जुलाई 2010 के लिए पुरालेख

>तस्वीरें : छाया : मुकुल

जुलाई 29, 2010

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>आ चुकी है शताब्‍दी – कविता – कुमार मुकुल

जुलाई 21, 2010

>आ चुकी है शताब्दी ( एक्सप्रेस )
राजकमल के प्रिय रंग आसमानी से रंगी
चेतन होते तो कहते : क्या सेक्सी गाड़ी है
तभी तो हर चौथा कांच अपने अनोखे खूबसूरत तरीके से
चनका है गोलाई में
एक कृत्रिम फूल खिलाता सा

बाहर हवा तेज है और बौछारे भादों की
झूमते से पेड़ और चिमनियां भट्टे की स्थिर-अवाक
पर भीतर मौसम थिर है खुशनुमा
बीच में दीवार है शीशे की
जिस पर बूंदों की चित्रकारी जारी है
वे ठुमकती सी तिरछे सरक रही हैं – नीचे
शीशे से टकरातीं
चर-चर की धीमी आवाज करतीं
बाहर कितनी हरियाली है
भागती सी कहीं कहीं जुते खेत हैं
पानी के चहबच्चों से जगमगाते
प्रतिबिंबित करते आकाश
पटरियों के किनारे-किनारे काश है
अपने साम्राज्य पर फूली नहीं समाती सी झूमती
और एक आध पंछी
भीगे पंख झटकारते

पी जा चुकी है चाय
नाश्ता तैयार हो रहा है-
अजय मिश्र के शब्दों में-
यहां भी वहीं अकाटू-बकाटू लोग हैं
धीमे पुराने फिल्मी संगीत में डूबते-ऊबते
एक पहाड़ी लड़की
अपनी बेबसी झाड़
हवा में घूसेबाजी करती
लंबे बालों वाले अपने साथी से कुछ कह रही है
ओह-कोई याद आने लगा है और मैं होता जा रहा हूं
परिदृश्य से ओझल।

>क्‍या कविता मात्र स्‍वांत: सुखाय नहीं हो सकती – कविता के रूप और फार्म पर एक बहस

जुलाई 12, 2010

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कविता ही क्यों, साहित्य की किसी भी विधा में बहस का विषय अगर रूप और कथ्य ही बनता हो, तो हमें मान लेना चाहिए कि हमारा साहित्य अभी प्रौढ़ नहीं हो सका है। रूप और कथ्य हमारी अभिव्यक्ति को एक आकार प्रदान करते हैं। और ऐसा शायद दोनों के साझा सहयोग से ही संभव होता है। इनमें किसी एक की कमी भी कविता के असर को कम कर सकती है। प्रकृति नित बदल रही है। इस परिवर्तन में एक निरंतरता भी है। भाषा अपने वृहत्तर रूप में इसी प्रकृति की अभिव्यक्ति है। ठीक प्रकृति की तरह हमारी भाषा भी नित नवीन है। इस नवीनता की कल्पना के बगैर मनुष्य के सर्जक रूप को गढ़ पाना संभव हो सकता है क्या।

आप दुनिया की किसी भी भाषा का अध्ययन करें। ज्यादा नहीं केवल दशकों में बांटकर। अभूतपूर्व तरीके से भाषा बदली हुई मिलेगी। आज की उर्दू पढ़कर मैंने मंटो को पढ़ना शुरू किया, लगा मंटो को तो उर्दू आती ही नहीं थी। यह भी मानकर चलें कि भाषा में कई बार जो परिवर्तन आते हैं वे किसी शास्त्र से निर्देशित नहीं होते। बिल्कुल अतार्किक हो सकते हैं वे। भाषा के विकास का अपना एक स्वतंत्र व्याकरण शास्त्र है।
शब्द बदलते हैं। शब्दार्थ बदलते हैं। कभी-कभी यह बदलाव इतना अनर्थकारी जैसा भी लगता है। शब्द तो फिर भी शब्द हैं, भिन्न काल में इसकी व्युत्पत्ति तक हमें बदली हुई मिलती है। कविता में रूप और कथ्य की हमारी सारी बहस इन्हीं शब्दों पर आधारित हैं जो स्वयं परिवर्तनशील हैं।
मुझे तो लगता है कि रूप और कथ्य को लेकर कविता पर बहस करना ‘अकवितावादी’ होना है। क्या कविता मात्र स्वान्तः सुखाय नहीं हो सकती। मुझे हमेशा एक सच्चा कवि केवल और केवल वह लगा है जो शराब के नशे में मस्त हो। मस्ती का यह नशा शराब के इतर भी संभव है। आप चाहे जो कहें, कफन कहानी के अंत में बाप-बेटे जब मस्त झूमते हैं तो अजीब काव्यात्मक लगते हैं। जिसकी एक नियमित दिनचर्या हो वह विद्रोही क्या। जिसके लिए बना-बनाया फार्म पर्याप्त हो वह कवि भी क्या। कविता पर बंदिश ठीक नहीं। वैसे भी हमलोग ‘कवि’ उसी को कहते हैं जो निर्बंध हो। जो बंध गया, कवि नहीं, कविकाठी है।

