>सफल कवि

>हिटलर को कोसता
स्टालिन को सर नवाता
किसी गोष्ठी की अध्यक्षता को
आगे बढ़ जाता है सफल कवि

यूरेका यूरेका
ध्वनित होता है
उसकी हर कविता से
हर पंक्ति उसकी
पत्थर की लकीर होती है
ख़ास आदमी के ऐश्वर्य की
खिल्लियाँ उड़ाना आता है उसे
मंजिल बहुल अपने आफिस से
लिफ़्ट को त्याग
सीढ़ियों से
नीचे आता है सफल कवि
और मानता है
कि इस तरह वह
आम आदमी के निकट आता जा रहा है

पूरी दुनिया
नंगी आँखों देखना चाहता है वह
पूरी धरती रौंदना चाहता है
नंगे पांव
पर लोग हैं
कि करने नहीं देते कुछ
आम जन की समझ में
कर्मठ
और अपनी नज़रों में
सबसे बड़ा काहिल होता है सफल कवि

नवागंतुकों से
सुहागनों की तरह
पेश आता है सफल कवि
बातों का घूंघट
सलीके से करता है
विचारों से
पति-परमेश्वर की तरह
मिलाता है मुश्किल से

क़लम को
कूची की तरह पकड़ता है
सफल कवि
और चेहरों को
चूल्हों की तरह पोत देता है
फिर महसूसता है
कि उसकी नसों का ताप
ठंडा पड़ रहा है।

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4 Comments »

  1. >जिन्दा लोगों की तलाश!मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!!काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा।=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=सच में इस देश को जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे।हमें ऐसे जिन्दा लोगों की तलाश हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है।इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है।अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं।आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना।शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल-सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! अब हम स्वयं से पूछें कि-हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे?जो भी व्यक्ति इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :-(सीधे नहीं जुड़ सकने वाले मित्रजन भ्रष्टाचार एवं अत्याचार से बचाव तथा निवारण हेतु उपयोगी कानूनी जानकारी/सुझाव भेज कर सहयोग कर सकते हैं)डॉ. पुरुषोत्तम मीणाराष्ट्रीय अध्यक्षभ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

  2. >हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाईकृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

  3. 3
    JHAROKHA Says:

    >पूरी दुनिया नंगी आँखों देखना चाहता है वह पूरी धरती रौंदना चाहता है नंगे पांव पर लोग हैं कि करने नहीं देते कुछ आम जन की समझ में कर्मठ और अपनी नज़रों में सबसे बड़ा काहिल होता है सफल कवि Sach kaha hai apne—yah ek kavi man kee chhatpatahat hee to hai.Hardik shubhakamnayen.


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