मार्च 2011 के लिए पुरालेख

>हमलोगों का नाम कितना घटिया है पापा ….

मार्च 28, 2011

>

आदमी होकर सिंह, बाघ का टाइटल लगाते शर्म नहीं आती 
चार पांच साल से देख रहा हूं कि बेटे जब तब भुनभुनाने लगते कि पापा हमलोगों का नाम कैसा है…। मैं पूछता- कैसा है…। कैसा है क्‍या…एकदम घटिया है… छोटा बेटा भुनभुनाता…. यह कोई नाम हुआ …मम्‍मी आभा सिंह, पापा अमरेन्‍द्र कुमार, मुकुल, मैं अभिषेक रत्‍नम भैया पीयूष नारायण। स्‍कूल में टीचर, लडके कहते हैं कि तुम लोग क्‍या हो कुछ पता ही नहीं चलता। पीयूष ने भी जोडा- हां पापा, सब समझते हैं कि हम दक्षिण भारतीय हैं , रत्‍नम वहीं के लोग लगाते हैं। सबके नाम में सिंह रहना चाहिए था , इस पर सहमति थी क्‍योंकि मम्‍मी, बाबा और नाना के नाम में सिंह है।  और नाम के मामले में उन्‍हें लगता था कि मम्‍मी सही हैं।
       यह सब सुनकर मुझे गुस्‍सा आता, मैं कहता कि आदमी होकर सिंह, बाघ का टाइटल लगाना , शर्म नहीं आती। स्‍पष्‍ट है कि किसी बात को समझाने के, कन्विंश करने के ,मामले में गुस्‍साकर कुछ भी कहना सबसे बेहूदा तरीका है। पर जिस तरह से सिंह पर सबकी सहमति थी और मम्‍मी की बांछें खिल जाती थीं, गुस्‍सा आना स्‍वाभाविक था। पर चूंकि अपनी बेवकू‍फियों पर भी मैं नजर रखता हूं इसलिए मैं ऐसे समय का इंतजार करने लगा जब बिना गुस्‍सा के मैं अपना पक्ष रख सकूं।
       आखिर चार पांच साल बाद यह मौका आया। मम्‍मी को तो कुछ भी समझाना कठिन है पर बच्‍चे जैसे जैसे बडे होते गए उनकी ज्ञान पिपासा को शांत करने के दौरान मैं उनकी चेतना को वैज्ञानिक रूझान देने की कोशिशि करता रहता था। नतीजा सात साल की उम्र तक बच्‍चे ईश्‍वर के अस्तित्‍व को समझ गए थे और अब आस्‍था या भावुकता के दबाव में उन्‍हें इस संबंध में कुछ भी उटपटांग समझाना संभव नहीं था। घर में उनके बाबा, नाना सब पुजारी किस्‍म के थे। बच्‍चे जब छोटे थे तब पापा को बेवकूफ समझते थे कि पापा को इतना भी पता नहीं कि ईश्‍वर होता है…। पर जब जीवन से संबंधित अपनी जिज्ञासा को वे ईश्‍वर से जोड कर कुछ पूछते तो मेरा जवाब उन्‍हें इस संबंध में आश्‍वस्‍त करता जाता कि ईश्‍वर जैसी कोई चीज नहीं। और उसी उम्र से वे यह समझने लगे कि यह एक मानसिक स्थिति है, और इसे किसी को जोर देकर समझाया नहीं जा सकता जब तक कि उसकी जिज्ञासा नहीं हो।
      इधर एक दिन मैंने बच्‍चों को गांव में बहुत पहले बाघ के आने और उसके मारे जाने की कहानी सुनायी तब से वे जब तब पूछने लगे थे कि और कुछ बताइए। तो अबकी मैंने उन्‍हें जाति पर व्‍याख्‍यान दे देना जरूरी समझा। मैंने कहा कि सिंह टाइटल उस जमाने का है जब आदमी सिंह को जंगल का राजा समझता था। फिर यह एक छोटी सी जाति को इंगित करता है जो जग जीत लेने के मिथ्‍या दंभ में छाती फुलाए घूमती फिरती है। ऐसे टाइटल वालों की हालत भी वैसी ही होनी है जैसी कि सिंह की आज हो चुकी है।
       मैंने कहा कि मेरे नाम में सिंह बाघ नहीं है , और यह नाम पिता ने ही रखा है। चूंकि पिता अपने जमाने के पढे लिखे आदमी रहे हैं सो उन्‍होंने काफी पहले इस टाइटल की निस्‍सारता पहचान ली थी। बाबा पास ही थे तो बच्‍चे उनसे पूछ बैठे- उनका जवाब था कि उन्‍होंने देखा कि जाती के आधार पर उस समय बिहार और देश भर में सिरफुटौवल चल रही है, खून खराबा हो रहा है तो मैंने सोचा कि बच्‍चों को इस सबसे बचाने के लिए जरूरी है कि उनके नाम में एसे टाइटल ना जोडें।
       पिता अंग्रेजी के शिक्षक रहे और हिन्‍दी साहित्‍य पर भी उनकी पकड वैसी ही रही है सो हम दोनों भाइयों का नाम उन्‍होंने प्रसाद की एक ही कविता से चुना लिया था मेरा मुकुल और छोटे का किसलय। पुकार का नाम मुकुल तो चल गया पर किसलय की जगह गुडडू चला । मेरा नाम पिता ने अमरेन्‍द्र कुमार रखा था सर्टिफिकेट में। पर चेतना के विकसित होने के साथ मुझे यह नाम भी पसंद नहीं आ रहा था क्‍योंकि इसमें अमर और इन्‍द्र जैसे शब्‍द थे। इन्‍द्र से मुझे चिढ सी है , क्‍योंकि वह एक आततायी आर्य राजा रहा है। सो आगे मैंने अपने पुकार के नाम मुकुल को ही मुख्‍य नाम की तरह बरतने लगा। और आज वही जिन्‍दा है। …….जारी