कुमार मुकुल
हां,प्रौढता के लिहाज से आपकी बात सही है पर जो नयी जमात साहित्य‍ में आती रहती है उसके लिये आगे बढ गये लोगों को पिछली सुचिंतित बातों पर भी विचार करते रहना चाहिए। इससे उन्हें अतीत की रोशनी में भविष्य की ओर कदम बढाने में सहूलियत होती है। तुलसीदास ने कहा भी है कि शास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिए। मतलब तय चीजों का भी पुनर्मुल्यांकन जरूरी है चाहे वह शास्त्र ही हो। बदलाव तो मौलिक शर्त है जीवन की। हर सांस नयी होती है। हां शास्त्र तो भाषा के परिवर्तनों का जमा खाता है। परिवर्तन पहले आते हैं शास्त्र बाद में बनते हैं उनकी रोशनी में। चूंकि माध्यम शब्द ही हैं तो परिवर्तन की बानगी भी सबसे पहले वहीं दिखेगी। अकविता भी तो एक कविता ही है। स्वान्त : सुखाय भी होती ही है पर वह स्व कितना विकसित हो पाता है यह देखने की जरूरत होती है हर बार। हां जीवन का नशा हमेशा शराब से ज्यादा होता है। हर नयी बात अपना नया रूप लेकर आती है। हर चेहरा एक नयी कहानी कहता है। हां बंधन स्वविवेक का ही होना चाहिए वरना वह कविकाठी ही है।

अशोक कुमार पाण्‍डेय

कवि का स्व ही इतना विस्तृत हो जाना चाहिये कि उसके वर्ग का हर दुख उसका अपना हो जाये…वर्गांतरण की प्रक्रिया यही है…कवि का स्व अगर उसके निजी जीवन तक ही सीमित है तो फिर वह जन के किसी काम का नहीं…
और मूल्यांकन तो होना ही चाहिये परंतु काल सापेक्ष्…आज की स्केल पर पुराने को मापा जाना सही नहीं होगा।

>कविता के रूप और फार्म पर एक बहस

जुलाई 11, 2010

>छंदमुक्‍त कविता में असफलता और महानता दोनों की संभावना ज्‍यादा है …

इस साल के आरंभ में अग्रज और प्रिय कवि लीलाधर मंडलोई ने आजमगढ उत्‍तरप्रदेश से छपने वाली एक पत्रिका अलख के लिये कवि और कविता को लेकर कुछ बातें सामने रखीं थीं जिसपर समकालीन रचनाकारों,कवियों की राय वे चाहते थे। उन सवालों पर  मुझ सहित रामजी यादव,अच्‍युतानंद मिश्र,सुधीर सुमन की राय सामने आयी थी , जो अलख में छपी भी। वे बातें और उन पर आयी राय यहां इस लिहाज से दी जारही है कि उस पर अन्‍य रचनाकारों की राय भी हमें मिल सके और एक संवाद बने। इस संवाद को हम क्रमश: यहां प्रस्‍तुत करेंगे।

क्‍या कविता के सभी मौजूद फार्म्स अस्तित्‍व में बने रहने चाहिए या किसी नयी और मानीखेज कविता की जरूरत के चलते उसे बदलना चाहिए । भाषा,फार्म या कथ्‍य के स्‍तर पर या किसी और रूप में…

सुधीर सुमन – बेशक सारे फार्म अस्तित्‍व में रहने चाहिए। नया और मानीखेज अगर कुछ ऐसा है जो अब तक के शिल्‍प में नहीं अंट रहा है, तो उसकी अभिव्‍यक्ति की जद्दोजहद खुद भाषा और फार्म को बदल डालेगी।

