फ़रवरी 2011 के लिए पुरालेख

>मेरा एक शेर

फ़रवरी 21, 2011

>“सारी दुनिया में वो बिखरा पर कहीं खोया नहीं

जिसको लम्हे ने लिखा था वक़्त ने धोया नहीं”

>लोकायत

फ़रवरी 20, 2011

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शरीर
तू है 
तो आत्मा की 
जय जय है
जो तू न हो तो 
कोई कैसे कह सकता है 
कि आत्मा 
क्या शै  है …

>आफिसिअल समोसों पर पलनेवाले चूहे

फ़रवरी 19, 2011

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आफिसिअल समोसों पर
पलनेवाले चूहे
मालिक के आलू के बोरों को काटते हुए
सोचते हैं
कि दांत पजाते वर्षों हो गये
पर अपने सेठ का कुछ बिगड़ता नहीं
परकोटों पर पंख खुजाती चिड़ियों का संवाद
उन्हें जरा नहीं भाता
कि परिवर्तन में
कोई रुचि नहीं उनकी
कि जाने क्या खाती हैं ससुरी
कि दो जहानों की सैर कर आती हैं
एक हम हैं
कि नालियों के रास्ते सुरंग बनाते
उमर बीत गई
तमाम गोदामों में अंतर्जाल बना डाला
सुराखों के
इतने गुप्त संवाद किये
पर मायूसी लटकती रही हमारे चेहरों पर
बारहमासा
और ये हैं
कि बस चहचहाती फिरती हैं
दसों दिसाओं में …मूर्खायें .