जून 2010 के लिए पुरालेख

>किसी के साथ रहकर भी जो अकेले रह गये तो …

जून 28, 2010

>अकेले

उदासी के साथ रहना

एक तरह की आश्वस्ति देता है

– कि
इस अकेलेपन को
हम

खत्म कर सकते हैं

कभी भी

उस डर के मुकाबिल

कि
किसी के साथ रहकर भी

जो
अकेले रह गए
तो…

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>दिल्‍ली में सुबह

जून 27, 2010

>सीढि़यों से
गलियों में
उतरा ही था
कि हवा ने गलबहियाँ देते
कहा – इधर नहीं उधर
फिर कई मोड़ मुड़ता सड़क पर आया
तो बाएँ बाजू ख्‍ड़ी प्रागैतिहासिक इमारत ने
अपना बड़ा सा मुँह खोल कहा– हलो
मैंने भी हाथ हिलाया और आगे बढ़ गया फुटपाथ पर-
दाएँ सड़क पर गाडि़याँ थीं इक्का-दुक्का
सुबह की सैर में शामिल सर्र- सर्र गुज़रतीं
फ्लाईओवर के पास पहुँचा तो दिखा सूरज
लाल तलमलाता सा पुल चढ़ता
मैंने उससे पहले ही कह दिया– हलो…
आगे पुल के नीचे के सबसे हवादार इलाके में
सो रहे थे मजूर अपने कुनबे के साथ
उनके साथ थे कुत्ते
सिग्‍नलों के हिसाब से
दौड़-दौड़ सड़कें पार करते
वे भूँक रहे थे– आ ज़ा दी
ट्रैफिक पार कर फुटपाथ पर पहुँचा
तो मिले एक वृद्ध
डंडे के सहारे निकले सैर पर
मैंने कहा– हलो , उन्होंने जोड़ा
हाँ-हाँ चलो
हवाएँ तो संग हैं ही … अभी आता हूँ
तभी दो कुत्ते दिखे … पट्टेदार … सैर पर निकले
उन्हें देखते ही आगे-आगे भागती हवा
दुबक गई मेरे पीछे
खैर कुत्तों ने सूंघ-सांघ कर छोड़ा हवा को
अब मैं भी लपका
लो आ गया पार्क
और जिम – खट खट खटाक
लौहदंड – डंबल भाँजते युवक
ओह-कितनी भीड़ है इधर
हवाओं ने इशारा किया- चलो उधर
उस कोने वाली बेंच पर
उधर मैं भी भाग सकूंगी बे लगाम
मैंने कहा – अच्छा …

अब लोग थे ढेरों आते-जाते
कामचोरी की चरबियाँ काटते
आपनी-अपनी तोंदों के
इनकिलाब से परेशान
आफ़िस जाकर आठ घंटे
ठस्स कुर्सियों में धँसे रहने की
क्षमता जुटाते
और किशोरियां थीं
अपने नवोदित वक्षों के कंपनों को
उत्सुक निगाहों से चुरातीं-टहलतीं
और बच्‍चे ढलान पर फिसलते बार-बार
और पाँत में चादर पर विराजमान
स्त्री-पुरूष
योगा-श्वास प्रश्वास और वृथा हँसी का उद्योग करते
इस आमद-रफ़्त से
सूरज थोड़ा परेशान हुआ
हवा कुछ गर्मायी और हाँफने लगी
सबसे पहले महिलाएँ गईं बेडौल
फिर बूढ़े, फिर किशोरियाँ के पीछे
कुत्ता चराते लड़के गए
अब उठी वह युवती
पर उससे पहले उसके वक्ष उठे
और उनकी अग्रगामिता से परेशान
अपनी बाँहों को आकाश में तान
उसने एक झटका दिया उन्हें
फिर चल निकली
उससे दूरी बनाता उठा युवक भी
हौले-हौले
सबसे अं‍त में खेलते बच्चे चले
और हवा हो गए
अब उतर आईं गिलहरियाँ
अशोक वृक्ष से नीचे
मैंनाएँ भी उतरीं इधर-उधर से
पाइप से बहते पानी से ढीली हुई मिट्टी को
खोद-खोद
निकालने लगे काग-कौए
कीड़ों और चेरों को

अब चलने का वक़्त हो चुका है
सोचा मैंने और उठा – सड़क पर भागा
वहाँ हरसिंगार और अमलतास की
ताज़ी कलियाँ बिखरी थीं
जिन्हें बुहारने को तत्पर सफ़ाई कर्मी
अपने झाड़ओं को तौलता
अपनी कमर ऐंठ रहा था
इधर नीम पर बन आये थे
सफ़ेद बेल-बूटे
और टिकोड़े आम के बेशुमार
फिर पीपल ने अपने हरेपन से
कचकचाकर हल्का शोर-सा किया
हवा के साथ मिल कर
तभी
मोबाइल बजा-
किसी की सुबह हुई थी कहीं …
हलो … हाँ … हाँ … हाँ
आप तैयार हों
मैं पहुँच रहा हूँ …।

