जनवरी 2010 के लिए पुरालेख

>संत दादू दयाल – कुमार मुकुल

जनवरी 31, 2010

>कबीर की शिष्य परंपरा मे पांचवे राजस्थान के संत दादू संवत १६०१ में अहमदाबाद में साबरमती नदी के तट पर लोदीराम नाम के ब्राह्मण को पानी में बहते मिले थे । ११ की उमर मे इनकी श्री कृष्ण में आस्था हो गई थी और वे विरक्त हो गए थे । १३ साल मे जब वे घर से भागे तो माता-पिता पकड़ कर ले आये पर सैट साल बाद वी फिर भाग खडे हुए और सागर पहुंच कर धुनिया का काम करने लगे।
घर छोड़ने के बाद १२ साल तक वे अध्ययन मे लगे रहे ,इससे ब्राह्मण इनसे चिढे रहते थे । एक बार जब घर मे ध्यानस्थ थे तो पंडितों ने इनके घर का द्वार ही ईंटों से बंद करवा दिया। बाद मे पडोसिओं ने द्वार खुलवाया । तब दादू ने कहा की अच्छा हुआ के वे इस बीच कृष्ण का ध्यान करते रहे। इसके बाद ही ये दादू से संत दादू दयाल हो गए। मतलब दयालु संत।
काफी नाम होने पर अकबर ने भी इन्हें बुलवाया और पूछा कि अल्लाह कि जाती क्या है ? इस पर दादू ने एक दोहा सुनाया-
इशक अलाह कि जाती है इशक अलाह का अंग
इशक अलाह मौजूद है, इशक अलाह का रंग ।
कहा जाता है कि साधना के क्रम मे ही नाराना नगर कि भाराना पहाडी से वे गायब हो गए। आज भी उस पहाडी पर दादू के कपडे -किताबें आदि दादुपंथियो के पास हैं और उनकी एक समाधि भी है।
दादू कि रचनाओं मे कबीर कि रचनाओं के कई अंश शामिल हैं। गरीबदास,रज्जब आदि कई संत उनके शिष्य रहे हैं।

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>कनफ़्यूशियस् – शिक्षक,संत और सुधारक

जनवरी 31, 2010

>५५१ bc में जन्मे कनफ़्यूशियस् कि ख्याति मरने के बाद फैलती गई और आज चीन कि जनता के वे मसीहा हैं। बुद्ध कि तरह उनका भी देवी-देवता पेर विश्वाश नहीं था। आज उनके नम पर हजारों मंदिर हैं। चीन में बेताज बादशाह कुंग के रूप मी ख्यात कनफ़्यूशियस् का प्रभाव कोरिया,जापान, विअतनाम तक है।
चीन के धनी परिवार मे जन्मे कनफ़्यूशियस् का नाम चीऊ यानी पहाड़ी था। उनके सिर पर एक गूमड होने के कारण यह नाम पड़ा। वे बहुत लंबे थे। कनफ़्यूशियस् के समय चीन मे राजवाडे आपसी कलह मे लगे थे । तब उन्होने शिक्षा कि अलख जगाई। २५ साल कि उमर में शिक्षक का कम शुरू करने वाले कनफ़्यूशियस् ने आगे ३००० शिष्य बनाए ।
भेदभाव के विरोधी कनफ़्यूशियस् ने शिक्षा मंत्री के रुप में १३ साल तक यायावरी की। इस बीच उनका पठन-पाठन बंद था। अपनी शिक्षाओं के प्रकाशन मे उनकी रूचि नही थी। उनके शिष्यों ने आगे उनकी दस के करीब किताबें प्रकाशित कीं। कबीर के दोहों की तरह उनके कथन भी चीन में चर्चित हैं।

>विधवा माता ने लोकलाज से अनाथ छोड़ दिया था नामदेव को – कुमार मुकुल

जनवरी 31, 2010

>संत कबीर और दादू की तरह महाराष्‍ट्र के संत नामदेव भी ग्‍वालियर के एक दर्जी को सड़क पर पड़े मिले थे। यह 1278 की घटना है। उनकी विधवा माता ने लोगों की तीखी टिप्‍प्‍णी के बाद अपने नवजात को अनाथ छोड़ दिया था। विष्‍णुभक्‍त पिता की संत नामदेव के साथ कई चमत्‍कार जुड़े हैं। मंदिर जाते वक्‍त जूता चुरा लिए जाने के डर से नामदेव उसे कमर में बांध कर भीतर जाते थे। एक बार उनका जूता मंदिर में गिर गया। इससे क्रोधित होकर पुजारी ने उन्‍हें पीटकर बाहर कर दिया तब वे मंदिर के पीछे बैठकर भजन गाने लगे। कहा जाता है कि ऐसा करते वक्‍त्‍ा मंदिर का द्वार उनकी ओर घूम गया।
इसी तरह एक बार जब वे एकादशी व्रत रखे थे तो एक शाम एक वृद्ध उनके पास भिक्षा के लिए आए। नामदेव ने उन्‍हें कहा कि कल तक रूके , कल मेरा एकादशी व्रत टूटेगा तो आप भी मेरे साथ खाना खा लेंगे। वृद्ध भूखे थे और रात ही भूख से चल बसे। इससे दुखी होकर नामदेव ने प्रण किया कि वे भी इस वृद्ध के साथ जलकर सता हो जाएंगे। फिर किसी तरह उन्‍हें मनाया गया।
महाराष्‍ट्र के चर्चित बारकरी पंथ का संस्‍थापक नामदेव को ही माना जाता है। सर्वदर्शन संग्रहकारी संप्रदाय के संस्‍थापक पंडलिका के प्राथमिक शिष्‍यों में भी नामदेव की गिनती होती है। नामदेव ने मराठी के छंदों में भजन लिखे हैं। 1407 में अस्‍सी साल की उम्र में उनकी मृत्‍यु हुई।

