>उडा्न हूं मैं

>

चीजों को     सरलीकृत मत करो

अर्थ     मत निकालो
हर बात के    मानी नहीं होते

चीजें होती हैं
अपनी संपूर्णता में बोलती हुयीं
हर बार
उनका कोई अर्थ नहीं होता

अपनी अनंत रश्मि बिंदुओं से बोलती
जैसे होती हैं    सुबहें
जैसे फैलती है तुम्‍हारी निगाह
छोर-अछोर को समे‍टती हुई
जीवन बढता है हमेशा
तमाम तय अर्थों को व्‍यर्थ करता हुआ
एक नये आकाश की ओर

हो सके तुम भी उसका हिस्‍सा बनो

तनो मत बात-बेबात
बल्कि खोलो खुद को
अंधकार के गर्भगृह से
जैसे खुलती हैं सुबहें
एक चुप के साथ्‍ा
जिसे गुंजान में बदलती
भागती है चिडिया
अनंत की ओर
और लौटकर टिक जाती है
किसी डाल पर
फिर फिर
उड जाने के लिये

नहीं
तुम्‍हारी डाल नहीं हूं मैं

उडान हूं मैं
फिर
फिर…।

राइनेर मारिया रिल्‍के के लिये

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7 Comments »

  1. >आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी हैकल (24-3-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकरअवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।http://charchamanch.blogspot.com/

  2. >चीजें होती हैंअपनी संपूर्णता में बोलती हुयीं हर बारउनका कोई अर्थ नहीं होताwaah , akshrashah sach , apni yah rachna rasprabha@gmail.com per bhejen parichay tasweer blog link ke saath vatvriksh ke liye

  3. 3

    >काव्य के नवीन फलक एवं आयामों को विस्तीर्ण करती एक अर्थपूर्ण रचना ! बहुत सुन्दर !

  4. 4

    >अर्थ मत निकालोहर बात के मानी नहीं होतेkitni sundar-saral bhasha men kitna bara sach….wah.

  5. >जीवन बढता है हमेशातमाम तय अर्थों को व्‍यर्थ करता हुआ एक नये आकाश की ओर..बहुत सार्थक कथन..बहुत सुन्दर


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