>नदी – दो कविताएं

>

अरसा बाद
मिल रहा था उससे

मेरा वर्तमान कांप रहा था
उसकी आंखों में
गहराइयां
खींच रही थीं उसकी

सो
उतरता चला गया

ठेहुने-कमर-कंधे
और अब
गले लग रहा था उसके

अंत में
सांसें रोक
डुबकियां लगा दी मैंने।

नदी – दो

उतरना तो मैं
उसके वर्तमान में
चाह रहा था
पर
बार – बार
चला जा रहा था
स्‍मृतियों में उसकी

परेशान हो
अपनी जमीन
खींच ले रही थी वह
बार-बार

मैं संभलता
फिर बहने लगता
अतीत की रौ में

आखिर
एक ज्‍वार आया
और उब-चूब होने लगा मैं
सांसें
फूलने लगीं

और अब
वर्तमान ही वर्तमान था

भिगोता
रग-रग।

Nai Dunia me prakashit

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2 Comments »

  1. 1
    sada Says:

    >उतरना तो मैंउसके वर्तमान मेंचाह रहा थापरबार – बारचला जा रहा थास्‍मृतियों मेंबहुत ही सुन्‍दर पंक्तियां ।

  2. 2

    >आपकी कविता अच्छी लगी ,बड़े ही सहज ढंग से आपकी कविता पाठकों से संवाद करती है |


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