अगस्त 2010 के लिए पुरालेख

>इतिहासकार को सच को उस समय के संदर्भों में पकडना चाहिए – रामशरण शर्मा से कुमार मुकुल की बातचीत

अगस्त 18, 2010

>

आजकल ज्‍योतिषशास्‍त्र और बायोटेक्‍नालॉजी की पढाई की बात हो रही है…वैदिक गणित की चर्चा है…इस पर आप क्‍या कहेंगे…

हां नये लोग हैं,नये ढंग से विचार कर रहे हैं। ये बताते हैं कि सब वेदों में है। तो अब आगे पढने-पढाने की क्‍या जरूरत है…यूपी से वैदिक मैथेमेटिक्‍स पर एक किताब निकाली गई है। जो वहां कोर्स में चलाई जा रही है। मैंने गणितज्ञ गुणाकर मूले से वह किताब पढवाई थी। उन्‍होंने बताया कि वैदिक गणित की सामग्री कैम्ब्रि‍ज के एक गणितज्ञ के यहां से उतारी हुई है।

देखिए,हडप्‍पा में घोडा नही था सांड थे। उनलोगों ने सांड को घोडा कहा। जबकि घोडा लेट हडप्‍पा संस्‍कृति में मिलता है। उस समय हाथी या गैंडा था। यह शब्‍द गण-गंडक से निकलता है। पहले लिखा जाता था कि भगवन बुद्ध गैंडे की तरह चलते थे। दरअसल इतिहासकार को सच को उस समय के संदर्भों में पकडना चाहिए।
सच पर बात हो सकती है। पर आप सांड को घोडा कहें तो दिक्‍कत होगी। इसी तरह गाय का मामला है। पहली बार महात्‍मा बुद्ध ने कहा था कि गाय को नहीं मारना चाहिए। इसका बडा फायदा है। फिर आगे ब्राह्मणों ने भी कहा कि गाय को नहीं मारना चाहिए। पर ब्राह्मणों ने यह भी जोडा कि गाय के साथ ब्राह्मण को भी नहीं मारना चाहिए। आगे गाया की हत्‍या रूकी तो खेती बढी। इस विचार का लाभ मिला लोगों को। पर आज ट्रैक्‍टर आदि के आने के बाद बैल बेकार साबित हो रहे हैं। हाल में ही दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के वाइस चांसलर ने लिखा है कि आज गाय पालना हानिकारक है।

आप मार्क्‍सवादी इतिहासकार हैं। आज भारत में मार्क्‍सवाद और वादी पिछड क्‍यों गये हैं…

अब मार्क्‍सवादी भी एक्‍शन-इंटरेक्‍शन के प्रासेस को नहीं पकड पाते। उन्‍हें आर्थिक के साथ सामाजिक स्थितियों का भी ध्‍यान रखना चाहिए। आर्थिक कारण हैं चीजों के। इस आर्थिक कारण से जो चीजें पैदा होती हैं। इसका फिर क्‍या प्रभाव पडता है…। इसपर ध्‍यान ही नहीं है।

विचारधारा और इतिहास के अंत की घोषणाएं हो रही हैं आज। फुकियामा ने इतिहास के अंत की घोषणा की है। आप इस पर क्‍या सोचते हैं…।

विचारधारा का प्रभाव जबरदस्‍त पडता है। यह धर्मांधता को हटाती है। पर ब्राह्मणों ने तो हमारे लोगों का दिमाग बदल दिया है। फुकोयामा ने जो कहा है , ठीक ही कहा है – भाजपा वाले और फुकोयामा मिल जाएंगे और दोनों मिलकर सब का अंत कर देंगे। हमारे पीएम इरान जाते हैं तो वहां इस्‍लाम के योगदान पर बोल आते हैं और यहां कुछ और होता है। वह जो कहावत है न – जब जइसन तब तइसन…। इसी पर चलते हैं ये। उनका कोई हिडेन एजेंडा नहीं है। वे सुखदेव और भगतसिंह को देशद्रोही कहते रहे हैं।

