>हिंदुस्तानी समाज और आलोचना की संस्कृति – कुमार मुकुल

>हिंदुस्तानी समाज में आलोचना की दो तरह की संस्कृति है,एक वह जो दमन के प्रतिकार में आरंभ होती है, दूसरी वो जो अपने समय व समाज के प्रति असंतोष के फलस्वरूप विकसित होती है। अपने संत कवियों में हम इन दो संस्कृतियों का आधार देख सकते हैं।मांग के खइबो मसीत के सोइबो,लेबे के एक न देबे के दोउ लिखने वाले तुलसीदास की पीडा आत्मदमन से उपजी है। आज के मानदंडों पर तुलसी एक दलित साहित्यकार साबित होते हैं। जन्म से जातिनिकाला पाए अछूत के घर पले बढे,तुलसीदास का साहित्य,जाति परंपरा में अपनी जगह तलाशते एक दलित मन की गाथा है। इसीलिए वह स्वांत:सुखाय है, क्योंकि उस संस्कृतनिष्ठ ब्राह्मणवादी परंपरा में उनके द्वारा अवधी जैसी लोकभाषा में लिखी गयी कृति को कौन महत्व देता।
इसके विपरीत ब्राह्मण ते गदहा भला,आन देव ते कुत्ता,मुल्ला ते मुरगा भला,नगर जगावे सुत्ता लिखने वाले कबीरदास की लडाई समाज के कई स्तरों पर है। वह ब्राह्मणवादी परंपरा में अपनी जगह बनाने की लडाई मात्र नहीं है। कबीर स्वांत: नहीं सर्वांत:सुखाय लिखते हैं। वे तुलसीदास की तरह अपना कोई मर्यादापुरूषोत्तम नायक नहीं रचते। दशरथ पुत्र राम की जगह वे प्रकृतिस्वरूप राम को अपना आदर्श बनाते हैं। उनका राम घट घट वासी है अयोध्यावासी नहीं।
कबीर की लडाई परमपद पाने की नहीं है। वे विश्वामित्र की तरह वशिष्ठ के मुख से अपने लिए मात्र ब्रह्मर्षि शब्द सुनने के लिए विद्रोह नहीं करते।तहलका मचा रही तत्कालीन भाजपा सरकार के समय ही दलित साहित्य का जो आंदोलन हिंदी पट्टी में जोर मार रहा था वह यूं ही नहीं था। इसके विपरीत उसी समय पान दुकानों से लेकर विभिन्न पूजा पाठ आदि अवसरों पर भी कबीर के कैसेटों का बजना अलग मर्म रखता है।दरअसल ये दो संस्कृतियां हैं , जो कभी टकराती हुयी समानांतर चलती हैं कभी पूरक बनती हैं। आजादी की लडाई के दौरान भी ये धाराएं अपने ढंग से सक्रिय थीं। गांधी के राम भी दशरथ के राम नहीं थे। ऐसा गांधी खुद लिखते हैं, उनकी मां कबीर पंथी थीं। वहीं दूसरी जमात रामरचिराखा वाली थी। जो खुद को उस दौर में किनारे रखे रही, वह सोचती रही कि अंग्रेज यहां हैं तो रामजी की कोई मंशा होगी।पहली धारा में एक तरह का प्रतिक्रियावाद होता है जो एक स्वांत: सुखाय नायक रचता है। उसकी मर्यादा रचता है और इसतरह उन्हें पतित माननेवाले ब्राह्मणों के त्रिदेवों के वरक्स अपने पतितपावन देवता रचता है। वह एक व्यक्तिकगत जेहाद रचता है पर जहां से उसके नायक की मर्यादा को कथा में आघात लगनेाला होता है वहां वह कथा स्थगित कर देता है। क्योंकि आगे वाल्मीकि की तरह अगर वह लव-कुश प्रसंग में जाता तो उसे लिखना पडता – राम रथी विरथी लवकूशा…देखहीं सीता भयउ कलेशा…। पर ऐसा करने पर राम नायक नहीं बन पाते। और ऐसा कर तुलसी एक और शास्त्र नहीं रच पाते।वाल्मीकि कबीर की ही धारा के अग्रज कवि हैं। उनकी रचनात्मकता सत्ता को चुनौती दे डालती है। वे राम की मर्यादा को लवकुश द्वारा धूल धूसरित करवा देते हैं और राम को सरयू में डूब मरना पडता है। दलित होने के बाद भी वाल्मीकि दलित साहित्यकार नहीं हैं क्योंकि वे दमन के प्रतिरोध में डाकू बन जाना पसंद करते हैं।
