Archive for the ‘1987 में छपी कुमार के पहले संकलन ‘समुद्र के आंसू’ की पहली कविता।’ Category

>मां सरस्‍‍वती – कुमार मुकुल

मार्च 19, 2008

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मां सरस्‍वती! वरदान दो
कि हम सदा फूलें-फलें
अज्ञान सारा दूर हो
और हम आगे बढ़ें
अंधकार के आकाश को
हम पारकर उपर उठें
अहंकार के इस पाश को
हम काट कर के मुक्‍त हों
क्रोध की अग्नि हमारी
शेष होकर राख हो
प्रेम की धारा मधुर
फिर से हृदय में बह चले
मां सरस्‍वती! वरदान दो
कि हम सदा फूलें-फलें!

मां सरस्‍वती शुद्ध गद्य है – यह कविता कैसे हुई। एक प्रार्थना मात्र है।इसे गद्य की तरह पढ़ें। क्‍या गद्य को तोड़-तोड़कर मुद्रित कर देने से ही कविता हो जाती है मात्राएं भी सब पंक्तियों की एकसी नहीं हैं:15,13,14,12 – यह पहली चार पंक्तियों की मात्राएं हैं – छन्‍द भी ठीक नहीं – डॉ.प्रभाकर माचवे/3-1-88

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