>महात्‍मा जोतिबा फुले – कुमार मुकुल

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भारतीय समाज क्रांति के जनकों में जोतिबा फुले एक अविस्‍मरणीय नाम है। महाराष्‍ट्र की एक दलित जाति मालि में जन्‍मे फुले
जाति प्रथा के जहर की काट जीवन भर ढूंढते रहे और एक हद तक सफल भी रहे। महाराष्‍ट्र में जनप्रिय वीर शिवाजी फुले को भी प्रिय थे, उन्‍होंने उन पर एक कविता भी लिखी है जिसमें उन्‍होंने शिवाजी को शूद्र माने गए क्षत्रिय के रूप में देखा है। शिवाजी की तरह कुनबी, माली, महार आदि तथाकथित शूद्र जातियां कभी क्षत्रिय थीं, जो जातिवादी षडयंत्र का शिकार होकर दलित कहलायीं, यह जोतिबा की स्‍‍थापना थी।
1827 में जन्‍मे जोतिबा के पिता गोविन्‍द राव थे और माता विमलाबाई थीं,जो उनकी साल भर की छोटी सी उम्र में ही चल बसीं। बच्‍चों का ख्‍याल कर पिता ने दूसरी शादी कर ली। आगे पिता ने सगुणा बाई नामक विधवा को बच्‍चों की देख-भाल के लिए रख लिया। फुले का मानना था कि सगुणा ने ही उन्‍हें ऐसा बनाया। सगुणा मिशनरियों से जुड़ी थीं। उसे कुछ अंग्रेजी भी आती थी। फुले के पिता सगुणा को मुंहबोली बहन मानते थे।
जोतिबा को पढ़ाने की ललक से पिता ने उन्‍हें पाठशाला भेजा था पर सवर्णों ने उन्‍हें स्‍कूल से वापिस बुलाने को मजबूर कर दिया। अब जोतिबा पिता के साथ माली का काम करते थे। काम के बाद वे पास-पड़ोस के लोगों से देश-दुनिया की बातें करते और किताबें पढ़ते थे।
तेरह साल की छोटी सी उम्र में उनका विवाह खंडोजी नेवसे पाटिल से हो गया। आगे उनका नाम मिशन स्‍कूल में लिखा दिया गया। उसी समय उन्‍होंने थामसपेन की किताब राइट्स ऑफ मेन पढ़ी, जिसका उनपर काफी असर पड़ा।
स्‍कूल के अपने एक ब्राह्मण मित्र की शादी में एक बार जोतिबा गये थे तो उन्‍हें अपमानित होना पड़ा था। बड़े होने पर उन्‍होंने इन रूढि़यों के प्रतिकार का विचार पक्‍का किया। 1848 में उन्‍होंने अछूतों का पहला स्‍कूल पुने में खोला। यह भारत के तीन हजार साल के इतिहास में ऐसा पहला स्‍कूल था। इस कारण उनके पिता पर काफी दबाव पड़ा तो उनके पिता ने आजिज आकर कहा कि या तो स्‍कूल बंद करो या घर छोड़ दो। तब दोनों पति-पत्नि ने घर छोड़ दिया। आगे आर्थिक तंगी के चलते उन्‍हें स्‍कूल बंद करना पड़ा जिसे बाद में फिर खोला उन्‍होंने। उस स्‍कूल में एक ब्राह्मण शिक्षक पढ़ाते थे। उनको भी दबाव में अपना घर छोड़ना पड़ा।
1857 में जोतिबा ने भारत का पहला लड़कियों को स्‍कूल खोला जिसमें पढ़ाने को कोई तैयार नहीं हुआ तो उनकी पत्‍नी सावित्री ने ही पढ़ाना आरंभ किया। इस तरह घर से बाहर आ पढ़ाने का काम करने वाली पहली शिक्षिका थीं सावित्री। उन्‍हें तंग करने के लिए शुरू में उनपर गोबर और पत्‍थर फेंके जाते थे। पर वे डिगीं नहीं।
अपने सुधारों के लिए पुणे महाविद्यालय के प्राचार्य ने अंग्रेज सरकार के निर्देश पर उन्‍हें पुरस्‍कृत किया और वे चर्चा में आए। इससे चिढ़कर कुछ अछूतों को ही पैसा देकर उनकी हत्‍या कराने की कोशिश की गई पर वे उनके शिष्‍य बन गए।
1873 में जोतिबा ने सत्‍यशोधक समाज की स्‍थापना की। आगे स्‍वामी दयानंद ने जब बंबई में आर्यसमाज की स्‍थापना की तो सनातनियों के विरोध को देखते हुए उन्‍हें जातिबा की मदद लेनी पड़ी। जोतिबा ने शराबबंदी के लिए भी काम किया था।
एक गर्भवती ब्राह्मण विधवा को आत्‍महत्‍या करने से रोक उन्‍होंने उसके बच्‍चे को गोद ले लिया जिसका नाम यशवंत रखा गया। अपनी वसीयत जातिबा ने यशवंत के नाम ही की।
1890 में जातिबा के दांए अंगों को लकवा मार गया तब वे बाएं हाथ से ही सार्वजानिक सत्‍यधर्म नामक किताब लिखने में लग गये। इसी साल उनकी मृत्‍यु के बाद यह किताब छपी।
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