मार्च 2010 के लिए पुरालेख

>नथिंग इज गुड और बैड-राजेन्‍द्र यादव:बातचीत-कुमार मुकुल

मार्च 31, 2010

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आपके मनोविज्ञान को किन लेखकों ने प्रभावित किया?

रवीन्द्रनाथ टैगोर, एंटोन चेखव, टाल्सटाय, दोस्तोएवस्की और सीमोन द बोउवार जैसे लेखकों ने मेरे मन पर प्रभाव डाला। ये ऐसे लेखक हैं जिन्होंने मनुष्य के मनोजगत में गहरे उतरकर देखा है। किसी विशेष स्थिति में चेखव पात्रों का जिस गहराई और प्रामाणिकता से चित्रण करते हैं, वह चकित करता है-पात्र चाहे साधु संत हो या लंपट, वे दोनों के मन में समान गहराई से उतरते हैं। जब किसी पात्रा का चित्रण करते हैं तो लगता है कि चेखव खुद उन परिस्थितियों से गुजरे हों। दोस्तोएवस्की ने अपने पात्रों के मनोविज्ञान व मानसिक उठापटक और अंतर्मन में चलते द्वंद्वों का जैसा चित्रण किया है वैसा दुनिया के किसी कथाकार ने नहीं किया है। खुद फ्रायड ने दोस्तोएवस्की पर किताब लिखकर उनके मनोविज्ञान से अपने सिद्धांतों का निर्माण किया। दोस्तोएवस्की की पुस्तक अपराध और दंड को अमेरिका में अपराध शास्त्रा को समझने के लिए पाठ्यक्रमों में लगाया गया है। मुझे उनका उपन्यास डबल प्रिय है जिसमें मानसिक दबावों और तनावों में जीनेवाला नायक खुद अपने प्रतिरूप को सामने पाता है और उससे संवाद करता है और पाठक भूल जाता है कि असली नायक कौन है। मनोविज्ञान की इस गहराई तक शायद ही कोई दूसरा लेखक पहुंचा हो। टैगोर-शरतचंद्र में स्त्री मनोविज्ञान को पकड़ने की अद्भुत क्षमता है। उन्नीसवीं सदी के सभी बडे कथाकारों ने बेहद प्रामाणिकता से नारी मनोविज्ञान को पकड़ने की कोशिश की है। उनमें फ्लाबेयर, बाल्जाक, आदि मुख्य हैं। सीमोन की सेकंड सेक्स तो नारी मनोविज्ञान की गीता मानी जाती है। उसने स्त्रियों की सामाजिक, पारिवारिक और राजनीतिक कई पक्षों का गहराई से चित्राण किया है। नारी होने के कारण यह उसके लिए सहज भी था।

आपके जीवन की किन घटनाओं ने आपको विचलित किया?

मुश्किल है याद करना…। सब जुड़ी हैं…। मेरे एक घनिष्ठ मित्र की तनावपूर्ण परिवारिक जीवन की यातनाओं से गुजरने की घटना ने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया। उसी पर मैंने सारा आकाश उपन्यास लिखा। उनका नाम था रामप्रकाश दीक्षित। हाल की एक घटना बहुत महत्त्वपूर्ण है। मेरा एक परिचित युवक अपने मित्र की पत्नी के प्रेम में इस तरह पड़ा कि उसे कुछ सूझता ही नहीं था। पर जब उसी महिला ने एक और मित्रा पर नजरे-इनायत की तो उस युवक को गहरा धक्का लगा और वह घंटों रोता रहा कि जिसके पीछे उसने अपनी जिंदगी के पंद्रह साल खराब किए वह उसे दगा दे गई। वह आत्महत्या करने की सोचने लगा था। यह घटना मुझे मनोवैज्ञानिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण लगती है। इस पर गहराई से लिखने का मन होता है।

मनोवेद जैसी पत्रिका में आप क्या चाहते हैं?

हर बार कुछ नये मनोवैज्ञानिक केसेज सामने लाए पत्रिका।

मन ही मनुष्य है’ मनोवेद का यह स्लोगन कैसा है ?

ठीक है। मन के हारे हार है मन के जीते जीत। अंग्रेजी कहावत भी है-देयर इज नथिंग गुड और बैड, बट थिंकिंग मेक्स इट सो…।
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>‘‘मनोविज्ञान की समझ आम लोगों तक साहित्य के माध्यम से ही जाती है’’ – विष्‍णु नागर

मार्च 31, 2010

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चर्चित कवि-कथाकार विष्णु नागर से कुमार मुकुल की बातचीत

आप कवि के साथ समर्थ व्यंग्यकार भी हैं, व्यंग्य की रचना-प्रक्रिया क्या कविता से अलग है?
कविता हो या व्यंग्य रचना-प्रक्रिया तो एक ही है। जिस तरह कविता दिमाग में आती है उसी तरह व्यंग्य भी आता है। कई बार ऐसा भी होता है कि कुछ पता नहीं चलता कि यह रचना क्या रूप ले रही है। कब वह कविता से कहानी बनने लगती है, इसका अंदाज नहीं हो पाता, हालांकि अब ऐसा अक्सर नहीं होता है। कई बार रचना पूरी होने पर ही स्थिति साफ होती है कि वह क्या बनी। कई बार व्यंग्य लिखना चाहता हूं और वह कुछ और हो जाता है – उसमें कटुता ज्यादा आ जाती है या वह व्यंग्य से अधिक व्यक्ति के मर्म को अधिक छूने वाली रचना बन जाती है पर प्रक्रिया एक ही होती है। व्यंग्य चूंकि आजकल रोज लिखना होता है तो अभ्यास होने से एक आसानी होने लगती है पर कविता उस आसानी से नहीं आती। कभी आई नहीं।

सारा साहित्य एक मनोविज्ञान को सामने लाता है, तो साहित्यकार किस हद तक मनोविज्ञानी है? क्या इस रूप में उनकी भूमिका को रेखांकित किया जा सकता है?
बिल्कुल किया जा सकता है। मनोविज्ञानी आमतौर पर रचनात्मक नहीं होतेे और वे मनोविज्ञान को कुछ फार्मूलों के तहत ज्यादा समझना चाहते हैं। आदमी उनके सामने होने पर भी उसके मन में उतरने की बजाय वे अपने सीमित टूल्स का इस्तेमाल करते हैं। इस तरह वे सामने वाले को एक आॅब्जेक्ट के रूप में देखने लगते हैं – फलतः आप उसके मनोविज्ञान को समझ कर भी नहीं समझ पाते। लेखक के लिए आदमी आॅब्ज्ेाक्ट नहीं होता – उसे उसका इस्तेमाल नहीं करना होता है – उसे वह जीवन की सहज प्रक्रिया के दौरान ही जानता-समझता है। मनोविज्ञान की समझ उसकी आम लोगों तक किसी-न-किसी किस्म के साहित्य के माध्यम से की जाती है। हमारी दुनिया के बड़े लेखकों ने भले मनोविज्ञान की पढ़ाई न की हो, पर उनसे बड़े मनोवैज्ञानिक कम ही हैं, जैसे – चेखव, प्रेमचंद आदि।