>वसंती की प्रेरणा और कालिदास – कुमार मुकुल

जनवरी 31, 2010

>काशीनरेश भीमशुक्‍ल की विदुषी पुत्री वसंती ने कई विद्वान लड़कों के विवाह प्रस्‍ताव को यह कहकर खारिज कर दिया था कि वह उस लड़के से ज्‍यादा बुद्धिमान है। उसके योग्‍य लड़का राजा और दरबारी खोज नहीं पा रहे थे तो तंग आकर उसे पाठ पढ़ाने के लिए कालिदास को ढूंढ लाए थे।
दरअसल दरबारियों ने एक दिन देखा कि एक आदमी पेड़ की जिस डाल पर बैठा है उसी को काट रहा है। उन्‍हें लगा कि वासंती के लिए यही लड़का ठीक रहेगा। उन्‍होंने उसे यह सिखला कर राजदरबार लाया कि उसे कुछ बोलना नहीं है हर सवाल का जवाब उसे ईशारे में देना है। दरबारियों ने कहा कि लड़का अतिशय विद्वान है और हर सवाल का जवाब ईशारे में देने की क्षमता रखता है। लड़का सुंदर था तो वासंती उससे शास्‍त्रार्थ को तैयार हो गई।
वसंती ने जब लड़को को एक उंगली दिखाते हुए पूछा कि क्‍या ब्रह्म एक है तो लड़के ने समझा कि लड़की कह रही है कि वह उसकी एक आंख फोड़ डालेगी तो जवाब में उसने दो उंगलियां दिखा दीं कि वह उसकी दोनों आंखें फोड़ देगा। वासंती को लगा कि लड़का कह रहा है कि ब्रह्म दो है- सगुण और निर्गुण। उसे लगा कि वह वाकई विद्वान है। वह विवाह को राजी हो गई।
बाद में जब वसंती को सच्‍चाई का पता चला तो उसने इसे चुनौती के रूप में लिया और अपने भोले-भाले पति को पढ़ा लिखा कर महान रचनाकर बनने की प्रेरणा दी।
कालिदास की रचनाओं में उज्‍जैन नगरी का जिक्र बार-बार आता है इससे लगता है कि उनके जीवन का बड़ा हिस्‍सा वहीं गुजरा था। कहा जाता है कि आज से चौदहसौ साल पहले हुए राज बिक्रमादित्‍य के नवरत्‍नों में कालिदास भी थे। कालिदास ने काफी यात्राएं कीं थीं। उनकी रचनाओं में आसाम,बंगाल,उड़ीसा से लेकर पांड्या , केरल और सिंध , गांधार तक की चर्चा है। अपने वर्णनात्‍मक काव्‍य मेघदूत में यक्षिणी का प्रणय संदेश लेकर घूमते मेघ के द्वारा कालिदास ने भारत के विभिन्‍न भू-भागों का परिचय कराया है।
महाकाव्‍य रघुवंश कलिदास की महत्‍वपूर्ण रचना है। हिन्‍दी में महाकवि तुलसीदास ने रामचारित मानस में राम की आदर्श मयार्दारक्षक वाली छवि स्‍थापित की है पर रधुवंश में कालिदास ने राम के पूर्वज रघु और राम के बाद की पीढ़ी का भी आलोचनात्‍मक वर्णन किया है। राम के पूर्वजों दिलीप,अज,दशरथ की गौरव गाथा लिखने के साथ कालिदास ने रघु के वंश के अंतिम अय्याश राज अग्निवर्ण तक की गाथा लिखी है।
कालिदास के जन्‍म की तरह उनकी मृत्‍यु पर भी विवाद है। जन्‍मते ही उनके माता-पिता चल बसे थे और वे अनाथ हो गये थे उसी तरह उनकी हत्‍या एक नगरवधू के निवास पर धोखे से हो गयी थी।
दुनिया की प्राचीन भाषाओं में अवेस्‍ता, संस्‍कृत , लैटिन आदि हैं। कालिदास संस्‍कृत के कुछ महत्‍वपूर्ण रचनाकारों में हैं। कुमार संभव, विक्रमोवर्शीय, मालविकागिन आदि उनके प्रसिद्ध नाटक हैं। संस्‍कृत की चर्चित उक्ति है – काव्‍येषु नाटक: रमणं, नाटकेषु शकुंतला। काव्‍यों में नाटक रमणीय है और नाटकों में कालिदास की शकुंतला। अभिज्ञान शाकुंतलम उनका प्रसिद्ध नाटक है।

>दारा शिकोह – कुमार मुकुल

जनवरी 31, 2010

>और शाहजहां गूंगा हो गया था

अकबर ने हिंदू-मुस्लिम साझी संस्‍कृति की जो नींव भारत में डाली थी, दारा शिकोह उसकी अंतिम कड़ी था। शाहजहां का यह बड़ा बेटा दारा ही गद्दी का असली अधिकारी था। पर पिता के बीमार पड़ने पर औरंगजेब ने न केवल उन्‍हें कैद में डाल दिया बल्कि अपने बाकी भाइयों को भी कैद कर डाला। 1658 में सत्‍ता को मुख्‍य दावेदार दारा शिकोह औरंगजेब से हार गया था और बाद में उसे मार डाला गया था।

दारा जितना युद्धकला में निपुण था उतना ही वह पठन-पाठन के लिए भी समय देता था। उसने गीता और उपनिषदों का फारसी में अनुवाद कराया था। अकबर की तरह उसे भी सभी धर्मों में समान रूचि थी। पर औरंगजेब की तरह वह कूटनीतिक नहीं था।

राजसत्‍ता का उत्‍तरिधाकार दारा के लिए मुसीबत साबित हुआ और उसे निर्वासित जीवन जीना पड़ा था। भागता हुआ वह सिंध के राजा मलिक के यहां शरणागत हुआ था। कभी मलिक को दारा ने बादशाह के कोप से बचाया था और मलिक की जान बची थी। पर औरंगजेब के दबाव में मलिक ने दारा को धोखे से गिरफ्तार कर दिल्‍ली भिजवा दिया। वहां पहले दारा को हाथी पर बिठाकर घुमाया गया फिर अगस्‍त 1659 को उसकी हत्‍या कर दी गयी। यह खबर जब शाहजहां की बेटी जहांआरा ने शाहजहां को सुनाई तो वह अवाक रह गया। कहा जाता है कि इस घटना के बाद शाहजहां गूंगा हो गया था।

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>महात्‍मा जोतिबा फुले – कुमार मुकुल