>मैं हिन्‍दू हूं…

जून 26, 2010

>मैं
हिन्‍दू हूं
इसलिए
वे
मुसलमान और ईसाई हैं
जैसे
मैं चर्मकार हूं
इसलिए वे
बिरहमन या दुसाध हैं

आज हमारा होना
देश-दिशा के अलगावों का सूचम नहीं
हम इतने एक से हैं
कि आपसी घृणा ही
हमारी पहचान बना पाती है
मोटा-मोटी हम
जनता या प्रजा हैं
हम
सिपाही पुजारी मौलवी ग्रंथी भंगी
चर्मकार कुम्‍हार ललबेगिया और बहुत कुछ हैं
क्‍योंकि हम
डॉक्‍टर इंजीनियर नेता वकील कलक्‍टर
ठेकेदार कमिश्‍नर कुछ भी नहीं हैं

उनके लिए क्‍लब हैं
पांच सितारा होटल हैं
एअर इंडिया की सेवाएं हैं

हमारे लिए
मंदिर – मस्जिद – गिरजा
पार्क और मैदान हैं
मार नेताओं के नाम पर
और उनमें ना अंट पाने के झगडे हैं

हम आरक्षित हैं
इसलिए हमें आरक्षण मिलता है
मंदिरों – मस्जिदों – नौकरियों में
जहां हम भक्ति और योग्‍यता के आधार पर नहीं
अक्षमताओं के आधार पर
प्रवेश पाते हैं
और
बादशाहों और गुलामों के
प्‍यादे बन जाते हैं।

>सबसे अच्‍छे ख़त

जून 25, 2010

>सबसे अच्‍छे ख़त वो नहीं होते
जिनकी लिखावट सबसे साफ़ होती है
जिनकी भाषा सबसे खफीफ होती है
वो सबसे अच्‍छे ख़त नहीं होते
जिनकी लिखावट चाहे गडड-मडड होती है
पर जो पढ़ी साफ़-साफ़ जाती है

सबसे अच्‍छे ख़त वो होते हैं
जिनकी भाषा उबड़-खाबड़ होती है
पर भागते-भागते भी जिसे हम पढ़ लेते हैं
जिसके हर्फ़ चाहे धुंधले हों
पर जिससे एक चेहरा साफ़ झलकता है

जो मिल जाते हैं समय से
और मिलते ही जिन्‍हे पढ़ लिया जाता है
वो ख़त सबसे अच्‍छे नहीं होते
सबकी नज़र बचा जिन्‍हें छुपा देते हैं हम
और भागते फिरते हैं जिसकी ख़ुशी में सारा दिन
शाम लैंप की रोशनी में पढते हैं जिन्‍हें

वो सबसे अच्‍छे ख़त होते हैं
जिनके बारे में हम जानते हैं कि वे डाले जा चुके हैं
और जिनका इंतज़ार होता है हमें
और जो खो जाते हैं डाक में
जिन्‍हें सपनों में ही पढ पाते हैं हम
वे सबसे अच्‍छे ख़त होते हैं।

>आदमी के अभयारण्‍य

जून 25, 2010

>शेर – चीतों के बाद
अब आदमी के भी
बनने लगे हैं अभयारण्‍य
शुभ्र धवल छंटी हुई दाढ़ी
और चश्‍मे के भीतर से चमकती
उस दरिंदे की आंखों को तो देखो
एक मिटती प्रजाति है यह
पर एक पूरा राज्‍य है
इसके हवाले

ओह
कैसी गझिन
रक्‍तश्‍लथ है
हंसी इसकी
इस रक्‍तपायी की जीभ तो
दिखती नहीं कभी
सारे रक्‍तचिन्‍ह
चाट गया है यह
बस इसकी दाढ़ों में लगा
बच रहा है खून।

>संतोषम परम सुखम

जून 23, 2010

>सन्तोष बड़ा सुख है
ज्ञानी विचार से सन्तुष्ट होता है
बुद्धिमान तर्क से
मूरख अपनी आस्थाओं से सन्तुष्ट होता है
और जड़ अपनी जड़ताओं के टूटने से

तमाम डरों के प्रति अपनी जिज्ञासाओं से
सन्तुष्ट होते हैं बच्चे
बच्चों के डरों को जानकर
ख़ुश होते हैं बूढ़े
कि वे भी उन्हीं के समान हैं