एक रचनाकार अपने रचना-कर्म से असंतुष्ट भी रहता है और उससे मोह भी रहता है। इस द्वंद्व के साथ उसे कैसे तालमेल बैठाना चाहिए?
कोई भी रचनाकार मेरे खयाल से कभी अपनी रचना से संतुष्ट नहीं होता। उसे उसकी रचना के और अपने अधूरेपन का अहसास हमेशा रहता है। रचनाकार का कोई एवरेस्ट शिखर नहीं होता, जहाँ वह झंडा फहरा आए। लेकिन जो रचा है, उसे सबके सामने लाने की इच्छा भी रहती है ताकि दूसरों की आँख से भी उसे जाँचा-परखा जा सके। इस द्वंद्व के साथ ही कोई भी रचनाकार जीता है।

आप ‘भटकते रहने में’ विश्वास करते हैं। इसके पीछे आपकी सोच क्या है?
मैं इसके शाब्दिक अर्थ में भी यानी सड़क पर भटकने में भी विश्वास रखता हूं और एक रचनाकार के रूप में भटकते रहने में भी। भटकने की आदत के चलते मुझे आपने आसपास के तमाम रास्तों का पता रहता है और नए रास्ते मिलते रहते हैं। एक रचनाकार के रूप में क्यों हम अपनी एक खास छवि ही प्रक्षेपित करने पर जोर दें? जो आपका मन करे, जैसे करे, वैसा उस रूप में लिखा जाए फिर उसे कोई मान्यता दे या ना दे। यह दूसरों की स्वतंत्राता है कि वे उसे रचना के रूप में माने या न माने और यह रचनाकार की स्वतंत्राता है कि वह लिखे और संभव हो तो प्रकाशित कराए। मेरा विश्वास है कि छवियोें में बंद होना अपनी रचनात्मकता को खत्म करना है।

माँ पर आपकी कई कविताएँ हैं। माँ को लेकर अपनी यादों से कुछ बाँटना चाहेंगे?मैंने अपने पिता को अपनी स्मृति में देखा नहीं। मैं अपने परिवार में अपनी माँ के अलावा अकेला था। तो माँ ने ही मुझे पाला-पोसा, बड़ा किया। उसी से मैं लड़ता भी रहा और प्यार भी करता रहा, पाता रहा। मेरी एक इच्छा पूरी नहीं हो पाई कि मैं उनके जीते जी उन्हें कुछ भौतिक सुख प्रदान कर पाता। यह दुख मुझे सालता है। उनका जीवन आर्थिक तंगी और उसके तनावों में ही बीता।

अन्य बीमारियों के उलट मनोरोग को भारतीय समाज एक कलंक मानता है। इस प्रवृत्ति को कैसे बदला जाए?
हमारे समाज में चिकित्सा की इतनी कम सुविधाएं रही हैं कि लोग शरीर के इलाज के अलावा मानसिक इलाज के बारे में जानते ही नहीं ? आदमी के पागल हो जाने के बाद ही यह सोचा जाता है कि उसे किसी मनोचिकित्सक को दिखाना है, कि वह समाज के किसी काम का नहीं, कि उसे पागलखाने में भर्ती कराना है। सदियों से गहरे में बैठी इस मानसिकता का नतीजा है कि जागरूक लोग भी मानसिक बेचैनियों की स्थिति में किसी मनोचिकित्सक के पास जाने से हिचकते हैं। इस प्रवृत्ति से लड़ना होगा क्योंकि अपनी कई मानसिक परेशानियों का निदान न होने पर आदमी कई बार अचानक हिंसक हो उठता है, आत्महंता हो जाता है या पागल हो जाता है। अपनी भूमिका को मीडिया कुछ हद तक निभा रहा है पर वह पर्याप्त नहीं है।

मनोवेद में और कौन-सी नई सामग्री आप चाहेंगे?चाहे वह भले ही सीधे मनोविज्ञान से न जुड़ी हो पर जिसका रवैया रचनात्मक हो तो उसका इस्तेमाल इसमें होना चाहिए। गिजुभाई जैसे बाल मनोविज्ञान के जानकार लेखकों की सामग्री को हिन्दी में मनोवेग जैसी पत्रिकाओं को उपलब्ध कराना चाहिए। वैसी सामग्री जो किसी भी रूप में लोगों के मनोविज्ञान को सामने लाती हो, चाहे वह ऊपर से मनोवैज्ञानिक न लगती हों उसका इस्तेमाल ज्यादा से ज्यादा होना चाहिए।

‘मन ही मनुष्य है’ इस उक्ति को आप कहां तक उचित मानते हैं?उक्तियों के उलझाव में मैं जाना नहीं चाहता। ये ऊपर से आकर्षक होती हैं पर कई बार पूरी सच्चाई को सामने नहीं आने देतीं। मानव इतना जटिल जीव है कि वह खुद भी नहीं जानता कि वह क्या है – रोज-रोज उसके सामने उसका अपना रहस्योद्घाटन होता रहता है। कई बार बुरे अर्थों में और कई बार बहुत अच्छे अर्थों में। मेरा खयाल है कि जो अपने व्यवहार का और समाज का भी लगातार विश्लेषण और आत्म विस्तार करता रहता है वही एक बेहतर मनुष्य हो पाता है। ऐसा करने के लिए आपके पास कई तरह के मानवीय-सांस्कृतिक औजार होने चाहिए क्योंकि जब आप अपनी क्षमता से बड़ी चुनौती के आगे खड़े होते हैं तब भी आपकी समझ में आता है कि आप कहां हैं, क्या हैं। हालांकि आज का हमारा संसार बहुत ही आत्मतुष्ट किस्म के लोगों का संसार है। और उन्हें अपनी हर छोटी-मोटी उपलब्धि पर गर्व है।

किन रचनाकारों ने आपके मनोविज्ञान पर प्रभाव डाला?किसी एक का नाम लेना सरलीकरण होगा। फिर भी जिनका नाम याद आ रहा है, वे हैं – तालस्ताय, चेखव, ब्रेख्त, प्रेमचंद, रघुवीर सहाय और कुछ हद तक जैनेंद्र। असंख्य रचनाकार हैं जिन्होंने तरह-तरह से प्रभावित किया है। एक आदमी मात्रा लिखित रचना से ही प्रभावित नहीं होता। रचनात्मकता के अलिखित रूप भी उसे प्रभावित करते हैं। मसलन संगीत, भारतीय शास्त्राीय संगीत ने गहरे से मथा है मुझे। कई बार लगता है कि संगीत से बड़ी कोई रचना शब्दों में नहीं की जा सकती।