जनवरी 31, 2010

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भारतीय समाज क्रांति के जनकों में जोतिबा फुले एक अविस्‍मरणीय नाम है। महाराष्‍ट्र की एक दलित जाति मालि में जन्‍मे फुले
जाति प्रथा के जहर की काट जीवन भर ढूंढते रहे और एक हद तक सफल भी रहे। महाराष्‍ट्र में जनप्रिय वीर शिवाजी फुले को भी प्रिय थे, उन्‍होंने उन पर एक कविता भी लिखी है जिसमें उन्‍होंने शिवाजी को शूद्र माने गए क्षत्रिय के रूप में देखा है। शिवाजी की तरह कुनबी, माली, महार आदि तथाकथित शूद्र जातियां कभी क्षत्रिय थीं, जो जातिवादी षडयंत्र का शिकार होकर दलित कहलायीं, यह जोतिबा की स्‍‍थापना थी।
1827 में जन्‍मे जोतिबा के पिता गोविन्‍द राव थे और माता विमलाबाई थीं,जो उनकी साल भर की छोटी सी उम्र में ही चल बसीं। बच्‍चों का ख्‍याल कर पिता ने दूसरी शादी कर ली। आगे पिता ने सगुणा बाई नामक विधवा को बच्‍चों की देख-भाल के लिए रख लिया। फुले का मानना था कि सगुणा ने ही उन्‍हें ऐसा बनाया। सगुणा मिशनरियों से जुड़ी थीं। उसे कुछ अंग्रेजी भी आती थी। फुले के पिता सगुणा को मुंहबोली बहन मानते थे।
जोतिबा को पढ़ाने की ललक से पिता ने उन्‍हें पाठशाला भेजा था पर सवर्णों ने उन्‍हें स्‍कूल से वापिस बुलाने को मजबूर कर दिया। अब जोतिबा पिता के साथ माली का काम करते थे। काम के बाद वे पास-पड़ोस के लोगों से देश-दुनिया की बातें करते और किताबें पढ़ते थे।
तेरह साल की छोटी सी उम्र में उनका विवाह खंडोजी नेवसे पाटिल से हो गया। आगे उनका नाम मिशन स्‍कूल में लिखा दिया गया। उसी समय उन्‍होंने थामसपेन की किताब राइट्स ऑफ मेन पढ़ी, जिसका उनपर काफी असर पड़ा।
स्‍कूल के अपने एक ब्राह्मण मित्र की शादी में एक बार जोतिबा गये थे तो उन्‍हें अपमानित होना पड़ा था। बड़े होने पर उन्‍होंने इन रूढि़यों के प्रतिकार का विचार पक्‍का किया। 1848 में उन्‍होंने अछूतों का पहला स्‍कूल पुने में खोला। यह भारत के तीन हजार साल के इतिहास में ऐसा पहला स्‍कूल था। इस कारण उनके पिता पर काफी दबाव पड़ा तो उनके पिता ने आजिज आकर कहा कि या तो स्‍कूल बंद करो या घर छोड़ दो। तब दोनों पति-पत्नि ने घर छोड़ दिया। आगे आर्थिक तंगी के चलते उन्‍हें स्‍कूल बंद करना पड़ा जिसे बाद में फिर खोला उन्‍होंने। उस स्‍कूल में एक ब्राह्मण शिक्षक पढ़ाते थे। उनको भी दबाव में अपना घर छोड़ना पड़ा।
1857 में जोतिबा ने भारत का पहला लड़कियों को स्‍कूल खोला जिसमें पढ़ाने को कोई तैयार नहीं हुआ तो उनकी पत्‍नी सावित्री ने ही पढ़ाना आरंभ किया। इस तरह घर से बाहर आ पढ़ाने का काम करने वाली पहली शिक्षिका थीं सावित्री। उन्‍हें तंग करने के लिए शुरू में उनपर गोबर और पत्‍थर फेंके जाते थे। पर वे डिगीं नहीं।
अपने सुधारों के लिए पुणे महाविद्यालय के प्राचार्य ने अंग्रेज सरकार के निर्देश पर उन्‍हें पुरस्‍कृत किया और वे चर्चा में आए। इससे चिढ़कर कुछ अछूतों को ही पैसा देकर उनकी हत्‍या कराने की कोशिश की गई पर वे उनके शिष्‍य बन गए।
1873 में जोतिबा ने सत्‍यशोधक समाज की स्‍थापना की। आगे स्‍वामी दयानंद ने जब बंबई में आर्यसमाज की स्‍थापना की तो सनातनियों के विरोध को देखते हुए उन्‍हें जातिबा की मदद लेनी पड़ी। जोतिबा ने शराबबंदी के लिए भी काम किया था।
एक गर्भवती ब्राह्मण विधवा को आत्‍महत्‍या करने से रोक उन्‍होंने उसके बच्‍चे को गोद ले लिया जिसका नाम यशवंत रखा गया। अपनी वसीयत जातिबा ने यशवंत के नाम ही की।
1890 में जातिबा के दांए अंगों को लकवा मार गया तब वे बाएं हाथ से ही सार्वजानिक सत्‍यधर्म नामक किताब लिखने में लग गये। इसी साल उनकी मृत्‍यु के बाद यह किताब छपी।

