>पिता के संस्मरण

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  पिता को लेकर पहली याद रात को सोने जाने को लेकर है। खाने के बाद मैं पिता के पेट पर पैर देकर सो रहता था और वे कहानियां सुनाते थे, जीव जंतुओं वाली। शेर, बाघ, बगुला,केंकडा,सियार आदि वाली कहानियां जो आम भारतीय किसी न किसी से सुनते हैं या आगे जाकर पढते हैं। पिता से इस तरह कहानियां सुनना सबसे मजेदार अनुभवों में है। मां बहुत छुआ छूत मानती थीं  इसलिए लगता है मुझे उनकी संगत याद नहीं। आज भी पोते पोतियों को भी वे अपने बिछावन पर नहीं आने देतीं। यह सब आज एक मनोरोग में बदल चुका है जिससे मां निजात चाहती हैं, डाक्टर विनय से एकाध बार मैंने दवाएं भी ली हैं मां के लिए पर…।

    पिता अच्छे शिक्षक और कडे प्रशासक थे। उनका विषय अंग्रेजी था पर हम हमेशा पसंद करते कि वे हिन्दी का हमारा क्लास लें। चूंकि इस क्लास में भी वे कथाओं के माध्यम से शिक्षा देते थे जो हमें बहुत पसंद आता था। आज भी उनका क्लास में जयद्रथ वध की पंक्तियां सुनाना याद है – सिर कटा जयद्रथ का मस्तक निर्दोष पिता का चूर्ण हुआ। अंग्रेजी की तो यह हालत थी कि टवीशन पढने आने वाले छात्रों के हर बैच में वे मुझे बिठा देते थे। नतीजा अंग्रेजी के क्लास में जब वे नैरेशन या टेंश कुछ भी बनाने को देते तो कापी में मैं जवाब ही लिखता था और उनका बोलना समाप्त होते ही मैं कापी जमा कर देता था क्लास के जो तेज लडके थे वे यह देख हतप्रभ हो जाते थे। शेक्सपीयर के नाटक भी मैं दिन रात घोंटता रहता था। पर इस अतिरिक्त अंग्रेजीदां दबाव का ही नतीजा था कि आगे मैंने अंग्रेजी पर जरा ध्यान नहीं दिया। आज तक मैं अंग्रेजी से भागता हूं। हालांकि शुरू में कुछ कविताएं मैंने अंग्रेजी में लिखीं और दर्जनों कविताओं के अंग्रेजी से अनुवाद किए जो छपे भी पर मैं कभी भी खुद को अंग्रेजी के सामन्य जानकार के रूप में भी जाना जाना पसंद नहीं करता ।
    पहले अरसे तक मैं डायरी लिखा करता था पर पिता थे कि मेरी अच्छी खासी डायरी में गलतियां काट कर उसे बदरंग कर डालते थे। संभवतः इसी का नतीजा है कि अब मैं कहीं भी अपनी गलतियों को काटकर सुधारता नहीं, मन में होता है कि मैं जान ही रहा हूं  तो अब इसे सुधारना क्या…किसी बताना है …खुद ही को ना…।
    जिला स्कूल इंटर कालेज के प्रिंसीपल के रूप में पिता की बडी ख्याती थी। सहरसा में जिला स्कूल को ही लोग जानत े थे तब। चूंकि वहां पढाई तो होती ही थी परीक्षा मे चोरी नहीं होती थी। अगर किसी स्कूल का सेंटर वहां पडता तो उसका रिजल्ट खराब हो जाता था चोरी नहीं होने के कारण।
    ईमानदारी का तगमा पिता उम्र भर धारण किए रहे। एक बार हुआ यह कि कहीं खेलते हुए मैंने एक बेकार सी पडी कार के पेट्रोल टैंक का ढक्कन खोल लाया था किसी ने पिता को कह दिया फिर मेरी वह पिटायी हुयी कि …। इसी तरह एक बार कुत्ते के एक पिल्ले को मैं कान से उठाए उसका रिरियाना सुन रहा था कि सामने पिता पड गए, फिर तो थोपियाते हुए घर ले आए कि यह लडका तो बहुत दुष्ट है कल भी यह छिपकली को मार रहा था।
    बाजार जाते समय पिता मुझे साथ ले जाते। यह अच्छा और बुरा दोनों हाता। अच्छा यह कि मैं जानता होता कि आज पंजाबी की दुकान से रसगुल्ले और बालशाही खाने को मिलेंगे। पर रास्ता कैसे कटेगा यह सोच हमेशा डरा रहता मैं। रास्ते में पिता गणित के सवाल पूछते जाते और गलत होने पर एकाध चमेटा कहीं भी रसीद कर देते। नतीजा गणित में कभी मुझे अच्छे नंबर नहीं आए। बाजार जाते हमेशा यह डर रहता कि हाथ का झोला कहीं गिर ना जाए, यह मनोवैज्ञानिक दबाव की वजह से था।
    मैट्रिक तक मुझे कभी खेलने कूदने की छूट नहीं मिली नतीजा आगे एमए तक मैं खेलता ही रहा। पर पिता खुद फुटबाल के खिलाडी थे और गेंद जैसी गोल चीज को बिना हाथ लगाए पैरों पर उठाकर शाट लगाना उन्होंने ही सिखाया था। इसी तरह नदी में तैरने की भी ट्रेनिंग वे देते थे। धारा में लाकर मुझे छोडे देते कहते हाथ पांव मारो। मैं डूबता नाक में पानी जाने से चीखता किनारे भागने की कोशिश करता। तैरना भी मैं कभी ढंग से नहीं सीख सका। जब कि मेरे छोटे भाई बहन जो गर्मी की छुट्टी में एक माह के लिए गांव जाते बाकी बच्चों के साथ आसानी से खेल खेल में तैरना सीख गए थे। मैं तैरना इतना ही सीख सका कि कहीं भी डूब जाउं। मैं ताकत से तैरता था कुछ दूर जहां तक बाहें चलतीं पर गहरे पानी में भी निश्चिंत हो छप छप करते रहना मुझे नहीं आया कभी। जबकि पिता सांस फुला कर शव की तरह बीच धारा में बिना हाथ पांव हिलाए बहते जाने का करतब भी दिखलाते थे। ….जारी
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3 Comments »

  1. 1

    >बहुत प्रेरणादायी संस्मरण है |

  2. >बहुत सुन्दर संस्मरण| धन्यवाद|

  3. 3

    >मुकुल जी, शायद इसी कड़ी की एक पोस्‍ट थी, जिसमें आप अस्‍वस्‍थ्‍य पिता को देखने दिल्‍ली से पटना आए, जैसा जिक्र था उस पोस्‍ट में, इसका लिंक एक बार श्री राजूरंजन जी से मैंने लिया था, लेकिन अब फिर ढूंढ नहीं पा रहा हूं, यदि लिंक दे सकें rahulsinghcg@gmail.com पर तो मेहरबानी होगी.


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