कुछ घटनाएं, जिन्होंने आपको विचलित किया हो?
रोज ही कुछ न कुछ विचलित करता है पर जो आपके साथ घटित होता है तो आदमी उससे ज्यादा विचलित होता है। जैसे – भोपाल गैस हादसे का मैं शिकार होते-होते बचा क्योंकि – हादसे के एकाध घंटे पहले मैं भोपाल से निकल गया था जबकि मेरा इरादा उसी रेलवे स्टेशन पर सोने का था। बाद में हादसे की भयानकता का अंदाजा लगा तो जीवित होतेे हुए भी कई दिनों तक या शायद महीनों तक खुद को मरा हुआ ही समझता रहा। इस हादसे के मनोवैज्ञानिक प्रभाव से निकलने में सालों लगे पर उस पर एक लाइन नहीं लिख पाया मैं, यह भी दिलचस्प है। जबकि मैं बाद में नवभारत टाइम्स के लिए कवरेज करने के लिए गया भी था। एक सप्ताह वहां रहा। आज भी भोपाल शहर को मैं बहुत पसंद करता हूं। वहां बार-बार जाने की इच्छा होती है।

मनोवेद से

>’ख’ महाशय के किस्‍से – 3

मार्च 31, 2010

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हीरोइन से मुलाकात – कुमार मुकुल
पुराना किस्सा है । तब ‘ख’ महाशय की हल्की भूरी मूछें उगनी आरंभी ही हुई थीं । जीवन की पहली प्रतियोगिता परीक्षा देकर वे बॉम्बे जनता से मुगल सराय लौट रहे थे । गाड़ी में लड़के भरे थे भागलपुर के कुछ बाद एक परिवार चढ़ा जिसमें एक खूबसूरत लड़की थी । उम्र होगी यही चौदह-पंद्रह ‘ख’ महाशय भी पंद्रह पार कर गए थे ।

‘ख’ महाशय ने लड़की को देखा तो सोचने लगे कि शायद लड़की बॉंम्बे जा रही है, हीरोइन बनने । सुंदर लड़की को बॉम्बे जनता में देखने के बाद इससे ज्यादा सोचने की कूबत अभी नहीं हुई थी ‘ख’ महाशय की ।

लड़की के भावी हीरोइन होने के ख्याल ने उनको थोड़ा सक्रिय कर दिया । उन्होंने लड़कों की भीड़ में उसके परिवार को उनकी आरक्षित सीटें दिलाने में मदद की । खुद उपर की सीट पर अब अपना बैग छोड़ नीचे आ बैठै
फिर सब नार्मल हो गया लड़की ने एक बार ‘ख’ महाशय से नीचे से पानी का बोतल मांगा तो लपककर `क´ ने बोतल दिया । उनका विचार पक्का हुआ कि इतनी खुली तो हीरोइन ही हुआ करती होंगी फिर शाम और रात होने लगी सभी खाने-पीने के बाद ऊंघने लगे ।

लड़की ‘ख’ महाशय के सिर के उपर वाली सीट पर लेट गई थी , गाड़ी बढ़ी जा रही थी अपनी समगति में । थोड़ी देर बाद ‘ख’ महाशय भी उंघने लगे, एक झपकी के बाद गाड़ी जब मोकामा पुल पार करने लगी तो ‘ख’ महाशय के चेहरे के आगे अचानक अंधेरा सा छा गया । दरअसल उपर सो रही लड़की की लंबी जुल्फें खुल कर नीचे लहराने लगी थीं ।

पहले तो ‘ख’ महाशय थोड़ा उजबुजाए फिर उन्हें बालों की महक अच्छी लगने लगी । आगे ‘ख’ महाशय ने सोचा कि बालों को समेट कर उपर कर दिया जाए । अखिर वे उठे और बालों को समेटने लगे । इतने कोमल मुलायम बाल उनकी कल्पना से बाहर थे । आखिर बालों को समेटने के बाद उन्‍होंने लड़की के हाथों को उठाकर बालों को उपर अटकाने की कोशिश की । इसमें लड़की की नींद उचटी और उसने अपना मुखड़ा घुमाकर उनकी ओर कर दिया ।

अब ‘ख’ महाशय खड़े थे सो खड़े रह गए । कोमल बालों की याद तलहथी से जा नहीं रही थी सो उन्होंने फिर से बालों में हाथ दे दिया और लगे संवारने । फिर उनके हाथ चेहरा सहलाने लगे । पूरा डब्बा एक लय-एक गति में डूबा उंघ रहा था ।

फिर ‘ख’ महाशय ने लड़की के ओठों केा छुआ ऊंगलियों से फिर कुछ हुआ कि उसके हाथ चूम लिए । फिर तो चुम्बनों की लड़ी लगा दी ।

आखिरी बार जब गाड़ी ने मुगलसराय लगने के पहले सीटी दी तो डब्बे के बाकी लड़कों के साथ ‘ख’ महाशय भी जगे । एक लड़के ने पीछे से हांक दी- उतरने का इरादा नहीं है क्या ? तब ‘ख’ महाशय ने पाया कि वे खड़े-खड़े लड़की के हाथों पर उंघ रहे हैं और उसके बाल उनके हाथों में हैं । उनका बैग । लड़की के सिरहाने था । अब लड़की को टुढ्डी से हिलाते हुए ‘ख’ महाशय ने बैग छोड़ने के लिए आवाज दी ।

लड़की आंखें मलती उठी और देखा कि ‘ख’ महाशय नीचे उतर रहे हैं । उतरते-उतरते ‘ख’ महाशय ने एक बार गरदन घुमा कर देखा-तो पाया कि लड़की मुस्कुराते हुए हाथ हिला रही है । ‘ख’ महाशय ने निश्‍चय किया कि लड़की जरूर हिरोइन बनने जा रही है वे सोचने लगे कि हिरोइन बनने के बाद वे उसे पहचानेंगे कैसे, उन्हें इतना तो याद आ रहा था कि लड़की मधुबाला जैसी सुंदर थी पर रात-अधेरा-नींद चेहरा कुछ साफ हो नहीं रहा था ।

>’ख’ महाशय के किस्‍से – 2

मार्च 31, 2010

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साहब की सोहबत – कुमार मुकुल

सुबह नहा धोकर कसरत करने के बाद ‘ख’ महाशय को लगा कि बाहर कोने में बैठना चाहिए, वहां ठंडी हवा होगी `रिल्के´ की कहानियों का अनुवाद हाथ में ले प्लास्टिक की एक कुर्सी उठाए आ गए एक पेड़ के नीचे । हां, यहां हवा तेज है । नहाने से अभी भीगे बालों से जब हवा लगी तो सिहरन सी हुई । फिर कुर्सी पर बैठे महाषय ‘ख’ किताब पलटने लगे । अचानक उन्हें लाने में खड़बड़-खड़बड़ की आवाज सुनाई दी । उन्होंने देखा कि सामने उगी लंबी घासों में धोबिन चिडि़यों का झुंड सक्रिय हैं ।