लगाम कसे जाने पर
बिगड़ैल घोड़ों की तरह भागता
युवा ख़ुश होता है
तमाम पाबंदियों को बिसारकर
सन्तुष्ट होती है युवती

युवा समझे जाने पर किशोर ख़ुश होता है
नवोदित वक्षों में खदबदाती
गौरैयों को छेड़कर
खुश होती है किशोरी

विरह में प्रेमी ख़ुश होते हैं
मिलन में कामी
बन्धने पर तन ख़ुश होता है
स्वतन्त्र छोड़ देने पर मन

हवाई दुर्घटनाओं की ख़बर सुनकर
क्रान्तिकारी ख़ुश होता है
कि चलो दलालों की एक खेप कम हुई
ख़बरों को पाकर
ख़बरनवीस सन्तुष्ट होता है
उन्हें दबाकर संपादक

पर राजनीतिज्ञ और हत्यारे
कभी ख़ुश नहीं होते
अपने हर क़दम के बाद
ख़ुद को वे
और घिरा पाते हैं।

>बल्‍ले से गेंद को पीटना एक बडा काम है…

जून 23, 2010

>बल्ले से गेंद को पीटना
एक बडा काम है
और उसे पीटते रहना
बहुत बडा काम
और उसे लगातार पीटते रहना
महान काम है

बीच बीच में अगर देश
पिट भी जाए
फिर भी लगातार पीटते रहना तो
महा महान काम है

गेंद को बल्ले से पीटे जाते देखना
अच्छा काम है
और उसे पीटे जाते निहारना
खूबसूरत काम है
और उसे देखते रहना अंत तक अनिमेष
तो साधना ही है एक
जिसके लिए दर्शकों को
बम्हर्षि की उपाधि
दी ही जानी चाहिए

गेंद को द्रविड पीटे तो
देश का नाम होता है
और उसे सिंह पीटे तो
बडा नाम होता है
पर अगर उसे पंडत पीटे
तब तो महो महो………

>कौन डरता है यहां पागल हो जाने से…

जून 22, 2010

>फुटपाथ के मल-मूत्र में डूबे हिस्से पर
अगर एक आदमी
अपने स्वप्न की गठरियां सजाता है
रात ढले
और चांदनी बिखरने लगती है
उससे फूटती उबकाई पर
और आखिरकार मुंह बाएं
सो जाता है वह
और यह दृश्य देख हम होश में हैं
तो तय है
कि हमें होश में रहने की बीमारी है

कौन डरता है यहां पागल हो जाने से

आपका एक अपना जब
आधी रात को
छोड जाता है आपको
भटकने को प्लेटफार्म पर
और चांद के धब्बे निहारते
आप बिता देते हैं बाकी रात

कौन डरता है यहां पागल हो जाने से

अगर एक लफंगा
हीरे की अंगूठी की चमक को
अपनी आंखों की चमक पर
तरजीह देता
इतराता है
अपने बिकाउ या सेलीब्रिटी हो जाने पर

कौन डरता है यहां पागल हो जाने से

लोग जब रहे नहीं
ना रहा दुख
ना रही भाषा
बस प्रत्याशा रह गयी
विज्ञापनों में कूकती

कौन डरता है यहां पागल हो जाने से।

>सफल कवि

जून 21, 2010

>हिटलर को कोसता
स्टालिन को सर नवाता
किसी गोष्ठी की अध्यक्षता को
आगे बढ़ जाता है सफल कवि

यूरेका यूरेका
ध्वनित होता है
उसकी हर कविता से
हर पंक्ति उसकी
पत्थर की लकीर होती है
ख़ास आदमी के ऐश्वर्य की
खिल्लियाँ उड़ाना आता है उसे
मंजिल बहुल अपने आफिस से
लिफ़्ट को त्याग
सीढ़ियों से
नीचे आता है सफल कवि
और मानता है
कि इस तरह वह
आम आदमी के निकट आता जा रहा है

पूरी दुनिया
नंगी आँखों देखना चाहता है वह
पूरी धरती रौंदना चाहता है
नंगे पांव
पर लोग हैं
कि करने नहीं देते कुछ
आम जन की समझ में
कर्मठ
और अपनी नज़रों में
सबसे बड़ा काहिल होता है सफल कवि

नवागंतुकों से
सुहागनों की तरह
पेश आता है सफल कवि
बातों का घूंघट
सलीके से करता है
विचारों से
पति-परमेश्वर की तरह
मिलाता है मुश्किल से

क़लम को
कूची की तरह पकड़ता है
सफल कवि
और चेहरों को
चूल्हों की तरह पोत देता है
फिर महसूसता है
कि उसकी नसों का ताप
ठंडा पड़ रहा है।