     

 

Advertisements

>साहित्‍य अकादमी का कलमाडीकरण या नया विकास

मार्च 26, 2011

>

आज साहित्‍य अकादमी और रमणिका फाउंडेशन के संयुक्‍त तत्‍वावधान में देश भर की तमाम भाषाओं की कवयित्रियों का सम्‍मेलन था। मणिपुरी,बांग्‍ला,मलयाली,कश्‍मीरी,उदू,अंग्रेजी और हिन्‍दी अदि तमाम भारतीय भाषाओं की कवयित्रियों ने कविताएं पढीं। पूरे‍ दिन का चार सत्रों का कार्यक्रम था। ऐसी गहमा गहमी कभी कभी ही दिखती है। देखकर सुखद आश्‍चर्य हो रहा था। पर पिछले वर्षों में जिस तरह अकादमी का आधुनिकीकरण हो रहा है उसके कुछ नमूने भी दिखे। हाल तो अब चकाचक हो गया है। और उसका किराया भी हजार की जगह दस हजार से उपर हो गया है।
       चलिए यह भी ठीक है। इस व्‍यवस्‍था में विकास ऐसा ही होता है। वैसे भी आकदमी और सैमसंग की गंठजोड पर बबाल हो ही चुका है। ऐसे में आज के कार्यक्रम के दौरान अकादमी के आधुनिकीकरण के कुछ नमूने यहां पेश करता हूं।
        कई सत्रों में कार्यक्रम होने के चलते लोग बीच में उठ कर बाहर घूम टहल आ रहे थे। मैं भी बीच में युवा कवि अच्‍युतानंद के साथ बाहर के पार्क नुमा बची जगह में जा बैठा। हम बैठे ही थे कि वहीं एक ओर बैठा गार्ड पास आया और सूचना दी कि यहां बैठने की मनाही है, कि ऐसा किन्‍हीं राजकुमार वर्मा के आदेश से है। हमलोगों ने कहा कि ऐसा है तो यहां लिख कर टांग दो कि यहां बैठना मना है। इस पर वह अपने बॉस के पास गया और लौटा तो बोला कि वर्मा जी आपलोगों को बुला रहे हैं। हमने कहा उन्‍हें ही भेज दो यहां। गार्ड फिर वर्मा जी के पास गया और लौटा तो कुछ नहीं बोला।
        इस बीच हमने ध्‍यान दिया कि जहां हम बैठे हैं वहां की सारी घास सूखी है, कोई घेरा भी नहीं है वहां। उल्‍टा बगल का खेत जुता हुआ सा है और धूल उडकर आ रही है। फिर जिस घेरे की घास पर बैठने से रोका जा रहा था उसी के एक हिस्‍से में घास पर एक टूटी कुर्सी लगी है गार्ड के बैठने के लिए। अगर पार्क की घास बचानी है तो कुर्सी को घेरे के बाहर रखना चाहिए था। फिर अगर सुंदर दिखने का मामला हो तो ऐसी टूटी कुर्सी गार्ड को देना कौन सी सौदर्य दृष्टि है।