अच्‍युतानंद मिश्र – कविता के फार्म,कथ्‍य, समय-समय पर बदलते रहते हैं, ऐसा इसलिये होता है कि सच्‍ची कविता अपने समय को प्रतिबिंबित करती है। अपने समय की गहन अभिव्‍यक्ति के लिये वह अपनी भाषा,फार्म,कथ्‍य, सब स्‍वयं ढूंढ लेती है। जिस तरह हमारा समय लगातार बदल रहा है उसी तरह अपने सभ्‍य समाज,देश,काल की अभिव्‍यक्ति करने वाली कविता भी शिल्‍प और वस्‍तु के स्‍तर पर बदलती रहती है और लगातार निर्मित होती रहती है। इसे बदलने में रचनात्‍मकता को बचाए रखने की चेतना कार्य करती है।

कुमार मुकुल – फार्म नहीं बात महत्‍वपूर्ण है। शमशेर बहादुर सिंह ने लिखा भी है- बात बोलेगी, हम नहीं…भेद खोलेगी बात ही। अब आपके भीतर की बात अपने को पूरी कराने के लिए कोई भी रूप ले सकती है,किसी भी फार्म में वह कागज पर उतर सकती है। मैं अक्‍सर डायरी आदि को भी बाद में कविता में तब्‍दील होता पाता हूं। कई बार कविता कहानी हो जाती है। जरूरत होने पर कोई भी नया फार्म रच सकता है। अगर नया फार्म संप्रेषणीयता की नयी ताकत के साथ आता है तो उसका स्‍वागत होगा। पर फार्म को रचनाकार की सीमा नहीं बन जाना चाहिए। वर्ना वह उसकी प्रगति की राह का रोड़ ही बनेगा।

रामजी यादव – बेहतर हो कि छांदस और अछांदस कविता और समाज के अंतरसंबंधों को देखा जाए। तुक वाली कविताएं प्राय: उन्‍हें ज्‍यादा खींचती हैं जो जिंदगी का तुक नहीं दिखा पा रहे हैं और उसके नपे-तुले- ढब और ढर्रे को उपादेय मानते हैं। जाहिर है यहां कथ्‍य ज्‍यादा मायने नहीं रखता और इसीलिये अर्थहीनता एक सामान्‍य परिघटना है। दूसरी ओर मुक्‍त छंद में जीवन प्रवाह, तार्किकता और आजादी ज्‍यादा है। औचित्‍य की खोज से ज्‍यादा यहां नए क्षितिज के प्रति उन्‍मुक्‍त आग्रह और उत्‍साह भी है। यह समाज के साथ कविता के चलने की जद्दोजहद को दर्शाता है। यहां कविताएं प्राय: असफल होकर स्‍मृतियों से बाहर चली जाती हैं। फिर भी संस्‍कृति और चेतना के विकास में उनका योगदान अद्भुत है। भाषा ,फार्म , कथ्‍य और मेटाफर एक अनवरत और स्‍व्‍त:स्‍फूर्त प्रक्रिया है। इसीलिये छंदमुक्‍त कविता में असफलता और महानता दोनों की संभावना ज्‍यादा है।

>कि अकाश भी एक पाताल ही है – कथा कविता

जुलाई 10, 2010

>हवा और पतंग

पतंग थी एक
अपनी लटाई से लगी
खूब
फड़फड़ा रही थी एक हवा में
तो एक और हवा आयी
कहा- चलो, खूब उड़ाती हूं तुम्‍हें
पतंग फड़फड़ायी खुशी से
सच्‍ची, खूब उड़ाओंगी ना
हां हां
खूब उड़ाउंगी
राम जी के दुआरे तक पहुंचा दूंगी
पतंग
और जोर से फड़फड़ायी
और उड़ चली हवा संग
इस अकाश से उस अकाश

सुबह से दोपहर फिर शाम हुयी
हवा ने पूछा – खूब मजा आया ना
खूब – पतंग खूब जोर से फड़फड़ायी
तब हवा ने कहा – अब लौटती हूं
घर
क्‍या – पतंग ने पूछा
हां,शाम हो रही , लौटना तो होगा ना
पर मेरी लटाई
लटाई – वह तो उड़ गयी
उसका क्‍या करोगी
अरे,फिर मैं कहां जाउंगी
मुझे भी अपने घर ले चलो

