>उडा्न हूं मैं

मार्च 23, 2011

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चीजों को     सरलीकृत मत करो

अर्थ     मत निकालो
हर बात के    मानी नहीं होते

चीजें होती हैं
अपनी संपूर्णता में बोलती हुयीं
हर बार
उनका कोई अर्थ नहीं होता

अपनी अनंत रश्मि बिंदुओं से बोलती
जैसे होती हैं    सुबहें
जैसे फैलती है तुम्‍हारी निगाह
छोर-अछोर को समे‍टती हुई
जीवन बढता है हमेशा
तमाम तय अर्थों को व्‍यर्थ करता हुआ
एक नये आकाश की ओर

हो सके तुम भी उसका हिस्‍सा बनो

तनो मत बात-बेबात
बल्कि खोलो खुद को
अंधकार के गर्भगृह से
जैसे खुलती हैं सुबहें
एक चुप के साथ्‍ा
जिसे गुंजान में बदलती
भागती है चिडिया
अनंत की ओर
और लौटकर टिक जाती है
किसी डाल पर
फिर फिर
उड जाने के लिये

नहीं
तुम्‍हारी डाल नहीं हूं मैं

उडान हूं मैं
फिर
फिर…।

राइनेर मारिया रिल्‍के के लिये

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>दर्शक

मार्च 23, 2011

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>मॉं , पिता जी

मार्च 22, 2011

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>हिन्दी के बलवाई – कबीरआँठ

मार्च 6, 2011

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निरूत्तराधुनिकता के बेपर बकता बबा बिभीखन पर एगो कोंचक बिषमबाद

ए बबुआ भुईंलोठन, आपन तिरकट नजरिय मार के तनी भाख कि आपन लंगडिस बबा बिभीखन बरबाद खबर में अबकी कवन पुरान नुसुखा भुडभुडाइल बाडन।

अजी धंधा ढूंढीस अचौरी बबा, पहिले त हमरा इ सबद लंगडिस के माने अझुराईं।

धत बुडबक , अतनो ना बुझलिस। अरे, उ निरूत्तराधुनिकता बर्बाद के बेपर बकता चिंदास बबा जब हिन्दी आ इंगलिस भाखा में समान अभाव से लंगडा के चलेले त उनका ढब आ धजा देख के हमार आतिमा बेलाजे भभीठ हो जाला।

ए बबा, रउओ का एतवारे – एतवारे अइसे भभीठ होखे के परण क लेले बानी। अबरियों बिभीखन बबा आपन बेरोजगार धरम के सपताहिक बरत निबहले बाडन। ए में पुरान का बा।

ए भुईंलोटन , तनी इ बिरतानत के अझुरा के समुझाव। जइसे आपन चिंदास बिभीखन बबा हर सपताह अझुरा अझुरा के आपन बकवास समुझावेले।

अरे का अझुराई ए बबा। अबरियो बबा बिभीषन आपन पुरान भरेठ दगले बाडन। माने समझ ल कि एहू बेरिया उ आपन कबीजीवा के लतिअवले बाडन।

कवन कबीजीवा के ए भुई लोटन। उनका त ना जिनका साल भर पहिरे आपन रूचिर किशोर बबा राज लतिअवले रहले।

हं बबा , उहे कबीजीवा के।

अरे भुईंलोटन, किशोरबबा के त गांधी आश्रम में स्थान परापत करे के रहे , उहे कबीजीवा के साथ, पर बबा बिभीखन कवन परमारथ कारने गरिअवलन हां, तनि ए पर अंधेर करीं।

ए भुईंलोटन, निरूत्तरआधुनिक युग में साधु सभे सवारथे कारण शरीर धरे ले। पर आपन बिभीखन बबा के कवन परमारथ अतिमा में बेआपल कि उ कबीजीवा के लतिआवे के इ धमाधम करम कइले, इ त उनकर देहिए जाने।

ए बबा, पहिले सभ बात अतिमा जानत रहे पर अब इ देहिया काहे अतना बेआपे लागल ,तनी इहो अझुराईं।

धत्त पगलेट, अपने गारद बबा बांच गइल बाडन नू कि निरूत्तर काल में अतिमा हिन्दी भाखा में रह जाई आ देहवा चिंदी भाखा में ……त क्षय हो चिंदास बबा बिभीखन के।

>मेरा एक शेर

फ़रवरी 21, 2011

>“सारी दुनिया में वो बिखरा पर कहीं खोया नहीं

जिसको लम्हे ने लिखा था वक़्त ने धोया नहीं”

>लोकायत

फ़रवरी 20, 2011

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शरीर
तू है 
तो आत्मा की 
जय जय है
जो तू न हो तो 
कोई कैसे कह सकता है 
कि आत्मा 
क्या शै  है …

>आफिसिअल समोसों पर पलनेवाले चूहे

फ़रवरी 19, 2011

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आफिसिअल समोसों पर
पलनेवाले चूहे
मालिक के आलू के बोरों को काटते हुए
सोचते हैं
कि दांत पजाते वर्षों हो गये
पर अपने सेठ का कुछ बिगड़ता नहीं
परकोटों पर पंख खुजाती चिड़ियों का संवाद
उन्हें जरा नहीं भाता
कि परिवर्तन में
कोई रुचि नहीं उनकी
कि जाने क्या खाती हैं ससुरी
कि दो जहानों की सैर कर आती हैं
एक हम हैं
कि नालियों के रास्ते सुरंग बनाते
उमर बीत गई
तमाम गोदामों में अंतर्जाल बना डाला
सुराखों के
इतने गुप्त संवाद किये
पर मायूसी लटकती रही हमारे चेहरों पर
बारहमासा
और ये हैं
कि बस चहचहाती फिरती हैं
दसों दिसाओं में …मूर्खायें .  

>नदी और पुल

दिसम्बर 30, 2010

>नदी और पुल

नदी में पानी नहीं
फिर भी यह पुल
पुल है

रेत की नदी भी
नदी कहलाती है

जबतक यह पुल है
नदी रहेगी
मौसमों का इंतजार करती हुई

नदी और पुल – २

नदी पार करने की ईच्छा में
जब नदी पार करने का साहस मिलता है
तो नदी पार करने की सहूलियत
बनाती है पुल

>अथ बेताल कथा – अजय कुमार

दिसम्बर 29, 2010

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>थोड़ा सा स्त्री होना चाहता हूँ

दिसम्बर 25, 2010

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