>दो दो बार स्‍वीकृत होकर ‘पहल’ में ना छपने का दुख – संस्‍मरण

जनवरी 27, 2010

>1990 में मैं पटना आ गया था सहरसा से। लेखकों से मिलना जुलना , गोष्ठियों आदि का दौर आरंभ था। अरूण कमल, आलोक धन्‍वा, नंदकिशोर नवल,खगेंद्र ठाकुर, भृगुनंदन त्रिपाठी, मदन कश्‍यप, कर्मेंदु शिशिर,प्रेम कुमार मणि आदि पटना के सक्रिय लेखकों के घर आना जाना आरंभ हो चुका था। नवतुरिया लेखक था सो सभी लोग बडे प्रेम से बातें करते मिलते जुलते बहसें करते। बउआने की आदत सहरसा के मैथिली के लेखक महाप्रकाश की संगत में लग चुकी थी। शाम छह बजे जब महाप्रकाश अपने आफिस से छूटने को होते तो मैं वहां हाजिर हो जाता। फिर उनके घर जाकर नाश्‍ता आदि कर जो हम घूमने निकलते तो रात दस बज जाते लौटते।
पटना में एक साल बिताने के बाद सायंस कालेज में हिन्‍दी के प्रोफेसर भृगुनंदन त्रिपाठी से परिचय हुआ तो वह गहराता चला गया। सहरसा में महाप्रकाश और डॉ.शिवेन्‍द्र दास की संगत में जो कविता के अलावे समीक्षा , आलोचना आदि पर जोर आजमाइश का दौर आरंभ हो चुका था वह पटना में त्रिपाठी जी की संगत में ही फला-फूला। त्रिपाठी जी उस समय देश की तमाम पत्र-पत्रिकाओं पहल, आलोचना आदि में लिखते थे। और मुझे भी प्रोत्‍साहित करते थे। शाम सात से दस-ग्‍यारह बजे तक हमलोग आसपास पांच किलोमीटर का इलाका टहलते हुए छान मारते। इस बीच तमाम नये-पुराने रचनाकारों की लानत-मलामत कर डालते। यूं राजकमल चौधरी पर लिखा मेरा एक आलेख सहरसा में रहते हुए ही महाप्रकाश जी ने पटना से प्रकाशित हो रहे साप्‍तहिक जनादेश में छपवा चुके थे। पर त्रिपाठी जी के साथ की लगातार बातचीत ने मेरी समझ को सिरे से दुरूस्‍त किया और चाहे छपा कम पर उन्‍होंने बहुत सारी चीजों पर लिखवा दिया जो आगे छपती रहीं, और कुछ तो अब उन्‍न्‍ीस बीस साल बाद भी कहीं कहीं छप रही हैं। एक बार लिख्‍ा लेने के बाद उसे फेयर ना कर पाने की मेरी कमजोरी के चलते समीक्षा हो या कविता वह दस पंद्रह साल बाद ही छप पाती है अक्‍सरहां। त्रिपाठी जी ने ही तब दक्षिण अफ्रीकी कविताओं का अनुवाद करवाया था जो दो साल पहले सम्‍प्रति पथ में छपा।
तो उनकी संगत में मैं लिख तो रहा ही था स्‍थनीय अखबारों और एकाध पत्रिकाओं में चीजें छपने भी लगी थीं। मुक्तिबोध मेरे मानदंड थे आलोचना में और थोडा शमशेर का गद्य प्रभावित करता था। नामवर सिंह को पढा तो पूरा पर उनके असर को पता नहीं क्‍यों, नहीं लिया मैंने। संभवत: आरंभ में मुक्तिबोध संमग्र पढने के चलते ऐसा हुआ हो। रामविलास जी से बात ना बनने पर मजाक मे उडा देने की कला का प्रयोग भी थोडा बहुत सीख गया था मैं, पर जिसे मैं उचित नहीं मानता था।
तो यही दौर था जब एक दिन सूचना मिली कि मुजप्‍फरपुर के कथाकार विजयकांत पटना आए हैं और एक होटल में ठहरे हैं। तो मैं अगले दिन सायकिल उठा जा पहुंचा उनसे मिलने। सफेद झकाझक धोती कुर्ता में देख मुझे कुछ आश्‍यर्य हुआ। वे उत्‍साह से मिले और उनसे जाना कि वे मेरे लिखे से परिचित हैं थोडा बहुत। औपचारिक बातचीत के बाद उन्‍होंने पहल के संपादक ज्ञानरंजन का पोस्‍टकार्ड दिखाया , जिसमें उन्‍होंने लिखा था कि अपने कहानी संग्रह की समीक्षा किसी समझदार व्‍यक्ति से कराकर आप भिजवा दें। साफ था कि मुझे समझदार माना जा रहा था, सो उन्‍होंने पूछा कि मेरी कहानियां पढी हैं आपने। मैंने झूठ ही कह दिया कि हां पढी हैं। पहल में समीक्षा का लोभ था। तब उन्‍होंने अपना संग्रह मुझे दिया और कहा कि अभी मैं एक जगह निकलूंगा आप दो घंटे में आएं तो बाकी बातें होंगी, आप विचार कर लें कि इसकी समीक्षा करेंगे या नहीं।
वहीं पास ही अरूण कमल और आलोक धन्‍वा को घर था सो मैं उधर ही निकल गया। अब रास्‍ते में चलते हुए मैं संग्रह की एक कहानी भी पढता जा रहा था ताकि लौट कर अपनी आलोचकीय प्रतिभा का कुछ नमूना बातचीत में पेश कर सकूं ताकि पहल में समीक्षा का छपना तय हो जाए। लौटकर चाय आदि पीकर कुछ बातें हुयी और उन्‍होने कहा कि समीक्षा लिखकर पहल को भिजवा देंगे। उनकी किताब का नाम था – बह्मफांस
दस दिन के भीतर मैंने समीक्षा लिखकर भेज दी ज्ञानजी को। पता त्रिपाठी जी का ही दे दिया। महीने भर बाद ही ज्ञानजी का पत्र आया।
3-11
प्रियवर,
आपकी समीक्षा अभी अभी मिली। पहले में इसका उपयोग करेंगे। अंक 46 या 47 में।
टंकण बहुत खराब है। आपने विजयकांत पर लिखा, इसके लिए हमारा आभार स्‍वीकार करें।
ज्ञानरंजन
भृगुनंदन जी को
हमारा स्‍मरण कराएं
ज्ञ.

साफ है कि मैं इस स्‍वीकृति से बहुत खुश था। पर महीने भर बाद ही विजयकांत का एक पत्र आया कि आप अपनी समीक्षा किसी और अच्‍छी पत्रिका में मेरे बताए अनुसार भेज दें, पहल में किन्‍हीं दूसरे की समीक्षा छप रही है। इस पत्र से मुझे गुस्‍सा आ गया कि क्‍या तमाशा समझ रखा है। सो मैंने वह समीक्षा फाडकर फेंक दी और कहीं छपने को नहीं दी।
दुर्भाग्‍य से या इसे साहित्‍य की राजनीति का नतीजा कहें सात आठ साल बाद फिर 1998 में मेरे साथ यही घटित हुआ । विष्‍णु खरे पर लिखा अपना लेख मैंने पहल को भेजा था , पिछली खटास मन से निकल चुकी थी। इस बार भी ज्ञानजी का पत्र आया।
पहल,21-1-98
प्रियवर
आपका पत्र और विष्‍णु खरे वाला लेख मिला। धन्‍यवाद। आपका लेख दिलचस्‍प है। हमारी दिक्‍कत है कि हम विष्‍णु खरे पर पर्याप्‍त सामग्री दे चुके हैं। साक्षात्‍कार फिर उसके बाद जनार्दन की लंबी प्रतिक्रिया। हमें दूसरों पर भी ध्‍यान देना है।
नए अंक में नामदेव ढसाल का साक्षात्‍कार है। उसके आगे लीलाधर जगूडी का होगा। आपके लेख को कभी उपयोग करेंगे।
ज्ञानरंजन

करीब आठ माह बाद याद दिलाने पर उनका एक कार्ड और आया।
ज्ञानरंजन, 18-9-98
प्रिय भाई कुमार मुकुल:अभिवादन,तुम्‍हारा पत्र मिला। जगूडी का साक्षात्‍कार पूरा होने के बावजूद ट्रांसक्राइब नहीं हो सका। यह मोहन थपलियाल की अपनी दिक्‍कत है। हम अगले अंक में कमलिनी दत्‍त का साक्षात्‍कार देंगे आगे राजेश जोशी का। जगूडी और देवताले के साक्षात्‍कार लटके हैं। पहल का कविता अंक अब नहीं आएगा। विजय कुमार के उद्भावना वाले अंक के बाद इतनी जल्‍दी यह संभव नहीं लगता। लेकिन मार्क्‍सवादी आलोचना के अंक की तैयारी गहरी है। वह 1999 के पूर्वाध में आ जाएगा। अगर संभव हो तो अपना लेख विष्‍णु खरे वाले की एक प्रति और भेज दें। हमने अब एक व्‍यापक संपादक मंडल बना लिया है और प्रबंधन भी। एक साथी को आपका लेख पढने को भेजा था और उनसे मिसप्‍लेस हो गया है। असुविधा के लिए क्षमा ।
ज्ञा.