नहीं
मैं अपने घर की अच्‍छी बच्‍ची हूं
बाहर की चीजें
घर नहीं ले जाती
फिर
मैं क्‍या करूं
तू
चल अब तेरी डोर छोड देती हूं
हवा ने कहा
फिर तू उपर उड़ती चली जाएगी
एकदम अकाश में

पतंग फड़फड़ायी
सच्‍ची
सच्‍ची,एकदम रामजी के दुआरे जा पहुंचेगी
ओह,एकदम रामजी के दुआरे
खुशी से पतंग फड़फड़ायी
खूब जोर से
और हवा ने उसकी डोर छोड़ दी
और पतंग उड़ चली
अनंत अकाश की ओर

पतंग को क्‍या पता
कि अकाश भी
एक पाताल ही है …

>बेचैन सी एक लड़की जब झांकती है मेरी आंखों में…

जुलाई 9, 2010

>मिथक प्‍यार का

बेचैन सी एक लड़की जब झांकती है मेरी आंखों में
वहां पाती है जगत कुएं का
जिसकी तली में होता है जल
जिसमें चक्‍कर काटत हैं मछलियों रंग-बिरंगी

लड़की के हाथों में टुकड़े होते हैं पत्‍थर के
पट-पट-पट
उनसे अठगोटिया खेलती है लड़की
कि गिर पड़ता है एक पत्‍थर जगत से लुडककर पानी में
टप…अच्‍छी लगती है ध्‍वनि
टप-टप-टप वह गिराती जाती है पत्‍थर
उसका हाथ खाली हो जाता है
तो वह देखती है
लाल फ्राक पहने उसका चेहरा
त ल म ला रहा होता है तली में
कि
वह करती है कू…
प्रतिध्‍वनि लौटती है
कू -कू -कू
लड़की समझती है कि मैंने उसे पुकारा है
और हंस पड़ती है
झर-झर-झर
झर-झर-झर लौटती है प्रतिध्‍वनि
जैसे बारिश हो रही हो
शर्म से भीगती भाग जाती है लड़की
धम-घम-घम

इसी तरह सुबह होती है शाम होती है
आती है रात
आकाश उतराने लगता है मेरे भीतर
तारे चिन-चिन करते
कि कंपकंपी छूटने लगती है
और तरेगन डोलते रहते हैं सारी रात
सितारे मंढे चंदोवे सा

फिर आती है सुबह
टप-झर-धम-धम-टप-झर-झर-झर

कि जगत पर उतरने लगते हैं
निशान पावों के

इसी तरह बदलती हैं ऋतुएं
आती है बरसात
पानी उपर आ जाता है जगत के पास
थोडा झुककर ही उसे छू लिया करती है लड़की
थरथरा उठता है जल

फिर आता है जाड़ा
प्रतिबंधों की मार से कंपाता

और अंत में गर्मी
कि लड़की आती है जगत पर एक सुबह
तो जल उतर चुका होता है तली में

इस आखिरी बार
उसे छू लेना चाहती है लडकी
कि निचोडती है खुद को
और टपकते हैं आंसू
टप-टप
प्रतिध्‍वनि लौटती है टप-टप-टप
लड़की को लगता है कि मैं भी रो रहा हूं
और फफक कर भाग उठती है वह
भाग चलता है जल तली से।