आजकल आप इतिहास के अलावा क्‍या पढ रहे हैं…इधर कुछ नया लिखा है…

कुछ नहीं पढ रहा। बस सुबह-शाम टहलता हूं। पुरानी किताबें फिर से छपी हैं। इधर अर्ली मिडिआइवल इंडियन सोसायटी ए स्‍टडी इन फ्यूडेलाइजेशन छपी है नयी। इसकी कीमत छ सौ है। पेपरबैक छपेगी तो सस्‍ती होगी। अब इस उमर में कुछ करना पार नहीं लगता।इतिहास पर काम के अलावे दूसरा कोई काम नहीं। मेरा सिद्धांत है – एके साधे सब सधे,सब साधे सब जाए।
बिहार की आज की स्थिति के बारे में क्‍या सोचते हैं आप…
पटना के बुद्धिजीवि पढते-लिखते हैं। यहां अखबार,साप्‍ताहिक खूब बिकते हैं। बिहार सरकार को उच्‍च शिक्षा पर ध्‍यान देना चाहिए। 1977 में जब मेरी किताब पर वैन लगी थी तब मैंने जवाब में एक पुस्तिका,सोशल चेंज इन इंडिया, लिखी थी। कर्पूरी ठाकुर इस किताब को बराबर जेब में रखते थे।
बातचीत का यह अंश 2001 में पटना से निकलने वाले पाक्षिक न्‍यूज ब्रेक में छपा था।

>पूरबा हवा है यह

अगस्त 17, 2010

>

स्‍नेहिल आगोश की
निरंतरता में समोती हमें
पूरबा हवा है यह

आकाश का
नम नीलापन

हमारी आंखों में
आंजती

भीतर को
करती बाहर

बाहर को
भरती भीतर
हवा है यह

>जब मुखिया के लडके ने गडासे से लडकी को काट दिया – पटना डायरी

अगस्त 17, 2010

>मसीहा बनने निकले लालू राजा बन कर रह जाते हैं और नितीश लालू बनकर…
गांव मुझे बहुत प्‍यारा रहा है हमेशा से। बांध और नदी और बाग बगीचे कपडे लत्‍ते चप्‍पल जूते की चिंता किये बगैर निकल जाना कहीं भी। हालांकि अब चीजें बदल चुकी हैं। तो जब पटना में था तो गांव से चाची और भाई आए थे इलाज करा कर लौटते रूक गए थे। तब मैंने उनसे गांव की एक घटना के बारे में पूछा था जिसके बारे में दिल्‍ली में सुधीर सुमन ने पूछा था – कि यार आपके ही गांव की घटना है यह, मुखिया के बेटे ने एक लडकी को बलात्‍कार के बाद काट दिया। तब मैंने सोचा था मुखिया का परिवार अबंड है ही …।
तब मेरे दिमाग में वह मुखिया था जो अपनी बिरादरी का था, जिसकी राजनीतिक पैठ उपर तक थी और जिसने एक बार दारोगा को थाने में जाकर पीटा था और जेल तक से बच गया था। वह घटना पच्‍चीसों साल पहले हुयी थी। उस घटना में मेरे एक चाचा जो अब नहीं हैं, भी शामिल थे। मुखिया जी पीने आदि के लिये मशहूर थे। केवल मेरे पिता ही गांव में ऐसे थे जो उन्‍हें तरजीह नहीं देते थे। और मैं तो सोचता ही नहीं था कि मुखिय क्‍या होता है…।
पर जब गांव की घटना की तफतीश की तो बातें कुछ और निकल कर आयीं। पता चला यह मुखिया अरसा पहले मुखियागिरी से हट चुके हैं। और नये मुखिया चर्मकार थे। और उनके बेटे ने गांव की ही मल्‍लाह की लडकी को गाडासे से काट दिया था। वह उससे शादी करना चाहता था। पर लडकी ने इनकार कर दिया तो उसके लिये सम्‍मान का मसला बन गया था कि एक मल्‍लाह की लडकी मुखिया के बेटे से विवाह से इनकार कैसे कर सकती है। इस मामले में आगे उस मुखिया को अपने पद से हटना पडा अपने बेटे के इस कारनामे के चलते। बेटा तो जेल गया ही।
यह सब जान मुझे आश्‍चर्य हुआ। मतलब जो क्रूर कार्य कठोर छवि वाले सवर्ण मुखिया और उसके परिवार ने कभी नहीं किया, वह एक दलित मुखिया की पहली ही पीढी ने कर डाला। सत्‍ता भ्रष्‍ट करती है , का अच्‍छा उदाहरण है यह। जब एक दलित आज की व्‍यवस्‍था में संख्‍यां बल पर एक पद पाता है तो वह और उसके सगे पद ही नहीं पाते, विरासत में पद पर बैठे व्‍यक्ति दवारा किये जाने वाले अत्‍याचार भी पाते हैं। और पद की गरिमा बनाये रखने को अत्‍याचार में आगे बढ जाते हैं और इसका सर्वाधिक शिकार अपने जैसे लोगों को ही बनाते हैं। इसीलिये व्‍यवस्‍था परिवर्तन के बगैर मात्र सत्‍ता में हिस्‍सेदारी से परिवर्तन के बहुत मायने नहीं निकलते। इसी का परिणाम है कि मसीहा बनने निकले लालू राजा बन कर रह जाते हैं और नितीश लालू बनकर…