मैंने पुन: वह लेख पहल को भेजा पर नहीं छपना था सो नहीं छपा। फिर आगे कभी पहल को नहीं भेजा कुछ। मैंने अनुभव किया कि साहित्‍य में बहुत राजनीति है और पहले लिख लाख कर इस राजनीति की काट की जाए और जो रचना छापाना चाहें उन्‍हें ही दी जाए। यह आदत आज तक है। पहली बार वसुधा ने दस बारह साल पहले मेरी कुछ कविताएं ठीक से छापी थीं तो उपर लिखा था कि ये कविताएं इस नये कवि से मंगवाई गयीं हैं।
वह अनुभव पहल से उल्‍टा है। जब मैं पहली नौकरी में बनारस में था तब वहां ज्ञानेन्‍द्रपति के अलावे काशीनाथ सिंह से भी कुछ मुलाकातें हुयी थीं। काशीनाथ जी बहुत अच्‍छे लगे थे मुझे। पहली बार जब उनके घर गया तो उन्‍होंने पहले गुड की भेली दी पानी पीने को, फिर पूछा कि क्‍या करते हो पत्रकारिता के अलावे। तो मैंने बताया कि – कविता करता हूं। उन्‍होंने कहा कि तब सुनाओ जो याद हो। उन दिनें पहाड कविता याद थी सो सुनाई , दोनों कविताएं। तब उन्‍होंने अपनी एक डायरी दी कि इस पर कविताएं लिख दो। मैंन लिख दी। फिर मैं बनारस छोड पटना आ गया। पांच छह साल बाद जब मैंने दिनेश कुशवाह की कविताओं की प्रशंसा में एक कार्ड डाला तो उनका पत्र आया कि अरे मैं आपका पता ढूंढ रहा था, गुरूदेव मतलब काशीनाथ जी, आपको याद करते हैं, अपनी कुछ कविताएं भिजवाइए। तो जो कविताएं भेजीं वही वसुधा में छपीं। मजेदार कि उसमें पहाड कविता नहीं थीं। पहाड कविता को छापने की बात सियाराम शर्मा ने भी लिखी थी, विकल्‍प में। उसके अंक निकल गए पर वह कविता छपी नहीं। पहले संग्रह में वह संकलित है पर कहीं छपी नहीं पत्रिका में। जबकि वह जहां भी पढता हूं वाहवाही बटोर लेती है।
तो ये दोनों ही पहलू है साहित्‍य की राजनीति के। पहल आज बंद है, वसुधा में फिर कुछ भेजा नहीं कभी तो छपा नहीं। मैं सोचता हूं कि अगर पत्रकारित में नहीं रहता तो साहित्‍य की इस राजनीति से कैसे लड पाता। बाकी नये रचनाकारों को इसी तरह झेलना पडता होगा या चेला बनना पडता होगा। यह गुण मुझमें सिरे से गायब है।
इस संदर्भ में एक मजेदार वाकया याद आ रहा है। मेरी पहली किताब जो पिता ने 1987 में छपवाई थी उसकी भूमिका डॉ कुमार विमल ने लिखी थी। उनसे तब डेरे पर एकाध बार मिला भी था। बडे सौम्‍य स्‍वभाव के हैं वे। पर दस साल बाद पटना दूरदर्शन में उनसे भेंट हुयी मेरी। हमने आधे घंटे बात की एक दूसरे से। हम दोनों की रिकार्डिंग थी। फिर हम जुदा भी हो गए, पर ना उन्‍हें मेरी कोई याद थी ना मैंने याद दिलाया कि आपके सामने खडे लडके के निर्माण में आपकी भी एक भूमिका है। पिछले पहल सम्‍मान के समय काशीनाथ जी से भी भेंट हुयी तो मैंने प्रणाम किया पर वहां भी परिचय नहीं किया मैंने। असल में मिलने पर जिनकी आंखों में परिचित का भाव नहीं आता मैं उनसे बता नहीं पाता कि मैं यह हूं…। और अपरिचय का नया दौर चल जाता है।

श्यामल सुमन ने कहा…
आज की हकीकत यही है। साहित्य के मठाधीश अब चतुर नेताओं की तरह हो गए हैं।

रचना छपने के लिए भेजे पत्र अनेक।
सम्पादक ने फाड़कर दिखला दिया विवेक।।
http://www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com
२६ मई २००९ ७:५३ AM
काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…
अब इन तथाकथित बड़े लोंगों से पीछा छूटा…ब्लॉग हैं न !
२६ मई २००९ ८:२१ AM
vijay gaur/विजय गौड़ ने कहा…
मित्र लेख अच्छा लगा, बाकी क्या कहूं। आपकी कविताएं पढता रहा हूं।
२६ मई २००९ ८:३३ AM
Science Bloggers Association ने कहा…
संस्मरण की गम्भीरता देखकर अच्छा लगा। मैं तो बस इतना ही कहूंगा आगे जहाँ औरभी हैं। चिन्ता की क्या बात है।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
२७ मई २००९ ६:४४ AM

