>नथिंग इज गुड और बैड-राजेन्‍द्र यादव:बातचीत-कुमार मुकुल

>

आपके मनोविज्ञान को किन लेखकों ने प्रभावित किया?

रवीन्द्रनाथ टैगोर, एंटोन चेखव, टाल्सटाय, दोस्तोएवस्की और सीमोन द बोउवार जैसे लेखकों ने मेरे मन पर प्रभाव डाला। ये ऐसे लेखक हैं जिन्होंने मनुष्य के मनोजगत में गहरे उतरकर देखा है। किसी विशेष स्थिति में चेखव पात्रों का जिस गहराई और प्रामाणिकता से चित्रण करते हैं, वह चकित करता है-पात्र चाहे साधु संत हो या लंपट, वे दोनों के मन में समान गहराई से उतरते हैं। जब किसी पात्रा का चित्रण करते हैं तो लगता है कि चेखव खुद उन परिस्थितियों से गुजरे हों। दोस्तोएवस्की ने अपने पात्रों के मनोविज्ञान व मानसिक उठापटक और अंतर्मन में चलते द्वंद्वों का जैसा चित्रण किया है वैसा दुनिया के किसी कथाकार ने नहीं किया है। खुद फ्रायड ने दोस्तोएवस्की पर किताब लिखकर उनके मनोविज्ञान से अपने सिद्धांतों का निर्माण किया। दोस्तोएवस्की की पुस्तक अपराध और दंड को अमेरिका में अपराध शास्त्रा को समझने के लिए पाठ्यक्रमों में लगाया गया है। मुझे उनका उपन्यास डबल प्रिय है जिसमें मानसिक दबावों और तनावों में जीनेवाला नायक खुद अपने प्रतिरूप को सामने पाता है और उससे संवाद करता है और पाठक भूल जाता है कि असली नायक कौन है। मनोविज्ञान की इस गहराई तक शायद ही कोई दूसरा लेखक पहुंचा हो। टैगोर-शरतचंद्र में स्त्री मनोविज्ञान को पकड़ने की अद्भुत क्षमता है। उन्नीसवीं सदी के सभी बडे कथाकारों ने बेहद प्रामाणिकता से नारी मनोविज्ञान को पकड़ने की कोशिश की है। उनमें फ्लाबेयर, बाल्जाक, आदि मुख्य हैं। सीमोन की सेकंड सेक्स तो नारी मनोविज्ञान की गीता मानी जाती है। उसने स्त्रियों की सामाजिक, पारिवारिक और राजनीतिक कई पक्षों का गहराई से चित्राण किया है। नारी होने के कारण यह उसके लिए सहज भी था।

आपके जीवन की किन घटनाओं ने आपको विचलित किया?

मुश्किल है याद करना…। सब जुड़ी हैं…। मेरे एक घनिष्ठ मित्र की तनावपूर्ण परिवारिक जीवन की यातनाओं से गुजरने की घटना ने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया। उसी पर मैंने सारा आकाश उपन्यास लिखा। उनका नाम था रामप्रकाश दीक्षित। हाल की एक घटना बहुत महत्त्वपूर्ण है। मेरा एक परिचित युवक अपने मित्र की पत्नी के प्रेम में इस तरह पड़ा कि उसे कुछ सूझता ही नहीं था। पर जब उसी महिला ने एक और मित्रा पर नजरे-इनायत की तो उस युवक को गहरा धक्का लगा और वह घंटों रोता रहा कि जिसके पीछे उसने अपनी जिंदगी के पंद्रह साल खराब किए वह उसे दगा दे गई। वह आत्महत्या करने की सोचने लगा था। यह घटना मुझे मनोवैज्ञानिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण लगती है। इस पर गहराई से लिखने का मन होता है।

मनोवेद जैसी पत्रिका में आप क्या चाहते हैं?

हर बार कुछ नये मनोवैज्ञानिक केसेज सामने लाए पत्रिका।

मन ही मनुष्य है’ मनोवेद का यह स्लोगन कैसा है ?

ठीक है। मन के हारे हार है मन के जीते जीत। अंग्रेजी कहावत भी है-देयर इज नथिंग गुड और बैड, बट थिंकिंग मेक्स इट सो…।
Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: