दिसम्बर 2010 के लिए पुरालेख

>नदी और पुल

दिसम्बर 30, 2010

>नदी और पुल

नदी में पानी नहीं
फिर भी यह पुल
पुल है

रेत की नदी भी
नदी कहलाती है

जबतक यह पुल है
नदी रहेगी
मौसमों का इंतजार करती हुई

नदी और पुल – २

नदी पार करने की ईच्छा में
जब नदी पार करने का साहस मिलता है
तो नदी पार करने की सहूलियत
बनाती है पुल

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>अथ बेताल कथा – अजय कुमार

दिसम्बर 29, 2010

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>थोड़ा सा स्त्री होना चाहता हूँ

दिसम्बर 25, 2010

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>फैशन के इस दौर में

दिसम्बर 25, 2010

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>दो फरेबों के बीच के समय में – संस्मरणात्मक डायरी – 2008 [संदर्भ – उदय प्रकाश]

दिसम्बर 24, 2010

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एक फरेब खाकर मैं पहुंचा था उनके [उदय प्रकाश]  घर , चार साल बाद दूसरी बार ,सो, पहले पूछा उनकी पत्नी ने , आपका नाम ……..
बैठिए ……..आपका ब्लाग [कारवां] हमलोग देखते रहते हैं ………..
इतना सुनना था कि फरेब की काली छाया जा छुपी मेरी आंखों के भीतर, कि कहीं से आयी मिलेना [ छोटी सी  सफ़ेद कुतिया]  और तलुवे चाटने लगी।
ओह – मेरा जी गुदगुदाया , कि आवाज आयी ………….
नहीं मिलेना………..    नहीं  …………….  
और पूंछ हिलाती मिलेना पास ही लेट गयी
तबतक भीतर से आवाज आयी……………
आ रहा हूं  ………….  बस  
आते हुए पूछा उन्होंने  ………………  
तो आपका इतवार आज पडता है…………….
मैं तो अभी वही लिखने जा रहा था आरकुट पर…………..
ओह …………   सकुचाया मैं………….
कोने में रायपफल पडी थी, मृत सी। सामने एक नीग्रो जोडा दीवार पर पींगें लडा रहा था। गर्मी काफी थी , पर बाहर बदली सी थी सो राहत थी
परदे टंगे थे……..लैंप की हल्की रौशनी  ………और मार तमाम मूर्तियां ………..तस्वीरें ………और उनको रखने का एक कायदा।
चाय या ठंडा………….
कुछ भी ……….   चाय ……..या……..  
चलिए ………. ठंडा
अच्छी है आपकी पत्रिका  ………..[मनोवेद]
अरे युवावस्था में मैं भी सिजोफ्रेनिक हो गया था। साल भर इलाज चला।
फिर … मजेदार पूरी कथा…………
कुछ विचित्र लक्षण थे उस रोग के………………