>चंडीगढ में साहित्‍य अकादमी का कविता पाठ

जनवरी 26, 2010

>अपने युवा साथी और कवि देवेन्‍द्र कुमार देवेश का जुलाई के अंतिम सप्‍ताह में एक दिन फोन आया कि आपको चंडीगढ में कविता पढने जाना है, सहमति चाहिए। उसी शाम उनसे भेंट हुयी तो अकादमी के उपसचिव डॉ.एस.गुणशेखरन का एक पत्र मुझे मिला जिसमें इससे संबंधित जानकारी मुझे मिली। 1 अगस्‍त‍ की दोपहर आइएसबीटी पर कवि,पत्रकार राधेश्‍याम तिवारी के साथ हमने चंडीगढ के लिए एसी बस ली। बस अभी दिल्‍ली से निकली ही थी कि उसका एसी फेल हो गया और हम पसीने पसीने होते रात साढे आठ बजे चंडीगढ पहुंचे। चंडीगढ बस अड्डे पर उतरा तो उसकी सफाई देख दंग रह गया। क्‍या दिल्‍ली का बस अड्डा ऐसा नहीं हो सकता। बस से उतरते ही बाकी नगरों की तरह आटो व रिक्‍शा वाले पीछे लग गये। पास ही केन्‍द्र सरकार का होटल था जिसमें ठहरने की व्‍यवस्‍था थी। आटो वाले ने कहा कि चालीस लेंगे, हम आगे बढ गये। रिक्‍शे वाला पीछे था अभी , बोला पैंतीस लेंगे फिर तीस,पच्‍चीस और अंत में बीस पर टिक कर वह पीछे लगा रहा। आखिर आजिज आ हम उसके साथ चल दिए तो उसने एक रिक्‍शेवाले को हमें सौंप दिया। तब पता चला कि वह दलाल था रिक्‍शेवालों का। दूसरे दिन दोपहर जब हम होटल से निकल रिक्‍शे पर बैठे तो वहां भी एक दलाल ने हमें रिक्‍शेवाले को सौंपा सीधे कोई रिक्‍शावाला वहां नहीं था जिसपर हम सवार होते। इस तरह का यह पहला अनुभव था। बाकी शहर चकाचक था। और रिक्‍शेवाला जहां मन वहां से ट्रैफिक की गलत दिशा में बिना सोचे समझे रिक्‍शा जिस तरह मोड दे रहा था उससे हमें डर लगा, पर पास से गुजरती पुलिस गाडी के लिए यह कोई मुददा नहीं था। शहर में कचरा कहीं नहीं था सडक पर खोमचे वाले कहीं नहीं थे। रौशनी थी और सडकें थीं सरपट। बीच में रिक्‍शेवाले ने कहा साहब इससे बहुत कम पैसे में हम इससे बहुत अच्‍छे होटल में ठहरा देंगे तब हमने बताया कि हमें अपनी जेब से नहीं खर्चना है। होटल पार्क व्‍यू हम पहुंचे आख्रिरकार और आसानी से हमें हमारा कमरा दिखा दिया गया। हम नहा धोकर फारिग हुए ही थे कुबेरदत्‍त के साथ सांवले से एक युवक ने कमरे में प्रवेश किया। उसने हमारी ठहरने और खाने की सहूलियतों की बाबत हमें जानकारी दी। बाद में पता चला कि वे ही सचिव गुणशेखरन हैं, फिर बडी गर्मजोशी से उन्‍होंने हाथ मिलाया। उनका हाथ बहुत सख्‍त था सो मुझे बहुत अच्‍छा लगा। वरिष्‍ठ कवि वीरेन डंगवाल, युवा पत्रकार मृत्‍युंजय प्रभाकर और युवा नाटयकर्मी राकेश के हाथ याद आए। यह हाथ उन सब पर भारी पड रहा था। सो दूसरे दिन मैंने उनसे पूछ डाला कि भई आपका हाथ बहुत सख्‍त है , अच्‍छा लगा तो अलग से इसपर कुछ देर बात हुयी उनसे। उन्‍होंने हाथ दिखाते तमिल के दबाव वाली हिंदी में बताया कि पिछले महीने मेरे हाथ में बाइक चलाते फ्रैक्‍चर हो गया था नहीं तो और मजबूती से हाथ मिलाता हूं मैं। कि ऐसे हाथ मिलाने से हमारे संबंध हाथों की तरह मजबूत होते हैं। और भी कई बातें बताई उन्‍होंने। इस बीच हमने करीब दसियों बार हाथ मिलाया और मेरे दाहिने हाथ का दर्द जाता रहा। अंत तक मैं भी उनके वजन के बराबर के दबाव से हाथ मिला पा रहा था।अपने हाथ की तरह गुणशेखरन अपने इरादों के भी सख्‍त लगे। उन्‍होंने बताया कि वे हिन्‍दी को ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों के बीच ले जाना चाहते हैं। कि इससे पहले अकादमी का ज्‍यादातर कार्यक्रम दिल्‍ली में केंद्रित रहता था। वह भी ज्‍यादा त‍र आलोचना ओर विचार आधारित रहता था। हमने इसे रचना आधारित करने की कोशिश की है। हमने कविता और कहानी पाठ आरंभ कराया है वह भी साथ साथ जिससे दोनों विधाओं के लोग आपस में संवाद कर सकें। कि पहली बार पिछले महीनों देहरादून में अकादमी का इस तरह का पहला पाठ हुआ था जिसमें कवि कथाकार शामिल थे। चंडीगढ में यह इस तरह का पहला पाठ था अकादमी का। उन्‍होंने बताया कि दोनों पाठों में हमने किसी रचनाकार को रिपीट नहीं किया है। हम ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों को जोडना चाहते हैं।चार सत्रों में चले दिन भर के इस रचना पाठ में करीब चौबीस रचनाकार भाग ले रहे थे। जिसमे 16 कवि और 8 कथाकार थे। शाम को खाने की टेबल पर नये पुराने कई रचनाकार एक साथ उपस्थित थे। कैलाश वाजपेयी, विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी,कमल कुमार, हेमंत शेष,प्रमोद त्रिवेदी, राधेश्‍याम तिवारी,एकांत श्रीवास्‍तव, गगल गिल आदि। कुछ लोग जिनका पाठ दोपहर बाद के सत्र में था वे अगले दिन पहुंचे जैसे कविता,जितेन्‍द्र श्रीवास्‍तव आदि। कुछ स्‍थानीय रचनाकार सत्‍यपाल सहगल आदि भी आमंत्रित थे। इसतरह एक अच्‍छा मेल जोल भी हो गया।होटल के बडे से हाल में 150 कुर्सियां लगीं थीं और आश्‍चर्यजनक रूप से पाठ आरंभ होते होते वे सारी भर गयीं। आरंभ में गुणशेखरन चिंतित थे लोगों की आमद को लेकर। फिर सबने अच्‍छा पाठ किया। मेरा पाठ भी बहुत अच्‍छा रहा। मुझे पटना खुदा बख्‍श लाइब्रेरी का अपना कविता पाठ याद आया। लोगों ने पाठ के दौरान कविता की अपनी समझ के अनुसार अच्‍छी हौसला आफजाई की। राधेश्‍याम तिवारी ने भी अच्‍छा पाठ किया। सबसे अच्‍छा पाठ कुबेरदत्‍त ने किया। उनका उच्‍चारण और कविता में जो व्‍यंग्‍य की धार थी वह काबिलेतारीफ थी।लौटते में रात देर हो रही थी तो राधेश्‍याम तिवारी ने कहा कि आज इधर ही रूक जाइए। सो उन्‍हीं के यहां रूक गया। वहां सुबह मैंने उनके कुछ अच्‍छे गीत पढे और चकित रह गया। एक गीत प्रस्‍तुत है यहां-टहनी-टहनी गले मिलेगीपात परस से डोलेंगेहवा कहां मानेगीवह तो जाएगी सबके भीतरबिना द्वार का इस दुनिया मेंबना नहीं कोई भी घरएक दरवाजा बंद करोगेसौ दरवाजे खोलेंगेइतने लोग यहां बैठे हैंफिर भी कोई बात नहींबिजली चमकी,बादल गरजेपर आई बरसात नहींकोई बोले या न बोलेलेकिन हम तो बोलेंगेदिन बीते फिर रात आ गईलौट-लौट आए फिर दिनलेकिन डंसती रही सदा हीदुख की यह काली नागिनफिर भी कंधे अपने हैंबोझ खुशी से ढो लेंगे।