‘ख’ महाशय रूक कर उन्हें देखने लगे, वे उछल-उछल कर घास-पात को चोंच से उठा-उठाकर अपना भोजन तलाश रही थीं ।’ख’ महाशय ने सोचा-अच्छा तो ये सुबह-सुबह काम शुरू कर देती है, तो-काम ही जीवन है अब ‘ख’ महाशय खुद की बावत सोचने लगे । उन्होंने उठकर इस तरह चिडि़यों सा कोई काम किया या नहीं । हां- उठा, हाथ-मुह धोया । नहाया-कसरत किया । अब पढ रहा हूं, पर इसमें चिडि़यों की तरह कोई मिहनत का काम तो नहीं हुआ
‘ख’ महाशय यह सोच ही रहे थे कि पड़ोसी का कुत्ता दीवार फान लॉन में आ गया । अरे, यह कैसे छूट गया । डरे से वे कुछ समझते कि कुत्ता भी लॉन में चिडि़यों की तरह कुछ ढूंढने लगा । तो, यह भी काम कर रहा है । पर, अरे यह तो घास खा रहा है- ताबड़तोड़ ।

थोड़ी सी घास चरने के बाद उसने कुछ विचित्र हरकतें कीं, फिर लॉन के ही एक कोने में उल्टी कर दी । वे हां-हां करते दौड़ा तब-तक कुत्ता दीवार फांद अपने बाड़े में जा चुका था । ‘ख’ महाशय सोंचने लगे तो यह कुत्ता काम करने नहीं उल्टी करने आया था । मतलब, साहबों की सोहबत । रात में ज्यादा खाना, साहब तो बाथरूम गये होंगे यह आया इधर ।

>`ख´महाशय के किस्‍से-1

मार्च 31, 2010

> अपनी पिटाई का किस्सा – कुमार मुकुल

`ख´ महाशय को कॉलेज जाते अब छ: महीने हो चले थे । वे चुपचाप ग्यारह बजे लॉज से निकलते और सड़क की भीड़ में शामिल कॉलेज पहुंच जाते । कॉलेज में एकाध दोस्त बनाए थे, सो क्लास के बाद सीिढयों पर बैठ समय काटते । न चाय की आदत थी न सिगरेट की हां फिल्में खूब देखते थे पर अकेले ।

एक दिन जब वे भातिकी के क्लास में लक्चर सुन रहे थे एक अबंड लड़के ने उनकी काली कमीज पर सफेद चाक से कुछ लिख दिया `ख´ महाशय ने इस हरकत पर बस पीछे मुड़कर देखा और फिर लेक्चर सुनने लगे ।
अगले क्लास में `ख´ महाशय उस लड़के के पीछे बैठे थे । क्लास के दौरान उन्होंने भी उसकी पीठ पर कुछ लिख मारा । इस पर लड़के ने आंखे गुरेरी और फुसफुसाया निकलो तो बताते हैं । `ख´ महाशय ने इसे गंभीरता से नहीं लिया । तत्कालिक तौर पर उन्होंने अपने जूते के आगे के भाग में कुछ कीलें उल्टी खोंस ली कि लड़के ने कुछ किया तो इन्हीं से प्रहार किया जाएगा । पर लेक्चर के दौरान वे सब भूल गए कि लड़के ने चेतावनी दी थी ।

क्लास के बाद जब लेक्चरार बाहर गए और `ख´ महाशय सीढ़ीनुमा क्लास रूम में नीचे उतरने लगे । अभी आखिरी सीढ़ी पर वे पहुचे थे कि उन्हें अपने चारों ओर कुछ लहराता दिखा फिर फट-फट कर आवाज सुनाई दी । वे अकचकाए खड़ा थे । तब उन्हें अहसास हुआ कि यह आवाज बेल्ट की है और यह उन्हीं पर फटकारी जा रही है ।

`ख´ महाशय अभी भी कुछ समझ नहीं पा रहे थे तब-तक उन्होंने देखा कि कुछ लड़के उस अबंड लड़के को घूंसों-मुक्कों से पीट रहे हैं । `ख´ महाशय के पास खड़ा लड़का उन्हें उकसा रहा था मारो ससुर को दो हाथ तुम भी । तब उन्हें अपने जूते में खोंसी पिनें याद आईं । तो लड़के `ख´ महाशय की पिटाई के एवज में ही उसे पीट रहे थे । `ख´ को लगा कि दुनिया अभी है और रहेगी ।

>मृत्‍यु गीत – गाब्रियला मिस्‍त्राल

मार्च 29, 2010

>1945 में नोबेल से सम्‍मानित चीले की इस्‍पाहानी कवयित्री गाब्रियला मिस्‍त्राल की कविताओं से गुजरना एक आत्‍मीय अनुभव रहा। अनुपस्थिति का देश तथा अन्‍य कविताएं नामक इस संकलन की कविताओं का अनुवाद गंगाप्रसाद विमल,विनोद शर्मा और आलोक लाहड ने किया है। प्रस्‍तुत है उनकी एक कविता …

गिन गिन कर ले जाने वाली सनातन मृत्‍यु

यह दक्ष हाथों वाली मृत्‍यु

ज‍ब निकले राह पर

न मिले मेरे बच्‍चे को

सूंधती है नवजातों को

और लेती है गंध उनके दूध की

पाये वह नमक और आटे का ढेर

न मिले उसे मेरा दूध

वह दुनिया की पूतना

जीवित लोगों को समुद्र तटों

खौफनाक रास्‍तों पर विमो‍हित करने वाली

इस अबोध को न मिले

नामकरण के साथ

विकसता है वह फूल सा

भूल जाए उसे अचूक याद वाली मौत

खो दे अपनी गणना।

कर दें उसे पागल

नमक,रेत और हवाएं

और दिग्‍भ्रमित भटके

वह पगली मौत।

कर दें उसे भ्रमित माएं और बच्‍चे

मछलियों की मानिन्‍द

और जब मेरा वक्‍त आए

वह मुझे निपट अकेली खाए।

>ग्‍लोबलाइजेशन चीजों को टुकडों में देखता है – प्रभाष जोशी – बातचीत – 1997 प्रभात खबर