लगता………. कि यह झूठ है कि लंदन अमेरिका दूर है …………..   कि जरूर कोई सार्टकट  होगा   …………. और जब तब निकल पडता गांव में  ………….  कि जरा लंदन होता आ रहा हूं………………..कि जरा अमेरिका चला गया था   ……….   कि एक सार्टकट है मेरे पास
कि हमेसा  अकेला अंध्रेरे  कमरे में रहना अच्छा लगता था
और मुझे याद आयी फरेब की …………….   तो फरेब का भी अपना संकट है
आगे बोले वो- मुझे लगता कि हर आदमी मेरे विरुद्ध  खडयंत्र कर रहा है………..
फिर हंसते हुए कहा – एक अच्छी बात है इस इस पागलपन के साथ, कि यह दुबारा नहीं होता……………..
कि मैं इसे लिखूंगा अपने ब्लाग पर……………….
फिर एक लघु फिल्म दिखायी , जो उन्होंने बनायी थी, साहित्य अकादमी के लिये – भारतेन्दु …
उसे देखते जाना कि भारतेन्दु ने तत्कालीन अंग्रेज शासक की अभ्यर्थना करते हुए उसकी तुलना शिव से की थी। पूरी डाक्यूमेंटरी सुबह और शाम   के दृष्यों की तरह रंगीन थी।
फिल्म के दौरान मोबाइल बजा।
मैने सोचा कि यह फरेब खाने का सही वक्त नहीं ………..  सो उसे ऑफ कर दिया।
बहुत खुश  थे वो
चलिए आज आपकी तस्वीरें लूं कुछ……………बहुत अच्छा फोटोग्राफर हूं……………..
एक दो चार  बार फ्लैश  चमकी  …………  कुछ परेशान दिखे वो  
समझ गया मैं …… मुझ पर फरेब की छाया दिख रही थी उन्हें    वे हंसी ढूंढ रहे थे    आखिरकार वे सफल हुए
इधर  आकर खडे होइए, निराला की तस्वीर के बाएं बाजू
शाम के रंगीन आकाश  की तरह थी निराला की वह तस्वीर
उससे कुछ रंगत ले मैने फरेब की काली छाया पर पोता और मेरी रंगत कुछ खिली
हां   यह अच्छी आयी   और यह भी
तुरत उसे कम्प्यूटर पर लोड किया…….  
अभी आपको मेल कर देता हूं…….
कमरे पर नजर फिरायी मैंने    किताबें,   कैसेट्स , देशी विदेशी शराब  की बोतलें सजी थीं शीशे   में
और ब्रेख्त की तस्वीरें
और आज मैं भी उनके बीच था उन तस्वीरों में ….   वाह
फिर हम बैठे  …..फरेब अब थक रहा था  , मर रहा था अपनी मौत
जरा मेरी नयी आयी किताब [कवि ने कहा] तो लाइए
पत्नी को संबोधित किया उन्होंने। फिर किताब पर लिखा – प्रिय…   को, घर आने की ख़ुशी  में।
लीलाधर मंडलोई की एक कविता  [अब कोई नहीं आता]…  याद आ रही थी
फिर आलोकध्न्वा और सोननद आदि पर तमाम चर्चाएं हुईं…  फिर….  कि इतनी दूर से आए हैं   खाकर जाइए
पर फरेब सर उठाने लगा था…..    नहीं  ….  भूख नहीं है …फिर आते हैं
जरूर आइएगा ……………   बहुत अच्छा लगा   …………….