>जाति और धर्म के संस्‍मरण – कुमार मुकुल

जनवरी 26, 2010

>हमारी सामाजिक संरचना में पहले जाति आती है फिर धर्म। जाति शब्‍द ज्ञाति से रूढ होकर जाति हो गया है। मतलब जिससे उस व्‍यक्ति के बारे में ज्ञात हो। तो होश में आने पर पता चला कि मैं राजपूत जाति से हूं। पिता शिक्षित और अंग्रेजी से एमए रहे शायद इसलिए मुझे कभी यह बोध नहीं हुआ कि मैं किसी विशेष जाति से हूं,सवर्ण…। उन्‍होंने कभी जातिगत गर्व का बोध मुझे नहीं कराया। हां जब मुझे पता चला कि राजपूत में मैं परमार हूं तो इतिहास पढते परमार वंश के किसी राजा का वर्णन मिलता तो उसे जरा ध्‍यान से पढता मैं। मजेदार बात है कि अपने गांव में परमार मात्र हमलोग ही हैं। पिता चाचा आदि से बातचीत से पता चला कि मेरे बाबा कहीं बाहर से आकर उस गांव में बसे थे। वे दो भाई थे। एक नि:संतान थे और बाबा की सात संतानें थीं,जिनमें सबसे बडे पिता हैं। यूं गांव में बाकी जो राजपूत हैं वे ढेकहा-भूतहा कहलाते हैं। मुझे लगता है कि ये श्रमिक खेतिहर जातियां होगी जो बाद में पराक्रम बढने पर खुद को राजपूत कहने लगी होंगी,मुझे लगता है सारे राजपूत इसी तरह हुए होंगे। अब बाबा ने आकर कह दिया कि हम परमार हैं तो हम परमार हो गए। गांव में दो र्निवंश राजपूतों ने मरते समय अपनी सारी जमीन बाबा के नाम कर दी इसतरह हम उस गांव में जमीन वाले हो गये। इससे यह अंदाज लगाया जा सकता है कि बाबा आदि संभवत: सरल और अच्‍छे स्‍वभाव के होंगे,इसलिए उन्‍हें इस तरह जमीन सौंपने के योग्‍य समझा गया होगा क्‍योंकि आखिर उस गांव में अन्‍य राजपूत तो थे ही जिनसे उनका पुराना रिश्‍ता रहा होगा। पर आदमी स्‍वभावत: चेतनशील होता है और वह स्‍वतंत्र छोड दिए जाने पर मनुष्‍य की तरह सहज आचरण करता है ,विवेक का सहारा लेता है,उदारता दिखाता है। और अपनी परंपरा,जाति आदि से बाहर आ मनुष्‍यता के करीब जाने की कोशिश करता है। अपनी स्‍वतंत्र पहचान की चेतना अक्‍सर उसे अपने जाति गोत्र से बाहर आ काम करने को प्रेरित करती है।गांव में मेरे घर के चारों ओर तीन जाति और दो धर्म के लोग थे। पीछे की तरफ यादव, सामने मलाह और कहार,बाएं भूमिहार और दाएं मुसलमानों का घर था। इनमें सामान्‍यत: हमारा घरेलू संबंध भूमिहारों से था। गांव में वे तीन ही घर थे और तीनों मेरे बांए एक लाइन में थे। इनमें सबसे कम संबंध यादवों से था। उनसे बस कभी दूध,मठा,गोइठा आदि खरीदने आदि का संबंध था। पर खुद घर में हमेशा गायें,भैंसे रही सो यह संबंध छीन किस्‍म का था। मलाहों ,कहारों के घरों से आना जाना था,चूंकि वे खेती आदि में काम करते थे, उनके घर की महिलाएं भी काम में हिस्‍सा बंटाती थीं। इन घरों से हमारे संबंध बिना किसी राग द्वेष के थे। हम कभी कभी उन्‍हें बुलाने जाते थे उनके घर। पहले डोली आदि का प्रयोग होता था शादी में तो कहारों से एक तरह का संबंध था इसको लेकर। कहारों में एक था मोहन, मेरी ही उम्र का रहा होगा। उसकी नाच पार्टी थी। शादी में जब वह लवंडा बन नाचता था तब मेरी समझ में यह नही आता था कि वह ऐसा क्‍यों करता है,तब मैं छोटा था और उसके छोटे भाई के साथ बगीचों आदि में कभी कभार खेलता भी था। तो छठे छमाही उसकी अलग वेश-भूषा के मायने मेरी समझ से बाहर थे तब, हां लौंडा बन वह बडा कमसिन दिखता था और मुझे ज्‍यादा अच्‍छा लगता पर फिर उसे सामान्‍य देख वितृष्‍ण सी होती थी।जारी…