        फिर हमने इधर उधर ध्‍यान दिया तो पाया कि अकादमी के मेन गेट पर जिन दो खंभो पर जो छत टिकी है , वे खंभे नीचे से चणक कर टूट रहे हैं और वह छत कभी भी गिर सकती है, यह आप तस्‍वीर में देख सकते हैं कि खंभे कैसी स्थिति में हैं। अब सोचने की बात है कि तमाम सौंदर्यीकरण में लगी अकादमी की व्‍यवस्‍था को हम सूखी घास पर बैठ कर उसे गंदी करते तो दिखते हैं पर मुख्‍य दवार पर ढहता खंभा जो कभी भी किसी की जान को खतरा पहुंचा सकता है, नहीं दिख रहा है।

      
इसी तरह जब गोष्‍ठी का आरंभ हो चुका था पर कुछ लोग अभी चाय पी ही रहे थे तो एक अखबार के पत्रकार मित्र जो वहां आयोजन की खबर लिखने को आए थे चाय का कप लेकर भीतर जा बैठे तो पीछे से एक सज्‍जन ने आकर उन्‍हें कहा कि आप बाहर जाकर चाय पीएं।
      ठीक है , चाय बाहर जाकर पी जा सकती है और घास को हरी देख कर खुश हुआ जा सकता है पर इसे करने का एक तरीका होना चाहिए और पहले तमाम चीजों को दुरूस्‍त करने के बाद ही लोग खुद इन चीजों का ख्‍याल करेंगे। पर ऐसे खेत नुमा मैदान और टूटे खंभों से गुजरने के बाद लेखक बिरादरी अलग से सौंदर्य सचेत हो यह सहज नहीं।
    

>मानसिक रोगों की पहचान की समकालीन प्रणाली अविश्वसनीय है – डीएल रोजेनहन

मार्च 23, 2011

>

मन क्या है, इस सवाल पर अपने अध्यक्षीय भाषण में विचार करते हुए डॉ.एम.थिरूनावुकरसु कहते हैं कि यह शर्मनाक है कि अभी तक हम इस महत्वपूर्ण सवाल का कोई समुचित उत्तर नहीं तलाश पाए हैं। कि मन को लेकर किसी भी सहमति तक पहुंचने में हमने ऐतिहासिक अक्षमता प्रकट की है। इसकी जड में जाते हुए वे बताते हैं कि जिसने भी इस पर अपने मंतव्य रखने की कोशिश की उसे जैसी आलोचना व बहिष्कार से गुजरना पडा कि लोगों ने इस पर विचार करना ही बंद कर दिया। उनका मानना है कि हम मानसिक बीमारियों की व्याख्या के प्रश्न की उपेक्षा में सफल हो गए और मन की व्याख्या की भी उपेक्षा कर रहे हैं। उनका मानना है कि आज हम जिस नयी विचारधारा के समक्ष हैं वह है मानसिक स्वास्थ्य, जिसकी व्याख्या भी शेष है।

