सितम्बर 2010 के लिए पुरालेख

>कवि रिल्‍के के लिये

सितम्बर 24, 2010

>जब वह
कलम पकडता है
तो देवता लोटने लगते हैं
उसके कदमों की धूल में
पुनर्जन्‍म के लिये
तब
अपनी निरीहता और विस्‍फार
उन्‍हें सौंपता हुआ
रचता है वह उन्‍हें
खुद को प्रकृतिमय करता

सोचता
कि प्रबल होते मनुष्‍य की
नित नूतन कल्‍पना
कहां तक
संभाल सकेगी
इस अबल का बोझ।

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>मनोविनोदिनी

सितम्बर 24, 2010

>खाना खा लिया
कवि महोदय ने
सतरह नदियों के पार से
आता है एक स्‍वर
चैट बाक्‍स पर
छलकता सा
हां
खा लिया…
आपने खाया
हां … खाया
और क्‍या किया दिन भर आज
आज…
सोया और पढा … पढा और सोया
खूब..
फिर हंसने का चिन्‍ह आता ह
तैरता सा

और क्‍या किया

और..

माने सीखे तुम के

मतलब…

मतलब … तू और मैं तुम

हा हा

पागल…

यह क्‍या हुआ

यह दूसरा माने हुआ
तू और मैं का

दूसरा माने

वाह

खूब
हा हा
हा हा हा


मनोविनोदिनी – 2

यह
दूसरी बार
सुन रहा था
उसे

खिलते पुष्‍पों से
एक वृत्‍त में खुलते
स्‍वरों के पीछे

खल-खल करता

एक अन्‍य स्‍वर

यह खल-खल

सुनने नहीं दे रही थी
ठीक से
कुछ और

जो कहा जा रहा था

मैं उसे सुनना चाह रहा था

एक मधुरिल स्‍वर

पगा हूं

जिसमें मैं

उसे घोलती सी
यह स्‍वर लहरी
मेरे बाहर
जाने कहां
गिर रही थी

मनोविनोदिनी – 3

संवाद तो
होता ही रहता है

पर कुछ कहना
रह जाता है बाकी

सो उसका नाम

पुकारना चाहता हूं

जोर जोर से …….

उससे
यह सब कहूं
तो कहेगी
पागल…….

फिर खुश होउंगा
बेइंतहां

तब
कहेगी वह
सुधर जाइए
अब भी

अच्‍छा नहीं
यह

>और यथार्थ भी एक दिन स्‍वप्‍न हो जाता है

सितम्बर 21, 2010

>

और यथार्थ भी
एक दिन
स्‍वप्‍न हो जाता है

आपके कांधे से लग
…बिहंसती खुशी
कैद हो जाती है
आइने में अपने ही

खुद पर रीझती और खीझती
उसकी आवाज
अब दूर से आती सुनाई पडती है

दुविधा की कंटीली बाड
कसती जाती है घेरा

और जीने का मर्ज
मरता जाता है
मरता जाता है…