मार्च 29, 2010

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राष्‍ट्रीय पुनरनिर्माण के मुद्दों पर बहस में भाग लेने आए लोगों में वरिष्‍ठ पत्रकार प्रभाष जोशी भी अन्‍य वक्‍ताओं के साथ अनुग्रहनारायण संस्‍थान की अतिथिशाला में ठहरे थे। सुबह नौ बजे मैं पहूंचा तो कमरे में आसा के एकाध लडके थे। बेड पर उनकी चौडे पाढ वाली धोती खोलकर रखी थी। उसी पर एक कलफ चढा खादी का कुरता भी। तभी बाथरूम का दरवाजा खुला,जोशी जी ने पुकारा कि यार,यहां तो पानी ही नहीं आ रहा, बुलबुले फूट रहे हैं। तभी सुरेन्‍द्र किशोर आए। उन्‍होंने आसा के व्‍यवस्‍थापकों को सलाह दी कि आगे से जोशी जी को कम से कम ऐसी जगह ठहराएं जहां फोन हो। एक कर्मचारी नीचे से बाल्‍टी में गर्म पानी लेकर आया। उसने आग्रह किया कि बाल्‍टी जल्‍द खाली कर दें,क्‍योंकि कभी भी किसी वीआईपी का फोन आ सकता है- कि कमरा तैयार करो। सुरेन्‍द्र जी ने पूछा कि कैसे वीआईपी तो उसने बताया, कोई आईएएस या वाइसचांसलर।
जोशी जी नहा कर निकले…। यार सुरेन्‍द्र अपन को तो यहां बहुत कष्‍ट हुआ। लगता है कि बहुत दिन से यह बाथरूम यूज नहीं हुआ था। सब साफ करना पडा। आधा घंटे और इंतजार करवाउंगा अपन। मेरा धोती पहनना पूरा कर्मकांड ही है। मेरी बेटी कहती है कि आप तो बंगाली स्त्रियों से भी अच्‍छी धोती बांधते हैं, फिर उन्‍होंने बिसलरी की बोतल से पानी पिया। सुरेन्‍द्र जी ने परिचय कराया कि इन्‍हें समय चाहिए इंटरव्‍यू के लिए। जोशी जी ने पूछा, तो आप मेरा आंत्रव्‍यू लेंगे,जी हां – साक्षात्‍कार। शाम का समय मिला।

शाम में हमलोग बैठे घंटे भर विनयन व शेखर से बात करने में गुजरे। फुर्सत मिली तो जोशी जी बोले,यार बात तो होगी ,पहले कहीं से यह पता करो कि क्रिकेट का स्‍कोर क्‍या है..। आखिर स्‍कोर मालूम हुआ।
पहला सवाल मेरे मन में यह था कि उत्‍तरआ‍धुनिकता-अंग्रेजी की वापसी और ग्‍लोबलाईजेशन से हिंदी पत्रकारिता कैसे निपटेगी…।

उनका कहना था कि भारत में उत्‍तरआ‍धुनिकता नहीं है,हमारा समाज आधुनिक है,यह कहना भी मुश्किल है। हिंदी पत्रकारिता के सामने संकट तो है,पटने में 12 पेज के अखबार ढाई रूपये में मिलते हैं और दिल्‍ली में 24 पेज के अखबार डेढ रूपये में। पर डेढ में बेचकर भी उन्‍हें करोडों की कमाई हो जाती है। इसका कारण है ग्‍लोबलाइजेशन व विज्ञापन। यह 1991 के बाद की आर्थिक स्थिति का नतीजा है। ग्‍लोबलाइजेशन समाज को टुकडों में बांट कर देखता है।
भाषा के अखबार जनता के अखबार हैं, पर उनका हितसाधक समाज टुकडों में बंटा है। इसे राजनीति और व्‍यापार ने मिलकर बांटा है। आज लालू,मुलायम,नीतीश वोट बैंक की राजनीति करते हैं। मुलायम ने कहा था कि मुझे उत्‍तराखंड की चिंता नहीं है। आखिर एक मुख्‍यमंत्री एक पूरे इलाके को छोड देता है कि वह उसका बोट बैंक नहीं है। फिर भी भाषा के अखबार जनता के होकर ही जीवित रह सकते हैं। पर इसे बांटने वाली प्रवृति को रोकना होगा1 इधर प्रमंडल का अखबार निकालने का चलन बढा है। यही नहीं आजजागरण वाले तो जिले का अखबार निकालने लगे हैं। इसी से समाज बंटता है। पर अखबार मालिकों के इशारे पर चल रहे हैं, वे बताते हैं कि- इधर देश के सबसे बडे प्रकाशन गृह के अध्‍यक्ष ने मुझसे कहा कि इन, जिले वाले अखबार, में क्‍या खराबी है…। खर्च कम है ,लागत भी कम।

सौंदर्य प्रतियोगिता के विरोध में एक आदमी जल मरा। आरक्षण के विरोध में भी ऐसा हुआ था। पर महिला आरक्षण का मुददा गायब कर दिया गया।
इस सब की बाबत वे बताते हैं कि 1996 के चुनाव में सारी पर्टियों के घोषणापत्र में 33 फीसदी आरक्षण की बात थी। पर उसे टाला जा रहा है। महिलाओं का दबाव बढ रहा है। पर मौजूदा लोकसभा के अधिकांश सदस्‍य ऐसा नहीं चाहते।

इधर शिवसेना व वाघेला तक ने क्षेत्रीय दलों का साथ चाहा है। क्‍या राष्‍ट्रीय दलों का जमाना लद गया है…।
इस पर जोशी जी बताते हैं कि आज कोई दल राष्‍ट्रीय रह ही नहीं गया है।,उत्‍तर के कई राज्‍यों में कांग्रेस का नामलेवा नहीं रह गया है। यहां एक ही पार्टी थी कांग्रेस,उसकी जगह क्षेत्रीय पार्टियां ले रही हैं। पर ये सीमित क्षेत्र की बंटी पार्टियां हैं। भाजपा और क्षेत्रीय पर्टियां साथ काम करें तो कोई सूरत उभरे पर वह संभव नहीं लगती।

अचानक मेरा ध्‍यान घाली पर जाता है। कया यूएनओ एक अमेरिकी जेबी संस्‍था है…। घाली के मुददे पर अमेरिका ने वीटो कर दिया। इराक के मामले में तो राष्‍ट्रसंघ ने युद्ध की स्‍वीकृति दी पर अफगान मामले में ढंग से निंदा भी नहीं की..।

इससे सहमत होते जोशी जी कहते हैं कि सोवियत संघ के पराभव के बाद अफगानिस्‍तान तबाही में है। एक लाख लोग वहां मारे जा चुके हैं। अमेरिका ने पाकिस्‍तान को अफगानिस्‍तान में फंसाकर रख दिया है। पर पाक का अपना ही घर नहीं संभल रहा । जहां तक यूएनओ की बात है अमेरिका हमेशा से इसका प्रयोग विश्‍व जनमत को अपनी ओर मोडने में करता रहा है।

मैं फिर पत्रकारिता पर आता हूं। इधर राजेंद्र यादव ने अंग्रेजी पत्रकारिता से हिन्‍दी की तुलना कर उसकी फजीहत की कोशिश की है। क्‍या यह हिंदी की हीनता ग्रंथी है…।