>उम्मीदें ही उम्मीदें हैं…कुमार मुकुल और अच्‍युतानंद मिश्र की बातचीत

जुलाई 9, 2010

>

कविता में आपका आना किस तरह हुआ…
अध्ययन की जड. स्थितियों से उबिया कर मैं कविता में आ गया। पिता चाहते थे कि डाॅक्टर बनूं, राममोहन राय सेमिनरी में तीन महीने के कोचिंग के लिए मुझे भेजा गया था। वहां रोज ढड्डर का ढड्डर नोट्स लिखवाया जाता था कि आप उसका रट्टा मारें,तो तीन महीना पूरा होते ना होते मैं इस तरह की पढाई से उब गया। पिता ने समझाया कि कोचिंग पूरा कर ला,े भले मेडिकल में ना बैठना। पर मन उचट गया सो मैं बोरिया-बिस्तर ले वापस आ गया। उस दौरान मेरे मिजाज में विचित्र बदलाव आ रहे थे। कोचिंग के दौरान मेरे मन में विचित्र कल्पनाएं जगने लगीं कि इस पढाई से अच्छा हो कि पटना में जाकर गुलाबों की खेती करूं। शाम गांधी मैदान में जा बैठता और चांद-तारों को निहारता रहता, दरअसल पिछले दो सालों की पढाई के दौरान मैं ज्यादातर गांव में रहा सो नदी,पेड,चांद,तारों के अलावे मुझे कुछ सूझता नहीं था। सो सहरसा जाकर वाकई सालों मैंने गुलाब के ढेरों पौधे उगाए। इस बीच जो मेरे साथी बने वे तीनों कविताएं करते थे। देखा देखी मैं भी तुकें जोडने लगा, हालांकि आगे उनमें से कोई कविता के क्षेत्र में टिका ना रहा।
अप्रत्यक्ष रूप से पिता की भी भूमिका मेरे कवि बनने में है और मां की भी। मेरे पिता ने असहमति के बावजूद मेरे दो आरंभिक कविता संकलन छपवाए एक पर उन्होंने टिप्पणी भी लिखी। उनकी मेज पर मुक्तिबोध,नामवर सिंह,रामविलास शर्मा आदि की किताबें पडी रहती थीं,अंग्रेजी के अध्यापक होने के नाते शेक्सपीयर आदि को तो वे रटवाते ही रहते थे। सहरसा कोशी प्रोजेक्ट के सचिव जो पिता के मित्र थे घर के सामने रहते थे। उन्हें हम लोग सेक्रेटरी सहब कहते थे। वे अपने टेप पर बच्चन की मधुशाला सुनाते थे तो आंरभिक कविताएं मैं उन्हें ही लिखकर पढाता था और वे सराहते थकते ना थे। उनमें से कोई कविता कहीं छपी नहीं या उस लायक नहीं थी पर उनकी हौसला अफजाई ने भी बढावा दिया। और मां की लाजवाब करने वाली मुहावरेबाजी के बारे में क्या कहना।
फिर मेरे पहले कविता संकलन पर 1987 में जिस तरह उस समय के दिग्गजों प्रभाकर माचवे,विष्णु प्रभाकर,कवि रामविलास शर्मा आदि ने पत्र लिखकर उत्साहित किया उसने भी मेरा मिजाज बना दिया। माचवे जी ने तो प्रूफ की गलतियां ,पुस्तक पर अपनी राय और प्रकाशनार्थ सम्मति आदि अलग अलग लिखे थे। पर उस समय समीक्षा आदि का महात्तम मुझे पता नहीं था सो माचवे की वह सम्मति कहीं छपी नहीं। हां, मुकेश प्रत्यूष ने उस समय हिन्दुस्तान में एक समीक्षा लिख दी थी। मैं उसी से गदगद था।
बतौर कवि कविता के वर्तमान परिदृश्य को आप किस तरह देखते हैं…
एक तरह की धुंध है,हालांकि बड.े पैमाने पर नये कवि लिख रहे हैं पर उस परिवर्तनकामी चेतना का अभाव दिखता है जो कविता के मानी होते हैं। पर हमारे मुल्क में और इस महाद्वीप में अभी भी जिस तरह अशिक्षा और जहालत का बोलबाला है, जैसे-जैसे लोग शिक्षित होते जाएंगे कविता का घेरा बढेगा। बाकी जमात को छोड कर खुद कवि हो जाने,होते चले जाने के कोई मानी नहीं हैं।
हिन्दी कविता में दिल्ली के कवियों की केंद्रियता के क्या खतरे हैं…वही जो दिल्ली केन्द्रित सत्ता के हैं , पर कोई कवि दिल्ली का नहीं होता जैसे राजनीतिज्ञ दिल्ली के नहीं होते। एक केन्द्रियता तो रहेगी ही उसे बार बार विकेन्द्रित करने की जरूरत होगी।
आठवें दशक के बाद जो पीढी आयी उसने कविता के कथ्य और शिल्प को किन अर्थों में बदला…
मैं इस तरह दशकों में कविता को बांट कर नहीं देखता। यह बंटवारा इसलिए होता है कि उस छोटे से घेरे में आप महारथी दिखें। काहे का महारथी जब आपकी आधी से ज्यादा आबादी जहालत के घेरे में है, पहले उन्हें शिक्षित कर लें फिर उनके कवि होने का दावा और बंटवारा करें।
नहीं,मैंे जानना चाहता था कि नवें दशक के कवि कुमार अंबुज,एकांत श्रीवास्तव,मदन कश्यप,विमल कुमार आदि ने आठवें दशक के बरक्स कविता में कौन से नये बदलाव लाए। ये आपसे ठीक पहले के कवि हैं।