मनसिक स्वास्थ्य की व्याख्या के संदर्भ में थिरूनावुकरसु मनोवैज्ञानिक डीएल रोजेनहन के प्रयोग की चर्चा करते हैं। 1973 में रोजेनहन ने अपने अध्ययन ऑन बीईंग सेन इन इनसेन प्लेसेज को साइंस पत्रिका में छपवाकर तहलका मचा दिया था। उन्होंने दो प्रयोग किए थे। पहले में उन्होंने आठ सामान्य लोगों को छद्म रोगी बनाकर बारह अस्प्तालों में उपस्थित कराया था। आठ में तीन महिलाएं थीं और पांच पुरूषों में एक रोजेनहन भी थे। । सबने एक ही बीमारी श्रवण मतिभ्रम की शिकायत की। सबकी शिकायत थी कि उन्हें धमाका और सांय सांय की आवाज लगातार सुनाई देती है। रोजेनहन जानना चाहते थे कि क्या मनोचिकित्सक छद्म रोगियों की पहचान कर पाते हैं। पर यह शर्मनाक था कि तमाम विश्वविद्यालयों और अस्पतालों के मनोचिकित्सकों ने सात छद्म रोगियों को स्किजोफ्रेनिया का मरीज करार दिया। सिर्फ एक को मैनिक डिप्रेशिव सायकोसिस का शिकार माना गया।

इन सब को सात से बावन दिन तक भर्ती रखा गया। भर्ती होने के बाद इन्होंने अपनी बीमारी की शिकायत बंद कर दी और अस्पतालों के काम काज का लेखा जोखा लेने लगे। सबने दोस्ताना सहयोगपूर्ण व्यवहार किया और इसी रूप में उन्हें वहां दर्ज भी किया गया। पर किसी को भी अस्प्ताल में रहते सामन्य नहीं घोषित किया गया। इन सबको सायकोट्रॉपिक दवाएं दी गयीं जिन्हें ये आंख बचाकर फेंक दिया करते थे। सबको यह मानकर छुट्टी दी गयी कि वे स्किजोफ्रेनिया इन रेमिसन के शिकार और विक्षिप्त थे और अब बेहतर हैं।

रोजेनहन के इस प्रयोग की जब पोल खुल गयी तो एक अस्प्ताल ने दावा किया कि ऐसी गलतियां उसके संस्थान में नहीं होंगी। रोजेनहन ने तब यह सूचना दी कि वे अगले तीन महीनों में छद्म रोगियों को वहां भर्ती के लिए भेजेंगे। तीन महीनों के दौरान अस्पताल ने 193 मरीज भर्ती किए जिनमें 21 प्रतिशत को अस्पताल ने छद्म रोगी करार दिया। जब कि रोजेनहन ने खुलासा किया कि उसने कोई छद्म रोगी इस दौरान नहीं भेजा।

इस आधार पर रोजेनहन का निष्कर्ष था कि मानसिक रोगों की पहचान की समकालीन प्रणाली अविश्वसनीय है। रोजेनहन का सवाल था कि अगर सामान्य व्यवहार और पागलपन दोनों का अस्तित्व है तो हम उन्हें जानेंगे कैसे…। डॉ थिरूनावुकरसु का कहना है कि रोजेनहन के प्रयोगों के पैंतीस साल बाद आज भी उन सवालों का हमारे पास उचित उत्तर नहीं है…. जारी
इंडियन सायकाएट्रिक सोसाइटी के वार्षिक अधिवेशन में 17-1-2011 को दिये गये भाषण के आधार पर ।

>उडा्न हूं मैं

मार्च 23, 2011

>

चीजों को     सरलीकृत मत करो

अर्थ     मत निकालो
हर बात के    मानी नहीं होते

चीजें होती हैं
अपनी संपूर्णता में बोलती हुयीं
हर बार
उनका कोई अर्थ नहीं होता

अपनी अनंत रश्मि बिंदुओं से बोलती
जैसे होती हैं    सुबहें
जैसे फैलती है तुम्‍हारी निगाह
छोर-अछोर को समे‍टती हुई
जीवन बढता है हमेशा
तमाम तय अर्थों को व्‍यर्थ करता हुआ
एक नये आकाश की ओर