इस तरह की तुलना को जोशी जी गलत मानते हैं। …हीनता से बचने के लिए नहीं,परंपरा को समृद्ध करने के लिए हमें ऐसी तुलना से बचना चाहिए। हमारी भाषाई पत्रकारिता अंग्रेजी से समृद्ध है। अक्‍सर लोग अंग्रेजी से तुलना हिन्‍दी को झाडू लगाने के लिए करते हैं। अंग्रेजी की पत्रकारिता आज उल्‍टे बांस बरेली को भेज रही है। अंग्रेजी का अनुकरण कर हिंदी के अखबार कभी अच्‍छे नहीं हो सकते।
कुछ लोग क्षेत्रीय भाषायी पत्रकारिता को हिन्‍दी से समृद्ध बताते हैं…

जवाब में वे कहते हैं कि यह हिन्‍दी की अंग्रेजी से हीनता जैसी ही ग्रंथी है। यूं भाषायी पत्रकारिता ही हिंदी की जननी है। भारतीय पत्रकारिता की शुरूआत ही बंगाल से हुई है। जोशी आजकल गांधी को फिर से पढ रहे हैं। उनका मानना है कि साम्‍यवाद के पराभव व पूंजीवाद की विकृतियों के बीच का रास्‍ता गांधी से ही निकलेगा। यह हो सकता है कि हमें गांधी की पगडंडी चौडी कर राजपथ बनना पडे। क्‍योंकि पूंजीवाद की टेक्‍नोलाजी अपनाने से ही साम्‍यवाद में केंद्रीकरण की प्रवृति बढी व वह टूटा। महाभारत को भी वे पढने की सलाह देते हैं,कि मधुलिमये भी उसे पढते थे। उन्‍होंने आलोक धन्‍वा के लिए भी सलाह दी कि वे महाभारत पढें,उनका पराजय बोध घटेगा।
महाभारत की विशेषता है कि वहां न कोई हारता है न जीतता है। सबका विजय-पराजय दोनों से साबका पडता है। यह हिंदू धर्म की विशेषता है कि इसने तमाम अवातारों को सजा दी है। राम-कृष्‍ण-ब्रम्‍हा सब को ब्रम्‍हांड के न्‍याय के आगे सिर झुकाना पडा है।
अंतिम सवाल वरिष्‍ठ पत्रकार हेमंत करते हैं जो अभी अभी वहां आए हैं। वे पूछते हैं कि नये पत्रकारों को तैयार करने के लिए आप क्‍या कर रहे हैं…

उनका जवाब था कि प्रेस इंस्‍टीच्‍यूट के जरिए हमलोग नयी पीढी को पत्रकारिता के मूल्‍यों से परिचित कराने की सोच रहे हैं। नयी पीढी से अक्‍सर मुझे निराशा मिलती है। वे राजनीतिक तिकडमों को प‍त्रकारिता मानते हैं।
एक सवाल और उठता है कि हिंदी में कालमिस्‍ट नहीं हैं…।
उनका मानना है कि आज ज्‍यादातर अखबार अंग्रेजी के कालमिस्‍टों का अनुवाद छापते हैं ऐसे में क्‍या कहा जा सकता है। आज जागरणउजाला जैसे अखबार नकद पैसे देकर लेक्‍चररों से संपादकीय लिखवा ले रहे हैं । वार्ता और भाषा को जोशी जी अंग्रेजी की उपशाखाएं मानते हैं। वे बोलते हैं कि आज हमें भाषाई समाचार सेवा शुरू करने की जरूरत है।

>छुटटी के दिन का कोरस – प्रियंबद का उपन्‍यास – कुमार मुकुल

मार्च 27, 2010

>छुटटी के दिन का कोरस विन्सेंट डगलस यानि विवान के 1947 की ऐतिहासिक तारीख के दोनों ओर फैले जीवन की बिखरी स्मृतियों का कोलाज है। इस कोलाज में इतिहास और यथार्थ, स्वप्न और जीवन, कल्पना और वास्तविकता एक दूसरे पर ओवरलैपिंग करते नजर आते हैं और इस सब से उपजा दर्शन इस कोलाज को जोडे रखता है। इस कोलाज में बैठा विवान सोचता है कि अक्सर हम ऐसी प्रतीक्षाएं करते हैं जिनके बारे में हम जानते हैं कि वे कभी नहीं मिलतीं। विवान के लिए स्मृतियां ही यथार्थ हैं क्योंकि वे निष्कवच हैं। कि जो पवित्र दिखता है उसका षडयंत्र अपवित्र अंधेरी घाटियों में चलता रहता है। विवान के बहाने उपन्यासकार जैसे शंकर के मायावाद को फिर फिर रचना चाहता है पर उस माया को विच्छिन्न करने वाले सूत्रों को सामने आने से वह रोक नहीं पाता। हम सभी जानते हैं कि सच झूठ,पवित्र अपवित्र अगर संदर्भ रहित हों तो मात्र जुमले हैं, कि स्मृति का यथार्थ स्मृति का यथार्थ होता है जीवन के यथार्थ को वह धूमिल नहीं कर सकता।
इस उपन्यास में विवान के बहाने जितने बडे कालखंड को उपन्यासकार रचना चाहता है वह उसके अध्ययन और आत्मविश्वास से ही संभव हो पाता है अब वहां कहंा तक रच पाता है इसे भी वह जानता है इसलिए उसे कोरस ही कह पाता है और वह भी छुटटी के दिन का। इस कोरस की लय जहां तहां टूटती है पर हर बार उपन्यासकार उसे संभाल लेता है। विवान के बिखरे जीवन में जितने रंग हैं उतने एक साथ किसी एक उपन्यास में लाना उपन्यासकार की सफलता है। ये विवरण जीवन के फैले बहुआयामी यथार्थ से हमारा परिचय कराते हैं भले वे किसी निष्कर्ष तक ना पहुंचाते हों। आखिर यह मन और स्मृति की एक दिन की उडान ही तो है। इस लिहाज से यह एक दिन आत्मविश्लेषण का निर्णायक दिन है और इस एक दिन में विवान अपने जीवन और इतिहास का विश्लेषण कर जाता है।
उपन्यास में आए अनेक पात्रों के मनोजगत में लेखक गहरे उतरता है और नये नये रहस्य उजागर करता है और एक जगह तो वह अपने मुख्य पात्र के मनो जगत की छानबीन की भी नाटकीय कोशिश करता है जो अंततः एक तमाशे से ज्यादा प्रभाव नहीं छोड पाता। उपन्यास में गालिब जहां तहां शिरकत करते हैं और उपन्यास को एक लय प्रदान कर जाते हैं। आम भारतीय मानस की अच्छी पडताल है उपन्यास में अब वह परंपरिक परिवारों के भीतर चल रही प्रेम पच्चीसियां हों या आम हिस्टिरियाक चरित्रों का चित्रण। हां उपन्यास में जिस तरह हर पडाव पर एक यौन दृश्य को रचा गया है वह उसके ऐतिहासिक चरित्र को बाधित करता है।
कुल मिलाकर उपन्यास पारंपरिक भारतीय दर्शन में वक्त या समय की जो महत्ता है उसे ही स्थापित करता है। तभी तो जिस विवान को इंगलैंड की सत्ता में भागीदारी करनी चाहिए थी वह यहां मय्यत कमेटी का दफ्तर चला रहा होता है। आम भारतीय भी अपनी रोजाना की बातचीत में जिस तरह दर्शन की अंध गुहा में आपको ले जा सकता है और आप वहां भटकते रह सकते हैं यह उपन्यास भी आपको उस भूल भुलैया के दर्शन कराता है अब आप पर है कि आप उससे निकलना चाहते हैं कि उसी में अपनी निष्पत्तियां तलशते फंस कर रह जाते हैं। उपन्यासकार की निष्पत्ति यही है कि – हर जीवन एक महागाथा है, एक द्युमान लोक है,एक परम सत्य है। ये जीवन जीवन ही पतझर की तरह चारों ओर बिखरे हैं।…इनकी व्यप्ति ही अंतरिक्ष है।इनकी गति ही अहर्निश है। इनकी निरंतरता ही महाकाल है। यही जीवन ऋतु हैं,बम्ह हैं,चराचर जगत का आधार हैं। रचनाकार की दिक्कत यह है कि वह पक्ष और विपक्ष दोनों का दर्शन रच देना चाहता है वह स्वयंभू बनना चाहता है आम पारंपरिक भारतीय रचनाकार की तरह और दर्शन की उलटबंसी बजाकर बहुत जगह बेजा परेशान भी कर देता है। यूं उपन्यास अपनी उपस्थिति दर्ज करता है रचना के खाली लगते मैदान में, अगर धैर्य हो तो इसे पढकर पाठक खुद को विचारवान महसूस करेगा।