इनमें मदन कश्यप के अलावे बाकी ने खुद को अपने समय की राजनीति से बचाव की मुद्रा में रखा। प्रकृति का वर्णन या अंतरमन के प्रसंगों को कविता में लाना जरूरी है पर यह हमें अपने समय की उठापटक से दूर करने का वायस बने यह जरूरी नहीं। विमल कुमार ने अपने पहले संग्रह के बाद राजनीति से अपना जुडाव दिखाने की कोशिश की पर वह जमीनी नहीं बन पाया।
आज कुछ बडे प्रकाशक थोक भाव से कवियों को छाप रहे हैं कथाकरों और उपन्यासकारों को छाप रहे हैं जैसे वे उनके दिशा-निर्देशक हों। इस तरह पीढियां बनाने के प्रकाशन की भूमिका को आप किस तरह देखते हैं…
देखिए , खुशफहमियां पालने का हक सबको है, जब नये रचनाकार ही खुशफहमियों से बाहर आने को तैयार ना हों तो प्रकाशक को क्या पडी है , वह उन्हें निर्देशित करेगा ही। वह उसके व्यापर का हिस्सा है। बाकी पीढी-पीढा प्रकाशक क्या उभारेंगे, वे अपनी गांठ सीधी करें इससे ज्यादा की उन्हें फुरसत कहां है…
उर्वर प्रदेश पर जिस तरह से विवाद उठा है,उससे वर्तमान कविता और कवियों के बीच के अंतरविरोधों पर किस तरह रोशनी पडती है…
यह एक राजनीतिक विवाद है। इसका रचनात्मकता से कोई लेना देना नहीं। पुरस्कार कोई भविष्य की गांरटी कैसे दे सकते हैं। हर राजनीतिक तमाशा एक सीमा के बाद चूकता है। उर्वर प्रदेश भी चूका अब जाकर। इस प्रदेश से बाहर हमेशा ज्यादा उर्वर कवि रहे।
आपने कविता के अतिरिक्त गद्य भी लिखा है…एक कवि के लिए गद्य लेखन को आप कितना महत्वपूर्ण मानते हैं…
गद्य कविता में फार्मेट का अंतर है , बातें तो वही होती हैं। शमशेर ने कहा है ना कि बात बोलेगी , तो कविता हो या गद्य ,बातों को बोलना चाहिए, ऐसा ना हो कि उनकी वकालत की जरूरत पड.ें। हां,गद्य लिखने से कवि अपनी सत्ता को जान पाता है कि वह कितनी ठोस है।
फिलहाल आप किसे बड.ी संभावना के रूप में देखते हैं,कविता या आलोचना को…
संभावना या बात जहां होगी वह बडी हो जाएगी। अपने आप में कविता या आलोचना से क्या संभावना …।
पहले के किन कवियों ने आपके काव्य व्यक्तित्व और लेखन पर प्रभाव डाला है…
अलग-अलग समय में अलग लोगों ने प्रभावित किया। जैसे 1987 में जब मेरा पहला कविता संकलन पिता ने छपवाया था तब मैं केदारनाथ सिंह के प्रभाव में था। उनके असर में उस संकलन में एक कविता भी लिखी थी मैंने जो संकलन का नाम भी था,समुद्र के आंसू। आरंभ में तुलसी और दिनकर,बच्चन का प्रभाव था। विकास के साथ प्रभावित करने वाले कवि बदलते गये। केदारजी की कविता आज कोई प्रभाव नहीं छोड.ती। ना दिनकर,बच्चन ही। लंबे समय से मुक्तिबोध,शमशेर,नागार्जुन,त्रिलोचन का प्रभाव है। मुक्तिबोध,शमशेर का गद्य और कविता एक ही तरह से प्रभावित करते हैं और एक हद तक रघुवीर सहाय भी। टैगोर की कविताएं बहुत प्रभावित करती हैं वैसे रिल्के के पत्रों का सर्वाधिक प्रभाव खुद पर अनुभव किया।
प्रभाव से अलग मेरे प्रिय कवि अलग हैं, आलोक धन्वा,विष्णु नागर,विष्णु खरे,ऋतुराज,लीलाधर मंडलोई,मंगलेश डबराल,विजय कुमार,असद जैदी,मदन कश्यप,अनामिका,सविता सिंह,निर्मला पुतुल,वंदना देवेंद्र। बांग्ला कवि नवारूण भटटाचार्य बहुत प्रिय हैं मुझे। अपने प्रिय कवियों की कविताएं मैं लोगों केा बारहा सुनाता हूं।
लंबी कविताओं के संदर्भ में आप क्या कहना चाहेंगे…
कविताओं को छोटी और लंबी में बांटना नहीं चाहता मैं। दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण होती हैं। बस संगठन का फर्क है। वरना लंबी कविता भी आप एक सांस में पढ जाएं और छोटी भी आपको उबा दे। कुछ लंबी कविताओं ने मुझ पर गहरा प्रभाव छोडा, जैसे आलोक धन्‍वा की ब्रूनो की बेटियां,सफेद रात,लीलाधर जगूडी की मंदिर लेन,लीलाधर मंडलोई की अमर कोली और कुमारेन्‍द्र पारसनाथ सिंह की लंबी कविताएं।
नयों में किनसे उम्मीद बंधती है…
बहुत लोग बहुत तरह से लिख रहे हैं,उम्मीदें ही उम्मीदें हैं…