>नया साल, ठंड और लोदी गार्डन – डायरी

जनवरी 26, 2010

>तीन की सुबह जगा तो जनवरी की ठंड जैसी होती है वैसी थी, और हमेशा की तरह ठंड मुझे अपने बिल से निकलने को बाध्‍य करती है सो अपने कमरे से निकला तो लगा कि मौसम ऐसा है कि बिना चले गर्मी आएगी नहीं, तभी अपने कवि मित्र पंकज पराशर की याद आयी जिनका फोन अक्‍सर आता रहा कि कहां हैं भाई साहब , जब से नजदीक आए हैं नजर नहीं आते सो तय किया कि यह दो किलोमीटर का मंगलम से पांडव नगर का फासला चलकर तय किया जाए तो गर्मी आ जाएगी। हल्‍की हवा और कुछ कुहरीला मौसम चलने में आनंद दे रहा था तभी मैथिली कवि महाप्रकाश की याद आयी जिनके मैसेज का जवाब नहीं दिया था अब तक, चार दिन हो गये थे, सो फोन लगाया और बताया कि परेशान तो डेढ दो साल से हूं या ताउम्र परेशान ही रहा हूं और रहना है – मौत से पहले आदमी गम से निजात पाए क्‍यों…। उन्‍होंने कुछ सलाह दी कि अपनी भावनाओं को व्‍यक्‍त कर दिया करो उन्‍हें रोको नहीं इस तरह। उन्‍हें कैसे बताता कि वे इतने अपने हैं कि उनसे क्‍या व्‍यक्‍त करूं खुद से ही खुद को कैसे व्‍यक्‍त करे कोई।आगे बढा तो दो लडकियां एक रिक्‍शेवाले से जूझ रही थीं – सडक पार करती वे चीख रही थीं – बीस की जगह तू पचास रख ले , तुझे भीख चाहिए ना … वही सही। ऐसा कहती वे पास के एक होटल में घुसते हुए रिक्‍शेवाले को देखे जा रही थीं कि उसकी सदाशयता कब प्रकट होती है…। मैं भी मुड कर देख रहा था कि क्‍या करता है रिक्‍शेवाला। तो उसने धीरे से रिक्‍शा बगल की गली में लुढका दिया। शायद सामने सडक पर जाते जाना उसे सहन ना हो रहा हो नैतिकता के लिहाज से। मैंने सोचा अच्‍छा है, कि लडकियों का इस तरह का गुस्‍सा अच्‍छा है और रिक्‍शेवाले का इस तरह आंखें चुरालेना ,इसका विकल्‍प कहां उसके पास…।पंकज के पास पहुंचा तो उनका बेटा दरवाजे पर ही खेलता मिला , अपनी बडी बडी आंखों से देखे जा रहा था वह…। उससे संवाद की कोशिश करता भीतर दाखिल हुआ मैं वहां पंकज की मोहतरमा सामने रसोई में लगीं थी काम धाम में…। पंकज ने बताया कि उनका एक कविता संकलन आया है मैथिली में, देखा तो उसमें संगीत की शब्‍दावली व रागों से संबंधित कई कविताएं थीं । फिर उन्‍होंने अखबार की नौकरी और समय की किल्‍लत की बातें कीं, हालांकि इस बीच भी वे दिल्‍ली की संगीत की म‍हफिलों में जाने का समय निकाल लेते हें। हम बात में लगे थे तब तक गोभी के पराठे आ गये गर्म गर्म, टमाटर की चटनी के साथ। खाने वाले हम तीन जने थे एक बच्‍चे के नाना जी, सो मोहतरमा को तेजी से हाथ चलाना पड रहा था। इसतरह जोड के लिहाज से अच्‍छी और मनपसंद खुराक मिल चुकी थी तो निकल पडा लोदी रोड की तरफ , वहां विनोद जी के यहां से मनोवेद के नये अंक भी लेने थे। अंक लेते धर्मेंद्र श्रीवास्‍तव से बात हुयी तो बोले – अरे आइए…।तीन बजे तक पहुंचा वहां। उस अंक में धर्मेंद्र जी का भी एक लेख था माइकल जैक्‍सन पर । उसे देख उनकी मोहतरमा खुश हुयीं कि चलिए आप इनसे कुछ काम करा ले रहे हैं नहीं तो ये तो सुबह से बिछावन से निकले ही नहीं हैं..। फिर धर्मेंद ने अपनी ड्राफ्ट की कुछ नयी क‍हानियां सुनाईं। आत्‍मीय संबंधों और उनके अंतरविरोधों पर अच्‍छी कहानियां लगीं वे। मैंने कहा उन्‍हें फाइनल कीजिए..। फिर हमलोगों ने खाना खाया। काव्‍या ने पूछा – चाय बनाउं अंकल। हमलोगों ने कहा- जरूर जरूर …। फिर धर्मेंद्र बाहर निकले और बोले अरे मौसम कितना अच्‍छा है,ठंड है, बदली है , इसमें बारिश हो जाए तो घूमने में मजा आए। ऐसा कहते वे आसाम की बारिश और हरियाली को याद कर रहे थे। फौजियों के लिए मौसम के मानी अलग होते हैं। सो उन्‍होंने लोदी गार्डन जाने की तय की। छाता, टोपी आदि डटा कर हम निकले, आटो लिया और पांच बजे तक गार्डन गार्डन। गेट पर ही बडे बेचने वाले को देख धर्मेंद्र ने दो प्‍लेट बडे लिये। मैंने सोचा, अब किस पेट में खाया जाएगा …। अब तक रूकी बदली जैसे हमारे ही इंतजार में थी। और छाते को भी चल निकलने की मोहलत मिल गयी। जहां तहां इक्‍का दुक्‍का लोग बारिश से लौटने लगे थे। कुछ ही देर में बारिश थम गयी। पास के मैदान में कुछ युवक युवतियां डिस्‍क उछालने के खेल में लगे थे। आगे बढे तो छोटा सा कृत्रिम नाला था जिसमें बत्‍तखें तैर रही थीं छोटी व बडी हंस नुमा सफेद बत्‍तखें कुछ कत्‍थई और काली भी। पानी में हमलोगों ने बडे के टुकडे गिराये तो छोटी मछलियों का झुट वहां आ जुटा। तब हमें अपना मोबाइल कैमरा याद आया। और रिकार्डिंग शुरू कर दी हमने। जल, थल, गगन, चीलें, पेड, जलावन जमा करती स्त्रियां, जोडे, बूढे, जवान सबको कैद करते गए। बीच बीच में धर्मेंद गाने गाते लगातार रिकार्डिंग किए जा रहे थे। …सारी धमाचौकडी के बाद हम निकले तो गेट पर आइसक्रीम वाले दिखे। तो धर्मेंद्र कहां रूकने वाले थे, पूछे क्‍या लिया जाए- मैंने कहा – मैं नही जानता बहुत … और इस जाडे में। फिर रिप्‍पल्‍स खाते उन्‍होंने बताया कि इसका मानी लहरें होता है … हम हंसे .. शीत की लहरें। आगे मौसम विभाग की छत के उपर चीलें मुआयना कर रही थीं तो रूक कर देखा हमने। फिर हम इंडिया हैवीटेट में जा घुसे वहां प्रवीण मिश्र की पेंटिंग प्रदर्शनी लगी थी। प्रवीण गुजरात अहमदाबाद से आए थे वहां। लाजवाब तस्‍वीरें थीं उनकी बनायी। गांधी, बाजार, हल्‍के नीले अंधेरे न्‍यूड्स,कांटेदार फेंस पर तितली..घोंघे। वापिस पहुंचे तो मोहरमा ने कहा खाकर जाइएगा। मैंने कहा – इतनी जल्‍दी, अभी चार ही घंटे हुए हैं खाए, अब आज खाना मश्किल है मेरे लिए…।