>सबसे बडका सियार – संस्‍मरण

मार्च 19, 2010

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यह कहानी चाचा सुनाया करते थे। कहानी उस समय की है जब पिता कालेज में पढते थे। मेरा गांव सोन नदी के तट पर है। तो वह बाढ का समय था तो नदी किनारे गांव के कुछ लडके जो बाढ देखने और नहाने को वहां जमा थे , उन्‍होंने देखा कि नदी किनारे एक बडा सा जंगली जानवर थका सा बैठा है। वह कहीं से बहकर आ गया था वहां। वहां बच्‍चों ने इससे पहले ऐसा जानवर ना देखा था ना उसके बारे में जानते थे। उन्‍होंने सोचा कि यह लगता तो कुत्‍ते सियार की तरह है पर कद में बडा है। सो वे गांव लौटे तो बडों को बताया कि एक बहुत बडा सियार सोन किनारे बहकर आ गया है। उस जानवर का जिसतरह उन्‍होंने वर्णन किया उससे गांव के बडों की उत्‍सुकता जगी कि चलें देखें वह कैसा बडा सियार है।

सो वे जमात में चल दिए सोन किनारे। उस जमात में एक थे कैलाश तिवारी और दूसरे थे भंगा सिंह। दोनें मिलिट्री में थे और छुटटी आए थे दो दो महीने की। तिवारी जी ही भंगा को भगा कर ले गये थे इस नौकरी में। तो जब इन दोनों बहादुरों ने उस बडे सियार को देखा तो हंसे और बोले कि अरे इ त बाघ ह…। फिर तिवारी जी ने भंगा को कहा कि ए भंगा चल देखल जाव कि इ बघवा में कतना दम बा। अब भंगा तो और एक कदम आगे थे सो बोले हा बबा अब इ बघवा रही चाहे हमनी के रहब जा , चलीं देखल जाव।

तो सीना ताने दोनों जने चल दिए बाघ की ओर। जब वे एक लग्‍गी की दूरी पर पहुंचे तो बाघ को लगा कि दोनों महाशय उनकी ही खैरियत पूछने आ रहे हैं सो उसने एक छलांग मारी और इनके पास आ गये और एक तबडाक लगाया पहले तिवारी बबा को फिर दूसरा तबडाक भंगा को और वे दोनों एक पर एक गिरे और अब बाघ उनके उपर जा बैठा और भीड की ओर देखने लगा कि – अब आव केकर बारी बा।

पर भीड के नायकों की जो हालत हो चुकी थी अब भला कौन बढता बाघ की ओर। इस बीच सबसे नीचे पडे तिवारी जी ने सोचा कि पता ना बघवा केने से खाए के शुरू करी। तो उन्‍होंने पूछा – कि ए भंगा तू उपर बाडस तनी हाथ हिलाके देख कि बघवा के मुंह केने बा, कि पता लागो कि उ केने से खाए के शुरू करी। भंगा ने हाथ निकाल कर जब कोशिश की तो हाथ में बाघ की पूंछ आयी। अब बाघ को लगा कि दोनों को मैंने दबा रखा है तो यह तीसरा कौन पूंछ पकड रहा है। सो वह डरकर फिर वही उछल कर जा बैठा जहां वह पहले था।

अब दोनों जवान धूर झारके उठे और बोले कि बडा जबर बाघ बा हो , चलल जाव गांव से भाला बरछी ले आवल जाव।

फिर वे सब गांव हथियार लाने चले इधर बाघ उठकर खलिहान की तरफ चला। आगे एक यादवों का टोला था जनेसरा। वहां जाकर वह पुआल के दो टालों के बीच घुस कर छुप गया। भीड जो पीछे लगी थी उसमें एक जनेसरा के यादव जी ने सोचा कि अच्‍छा मौका है बहादुरी दिखाने को सो वे आगे सो घुमकर सीधे बाघ के मुंह की ओर से उसकी गरदन पकडने को हाथ बढाये ,पर वह तो बाघ था सो कच कच उनका हाथ केहुनी तक चला गया। तब तक लोग भाल बल्‍लम लेकर आ चुके थे और उन्‍होंने उसे भोंक भांक कर वहीं मार दिया। फिर इस बहादुरी के लिए उस समय की अंग्रेज सरकार ने गांव को इनाम दिया और बाघ की छाल वही पास के गांव रेपुरा के मंदिर मे टांग दी गयी जो आज भी टंगी है।

बाघ ने जो चोट की थी उससे आगे भंगा की मौत हो गयी थी। पर तिवारी बबा जब तक जीते रहे अपनी पीठ पर बाघ के मारे का निशान दिखाते रहे।