>यतीमों के मुख से छीने गये दूध के साथ…

जुलाई 8, 2010

>गुडहल

सांवले हरे पत्‍तों व सादे लाला फूलों के साथ
घर-घर में विराजमान मैं गुड़हल हूं

फिरंगियों के घर पैदा होता
तो डैफोडिल सा मेरा भी प्‍यारा नाम होता
जो बचाता बलि से मुझको
पर यहां निर्गंध हूं इसीलिए भक्‍तों का प्‍यारा हूं
मेरे पड़ोसी गेंदा-गुलाब
टुक-टुक मेरा मुंह देखते रहते हैं
और मैं मुटठी का मुटठी चढ़ा दिया जाता हूं
पाथरों पर
कोई जोडा मुझे बालों में नहीं सजाता
किसी की मेज की शोभा नहीं बढ़ता मैं
कॉपी के सफों में सूखकर
स्‍मृतियों में नहीं बदलतीं मेरी पंखुडि़यां
हर सुबह
यतीमों के मुख से छीने गयो दूध के साथ
मैं भी पत्‍थरों पर गिरता हूं
और हर शाम
उसी के साथ सडकर
बुहार दिया जाता हूं

मैं ओड़हुल हूं

>आदमियत – मैं हवा को पहनकर सोना चाहता हूं

जुलाई 7, 2010

>मैं

हवा को पहनकर
सोना

और

धूप को पहनकर
जागना चाहता हूं

यह
एक आदिम ईच्‍छा है

इस ईच्‍छा पर
नियंत्रण का नाम है

आदमियत…

>खुशी की आत्‍मा खुशी के पैरों में निवास करती है …

जुलाई 3, 2010

>खुशी का चेहरा

खुशी को देखा है तुमने क्‍या कभी
श्रम की गांठें होती हैं उसके हाथों में
उसके चेहरे पर होता है
तनाव-जनित कसाव
बिवाइयॉं होती हैं खुशी के तलुओं में
शुद्ध मृदाजनित

खुशी की
हथेलियॉं देखी हैं तुमने
पतली कड़ी लोचदार होती हैं वो
जो अपनी गांठें
छुपा लेती हैं अक्‍सर
अपनी आत्‍मा में
उस पर चोट करो
देखों कैसे तिलमिलाकर
उभर आती हैं गांठें

चेहरे के तनावजनित कसावों को
छेड़ने से ही
फूटती है हँसी
ध्‍वनि की तरह

तलुओं में ना हों तो
खुशी की स्‍मृत्तियों में
जरूर होती हैं बिवाइयॉं
वहॉं झांकोगे
तो फँसी मिटटी पाओगे
उसे मत निकालना गर्त्‍त से
रक्‍त
फूट पड़ेगा उनसे

बड़े गहरे संबंध होते हैं
मिटटी के और रक्‍त के
सगोत्रिय हैं दोनों

अपनी आत्‍मा को
जानते हो तुम

खुशी की आत्‍मा
खुशी के पैरों में निवास करती है
तब ही तो
इतनी तेज दौड़ती है खुशी
एक चेहरे से
दूसरे तीसरे व तमाम चेहरों पर

