>बरिश और कीचड से आबाद बचपन – कुमार मकुल

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चाँद  पर आवास  दीनानाथ सहनी  का चौथा  कविता संग्रह है। इसमें जीवन-जगत को लेकर कवि के सहज, सरल उद्गार और संबोधन हैं। विकास को लेकर कवि का अपना नजरिया है, वह लकीर पीटने में विश्वास नहीं करता बल्कि चीजों को वर्तमान संदर्भों में अपने ढंग से विष्लेश्ति करता है। चांद पर मानव बस्तियां बसने वाली हैं। भविस्य  की इन बस्तियों को लेकर बहुत उत्साहित नहीं वह ,क्योंकि वह जानता है कि आदमी महत्वाकांक्षा के घोडे  पर सवार है ,कि कल को चांद को भी बेषक वह धरती बना देगा ,वहां भी पेड-पौधे ,नदी-नाले होंगे पर बंधक बने कामगार भी वहां होंगे और सबसे बडा कवि का दुख यह है कि वहां चंदामामा का गीत नहीं होगा। चांद को लेकर लिखी पहली कविता के बाद पृथ्वीवासियों को संबोधित कविता भी उसी भाव का विस्तार है। इसमें भी वह कहता है कि – चांद पर मानव बस्तियां बसने से पूर्व / पृथ्वी पर गृविहीनों को आवास मिले।
    चाँद  पर जाने की तमाम महत्वाकांक्षी योजनाओं के बीच वह अपने देश  को याद करता है, मुरदों का देश  इसे कचोटता है क्योंकि यहां करूण का अभाव है,क्योंकि यहां श्रमिक जन का तिरस्कार है, पर कवि खुद को जानता है  कि वह – सरल किसान-कुल का बेटा है।
    कवि दलित, श्रमिक वर्ग का प्रतिनिधि है और अपनी ताकत का उसे भान है – मैं नहीं था आदि नफरत करने का / फिर भी मुझ पर जुल्म ढहाए गए/ मेरे बनाए हथियारों से निर्दोष  औरतों व बच्चों पर हमले किए गए
    कवि  की पीडा है  कि  वह अतीत की ओर ,जीवन के प्राचीन  श्रोतों की ओर लौटना चाहता है। अपनी जान की कीमत पर भी लौटने की  ईच्छा है उसकी। बारिश  और कीचड से आबाद उसका बचपन उसे आवाज देता है, वह उसकी ताकत है, यह कहने का साहस वह करता है, यही बातें उसे वर्तमान के नकलची कवियों से अलगाती है , जिनकी ना जडें हैं, ना जडों की पहचान और ना जडों से जुडने की ईच्छा।
    दीनानाथ को पढते कहीं-कहीं पाब्लो नेरूदा की कविताओं की अंतरलय का अहसास होता है – मुझे प्यार है मछुआरों से /जो समुद्र की लहरों से खेलते हैं  /चूमते हैं और चल देते हैं…/ फिर कभी नहीं लौटते।  नेरूदा भी कुछ ऐसा ही लिख चुके  हैं – वे चूमते हैं और चल देते हैं मौत से हमबिस्तर होने के लिए।
    व्यवस्था के प्रति कवि का आक्रोष गहरा है जो कहीं कहीं उसके स्वर को विद्रूप कर देता है, पर यह सहज है, रोते हुए कोई अपना चेहरा खुशनुमा कैसे दिखा सकता है – सरकारी कुत्ते /मंहगाई को सूंघते फिरते हैं /… बैंकों में शेयर  बाजारों में/ माल और मंडियों में /मंहगाई कहां है /…महंगाई तो / आज भी गा रही है अपने गीत / निरीह-गरीब जनता के आंसुओं में।
    बाजार के तमाम प्रपंचों से नष्ट  की जा रही धरती और उसके जनों के लिए गहरी करूणा और आशा  है कवि में । वह कुआं को पृथ्वी का उपहार पुकारता है और बच्चों के कठोर होते नेत्रों में/जनक्रांति का प्रतिबिम्ब देखता है।
    जीवन की जद्दोजहद को उसके विभिन्न रंगों रूपों व ध्वनियों के साथ अभिव्यक्त किया है कवि ने पर उसे संपादन पर भी ध्यान देना चाहिए। 160 पेज के इस संकलन से पचास पेज छांट दिए जाते और भाषा  पर कुछ और काम होता तो संग्रह और प्रभावी होता।

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