>दो दो बार स्‍वीकृत होकर ‘पहल’ में ना छपने का दुख – संस्‍मरण

>1990 में मैं पटना आ गया था सहरसा से। लेखकों से मिलना जुलना , गोष्ठियों आदि का दौर आरंभ था। अरूण कमल, आलोक धन्‍वा, नंदकिशोर नवल,खगेंद्र ठाकुर, भृगुनंदन त्रिपाठी, मदन कश्‍यप, कर्मेंदु शिशिर,प्रेम कुमार मणि आदि पटना के सक्रिय लेखकों के घर आना जाना आरंभ हो चुका था। नवतुरिया लेखक था सो सभी लोग बडे प्रेम से बातें करते मिलते जुलते बहसें करते। बउआने की आदत सहरसा के मैथिली के लेखक महाप्रकाश की संगत में लग चुकी थी। शाम छह बजे जब महाप्रकाश अपने आफिस से छूटने को होते तो मैं वहां हाजिर हो जाता। फिर उनके घर जाकर नाश्‍ता आदि कर जो हम घूमने निकलते तो रात दस बज जाते लौटते।
पटना में एक साल बिताने के बाद सायंस कालेज में हिन्‍दी के प्रोफेसर भृगुनंदन त्रिपाठी से परिचय हुआ तो वह गहराता चला गया। सहरसा में महाप्रकाश और डॉ.शिवेन्‍द्र दास की संगत में जो कविता के अलावे समीक्षा , आलोचना आदि पर जोर आजमाइश का दौर आरंभ हो चुका था वह पटना में त्रिपाठी जी की संगत में ही फला-फूला। त्रिपाठी जी उस समय देश की तमाम पत्र-पत्रिकाओं पहल, आलोचना आदि में लिखते थे। और मुझे भी प्रोत्‍साहित करते थे। शाम सात से दस-ग्‍यारह बजे तक हमलोग आसपास पांच किलोमीटर का इलाका टहलते हुए छान मारते। इस बीच तमाम नये-पुराने रचनाकारों की लानत-मलामत कर डालते। यूं राजकमल चौधरी पर लिखा मेरा एक आलेख सहरसा में रहते हुए ही महाप्रकाश जी ने पटना से प्रकाशित हो रहे साप्‍तहिक जनादेश में छपवा चुके थे। पर त्रिपाठी जी के साथ की लगातार बातचीत ने मेरी समझ को सिरे से दुरूस्‍त किया और चाहे छपा कम पर उन्‍होंने बहुत सारी चीजों पर लिखवा दिया जो आगे छपती रहीं, और कुछ तो अब उन्‍न्‍ीस बीस साल बाद भी कहीं कहीं छप रही हैं। एक बार लिख्‍ा लेने के बाद उसे फेयर ना कर पाने की मेरी कमजोरी के चलते समीक्षा हो या कविता वह दस पंद्रह साल बाद ही छप पाती है अक्‍सरहां। त्रिपाठी जी ने ही तब दक्षिण अफ्रीकी कविताओं का अनुवाद करवाया था जो दो साल पहले सम्‍प्रति पथ में छपा।
तो उनकी संगत में मैं लिख तो रहा ही था स्‍थनीय अखबारों और एकाध पत्रिकाओं में चीजें छपने भी लगी थीं। मुक्तिबोध मेरे मानदंड थे आलोचना में और थोडा शमशेर का गद्य प्रभावित करता था। नामवर सिंह को पढा तो पूरा पर उनके असर को पता नहीं क्‍यों, नहीं लिया मैंने। संभवत: आरंभ में मुक्तिबोध संमग्र पढने के चलते ऐसा हुआ हो। रामविलास जी से बात ना बनने पर मजाक मे उडा देने की कला का प्रयोग भी थोडा बहुत सीख गया था मैं, पर जिसे मैं उचित नहीं मानता था।
तो यही दौर था जब एक दिन सूचना मिली कि मुजप्‍फरपुर के कथाकार विजयकांत पटना आए हैं और एक होटल में ठहरे हैं। तो मैं अगले दिन सायकिल उठा जा पहुंचा उनसे मिलने। सफेद झकाझक धोती कुर्ता में देख मुझे कुछ आश्‍यर्य हुआ। वे उत्‍साह से मिले और उनसे जाना कि वे मेरे लिखे से परिचित हैं थोडा बहुत। औपचारिक बातचीत के बाद उन्‍होंने पहल के संपादक ज्ञानरंजन का पोस्‍टकार्ड दिखाया , जिसमें उन्‍होंने लिखा था कि अपने कहानी संग्रह की समीक्षा किसी समझदार व्‍यक्ति से कराकर आप भिजवा दें। साफ था कि मुझे समझदार माना जा रहा था, सो उन्‍होंने पूछा कि मेरी कहानियां पढी हैं आपने। मैंने झूठ ही कह दिया कि हां पढी हैं। पहल में समीक्षा का लोभ था। तब उन्‍होंने अपना संग्रह मुझे दिया और कहा कि अभी मैं एक जगह निकलूंगा आप दो घंटे में आएं तो बाकी बातें होंगी, आप विचार कर लें कि इसकी समीक्षा करेंगे या नहीं।
वहीं पास ही अरूण कमल और आलोक धन्‍वा को घर था सो मैं उधर ही निकल गया। अब रास्‍ते में चलते हुए मैं संग्रह की एक कहानी भी पढता जा रहा था ताकि लौट कर अपनी आलोचकीय प्रतिभा का कुछ नमूना बातचीत में पेश कर सकूं ताकि पहल में समीक्षा का छपना तय हो जाए। लौटकर चाय आदि पीकर कुछ बातें हुयी और उन्‍होने कहा कि समीक्षा लिखकर पहल को भिजवा देंगे। उनकी किताब का नाम था – बह्मफांस
दस दिन के भीतर मैंने समीक्षा लिखकर भेज दी ज्ञानजी को। पता त्रिपाठी जी का ही दे दिया। महीने भर बाद ही ज्ञानजी का पत्र आया।
3-11
प्रियवर,
आपकी समीक्षा अभी अभी मिली। पहले में इसका उपयोग करेंगे। अंक 46 या 47 में।
टंकण बहुत खराब है। आपने विजयकांत पर लिखा, इसके लिए हमारा आभार स्‍वीकार करें।
ज्ञानरंजन
भृगुनंदन जी को
हमारा स्‍मरण कराएं
ज्ञ.