कभी खुश हुए हो तुम
श्रम
किया है क्‍या कभी
दौड़े हो घास पर नंगे पॉंव
या फिर रेत पर
तो तुमने जरूर देखा होगा
कि कैसेट
हमारे पॉंवों में पैसी आत्‍मा
मिटटी से
चुगती है संवेदना
और कैसी तेजी से
हरी होती हैं
मस्तिष्‍क की जड़ें

यहॉं से वहॉं उड़ान भरती
कैसी उन्‍मुक्‍त होती है हँसी
और निर्द्वांद्व कितनी
कि पकड़ में नहीं आती कभी
कैमरे में बंद करो
तो तस्‍वीरों से फूट पड़ती है
मन में बंद करो
तो आंखों से

क्‍या करे वह
कि समय कम है उसके पास
और
असंख्‍य हैं मनुष्‍य
पीड़ा से बिंधे हुए
और सब तक जाना है उसे

खुशी की
ऑंखें होती हैं हिरणी सी
विस्‍फारित तुर्श साफ व सजल
छोटी सी पीड़ा भी
डुला देती है उसे
बह आता है जल
टप-टप-टप

बड़ा गम भी
पचा लेती है खुशी
कभी वही
गॉंठ बन जाती है
कैंसर की

पर श्रम की गॉंठ
जि‍यादा कड़ी होती है
गम की गॉंठ से
उसे गला देती है वह

खुशी जानती है
कि जियादा से जियादा
क्‍या कर सकता है गम
उसे माटी कर सकता है

मिटटी की तो
बनी ही होती है खुशी
खिलौनों सी
उसके टूटने पर बच्‍चे रोते हैं
कुम्‍हार नहीं रोता
वह जानता है श्रम को
पहचानता है खुशी को
गढ लेगा वह और और नयी

बारह से
पॉंव होते हैं खुशी के
मृगनयनी होती है
पर मृगमरीचिका नहीं देखती खुशी

पहले
कड़कती है बिजली
फिर होता है बज्रप्रहार

गरजता

जैसा आता है दुख
वैसा ही चला जाता है
पर चक्रवातों और
दुख की सूचनाओं की तरह
सन्‍नाटे का
व्‍यामोह नहीं रचती खुशी
आना होता है
तो आ जाती है चुप-चाप
भंग करती सन्‍नाटा

आती है
तो जाती कहॉं है खुशी
रच-बस जाती है सुगंध सी
खिला देती है
पंखुडि़यों को
फिर बंद कहॉं होती हैं पंखुडि़यॉं
झर जाऍं चाहे

गमों में
सब छोड़ देते हैं दामन
तो बच्‍चे
थाम लेते हैं खुशी को
और भरते हैं कुलॉंच

तब बड़े नाराज होते हैं
उन्‍हें मारते हैं चॉंटे
और खुद रोते हैं

कुत्‍ते की तरह
हमेशा
हमारे आगे-आगे
भागती है खुशी
बच्‍चों सी आगे आगे
साफ करती चलती है रास्‍ता

वह देखती है पहाड़
और चढ़ जाती है दौड़ कर
वहीं से बुलाती है

नदी को देखते ही
गुम हो जाती है
भँवरों में

जंगल को देखते
समा जाती है दूर तक
फिर कहीं से
करती है
कू-कू-कू
हम भागते हैं उसे पाने को
भागते चले जाते हैं
हॉंपते ढहते ढिलमिलाते
उसी की ओर

जंगल काटते हैं
और बनाते हैं पगडंडियॉं
भँवरों से लड़कर
बनाते हैं पुल
पत्‍थरों को छॉंट
चढते हैं पहाड़

शायद इसी तरह बने हैं
तमाम रास्‍ते सभ्‍यता के

खुशी को ढूंढता
कोलंबस
अमरीका ढूंढ लेता है

एवरेस्‍ट तक
हमें खुशी ले जाती है

चॉंद पर
जाती है खुशी
और कहती है
मंगल पर चलो

कभी
पीछे लौटकर नहीं देखती खुशी
स्‍मृतिविहीन अतीत का रास्‍ता
नहीं होता है उसका
डायनासोर मिलते हैं जहॉं
जो अपना भविष्‍य
खुद खा जाते हैं।