>मानसिक रोगों की पहचान की समकालीन प्रणाली अविश्वसनीय है – डीएल रोजेनहन

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मन क्या है, इस सवाल पर अपने अध्यक्षीय भाषण में विचार करते हुए डॉ.एम.थिरूनावुकरसु कहते हैं कि यह शर्मनाक है कि अभी तक हम इस महत्वपूर्ण सवाल का कोई समुचित उत्तर नहीं तलाश पाए हैं। कि मन को लेकर किसी भी सहमति तक पहुंचने में हमने ऐतिहासिक अक्षमता प्रकट की है। इसकी जड में जाते हुए वे बताते हैं कि जिसने भी इस पर अपने मंतव्य रखने की कोशिश की उसे जैसी आलोचना व बहिष्कार से गुजरना पडा कि लोगों ने इस पर विचार करना ही बंद कर दिया। उनका मानना है कि हम मानसिक बीमारियों की व्याख्या के प्रश्न की उपेक्षा में सफल हो गए और मन की व्याख्या की भी उपेक्षा कर रहे हैं। उनका मानना है कि आज हम जिस नयी विचारधारा के समक्ष हैं वह है मानसिक स्वास्थ्य, जिसकी व्याख्या भी शेष है।

मनसिक स्वास्थ्य की व्याख्या के संदर्भ में थिरूनावुकरसु मनोवैज्ञानिक डीएल रोजेनहन के प्रयोग की चर्चा करते हैं। 1973 में रोजेनहन ने अपने अध्ययन ऑन बीईंग सेन इन इनसेन प्लेसेज को साइंस पत्रिका में छपवाकर तहलका मचा दिया था। उन्होंने दो प्रयोग किए थे। पहले में उन्होंने आठ सामान्य लोगों को छद्म रोगी बनाकर बारह अस्प्तालों में उपस्थित कराया था। आठ में तीन महिलाएं थीं और पांच पुरूषों में एक रोजेनहन भी थे। । सबने एक ही बीमारी श्रवण मतिभ्रम की शिकायत की। सबकी शिकायत थी कि उन्हें धमाका और सांय सांय की आवाज लगातार सुनाई देती है। रोजेनहन जानना चाहते थे कि क्या मनोचिकित्सक छद्म रोगियों की पहचान कर पाते हैं। पर यह शर्मनाक था कि तमाम विश्वविद्यालयों और अस्पतालों के मनोचिकित्सकों ने सात छद्म रोगियों को स्किजोफ्रेनिया का मरीज करार दिया। सिर्फ एक को मैनिक डिप्रेशिव सायकोसिस का शिकार माना गया।

इन सब को सात से बावन दिन तक भर्ती रखा गया। भर्ती होने के बाद इन्होंने अपनी बीमारी की शिकायत बंद कर दी और अस्पतालों के काम काज का लेखा जोखा लेने लगे। सबने दोस्ताना सहयोगपूर्ण व्यवहार किया और इसी रूप में उन्हें वहां दर्ज भी किया गया। पर किसी को भी अस्प्ताल में रहते सामन्य नहीं घोषित किया गया। इन सबको सायकोट्रॉपिक दवाएं दी गयीं जिन्हें ये आंख बचाकर फेंक दिया करते थे। सबको यह मानकर छुट्टी दी गयी कि वे स्किजोफ्रेनिया इन रेमिसन के शिकार और विक्षिप्त थे और अब बेहतर हैं।

रोजेनहन के इस प्रयोग की जब पोल खुल गयी तो एक अस्प्ताल ने दावा किया कि ऐसी गलतियां उसके संस्थान में नहीं होंगी। रोजेनहन ने तब यह सूचना दी कि वे अगले तीन महीनों में छद्म रोगियों को वहां भर्ती के लिए भेजेंगे। तीन महीनों के दौरान अस्पताल ने 193 मरीज भर्ती किए जिनमें 21 प्रतिशत को अस्पताल ने छद्म रोगी करार दिया। जब कि रोजेनहन ने खुलासा किया कि उसने कोई छद्म रोगी इस दौरान नहीं भेजा।

इस आधार पर रोजेनहन का निष्कर्ष था कि मानसिक रोगों की पहचान की समकालीन प्रणाली अविश्वसनीय है। रोजेनहन का सवाल था कि अगर सामान्य व्यवहार और पागलपन दोनों का अस्तित्व है तो हम उन्हें जानेंगे कैसे…। डॉ थिरूनावुकरसु का कहना है कि रोजेनहन के प्रयोगों के पैंतीस साल बाद आज भी उन सवालों का हमारे पास उचित उत्तर नहीं है…. जारी
इंडियन सायकाएट्रिक सोसाइटी के वार्षिक अधिवेशन में 17-1-2011 को दिये गये भाषण के आधार पर ।

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1 Comment »

  1. >रोचक प्रकरण| धन्यवाद|


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