>दो फरेबों के बीच के समय में – संस्मरणात्मक डायरी – 2008 [संदर्भ – उदय प्रकाश]

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एक फरेब खाकर मैं पहुंचा था उनके [उदय प्रकाश]  घर , चार साल बाद दूसरी बार ,सो, पहले पूछा उनकी पत्नी ने , आपका नाम ……..
बैठिए ……..आपका ब्लाग [कारवां] हमलोग देखते रहते हैं ………..
इतना सुनना था कि फरेब की काली छाया जा छुपी मेरी आंखों के भीतर, कि कहीं से आयी मिलेना [ छोटी सी  सफ़ेद कुतिया]  और तलुवे चाटने लगी।
ओह – मेरा जी गुदगुदाया , कि आवाज आयी ………….
नहीं मिलेना………..    नहीं  …………….  
और पूंछ हिलाती मिलेना पास ही लेट गयी
तबतक भीतर से आवाज आयी……………
आ रहा हूं  ………….  बस  
आते हुए पूछा उन्होंने  ………………  
तो आपका इतवार आज पडता है…………….
मैं तो अभी वही लिखने जा रहा था आरकुट पर…………..
ओह …………   सकुचाया मैं………….
कोने में रायपफल पडी थी, मृत सी। सामने एक नीग्रो जोडा दीवार पर पींगें लडा रहा था। गर्मी काफी थी , पर बाहर बदली सी थी सो राहत थी
परदे टंगे थे……..लैंप की हल्की रौशनी  ………और मार तमाम मूर्तियां ………..तस्वीरें ………और उनको रखने का एक कायदा।
चाय या ठंडा………….
कुछ भी ……….   चाय ……..या……..  
चलिए ………. ठंडा
अच्छी है आपकी पत्रिका  ………..[मनोवेद]
अरे युवावस्था में मैं भी सिजोफ्रेनिक हो गया था। साल भर इलाज चला।
फिर … मजेदार पूरी कथा…………
कुछ विचित्र लक्षण थे उस रोग के………………
लगता………. कि यह झूठ है कि लंदन अमेरिका दूर है …………..   कि जरूर कोई सार्टकट  होगा   …………. और जब तब निकल पडता गांव में  ………….  कि जरा लंदन होता आ रहा हूं………………..कि जरा अमेरिका चला गया था   ……….   कि एक सार्टकट है मेरे पास
कि हमेसा  अकेला अंध्रेरे  कमरे में रहना अच्छा लगता था
और मुझे याद आयी फरेब की …………….   तो फरेब का भी अपना संकट है
आगे बोले वो- मुझे लगता कि हर आदमी मेरे विरुद्ध  खडयंत्र कर रहा है………..
फिर हंसते हुए कहा – एक अच्छी बात है इस इस पागलपन के साथ, कि यह दुबारा नहीं होता……………..
कि मैं इसे लिखूंगा अपने ब्लाग पर……………….
फिर एक लघु फिल्म दिखायी , जो उन्होंने बनायी थी, साहित्य अकादमी के लिये – भारतेन्दु …
उसे देखते जाना कि भारतेन्दु ने तत्कालीन अंग्रेज शासक की अभ्यर्थना करते हुए उसकी तुलना शिव से की थी। पूरी डाक्यूमेंटरी सुबह और शाम   के दृष्यों की तरह रंगीन थी।
फिल्म के दौरान मोबाइल बजा।
मैने सोचा कि यह फरेब खाने का सही वक्त नहीं ………..  सो उसे ऑफ कर दिया।
बहुत खुश  थे वो
चलिए आज आपकी तस्वीरें लूं कुछ……………बहुत अच्छा फोटोग्राफर हूं……………..
एक दो चार  बार फ्लैश  चमकी  …………  कुछ परेशान दिखे वो  
समझ गया मैं …… मुझ पर फरेब की छाया दिख रही थी उन्हें    वे हंसी ढूंढ रहे थे    आखिरकार वे सफल हुए
इधर  आकर खडे होइए, निराला की तस्वीर के बाएं बाजू
शाम के रंगीन आकाश  की तरह थी निराला की वह तस्वीर
उससे कुछ रंगत ले मैने फरेब की काली छाया पर पोता और मेरी रंगत कुछ खिली
हां   यह अच्छी आयी   और यह भी
तुरत उसे कम्प्यूटर पर लोड किया…….  
अभी आपको मेल कर देता हूं…….
कमरे पर नजर फिरायी मैंने    किताबें,   कैसेट्स , देशी विदेशी शराब  की बोतलें सजी थीं शीशे   में
और ब्रेख्त की तस्वीरें
और आज मैं भी उनके बीच था उन तस्वीरों में ….   वाह
फिर हम बैठे  …..फरेब अब थक रहा था  , मर रहा था अपनी मौत
जरा मेरी नयी आयी किताब [कवि ने कहा] तो लाइए
पत्नी को संबोधित किया उन्होंने। फिर किताब पर लिखा – प्रिय…   को, घर आने की ख़ुशी  में।
लीलाधर मंडलोई की एक कविता  [अब कोई नहीं आता]…  याद आ रही थी
फिर आलोकध्न्वा और सोननद आदि पर तमाम चर्चाएं हुईं…  फिर….  कि इतनी दूर से आए हैं   खाकर जाइए
पर फरेब सर उठाने लगा था…..    नहीं  ….  भूख नहीं है …फिर आते हैं
जरूर आइएगा ……………   बहुत अच्छा लगा   …………….

उदय प्रकाश के अध्ययन कक्ष में – छाया – उदय प्रकाश 
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