उदय प्रकाश के अध्ययन कक्ष में – छाया – उदय प्रकाश 

>आज दलित भी जातिवादी हो रहा है – डॉ. तुलसीराम

दिसम्बर 1, 2010

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 मुर्दहिया के लेखक डॉ. तुलसीराम से एक बातचीत

पिछले कुछ समय से साहित्‍य में बदलाव को लेकर कौन से नये विमर्श सामने आए हैं। आज का भारतीय समाज जिन संकटों से गुजर रहा है, क्‍या साहित्‍य उन संघर्षों और संकटों की पहचान कर पा रहा है, यदि हां , तो उनका स्‍वरूप क्‍या है…साहित्‍य में हो रहे परिवर्तनों के प्रति आपका नजरिया क्‍या है …नये यथार्थ को अभिव्‍यक्‍त करने वाली रचनाएं क्‍या आज हो पा रही हैं, यदि नहीं तो क्‍यों…क्‍या मोबाइल और रसोई गैस ने दुनिया बदल दी है…क्‍या आज का साहित्‍य केवल नये मध्‍यवर्ग को संबोधित है…
साहित्‍य सर्वहारा के संघर्ष से कट क्यों रहा है…
 तुलसी राम – विमर्श दो ही हैं इस समय, दलित और स्‍त्री। दोनों ने परंपरिक साहित्‍य की जडें हिला दी हैं। उसके जातीय वर्चस्‍व को चुनौती दी है। फलत: दोनों के विरूद़घ  आवाज उठती रही है। दलित साहित्‍य के बारे में परंपरावदियों का तर्क यह है कि ये टेम्‍परारी फेनोमना है,ख्‍त्‍म हो जाएगा। जातिव्यवस्‍था के खिलाफ हुए आदोलनों की उपज है दलित साहित्‍य। इसलिये जबतक जाति व्‍यवस्‍था रहेगी दलित साहित्‍य रहेगा। इसका भविष्‍य उज्‍ज्‍वल है।
आज जाति राजनीति व्‍यवस्‍था का अंग बन गयी है। चुनाव का आधार जाति है और राजनीतिक व्‍यवस्‍था आज जाति व्‍यवस्‍था बन गयी है। जातियां धर्म से जुडी हैं तो धर्म का इस्‍तेमाल राजनीति में धर्मनिरपेक्ष्‍ता के खिलाफ होता है।
दलित विमर्श के अपने अंतरविरोध भी हैं। जो दलित विमर्श जाति व्‍यवस्‍था को चुनौती दे रहा था,वह आज मायवती के रूप्‍ में एक बिगडा स्‍व्‍रूप ले चुका है। आज दलित भी जातिवादी हो रहा है। और इससे बहुत नुकसान हो रहा है। सदियों से चला आ रहा जातिवादी मूवमेंट इस दलित जातिवाद के चलते कठिन होता जा रहा है। बीजेपी और बीएसपी की चक्‍की में आज दलित साहित्‍य भी पिस रहा है। दलित साहित्‍यकार भी जातीय गौरव को उपलब्धि मान रहे हैं।
साठ के दशक में माहराष्‍ट्र में दया पवार के कथा लेखन और बलूत या अछूत के आने से दलित विमर्श सशक्‍त रूप में विकसित हुआ था और आत्‍मकथाएं दलित समाज को रिफलेक्‍ट कर रही थीं तब इस लेखन में अभिव्‍यक्‍त अनुभूतियों ने विमर्श का एक नया केन्‍द बनाया था।
बौद्ध साहित्‍य के नवजागरण के बाद सदियों तक अंधविश्‍वास गायब रहा। इसके विरूद्ध ब्राह्मणों का संघर्ष चलता रहा। उन्‍होंने बुद्ध्‍ के साहित्‍य को जलाया। और मिथकों पर आधारित पुराणों की रचना की, जिनका यथार्थ से संबंध नहीं था। इसका सिलसिला चलता रहा। कौटिल्‍य के अर्थशास्‍त्र में मनुस्‍म्रति से ज्‍यादा कठोर दंड दलितों के लिये हैं। इस मिथकीय दबाव का असर संत साहित्‍य पर भी पडा और कबीर,रैदास के समानांतर तुलसी और सूर जैसे मिथकों के आधार पर रचाना करने वाले सामने आए। मिथकीय साहित्‍य का बर्चस्‍व्‍ हमेशा कायम रहा। आज भी परंपरावादी मिथकीय चरित्रको कविता कहानी में अवश्‍य लाते हैं। इस लेखन को दलितों ने हर युग में चुनौती दी है। गावब हुए बौद्ध साहित्‍य में ये दलित चरित्र थे। कहीं कहीं ये अब भी मिलते हैं।
तालकूट बुद्ध का समकालीन नाटककार था। वह गांव गांव नाटक दिखाता था। मतलब बुद्ध के समय लोकनाटक मंडलियां थीं भारत में। ऐसे बहुसारे चरित्र एक समानांतर साहित्‍य रचते थे। पर मिथकीय परंपरा ने भारत में इस साहित्‍य को बहुत नुकसान पहुंचाया। यह आज भी जारी है।
दलित स्‍त्री लेखन ने आज अलग परंपरा कायम की है। यह और विकसित होगी। अब गैर दलित स्‍त्री लेखक भी खद दलित स्‍त्री लेखन का क्‍लेम कर रहे हैं , यह भी इन दोनों के विकास को दर्शाता है।
मोबाइल ने निश्चित दुनिया बदली है। पश्चिम के विद्ववान डिजिटल डिवाई का नया कांसेप्‍ट चला रहे। गरीब अमीर की जगह आज सूचना से धनी और सूचना से गरीब देश का कांसेप्‍ट आ रहा है। सूचनाएं थोपी जा रही हैं। इंटरनेट मोबाइल मिथ्‍कों को बदल कर पेश कर रहे। क्राइम स्‍टोरी बढ रही है। इससे सूचना बढ रही है पर ज्ञान घट रहा है।