वाल्मीकि और कबीर की तुलना में तुलसी की धारा थोडी चुप्पा किस्म की है। उनके स्वांत: सुखाय में भी समाज की आलोचना है, पर वह थोडी सीमित है। क्योंकि ऐसे समय में जब दरबारी साहित्य का बोलबाला था। राजा के स्तुतिगान में ना लगकर स्वांत: सुखाय लिखना भी आलोचना की एक तकनीक ही थी। पर इसके पीछे सत्ता मात्र की आलोचना नहीं थीं। बल्कि वहां सत्ता पर अपने राजाराम को स्थापित करने की आकांक्षा थी। जबकि कबीर किसी भी सत्ता के खिलाफ थे।रहीम तुलसी के ही मित्र थे। वे पारंपरिक रूप में दरबारी नहीं थे। क्योंकि वे सेनापति भी थे अकबर के। पर उनकी व्यथा भी तुलसी के समान थी, इसलिए वे निजमन की व्यथा मन में ही रखने की बात करते हैं। यह व्यथा को मन में रखना और तुलसी का स्वांत: सुखाय दोनों एक ही हैं। मन की व्यथा जब रचना में परिणत होती है,तो अंत:करण को सुख देती है।जबकि कबीर की व्यथा केवल मन की नहीं है, व्यापक जनजीवन की है।वेदांत या उपनिषद में हम पहली धारा की शास्त्रीयता के विरूद्ध संघर्षों की अभिव्यक्ति पाते हैं। साधना पहली धारा की मुख्य हथियार है। वह वेट एंड सी का ही शास्त्रीय रूप है। अवसर की अनुकूलता आनेतक धैर्य रखना ही साधना है जबकि दूसरी धारा का हथियार बहुआयामी संघर्ष्है। मात्र अलख जगाए रखने से काम नहीं चलता। यह दूसरी धारा थोडी निर्मम और उत्साही भी है।हिन्दी साहित्य की आलोचना में रामचंद्र शुक्ल और रामविलास शर्मा पहली धारा का प्रतिनिधित्व करते दिखते हैं। जबकि हजारी प्रसाद द्विवेदी और नामवर सिंह दूसरी धारा का । यह दूसरी धारा विवाद यानी एंटी थीसिस की रचना करती है। जबकि पहली धारा वाद से संवाद के मध्य धैर्य पूर्वक अलख जगाये रखती है। ये दोनों ही धाराएं पूरक सी हैं।एक धारा परिवर्तन में रूचि लेती है, तो दूसरी मूल्यांकन में। दूसरी धारा रूढियों में परिणत हो चुके अपने घर को जलाने से भी नहीं हिचकती – जो घर जारे आपना चले हमारे साथ …। वह दो सिरों से जलने वाली मोमबत्ती की तरह सबसे अंधेरे काल को प्रकाशित करने की कोशिश करती है। दूसरी धारा संक्रमण काल की निर्णयक शक्ति होती है।एक ही आदमी में दोनों धाराएं साथ साथ हो सकती हैं। व्यक्ति में जो धारा मुखर होती है,उसी से उसकी पहचान होती है। गांधी में जैसे दोनों ही धाराओं का संतुलन था। रामविलास शर्मा ने भी जो निराला की जीवनी आधारित साहित्य साधना की रचना की है, उसमें दूसरी धारा पर जोर है। निराला दूसरी धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं जबकि पंत-प्रसाद-महादेवी पहली धारा का। मीरा पहली धारा से हैं जबकि मारीना तस्वेतायेवा और तसलीमा नसरीन दूसरी धारा से। दूसरी धारा की स्त्री रचनाकारों का अभी हिंदी समाज में प्रकाट्य नहीं हुआ है। यूं कात्यायनी,निर्मला पुतुल को हम दूसरी धारा से जोडकर देख सकते हैं।स्वांत: सुखाय वाली तुलसी की धारा नामवर सिंह के मंच लूटनेवाले वक्तव्यों में भी दिखती है। इसे वे मेरी हिम्मत देखिए,मेरी तबीयत देखिए,सुलझे हुए मसलों को फिर से उलझाता हूं मैं … कहकर परिभाषित भी करते हैं। जबकि नामवर सिंह के ही पिछले लेखन का काल दूसरी धारा का परिचायक है।जिसे याद कर कभी शमशेर ने अकबर इलाहाबादी का शेर उद्धृत करते हुए नामवर सिंह के बारे में कहा था – हमारी बातें ही बातें हैं, सैयद काम करता था … न भूलो फर्क जो है, कहने वाले करनेवाले में …।

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