>जाति और धर्म के संस्‍मरण – कुमार मुकुल

>हमारी सामाजिक संरचना में पहले जाति आती है फिर धर्म। जाति शब्‍द ज्ञाति से रूढ होकर जाति हो गया है। मतलब जिससे उस व्‍यक्ति के बारे में ज्ञात हो। तो होश में आने पर पता चला कि मैं राजपूत जाति से हूं। पिता शिक्षित और अंग्रेजी से एमए रहे शायद इसलिए मुझे कभी यह बोध नहीं हुआ कि मैं किसी विशेष जाति से हूं,सवर्ण…। उन्‍होंने कभी जातिगत गर्व का बोध मुझे नहीं कराया। हां जब मुझे पता चला कि राजपूत में मैं परमार हूं तो इतिहास पढते परमार वंश के किसी राजा का वर्णन मिलता तो उसे जरा ध्‍यान से पढता मैं। मजेदार बात है कि अपने गांव में परमार मात्र हमलोग ही हैं। पिता चाचा आदि से बातचीत से पता चला कि मेरे बाबा कहीं बाहर से आकर उस गांव में बसे थे। वे दो भाई थे। एक नि:संतान थे और बाबा की सात संतानें थीं,जिनमें सबसे बडे पिता हैं। यूं गांव में बाकी जो राजपूत हैं वे ढेकहा-भूतहा कहलाते हैं। मुझे लगता है कि ये श्रमिक खेतिहर जातियां होगी जो बाद में पराक्रम बढने पर खुद को राजपूत कहने लगी होंगी,मुझे लगता है सारे राजपूत इसी तरह हुए होंगे। अब बाबा ने आकर कह दिया कि हम परमार हैं तो हम परमार हो गए। गांव में दो र्निवंश राजपूतों ने मरते समय अपनी सारी जमीन बाबा के नाम कर दी इसतरह हम उस गांव में जमीन वाले हो गये। इससे यह अंदाज लगाया जा सकता है कि बाबा आदि संभवत: सरल और अच्‍छे स्‍वभाव के होंगे,इसलिए उन्‍हें इस तरह जमीन सौंपने के योग्‍य समझा गया होगा क्‍योंकि आखिर उस गांव में अन्‍य राजपूत तो थे ही जिनसे उनका पुराना रिश्‍ता रहा होगा। पर आदमी स्‍वभावत: चेतनशील होता है और वह स्‍वतंत्र छोड दिए जाने पर मनुष्‍य की तरह सहज आचरण करता है ,विवेक का सहारा लेता है,उदारता दिखाता है। और अपनी परंपरा,जाति आदि से बाहर आ मनुष्‍यता के करीब जाने की कोशिश करता है। अपनी स्‍वतंत्र पहचान की चेतना अक्‍सर उसे अपने जाति गोत्र से बाहर आ काम करने को प्रेरित करती है।गांव में मेरे घर के चारों ओर तीन जाति और दो धर्म के लोग थे। पीछे की तरफ यादव, सामने मलाह और कहार,बाएं भूमिहार और दाएं मुसलमानों का घर था। इनमें सामान्‍यत: हमारा घरेलू संबंध भूमिहारों से था। गांव में वे तीन ही घर थे और तीनों मेरे बांए एक लाइन में थे। इनमें सबसे कम संबंध यादवों से था। उनसे बस कभी दूध,मठा,गोइठा आदि खरीदने आदि का संबंध था। पर खुद घर में हमेशा गायें,भैंसे रही सो यह संबंध छीन किस्‍म का था। मलाहों ,कहारों के घरों से आना जाना था,चूंकि वे खेती आदि में काम करते थे, उनके घर की महिलाएं भी काम में हिस्‍सा बंटाती थीं। इन घरों से हमारे संबंध बिना किसी राग द्वेष के थे। हम कभी कभी उन्‍हें बुलाने जाते थे उनके घर। पहले डोली आदि का प्रयोग होता था शादी में तो कहारों से एक तरह का संबंध था इसको लेकर। कहारों में एक था मोहन, मेरी ही उम्र का रहा होगा। उसकी नाच पार्टी थी। शादी में जब वह लवंडा बन नाचता था तब मेरी समझ में यह नही आता था कि वह ऐसा क्‍यों करता है,तब मैं छोटा था और उसके छोटे भाई के साथ बगीचों आदि में कभी कभार खेलता भी था। तो छठे छमाही उसकी अलग वेश-भूषा के मायने मेरी समझ से बाहर थे तब, हां लौंडा बन वह बडा कमसिन दिखता था और मुझे ज्‍यादा अच्‍छा लगता पर फिर उसे सामान्‍य देख वितृष्‍ण सी होती थी।जारी…

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4 Comments »

  1. >हिंदी ब्लाग लेखन के लिये स्वागत और बधाई । अन्य ब्लागों को भी पढ़ें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देने का कष्ट करें

  2. >इस नए ब्‍लॉग के साथ आपका हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत में स्‍वागत है .. आपसे बहुत उम्‍मीद रहेगी हमें .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

  3. >प्रिय बन्धुChitthajagat men aapkaa swagat hai.> भारत पूरी क्षमता, योग्यता, संरचनात्मकता से संपन्न है.>> भारतीय आकाशमंडल ऐसे अनेकानेक जगमगाते हुए सितारे हैं, जो पूरे विश्व को अपने> ज्ञान और संरचनात्मकता से जगमगा रहे हैं. भारत का प्राचीन इतिहास हमारे सिर को> गौरव से ऊँचा कर देता है. हमारे देश की गाथाएँ हमें ईमानदारी, सदाशयता,> आत्मविश्वास, समर्पण की भावनाओं से ओतप्रोत करती हैं, ताकि हम अपने लक्ष्य को> प्राप्त कर सकें और देश की शान को बढा सकें. गणतंत्र दिवस की मंगलकामनाएं.>> हमारी कामना है कि->> स्वतंत्रता का जश्न मनाएँ, मिलकर हम सब आज> हों पूरे संकल्प हमारे, मधुरिम बने समाज.>> *'शोध दिशा' का दिसंबर २००९ अंक जो माँ को समर्पित है*. www.*>> hindisahityaniketan.com पर पोस्ट कर>> दिया गया है.*> *आप उसका भी आनंद ले सकते हैं. आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी, ताकि उसे> आगामी अंक में छापा जा सके. *>> *डा. गिरिराज शरण अग्रवाल*>> * **डा. मीना अग्रवाल*>> संपादक ‘शोध दिशा’> —


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