>बीमार चल रहे पिता – पटना डायरी

अगस्त 15, 2010

>

अस्‍सी के आस-पास पहुंच चुके पिता इधर कुछ बीमार चल रहे हैं। दस साल पहले हुए हर्ट अटैक के बाद से दवाएं लगातार चल रही थीं, सो अब फिर से हृदशूल जब तब जोर पकड रहा है। कडे प्रशासक रहे पिता से मैं लंबे समय तक लडता रहा मार तमाम विचार,व्‍यवहार को लेकर। ना वे कभी झुके ना मैं कहीं रूका। फिर लडने की उम्र ना रही। चीजें तय हो चुकी थीं। राहें जुदा थीं। अब हमारा रवैया भी बदल चुका था।

पहले कर्मकांड के हर तमाशे का विरोध करने वाला मैं हैदराबाद से उनके लिये गणेश की एक काठ की मूर्ति ले आया था। मेरी अवधारणाओं में अंतर तो आने वाला नहीं था ना उनकी मान्‍यताओं में। पर एक दूसरे को लेकर हम सहज हो चुके थे। इधर जब दिल्‍ली रहता तो हर बार सोचता कि इस बार पटना जाउंगा तो जितने दिन रहूंगा उनका ख्‍याल रखूंगा रोज शाम को पांव आदि दबा दिया करूंगा। पर ऐसा हो नहीं पाता था। पिछली बार पंद्रह दिन था तो एकाध दिन ऐसा कर पाया था। इस बार जबकि वे बीमार थे मैं एक दिन भी ऐसा नहीं कर पाया। सेवा भाव मुझमें सहज है। पर पिता का जो दृढ स्‍वावलंबी रूप है वह सहजता से मुझे यह करने नहीं देता। सो सेवा की ईच्‍छा मेरे मन में ही रह जाती है। इस बार भी देखा कि एक दिन वे नल पर खडे हो एडियों में साबुन लगा रहे हैं। अब उन्‍हें कुछ करने से रोका भी नहीं जा सकता। पहले भी जब उन्‍हें पांवों में दर्द होता खुद ही तेल ले अपने पावों में लगाने बैठ जाते। कभी कभी हमें बहुत शर्म आती तो हम लगा देते पर हम कभी उनका दर्द भांप नहीं पाते थे समय से। यह सब उनके कठोर प्रशासकीय व्‍यक्तित्‍व के चलते ही रहा।
ऐसा मुझे याद नहीं कि कभी पिता खुद अपने कमरे से उठकर हम तक कोई बात कहने आए हों। वे बुला लेंगे या आएंगे तो कुछ कडे अंदाज में कहने ही। इस बार पहली बार उन्‍हें देखा कि वे मेरे कमरे के बाहर आए तो मैंने कहा – आव.. बइठ … एहिजा बढिया हवा बा..। पहली बार पिता ने मेरा कहना माना था। इसका कारण यह भी था कि मेरी अनुपस्‍िथति में पिता दिन में इस कमरे में ही बैठते थे ज्‍यादा हवादार होने के कारण।

पिता आए तो मां पहले से बैठी थीं जो कि वे अक्‍सर आकर सिरहाने खडे हो कर या बैठकर अपना दुखडा सुनाती रहती हैं। जिसे मैं कम ही सुनता हूं। मां जानती हैं फिर भी सुनाती रहती हैं वे और बीच में कह भी देती हैं कि आउर केकरा कहीं…। तो पिता आकर बैठे तों मॉं हंसती हुयी  बोलीं – इ का पोंछी बढा लेले बानी। मां का ईशारा चुटिया की ओर था। मैंने कभी पिता को चुटिया बढाते नहीं देखा था। पिता ने कोई खास ध्‍यान ना देते हंसते कहा – पोंछ ह कि चोटी ह। मँ ने फिर कहा – उहे चोटी पर लागला पोंछिए अइसन। पिता हंसते हुए चुटिया को इस बीच हल्‍के सहलाते रहे।
………………………………………………………………………………………………………………..

जारी…..