>गुड खाएं और सैम संग गुलगुले भी – कुमार मुकुल

मार्च 13, 2010

>नामवर सिंह का कथन है-‘नेहरू की दृष्टि में संस्कृति एक ‘एलीटिस्ट’ अवधारणा थी और उन्होंने रवींद्रनाथ की परंपरा में ही भद्रवर्गोचित अकादमियों की स्थापना की।’ अब भद्र वर्ग अंकल सैम के संग गुलगुले खाए या टाटा बिड़ला संग, कोउ नृप होहीं हमैं का हानि…। सब जानते हुए नामवर ही कहां परहेज कर सके। अब तमाशा हो रहा है, सब लगे हुए हैं, निष्ठा की तुक बिष्ठा से मिलाने में। गुड़ की तुक गुलगुले, से कुल्हड़ की हुल्लड़ से, जहां जो मिल जाये बिना हर्रे फिटकरी के रंग चोखा करते चलिए।
जब सैमसुंग पुरस्कार की बात सुनी तो इस अदने से कवि पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुयी, अब कोई ज्ञान को पीठ दिखा रहा, कोई सैम के चरण चूम रहा तो अपन को क्या…। अपन कहां मैटर करता है…। अपन सैमसंग या ज्ञानपीठ के लिए तो पढता लिखता नहीं। पर तार्किक तौर पर जब युवा लेखक जमात ने विरोध करने की ठानी तो लगा कि यह सही ही है। पहले विरोध की जगह ओबेराय होटल थी फिर हम साहित्य अकादमी परिसर के बाहर जमा हुए। अब राजकिशोर जी की बहस इसी पर है कि हमारे सर क्यों नहीं फूटे। पहली तो भैया हम वहां सिर फोडवाने गये नहीं थे,हमारा उद्देश्य था अपनी बातों को लोगों तक ले जाना, हमने वहां पर्चे बांटे ,उपस्थित लेखकों ने अपनी बातें रखीं फिर हम वापिस आ गये। हां पुलिस वहां थी हमसे तिगुनी संख्यां में, चूंकि धारा 144 लागू थी 26 जनवरी की तैयारी के तहत। पुलिस वालों को हमारे भाषणों में ना काम की चीजें मिलीं ना नुकसान की, सो वे घूम घाम कर चले गए। अब इतनी सी बात पर आपको परीलोक हो आने का मन हो या किसी पूर्व पुलिस अधिकारी के हरम का मुआयना करने का, आपको कौन रोक सकता है…। एक तो हरम आपकी नजरों के सामने अस्तित्व में आया है और यह कहां की बात हुयी कि वहां जाकर आप अप्रसन्न हों तो यह का्रंतिकारी काम हुआ और प्रसन्न हों तो गलाजत का …। भईआ हरम में जाने की जरूरत ही क्या है…। फिर हबीब तनवीर भी उसी हरम थे …।
अब राजकिशोर जी का कहना है कि सामसुंग का चुंकि मानववाद से कुछ लेना देना नहीं है इसलिए उसे टैगोर के नाम का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए था। सैमसुंग को बचाने की यह निराली अदा कुछ समझ में नहीं आयी। जिसका मानववाद से संबंध ही नहीं हो उसके दिमाग में यह नेक ख्याल लाने के भोले ख्याल पर तरस ही खाया जा सकता है। राजकिशोर इससे पहले लिखते हैं कि सामसुंग और अकादेमी को पुरस्कार देना ही था तो बीच में टैगोर जैसे महान लेखक को नहीं लाना चाहिए था। आखिर , बीच में किसी घटिया लेखक को ही क्यों लाना चाहिए था। मतलब राजकिशोर जी को अकादेमी और सैमसुंग के मिलन पर आपत्ती नहीं, उन्हें टैगोर के नाम को धूमिल करने पर रोष है। एक ओर राजकिशोर अकादेमी के तौर तरीके को घटिया बताते हैं दूसरी ओर उसे सलाह देते हैं कि एक व्यावसायिक कंपनी के चक्कर में उसे नहीं पडना चाहिए था। जब वह घटिया है तो फिर उसके चक्करों का इतना चक्कर क्यों लगाना है…छोडिए उसे। पर राजकिशोर जी की चिंता है कि अकादेमी ने सैमसुंग से घटिया लेखकों को पुरस्कृत करवा कर उसे ब्लैकहोल में फेंक दिया है। तो राजकिशोर जी की मूल चिंता सैमसुंग के होल में जाने की है। अब क्या करेंगे राजकिशोर भी, इसी कागज रंगने की नौकरी है सो रंगना तो है…।
मूलतः राजकिशोर जी की चिंताएं दूसरी हैं उन्हें दुख है कि तीन दशकों से मार्क्सवाद हिंदी की आफिशियल विचारधारा क्यों बनी है …। वे लिखते हैं कि पंद्रह हजार के पुरस्कारों के लिए लोग कुत्तों की तरह भागते हैं। यह कौन सी भाषा है राजकिशोर जी। वैसे आदमी कोयल की तरह गाता है सिंह की तरह ताकतवर होना चाहता है बैल की तरह मजबूत होना चाहता है तो लालची वह कुत्ते की तरह ही होगा… इस पर रोष कैसा…। आदमी के आदमी की तरह होने की बात कभी दिमाग में आती ही नहीं…। वैसे लेखक तो ऐसे भी हैं जो पुरस्कार की राशि देकर भी उसे अपने नाम से करने से नहीं चूकते।
अब जहां तक गुड गुलगुले और परहेज की बात है तो गुड गुलगुला नहीं है। मुहावरे हमेशा सीधी सादी जनता को चुप कराने के लिए गढे जाते हैं। गुड खाने वाला गुलगुले से परहेज करेगा ही। अब किसी को चिकनाई से परहेज हो तो आपका क्या जाता है। अब कहिए कि हरी मिर्च खाते हैं तो लाल भी खाइए अब इस अंतर को समझना हो तो पाइल्स के मारे बंदों के पास जाइए।
अब शंभुनाथ जी कि चिंता है कि यह विरोध विलासी है तो भइया असली विरोध आप जताइए ना, आप गुड गुलगुले दोनों खा रहे हैं, अब बेचारा परहेजी कहां तक विरोध करे। उसकी इतनी चिंता ही क्यों। अब यह क्या बात हुयी कि कोई कुछ करना चाहे तो आप लगिए सवाल करने कि आपने यह क्यों नहीं किया। कि बहुराष्ट्रीय का हमला नजर आ रहा राष्ट्रीय का घपला नहीं दीखता। कुछ दीख तो रहा है, पहले वह भी कहां दीखता था। आप क्यों केवल देखने वालो को देखने में लगे हैं। कुछ दिखा डालिए आप भी।
साहित्य अकादमी और सर्वोत्कृष्टता का मसला भी जमता नहीं। अकादेमी उत्कृष्टता की कसौटी कहां है। वह प्रचार की कसौटी है बस। इस मुल्क में दर्जनों सर्वोत्कृष्ट हमेशा एक साथ रहते हैं,सबको पुरस्कृत करना कब किसके लिए संभव है, फिर वे शायद उत्कृष्ट काम कर भी ना सकें।
कुलमिलाकर हमें सचेत हो जाना चाहिए इस सैमसुंगी हमले से। बच्चन की कविता की पैरोडी करते हुए कहें तो-
तुम बाजार समझ पाओगे…
तोड मरोड मृदु लतिकांए
नोच खसोट कुसुम कलिकाएं
जाता है न्यूयार्क दिशा को
इसका गान समझ पाओगे…।

यह टिप्‍पणी फरवरी के अतिम सप्‍ताह के आज समाज दैनिक में प्रकाशित हो चुकी है।