>साहित्‍य अकादमी का कलमाडीकरण या नया विकास

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आज साहित्‍य अकादमी और रमणिका फाउंडेशन के संयुक्‍त तत्‍वावधान में देश भर की तमाम भाषाओं की कवयित्रियों का सम्‍मेलन था। मणिपुरी,बांग्‍ला,मलयाली,कश्‍मीरी,उदू,अंग्रेजी और हिन्‍दी अदि तमाम भारतीय भाषाओं की कवयित्रियों ने कविताएं पढीं। पूरे‍ दिन का चार सत्रों का कार्यक्रम था। ऐसी गहमा गहमी कभी कभी ही दिखती है। देखकर सुखद आश्‍चर्य हो रहा था। पर पिछले वर्षों में जिस तरह अकादमी का आधुनिकीकरण हो रहा है उसके कुछ नमूने भी दिखे। हाल तो अब चकाचक हो गया है। और उसका किराया भी हजार की जगह दस हजार से उपर हो गया है।
       चलिए यह भी ठीक है। इस व्‍यवस्‍था में विकास ऐसा ही होता है। वैसे भी आकदमी और सैमसंग की गंठजोड पर बबाल हो ही चुका है। ऐसे में आज के कार्यक्रम के दौरान अकादमी के आधुनिकीकरण के कुछ नमूने यहां पेश करता हूं।
        कई सत्रों में कार्यक्रम होने के चलते लोग बीच में उठ कर बाहर घूम टहल आ रहे थे। मैं भी बीच में युवा कवि अच्‍युतानंद के साथ बाहर के पार्क नुमा बची जगह में जा बैठा। हम बैठे ही थे कि वहीं एक ओर बैठा गार्ड पास आया और सूचना दी कि यहां बैठने की मनाही है, कि ऐसा किन्‍हीं राजकुमार वर्मा के आदेश से है। हमलोगों ने कहा कि ऐसा है तो यहां लिख कर टांग दो कि यहां बैठना मना है। इस पर वह अपने बॉस के पास गया और लौटा तो बोला कि वर्मा जी आपलोगों को बुला रहे हैं। हमने कहा उन्‍हें ही भेज दो यहां। गार्ड फिर वर्मा जी के पास गया और लौटा तो कुछ नहीं बोला।
        इस बीच हमने ध्‍यान दिया कि जहां हम बैठे हैं वहां की सारी घास सूखी है, कोई घेरा भी नहीं है वहां। उल्‍टा बगल का खेत जुता हुआ सा है और धूल उडकर आ रही है। फिर जिस घेरे की घास पर बैठने से रोका जा रहा था उसी के एक हिस्‍से में घास पर एक टूटी कुर्सी लगी है गार्ड के बैठने के लिए। अगर पार्क की घास बचानी है तो कुर्सी को घेरे के बाहर रखना चाहिए था। फिर अगर सुंदर दिखने का मामला हो तो ऐसी टूटी कुर्सी गार्ड को देना कौन सी सौदर्य दृष्टि है।

        फिर हमने इधर उधर ध्‍यान दिया तो पाया कि अकादमी के मेन गेट पर जिन दो खंभो पर जो छत टिकी है , वे खंभे नीचे से चणक कर टूट रहे हैं और वह छत कभी भी गिर सकती है, यह आप तस्‍वीर में देख सकते हैं कि खंभे कैसी स्थिति में हैं। अब सोचने की बात है कि तमाम सौंदर्यीकरण में लगी अकादमी की व्‍यवस्‍था को हम सूखी घास पर बैठ कर उसे गंदी करते तो दिखते हैं पर मुख्‍य दवार पर ढहता खंभा जो कभी भी किसी की जान को खतरा पहुंचा सकता है, नहीं दिख रहा है।

      
इसी तरह जब गोष्‍ठी का आरंभ हो चुका था पर कुछ लोग अभी चाय पी ही रहे थे तो एक अखबार के पत्रकार मित्र जो वहां आयोजन की खबर लिखने को आए थे चाय का कप लेकर भीतर जा बैठे तो पीछे से एक सज्‍जन ने आकर उन्‍हें कहा कि आप बाहर जाकर चाय पीएं।
      ठीक है , चाय बाहर जाकर पी जा सकती है और घास को हरी देख कर खुश हुआ जा सकता है पर इसे करने का एक तरीका होना चाहिए और पहले तमाम चीजों को दुरूस्‍त करने के बाद ही लोग खुद इन चीजों का ख्‍याल करेंगे। पर ऐसे खेत नुमा मैदान और टूटे खंभों से गुजरने के बाद लेखक बिरादरी अलग से सौंदर्य सचेत हो यह सहज नहीं।
    

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5 Comments »

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    >साहित्य अकादेमी के बाहर क्या मंज़र था इसकी बड़ी हृदयद्रावक तस्वीर तो आपने खींच दी प्रियवर, लेकिन यह नहीं बताया कि अन्दर क्या कुछ चल रहा था, अध्यक्ष महोदय कैसी पंजीरी बांट रहे थे. ज़रा यह भी बताते तो बात बनती, वरना आप और अच्युतानन्द भी इस कल्माडीकरण के अलंकरण ही माने जायेंगे — नीलाभ

  2. >नमस्‍कार नीलाभ जी, पिछला पोस्‍ट जो मैंने मिटा दिया ,यह देखकर कि हिरावल मोर्चा आप ही हैं, उसमें आपने अध्‍याक्ष जी दवारा महिलाओं को पंजीरी बांटने की बात की है नीलाभ जी, तो यहां महिलाओं शब्‍द, एक सरलीकरण की ओर ईशारा कर रहा है, मानो उनका कोई अस्तित्‍व ही ना हो, या वे बस पंजीरी या महान विचार हम पुरूषों से प्राप्‍त करने के लिए ही वहां जुटी हों,वहां देश भर से तमाम भाषाओं की कवयित्रियों उपस्थित थीं और वे अपने अंतरविरोधों और विचारों के साथ वहां थीं आप भी वहां रहते तो उन विचारों पर विमर्श करते आपके साथ या उन सबके साथ, ऐसे क्‍या कहा जाए… और कैसे हैं आप

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    >नए मुल्ला अल्लाह ही अल्लाह बाबू लोगों को रचनाकर्म से जुड़े संस्थानों में सैट किया जाएगा तो यही होगा

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    >अन्दर की ख़बर आज जनसत्ता में देखी, अशोक जी का बयान भी देखा, तो अन्दर क्या चल रहा था इसकी ख़बर देने का अनुरोध किया था मैने, वरना साहित्य अकादेमी के उजाड़ को आप पहले भी उजागर कर सकते थे, या बाद में भी. मैं ठीक हूं जितना इस समय कोई ठीक रह सकता है, जब हर जगह संस्कृति के कल्माडी अध्यक्षता के लिए बुलाये जा रहे हों.


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