साफ है कि मैं इस स्‍वीकृति से बहुत खुश था। पर महीने भर बाद ही विजयकांत का एक पत्र आया कि आप अपनी समीक्षा किसी और अच्‍छी पत्रिका में मेरे बताए अनुसार भेज दें, पहल में किन्‍हीं दूसरे की समीक्षा छप रही है। इस पत्र से मुझे गुस्‍सा आ गया कि क्‍या तमाशा समझ रखा है। सो मैंने वह समीक्षा फाडकर फेंक दी और कहीं छपने को नहीं दी।
दुर्भाग्‍य से या इसे साहित्‍य की राजनीति का नतीजा कहें सात आठ साल बाद फिर 1998 में मेरे साथ यही घटित हुआ । विष्‍णु खरे पर लिखा अपना लेख मैंने पहल को भेजा था , पिछली खटास मन से निकल चुकी थी। इस बार भी ज्ञानजी का पत्र आया।
पहल,21-1-98
प्रियवर
आपका पत्र और विष्‍णु खरे वाला लेख मिला। धन्‍यवाद। आपका लेख दिलचस्‍प है। हमारी दिक्‍कत है कि हम विष्‍णु खरे पर पर्याप्‍त सामग्री दे चुके हैं। साक्षात्‍कार फिर उसके बाद जनार्दन की लंबी प्रतिक्रिया। हमें दूसरों पर भी ध्‍यान देना है।
नए अंक में नामदेव ढसाल का साक्षात्‍कार है। उसके आगे लीलाधर जगूडी का होगा। आपके लेख को कभी उपयोग करेंगे।
ज्ञानरंजन

करीब आठ माह बाद याद दिलाने पर उनका एक कार्ड और आया।
ज्ञानरंजन, 18-9-98
प्रिय भाई कुमार मुकुल:अभिवादन,तुम्‍हारा पत्र मिला। जगूडी का साक्षात्‍कार पूरा होने के बावजूद ट्रांसक्राइब नहीं हो सका। यह मोहन थपलियाल की अपनी दिक्‍कत है। हम अगले अंक में कमलिनी दत्‍त का साक्षात्‍कार देंगे आगे राजेश जोशी का। जगूडी और देवताले के साक्षात्‍कार लटके हैं। पहल का कविता अंक अब नहीं आएगा। विजय कुमार के उद्भावना वाले अंक के बाद इतनी जल्‍दी यह संभव नहीं लगता। लेकिन मार्क्‍सवादी आलोचना के अंक की तैयारी गहरी है। वह 1999 के पूर्वाध में आ जाएगा। अगर संभव हो तो अपना लेख विष्‍णु खरे वाले की एक प्रति और भेज दें। हमने अब एक व्‍यापक संपादक मंडल बना लिया है और प्रबंधन भी। एक साथी को आपका लेख पढने को भेजा था और उनसे मिसप्‍लेस हो गया है। असुविधा के लिए क्षमा ।
ज्ञा.