>अतीत की छायाओं का संग्रहण – कुमार मुकुल

जून 18, 2010

>होने की सुगंध  युवा कवि प्रकाश का पहला कविता संग्रह है। यह विडंबना ही है कि इस संग्रह की कविताओं में कवि का होना नहीं है कहीं। ये कवि के भूतकाल की कविताएँ हैं, इसलिए अकथ हैं- मेरे पास कहने को कुछ नहीं था
सो जन्मों से कहता जाता था
कहने को होता
तो कहकर चुक जाता।
हिन्दी की युवा कविता के लिए इस तरह की उलटबांसी नई है, पर भारतीय दर्शन ऐसी उलटबांसियों से पटा पड़ा है। दरअसल यह एक युवा की अपनी कथा कह न पाने की बेचैनी की कविताएँ हैं पर चूंकि यह कहना भूतकाल में है सो वर्तमान में यह संभव नहीं हो पाता। कविता में नयी जमीन तोड़ने का साहस नहीं है कवि में इसलिए अतीत का घटाटोप खड़ा कर देता है वह। क्योंकि अब अतीत का तो कुछ किया नहीं जा सकता।
जहाँ कवि अपने ‘या’ के अबूझ दर्शन से बाहर आकर कुछ रचने की कोशिश करता है, तो वहाँ वह झुककर नमस्कार करने या जो है उसे स्वीकारने के अलावा कुछ नहीं कर पाता –
नदी भागी जाती है 
सागर की ओर
पाँवों पर झुककर
लीन हो जाती है
यह नमस्कार की नित्य लीला है।
यह नदी आपके लिए नहीं है कविवर सागर के लिए है। यह नमन आपका है नदी की लीला नहीं? प्रकृति पर ऐसे आरोपन बहुत हैं संग्रह में और एक ही कथ्य का दुहराव भी। नदी सागर की ओर जाती है यह बात इस संग्रह में तीन जगह कही गयी है। मूलतः यह कथ्य अज्ञेय के यहाँ से लिया गया है। ‘कितनी नावों में कितनी बार’ कविता संग्रह में अज्ञेय ने लिखा है एक कविता में कि नदी सागर में मिल गयी, मैं किनारे पर खड़ा रह गया। इसी तरह संग्रह की कविताओं में ‘या’ की शैली में जो दर्शन उलटबांसी की तरह घेरता है पाठक को, वह भारतीय परंपरा की छाया है, जिसका प्रभाव ग्रहण किया है कवि ने और उसे वर्तमान में पुनर्रचित ना कर पाता है तो ‘या’ की शैली में कह जाता है।

‘सुनने के बारे में कुछ पंक्तियाँ’, नामक कविता में कवि लिखता है-
सुनो वह
जिसे सुनने के द्वार पर
तुमने शिला लुढ़का रखी है
और एक भी दूब खिलने नहीं दी।
 सही लिखा है कवि ने पर सत्य तो यह है कि कवि ने खुद वर्तमान के मुहाने पर भूत की शिला खड़ी कर रखी है। सुनने में कुछ विशेष प्रयत्न न था कवि की पंक्ति है। यही कवि स्वभाव भी है। प्रयत्नहीनता कवि का मूलभाव है बस अतीत की छायाओं का संग्रहण हैं ये कविताएँ है, सुनना है एक पर प्रयत्नहीन, सक्रियता नहीं है, जीवन नहीं है कहीं इन कविताओं में फड़कता या साँसें लेता।

हालांकि कवि को पता है कि सक्रियता ही आखिरी उपाय है जीवित आदमी के लिए। ‘धन्यवाद’ कविता में वह बताता भी है कि बंद दरवाजे की कुंडी खोल खुले आकाश को धन्यवाद देना ही आखिरी उपाय था, पर कवि ने यह उपाय किया या नहीं उसका पता नहीं देता वह। यूँ है की शैली में जहाँ कवि कोशिश करता है अपनी प्रयत्नहीनता के बाहर आने की वहाँ वह अच्छी कविता लिख पाता है। ‘हँसी का बीज’ जैसी ऐसी जीवंत कविता भी है प्रकाश के पास और उसे अपने इस बीज को आगे विकसित होने देना चाहिए अतीत के भूत से पल्ला छुड़ाकर तभी कविता में वह कुछ पन्ने जोड़ पाएगा।
‘हँसना शुरू होते ही
मैदान में हँसी के बीज पड़ जाते हैं।’
कवि को अपनी इस हँसी के श्रोत ढूँढ़ने होंगे। उसे अपनी भाषा का व्याकरण जो ‘करता था’ की ध्वनियों से पूरित है, उससे बाहर निकलना होगा, तभी उसके दुखों का निस्तार होगा।

यह समीक्षा मासिक साहित्यिक पत्रिका पाखी के जून अंक में प्रकाशित है।