अक्टूबर 2010 के लिए पुरालेख

>बहुत तेज बेचता है वह …

अक्टूबर 16, 2010

>बलात्‍कारी नहीं सवर्ण पैदा हुआ था वह
अपने रंग और आर्थिक आधार से असंतुष्‍ट
एक सवर्ण
एक जनकवि की छवियां बेचता
मजमे लगाने की उस्‍तादी सीखता
नमूदार हुआ था दृश्‍यपटल पर

फिर
जनकवि की लकुटी कमरिया फेंक
कब वह बाहुबली का जूता बन गया
उसे भी कहां याद होगा

तब से
कविता उसका दु:स्‍वप्‍न है
और बलात्‍कार उसका पेशा
उसका नुस्‍खा
टीआरपी बढाने का

पहला बलात्‍कार उसने जनाकांक्षा का किया था
जब क्षेत्रीय बाहुबली का चारण बन
जन की जगह गन के गीत गाये थे
फिर तो बाहुबलियों के जूते ढोता
जा पहुंचा राष्‍ट्रीय बाहुबली के दरबार में
वहां स्‍त्रीविमर्श विचारते
अपनी नवव्‍याहता की मुंहदिखायी ली उसने
और बाग बाग होता
लिखा बाहुबली चालीसा

अबतक
मदारी से बाजीगर हो चुका था वह
आत्‍महत्‍या धोखाधडी बलात्‍कार की फंतासियों से खेलता
एक चतुर बाजीगर
जो बीच बीच में दूजे रंगों से बचने को
जनकवि की काली कमली ओढ लिया करता
जनसम की रसम निभा दिया करता

यूं
पहचानने वाले
पहचान ही लेते हैं उसे

अजय कहते हैं अक्‍सर
बहुत तेज बेचता है वह

हां
बहुत तेज बेचता है वह
जनकवि की छवियां अखबार में
नवव्‍याहता की छवियां
बाहुबली के दरबार में

बहुत तेज बेचता है वह…

>चुप किया जाना एक सजा है तुम्‍हारी खातिर

अक्टूबर 16, 2010

>

चुप किया जाना
एक सजा है तुम्‍हारी खातिर

जबान और हाथों को जब
रोक दिया जाता है
शालीन अश्‍लीलता से
तो असंतोष की किरणें
फूटने लगती हैं
तुम्‍हारी निगाहों से
और कई बार
उसकी मार तुम
अपने भीतर मोड देती हो

तब
तुम्‍हारे मुकाबिल होना
एक सजा हो जाता है
मेरे लिये

एक सजा
जिसे पाना
अपनी खुशकिस्‍मती समझता हूं मैं

मेरी कुटुबुटु
कि
हमारा रिश्‍ता ही दर्द का है
जिसकी टीस को
जब संभाल लेती है मेरी कविता
तब कविता का महान व्‍योपार
कर पाती है वह
तब
देख पाता हूं
जान पाता हूं मैं
अपने कवि होने की बुनियाद।

>मीना कुमारी

अक्टूबर 8, 2010

>

दर्द
तुम्‍हारी आंखों में नहीं
हमारी रगों में होता है

छू देती हैं
निगाहें

उभर आता है दर्द
फफोले-फफोले।

यह कविता मेरे दूसरे कविता संकलन सभ्‍यता और जीवन से है।

>नदी – दो कविताएं

अक्टूबर 1, 2010

>

अरसा बाद
मिल रहा था उससे

मेरा वर्तमान कांप रहा था
उसकी आंखों में
गहराइयां
खींच रही थीं उसकी

सो
उतरता चला गया

ठेहुने-कमर-कंधे
और अब
गले लग रहा था उसके

अंत में
सांसें रोक
डुबकियां लगा दी मैंने।

नदी – दो

उतरना तो मैं
उसके वर्तमान में
चाह रहा था
पर
बार – बार
चला जा रहा था
स्‍मृतियों में उसकी

परेशान हो
अपनी जमीन
खींच ले रही थी वह
बार-बार

मैं संभलता
फिर बहने लगता
अतीत की रौ में

आखिर
एक ज्‍वार आया
और उब-चूब होने लगा मैं
सांसें
फूलने लगीं

और अब
वर्तमान ही वर्तमान था

भिगोता
रग-रग।

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