>हमलोगों का नाम कितना घटिया है पापा ….

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आदमी होकर सिंह, बाघ का टाइटल लगाते शर्म नहीं आती 
चार पांच साल से देख रहा हूं कि बेटे जब तब भुनभुनाने लगते कि पापा हमलोगों का नाम कैसा है…। मैं पूछता- कैसा है…। कैसा है क्‍या…एकदम घटिया है… छोटा बेटा भुनभुनाता…. यह कोई नाम हुआ …मम्‍मी आभा सिंह, पापा अमरेन्‍द्र कुमार, मुकुल, मैं अभिषेक रत्‍नम भैया पीयूष नारायण। स्‍कूल में टीचर, लडके कहते हैं कि तुम लोग क्‍या हो कुछ पता ही नहीं चलता। पीयूष ने भी जोडा- हां पापा, सब समझते हैं कि हम दक्षिण भारतीय हैं , रत्‍नम वहीं के लोग लगाते हैं। सबके नाम में सिंह रहना चाहिए था , इस पर सहमति थी क्‍योंकि मम्‍मी, बाबा और नाना के नाम में सिंह है।  और नाम के मामले में उन्‍हें लगता था कि मम्‍मी सही हैं।
       यह सब सुनकर मुझे गुस्‍सा आता, मैं कहता कि आदमी होकर सिंह, बाघ का टाइटल लगाना , शर्म नहीं आती। स्‍पष्‍ट है कि किसी बात को समझाने के, कन्विंश करने के ,मामले में गुस्‍साकर कुछ भी कहना सबसे बेहूदा तरीका है। पर जिस तरह से सिंह पर सबकी सहमति थी और मम्‍मी की बांछें खिल जाती थीं, गुस्‍सा आना स्‍वाभाविक था। पर चूंकि अपनी बेवकू‍फियों पर भी मैं नजर रखता हूं इसलिए मैं ऐसे समय का इंतजार करने लगा जब बिना गुस्‍सा के मैं अपना पक्ष रख सकूं।
       आखिर चार पांच साल बाद यह मौका आया। मम्‍मी को तो कुछ भी समझाना कठिन है पर बच्‍चे जैसे जैसे बडे होते गए उनकी ज्ञान पिपासा को शांत करने के दौरान मैं उनकी चेतना को वैज्ञानिक रूझान देने की कोशिशि करता रहता था। नतीजा सात साल की उम्र तक बच्‍चे ईश्‍वर के अस्तित्‍व को समझ गए थे और अब आस्‍था या भावुकता के दबाव में उन्‍हें इस संबंध में कुछ भी उटपटांग समझाना संभव नहीं था। घर में उनके बाबा, नाना सब पुजारी किस्‍म के थे। बच्‍चे जब छोटे थे तब पापा को बेवकूफ समझते थे कि पापा को इतना भी पता नहीं कि ईश्‍वर होता है…। पर जब जीवन से संबंधित अपनी जिज्ञासा को वे ईश्‍वर से जोड कर कुछ पूछते तो मेरा जवाब उन्‍हें इस संबंध में आश्‍वस्‍त करता जाता कि ईश्‍वर जैसी कोई चीज नहीं। और उसी उम्र से वे यह समझने लगे कि यह एक मानसिक स्थिति है, और इसे किसी को जोर देकर समझाया नहीं जा सकता जब तक कि उसकी जिज्ञासा नहीं हो।
      इधर एक दिन मैंने बच्‍चों को गांव में बहुत पहले बाघ के आने और उसके मारे जाने की कहानी सुनायी तब से वे जब तब पूछने लगे थे कि और कुछ बताइए। तो अबकी मैंने उन्‍हें जाति पर व्‍याख्‍यान दे देना जरूरी समझा। मैंने कहा कि सिंह टाइटल उस जमाने का है जब आदमी सिंह को जंगल का राजा समझता था। फिर यह एक छोटी सी जाति को इंगित करता है जो जग जीत लेने के मिथ्‍या दंभ में छाती फुलाए घूमती फिरती है। ऐसे टाइटल वालों की हालत भी वैसी ही होनी है जैसी कि सिंह की आज हो चुकी है।
       मैंने कहा कि मेरे नाम में सिंह बाघ नहीं है , और यह नाम पिता ने ही रखा है। चूंकि पिता अपने जमाने के पढे लिखे आदमी रहे हैं सो उन्‍होंने काफी पहले इस टाइटल की निस्‍सारता पहचान ली थी। बाबा पास ही थे तो बच्‍चे उनसे पूछ बैठे- उनका जवाब था कि उन्‍होंने देखा कि जाती के आधार पर उस समय बिहार और देश भर में सिरफुटौवल चल रही है, खून खराबा हो रहा है तो मैंने सोचा कि बच्‍चों को इस सबसे बचाने के लिए जरूरी है कि उनके नाम में एसे टाइटल ना जोडें।
       पिता अंग्रेजी के शिक्षक रहे और हिन्‍दी साहित्‍य पर भी उनकी पकड वैसी ही रही है सो हम दोनों भाइयों का नाम उन्‍होंने प्रसाद की एक ही कविता से चुना लिया था मेरा मुकुल और छोटे का किसलय। पुकार का नाम मुकुल तो चल गया पर किसलय की जगह गुडडू चला । मेरा नाम पिता ने अमरेन्‍द्र कुमार रखा था सर्टिफिकेट में। पर चेतना के विकसित होने के साथ मुझे यह नाम भी पसंद नहीं आ रहा था क्‍योंकि इसमें अमर और इन्‍द्र जैसे शब्‍द थे। इन्‍द्र से मुझे चिढ सी है , क्‍योंकि वह एक आततायी आर्य राजा रहा है। सो आगे मैंने अपने पुकार के नाम मुकुल को ही मुख्‍य नाम की तरह बरतने लगा। और आज वही जिन्‍दा है। …….जारी

     

 

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