मैंने पुन: वह लेख पहल को भेजा पर नहीं छपना था सो नहीं छपा। फिर आगे कभी पहल को नहीं भेजा कुछ। मैंने अनुभव किया कि साहित्‍य में बहुत राजनीति है और पहले लिख लाख कर इस राजनीति की काट की जाए और जो रचना छापाना चाहें उन्‍हें ही दी जाए। यह आदत आज तक है। पहली बार वसुधा ने दस बारह साल पहले मेरी कुछ कविताएं ठीक से छापी थीं तो उपर लिखा था कि ये कविताएं इस नये कवि से मंगवाई गयीं हैं।
वह अनुभव पहल से उल्‍टा है। जब मैं पहली नौकरी में बनारस में था तब वहां ज्ञानेन्‍द्रपति के अलावे काशीनाथ सिंह से भी कुछ मुलाकातें हुयी थीं। काशीनाथ जी बहुत अच्‍छे लगे थे मुझे। पहली बार जब उनके घर गया तो उन्‍होंने पहले गुड की भेली दी पानी पीने को, फिर पूछा कि क्‍या करते हो पत्रकारिता के अलावे। तो मैंने बताया कि – कविता करता हूं। उन्‍होंने कहा कि तब सुनाओ जो याद हो। उन दिनें पहाड कविता याद थी सो सुनाई , दोनों कविताएं। तब उन्‍होंने अपनी एक डायरी दी कि इस पर कविताएं लिख दो। मैंन लिख दी। फिर मैं बनारस छोड पटना आ गया। पांच छह साल बाद जब मैंने दिनेश कुशवाह की कविताओं की प्रशंसा में एक कार्ड डाला तो उनका पत्र आया कि अरे मैं आपका पता ढूंढ रहा था, गुरूदेव मतलब काशीनाथ जी, आपको याद करते हैं, अपनी कुछ कविताएं भिजवाइए। तो जो कविताएं भेजीं वही वसुधा में छपीं। मजेदार कि उसमें पहाड कविता नहीं थीं। पहाड कविता को छापने की बात सियाराम शर्मा ने भी लिखी थी, विकल्‍प में। उसके अंक निकल गए पर वह कविता छपी नहीं। पहले संग्रह में वह संकलित है पर कहीं छपी नहीं पत्रिका में। जबकि वह जहां भी पढता हूं वाहवाही बटोर लेती है।
तो ये दोनों ही पहलू है साहित्‍य की राजनीति के। पहल आज बंद है, वसुधा में फिर कुछ भेजा नहीं कभी तो छपा नहीं। मैं सोचता हूं कि अगर पत्रकारित में नहीं रहता तो साहित्‍य की इस राजनीति से कैसे लड पाता। बाकी नये रचनाकारों को इसी तरह झेलना पडता होगा या चेला बनना पडता होगा। यह गुण मुझमें सिरे से गायब है।
इस संदर्भ में एक मजेदार वाकया याद आ रहा है। मेरी पहली किताब जो पिता ने 1987 में छपवाई थी उसकी भूमिका डॉ कुमार विमल ने लिखी थी। उनसे तब डेरे पर एकाध बार मिला भी था। बडे सौम्‍य स्‍वभाव के हैं वे। पर दस साल बाद पटना दूरदर्शन में उनसे भेंट हुयी मेरी। हमने आधे घंटे बात की एक दूसरे से। हम दोनों की रिकार्डिंग थी। फिर हम जुदा भी हो गए, पर ना उन्‍हें मेरी कोई याद थी ना मैंने याद दिलाया कि आपके सामने खडे लडके के निर्माण में आपकी भी एक भूमिका है। पिछले पहल सम्‍मान के समय काशीनाथ जी से भी भेंट हुयी तो मैंने प्रणाम किया पर वहां भी परिचय नहीं किया मैंने। असल में मिलने पर जिनकी आंखों में परिचित का भाव नहीं आता मैं उनसे बता नहीं पाता कि मैं यह हूं…। और अपरिचय का नया दौर चल जाता है।

श्यामल सुमन ने कहा…
आज की हकीकत यही है। साहित्य के मठाधीश अब चतुर नेताओं की तरह हो गए हैं।

रचना छपने के लिए भेजे पत्र अनेक।
सम्पादक ने फाड़कर दिखला दिया विवेक।।
http://www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com
२६ मई २००९ ७:५३ AM
काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…
अब इन तथाकथित बड़े लोंगों से पीछा छूटा…ब्लॉग हैं न !
२६ मई २००९ ८:२१ AM
vijay gaur/विजय गौड़ ने कहा…
मित्र लेख अच्छा लगा, बाकी क्या कहूं। आपकी कविताएं पढता रहा हूं।
२६ मई २००९ ८:३३ AM
Science Bloggers Association ने कहा…
संस्मरण की गम्भीरता देखकर अच्छा लगा। मैं तो बस इतना ही कहूंगा आगे जहाँ औरभी हैं। चिन्ता की क्या बात है।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
२७ मई २००९ ६:४४ AM

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