हो सके तुम भी उसका हिस्‍सा बनो

तनो मत बात-बेबात
बल्कि खोलो खुद को
अंधकार के गर्भगृह से
जैसे खुलती हैं सुबहें
एक चुप के साथ्‍ा
जिसे गुंजान में बदलती
भागती है चिडिया
अनंत की ओर
और लौटकर टिक जाती है
किसी डाल पर
फिर फिर
उड जाने के लिये

नहीं
तुम्‍हारी डाल नहीं हूं मैं

उडान हूं मैं
फिर
फिर…।

राइनेर मारिया रिल्‍के के लिये

>दर्शक

मार्च 23, 2011

>

>मॉं , पिता जी

मार्च 22, 2011

>

>हिन्दी के बलवाई – कबीरआँठ

मार्च 6, 2011

>

निरूत्तराधुनिकता के बेपर बकता बबा बिभीखन पर एगो कोंचक बिषमबाद

ए बबुआ भुईंलोठन, आपन तिरकट नजरिय मार के तनी भाख कि आपन लंगडिस बबा बिभीखन बरबाद खबर में अबकी कवन पुरान नुसुखा भुडभुडाइल बाडन।

अजी धंधा ढूंढीस अचौरी बबा, पहिले त हमरा इ सबद लंगडिस के माने अझुराईं।

धत बुडबक , अतनो ना बुझलिस। अरे, उ निरूत्तराधुनिकता बर्बाद के बेपर बकता चिंदास बबा जब हिन्दी आ इंगलिस भाखा में समान अभाव से लंगडा के चलेले त उनका ढब आ धजा देख के हमार आतिमा बेलाजे भभीठ हो जाला।

ए बबा, रउओ का एतवारे – एतवारे अइसे भभीठ होखे के परण क लेले बानी। अबरियों बिभीखन बबा आपन बेरोजगार धरम के सपताहिक बरत निबहले बाडन। ए में पुरान का बा।

ए भुईंलोटन , तनी इ बिरतानत के अझुरा के समुझाव। जइसे आपन चिंदास बिभीखन बबा हर सपताह अझुरा अझुरा के आपन बकवास समुझावेले।

अरे का अझुराई ए बबा। अबरियो बबा बिभीषन आपन पुरान भरेठ दगले बाडन। माने समझ ल कि एहू बेरिया उ आपन कबीजीवा के लतिअवले बाडन।

कवन कबीजीवा के ए भुई लोटन। उनका त ना जिनका साल भर पहिरे आपन रूचिर किशोर बबा राज लतिअवले रहले।

हं बबा , उहे कबीजीवा के।

अरे भुईंलोटन, किशोरबबा के त गांधी आश्रम में स्थान परापत करे के रहे , उहे कबीजीवा के साथ, पर बबा बिभीखन कवन परमारथ कारने गरिअवलन हां, तनि ए पर अंधेर करीं।

ए भुईंलोटन, निरूत्तरआधुनिक युग में साधु सभे सवारथे कारण शरीर धरे ले। पर आपन बिभीखन बबा के कवन परमारथ अतिमा में बेआपल कि उ कबीजीवा के लतिआवे के इ धमाधम करम कइले, इ त उनकर देहिए जाने।

ए बबा, पहिले सभ बात अतिमा जानत रहे पर अब इ देहिया काहे अतना बेआपे लागल ,तनी इहो अझुराईं।

धत्त पगलेट, अपने गारद बबा बांच गइल बाडन नू कि निरूत्तर काल में अतिमा हिन्दी भाखा में रह जाई आ देहवा चिंदी भाखा में ……त क्षय हो चिंदास बबा बिभीखन के।