>क्‍या कविता मात्र स्‍वांत: सुखाय नहीं हो सकती – कविता के रूप और फार्म पर एक बहस

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कविता ही क्यों, साहित्य की किसी भी विधा में बहस का विषय अगर रूप और कथ्य ही बनता हो, तो हमें मान लेना चाहिए कि हमारा साहित्य अभी प्रौढ़ नहीं हो सका है। रूप और कथ्य हमारी अभिव्यक्ति को एक आकार प्रदान करते हैं। और ऐसा शायद दोनों के साझा सहयोग से ही संभव होता है। इनमें किसी एक की कमी भी कविता के असर को कम कर सकती है। प्रकृति नित बदल रही है। इस परिवर्तन में एक निरंतरता भी है। भाषा अपने वृहत्तर रूप में इसी प्रकृति की अभिव्यक्ति है। ठीक प्रकृति की तरह हमारी भाषा भी नित नवीन है। इस नवीनता की कल्पना के बगैर मनुष्य के सर्जक रूप को गढ़ पाना संभव हो सकता है क्या।

आप दुनिया की किसी भी भाषा का अध्ययन करें। ज्यादा नहीं केवल दशकों में बांटकर। अभूतपूर्व तरीके से भाषा बदली हुई मिलेगी। आज की उर्दू पढ़कर मैंने मंटो को पढ़ना शुरू किया, लगा मंटो को तो उर्दू आती ही नहीं थी। यह भी मानकर चलें कि भाषा में कई बार जो परिवर्तन आते हैं वे किसी शास्त्र से निर्देशित नहीं होते। बिल्कुल अतार्किक हो सकते हैं वे। भाषा के विकास का अपना एक स्वतंत्र व्याकरण शास्त्र है।
शब्द बदलते हैं। शब्दार्थ बदलते हैं। कभी-कभी यह बदलाव इतना अनर्थकारी जैसा भी लगता है। शब्द तो फिर भी शब्द हैं, भिन्न काल में इसकी व्युत्पत्ति तक हमें बदली हुई मिलती है। कविता में रूप और कथ्य की हमारी सारी बहस इन्हीं शब्दों पर आधारित हैं जो स्वयं परिवर्तनशील हैं।
मुझे तो लगता है कि रूप और कथ्य को लेकर कविता पर बहस करना ‘अकवितावादी’ होना है। क्या कविता मात्र स्वान्तः सुखाय नहीं हो सकती। मुझे हमेशा एक सच्चा कवि केवल और केवल वह लगा है जो शराब के नशे में मस्त हो। मस्ती का यह नशा शराब के इतर भी संभव है। आप चाहे जो कहें, कफन कहानी के अंत में बाप-बेटे जब मस्त झूमते हैं तो अजीब काव्यात्मक लगते हैं। जिसकी एक नियमित दिनचर्या हो वह विद्रोही क्या। जिसके लिए बना-बनाया फार्म पर्याप्त हो वह कवि भी क्या। कविता पर बंदिश ठीक नहीं। वैसे भी हमलोग ‘कवि’ उसी को कहते हैं जो निर्बंध हो। जो बंध गया, कवि नहीं, कविकाठी है।

कुमार मुकुल
हां,प्रौढता के लिहाज से आपकी बात सही है पर जो नयी जमात साहित्य‍ में आती रहती है उसके लिये आगे बढ गये लोगों को पिछली सुचिंतित बातों पर भी विचार करते रहना चाहिए। इससे उन्हें अतीत की रोशनी में भविष्य की ओर कदम बढाने में सहूलियत होती है। तुलसीदास ने कहा भी है कि शास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिए। मतलब तय चीजों का भी पुनर्मुल्यांकन जरूरी है चाहे वह शास्त्र ही हो। बदलाव तो मौलिक शर्त है जीवन की। हर सांस नयी होती है। हां शास्त्र तो भाषा के परिवर्तनों का जमा खाता है। परिवर्तन पहले आते हैं शास्त्र बाद में बनते हैं उनकी रोशनी में। चूंकि माध्यम शब्द ही हैं तो परिवर्तन की बानगी भी सबसे पहले वहीं दिखेगी। अकविता भी तो एक कविता ही है। स्वान्त : सुखाय भी होती ही है पर वह स्व कितना विकसित हो पाता है यह देखने की जरूरत होती है हर बार। हां जीवन का नशा हमेशा शराब से ज्यादा होता है। हर नयी बात अपना नया रूप लेकर आती है। हर चेहरा एक नयी कहानी कहता है। हां बंधन स्वविवेक का ही होना चाहिए वरना वह कविकाठी ही है।

अशोक कुमार पाण्‍डेय

कवि का स्व ही इतना विस्तृत हो जाना चाहिये कि उसके वर्ग का हर दुख उसका अपना हो जाये…वर्गांतरण की प्रक्रिया यही है…कवि का स्व अगर उसके निजी जीवन तक ही सीमित है तो फिर वह जन के किसी काम का नहीं…
और मूल्यांकन तो होना ही चाहिये परंतु काल सापेक्ष्…आज की स्केल पर पुराने को मापा जाना सही नहीं होगा।

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2 Comments »

  1. >जिसकी एक नियमित दिनचर्या हो वह विद्रोही क्या। जिसके लिए बना-बनाया फार्म पर्याप्त हो वह कवि भी क्या। कविता पर बंदिश ठीक नहीं। वैसे भी हमलोग ‘कवि’ उसी को कहते हैं जो निर्बंध हो। जो बंध गया, कवि नहीं, कविकाठी है।sahmat ..!

  2. >कवि का स्व ही इतना विस्तृत हो जाना चाहिये कि उसके वर्ग का हर दुख उसका अपना हो जाये…वर्गांतरण की प्रक्रिया यही है…कवि का स्व अगर उसके निजी जीवन तक ही सीमित है तो फिर वह जन के किसी काम का नहीं…और मूल्यांकन तो होना ही चाहिये परंतु काल सापेक्ष्…आज की स्केल पर पुराने को मापा जाना सही नहीं होगा।


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