अप्रैल 2011 के लिए पुरालेख

>अब पिता हैं कि मानते नहीं मुझे

अप्रैल 26, 2011

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पिछली 18 अप्रैल को पिता का देहांत हो गया। हालांकि घर में सब को लगा रहा है कि वे कहीं गये हैं और कभी भी लौट आएंगे….

पिता
अपनी छोटी गुदाज हथेली में
पिता की अंगुलियां थामे चल रहा था मैं
दूर सामने बहती नदी तक जाना था मुझे
नन्हें पांव थकने लगे थे रोने लगा था मैं
बिठा लिया था पिता ने तब कंधे पर अपने
बालों से उनके खेलने लगा था मैं निकटाने लगी थी नदी
पर सूरज उपर कसा जा रहा था
रोने लगा था मैं दुबारे
उतार दिया पिता ने तब चिलचिलाती रेत पर
बिल-बिलाकर चिपक गया था मैं बाहों में उनकी

फिर पास आ गयी थी नदी
भीगी रेत पर घरौंदे बनाए थे मैंने
चिल्ला-चिल्लाकर बुलाया था पिता को
आओ देखो यह घल मेला अपना घल
पर पिता से पहले आ गयी थी एक लहर
रूंआसा हो गया था मैं भयभीत भी
कि मेरा घर बहा ले जाने वाली यह लहर
मुझे तो नहीं ले जाएगी बहा कर….

अब कह रहे थे पिता
चलो तैरना सिखला दूं तुम्हें रोने लगा था मैं
पर कितने कठोर थे पिता
दुःसाध्य था कितना
इतिहास की सुरंगों से
वर्तमान के काल-खंडों तक
संचित
ज्ञान उनका

तब
ममत्व की बाहों से उठा
ले आए थे पिता
नदी की धारा में
धीरे से छुलाया था
सतह की नदी से
बोले मारो हाथ-पांव मारो
चीखें मारने लगा था मैं
और टप से छोड दिया था पिता ने
धारा में मुझे
बहता हाथ-पांव चलाता
डूबने लगा था मैं
समाने लगी थी नदी
मेरी आंखों में बाहों में रगों में
थोडा-थोडा होष
खोने लगा था मैं

आंखें खुलीं तो टंगा था मैं बांहों में पिता की
सोचा था कितनी लंबी हैं बाहें पिता की
लहरों से भी लंबी

क्या मैं नहीं हो सकता पिता की तरह
किनारों को छोड धारा में बना नहीं सकता घर
और कूद गया था मैं
बाहों के बल नदी में
आंखें खुली थीं भाग रहा था धारा में मैं
मछलियों के आगे-पीछे
देखता छू-छूकर तल में फैली कौडियां-सीपी-सिवार
बचता मगरों घडियालों के जबडे से
थकने लगता
तो लहरों से भी लंबी पिता की बाहें
थाम लेती थीं मुझे

आज हो चुका हूं कद्दावर पूरा
छूने लगे हैं नदी का तल मेरे पांव
और हाथ सहला रहे हैं चेहरा सूरज का

अब पिता हैं कि मानते नहीं मुझे
कहते हैं वहीं तक जाओ
लौट सको सुरक्षित जहां से मेरी बाहों में

पर तुम्हारा यह पवित्र मोह
हमारे अंतर के भविश्योन्मुख उर्जस्वित आवेग को
बांध सकेगा पिता
खुद बंध सके थे तुम ……..

१९८८  में पिता द्वारा छपवाए  गए  कविता  संकलन  सभ्यता  और  जीवन  से 
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>तुम्‍हारी उदासी के कितने शेड्स हैं विनायक सेन

अप्रैल 16, 2011

>जानता हूं विनायक सेन
बीमारी अंधकार और लौहदंडों के घेरे में
दम घुट रहा है तुम्‍हारा
दम घुट रहा है जनाकांक्षाओं का
पर देखो तो
तुम्‍हारी उदासी उद्भासित हो रही है कैसी
बज रही है कितने सुरों में
कि कतने शेड्स है इसके

यहां बाजू में घास पर बैठे हैं मंगलेश जी
चुप्‍पा हकबकाए से
आधा सिर हिलाते
कि नहीं
ठीक ऐसा नहीं है
कि जिगर फिगार अवाम की कीमत पर ली गयी
उधार की यह चमक
मुझे मंजूर नहीं

पास ही घुटनों के बल झुकी हैं भाषा सिंह
विस्‍फारित नेत्रों में बच्‍चों सा विस्‍मय भरे
अपने धैर्य को मृदु हास्‍य में बदलती
कुछ बतिया रही हैं रंजीत वर्मा से
वहीं उबियाए से बैठे हैं मदन कश्‍यप,रामजी यादव
कि तमाशा खडा करना हमारा मकसद नहीं
दाएं बाजू सामने चप्‍प्‍ल झोला रखे
बैठे हैं अजय प्रकाश
अपनी खिलंदडी मुस्‍कान के साथ
सरल हास्‍य में डूबी नजरों से ताकती प्रेमा को दिखलाते
कि वो तो रही नंदिता दास
वही
फिराक वाली नंदिता दास
दीप्‍ती नवल की खनकती निगाह को
यतीम कर दिए गए बच्‍चे के दर्द में डुबोकर
जड कर देने वाली नंदिता दास

उधर पीछे खडे हैं अभिषेक
अपनी ही चर्बी के इंकिलाब से अलबलाए
कि भईवा इ पानी है कि गर्म चाय
पास ही मुस्‍का रहे हैं अंजनी

कितने शेड्स हैं तुम्‍हारी उदासी के
उधर कितने अनमने से खडे हैं अनिल चमडिया
कि साहित्‍य अकादमी की धूमिल होती इस सांझ में
शामिल हो रहा है रंग खिलते अमलतास का
कि बजती है एक अंतरराष्‍ट्रीय धुन
कि सब तुम्‍हारे ही लिए हैं मेरी कुटुबुटु
कि चलता है रेला लोकधुन का
और फुसफुसते हैं लोग
कि यह राजस्‍थानी है कि गुजराती
कि भुनभुनाता है एक
कि यहां इस प्रीत के बोल की जरूरत क्‍या है

जरूरत है साथी
कि प्रीत के बोलों पर
अभिषेक और ऐश्‍वर्या की ही इजारेदारी नहीं
कि वे अपनी भूरी कांउस आंखों पर भी
कजरारे-कजरारे गवा लें
और पूरा मुलुक ताकता रह जाए
मुलुर-मुलुर

कि इन बोलों पर
फैज – नेरूदा – हिकमत का भी अधिकार है
कि प्रीत के बोलों पर उनका ही अधिकार है
जो अपनी धुन में चले चलते हैं
मौत से हमबिस्‍तर होने के लिए

हां ये सब
तुम्‍हारी उदासी के ही शेड्स हैं विनायक सेन
उदासी की ही धुन है यह
जिस पर नाच रहे हैं इतने सारे जन-गन
बौद्धिक-कवि-पत्रकार
सबको लग रहा है कि
यह उदासी है
कि वे हैं।

पाखी  अक्टूबर  अंक  में  प्रकाशित 

Posted in विनायक सेन. फैज – नेरूदा – हिकमत. दीप्‍ती नवल. नंदिता दास  |  1 Comment »