>चंडीगढ में साहित्‍य अकादमी का कविता पाठ

>अपने युवा साथी और कवि देवेन्‍द्र कुमार देवेश का जुलाई के अंतिम सप्‍ताह में एक दिन फोन आया कि आपको चंडीगढ में कविता पढने जाना है, सहमति चाहिए। उसी शाम उनसे भेंट हुयी तो अकादमी के उपसचिव डॉ.एस.गुणशेखरन का एक पत्र मुझे मिला जिसमें इससे संबंधित जानकारी मुझे मिली। 1 अगस्‍त‍ की दोपहर आइएसबीटी पर कवि,पत्रकार राधेश्‍याम तिवारी के साथ हमने चंडीगढ के लिए एसी बस ली। बस अभी दिल्‍ली से निकली ही थी कि उसका एसी फेल हो गया और हम पसीने पसीने होते रात साढे आठ बजे चंडीगढ पहुंचे।
चंडीगढ बस अड्डे पर उतरा तो उसकी सफाई देख दंग रह गया। क्‍या दिल्‍ली का बस अड्डा ऐसा नहीं हो सकता। बस से उतरते ही बाकी नगरों की तरह आटो व रिक्‍शा वाले पीछे लग गये। पास ही केन्‍द्र सरकार का होटल था जिसमें ठहरने की व्‍यवस्‍था थी। आटो वाले ने कहा कि चालीस लेंगे, हम आगे बढ गये। रिक्‍शे वाला पीछे था अभी , बोला पैंतीस लेंगे फिर तीस,पच्‍चीस और अंत में बीस पर टिक कर वह पीछे लगा रहा। आखिर आजिज आ हम उसके साथ चल दिए तो उसने एक रिक्‍शेवाले को हमें सौंप दिया। तब पता चला कि वह दलाल था रिक्‍शेवालों का। दूसरे दिन दोपहर जब हम होटल से निकल रिक्‍शे पर बैठे तो वहां भी एक दलाल ने हमें रिक्‍शेवाले को सौंपा सीधे कोई रिक्‍शावाला वहां नहीं था जिसपर हम सवार होते। इस तरह का यह पहला अनुभव था।
बाकी शहर चकाचक था। और रिक्‍शेवाला जहां मन वहां से ट्रैफिक की गलत दिशा में बिना सोचे समझे रिक्‍शा जिस तरह मोड दे रहा था उससे हमें डर लगा, पर पास से गुजरती पुलिस गाडी के लिए यह कोई मुददा नहीं था। शहर में कचरा कहीं नहीं था सडक पर खोमचे वाले कहीं नहीं थे। रौशनी थी और सडकें थीं सरपट। बीच में रिक्‍शेवाले ने कहा साहब इससे बहुत कम पैसे में हम इससे बहुत अच्‍छे होटल में ठहरा देंगे तब हमने बताया कि हमें अपनी जेब से नहीं खर्चना है।
होटल पार्क व्‍यू हम पहुंचे आख्रिरकार और आसानी से हमें हमारा कमरा दिखा दिया गया।
हम नहा धोकर फारिग हुए ही थे कुबेरदत्‍त के साथ सांवले से एक युवक ने कमरे में प्रवेश किया। उसने हमारी ठहरने और खाने की सहूलियतों की बाबत हमें जानकारी दी। बाद में पता चला कि वे ही सचिव गुणशेखरन हैं, फिर बडी गर्मजोशी से उन्‍होंने हाथ मिलाया। उनका हाथ बहुत सख्‍त था सो मुझे बहुत अच्‍छा लगा। वरिष्‍ठ कवि वीरेन डंगवाल, युवा पत्रकार मृत्‍युंजय प्रभाकर और युवा नाटयकर्मी राकेश के हाथ याद आए। यह हाथ उन सब पर भारी पड रहा था। सो दूसरे दिन मैंने उनसे पूछ डाला कि भई आपका हाथ बहुत सख्‍त है , अच्‍छा लगा तो अलग से इसपर कुछ देर बात हुयी उनसे। उन्‍होंने हाथ दिखाते तमिल के दबाव वाली हिंदी में बताया कि पिछले महीने मेरे हाथ में बाइक चलाते फ्रैक्‍चर हो गया था नहीं तो और मजबूती से हाथ मिलाता हूं मैं। कि ऐसे हाथ मिलाने से हमारे संबंध हाथों की तरह मजबूत होते हैं। और भी कई बातें बताई उन्‍होंने। इस बीच हमने करीब दसियों बार हाथ मिलाया और मेरे दाहिने हाथ का दर्द जाता रहा। अंत तक मैं भी उनके वजन के बराबर के दबाव से हाथ मिला पा रहा था।

अपने हाथ की तरह गुणशेखरन अपने इरादों के भी सख्‍त लगे। उन्‍होंने बताया कि वे हिन्‍दी को ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों के बीच ले जाना चाहते हैं। कि इससे पहले अकादमी का ज्‍यादातर कार्यक्रम दिल्‍ली में केंद्रित रहता था। वह भी ज्‍यादा त‍र आलोचना ओर विचार आधारित रहता था। हमने इसे रचना आधारित करने की कोशिश की है। हमने कविता और कहानी पाठ आरंभ कराया है वह भी साथ साथ जिससे दोनों विधाओं के लोग आपस में संवाद कर सकें। कि पहली बार पिछले महीनों देहरादून में अकादमी का इस तरह का पहला पाठ हुआ था जिसमें कवि कथाकार शामिल थे। चंडीगढ में यह इस तरह का पहला पाठ था अकादमी का। उन्‍होंने बताया कि दोनों पाठों में हमने किसी रचनाकार को रिपीट नहीं किया है। हम ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों को जोडना चाहते हैं।

चार सत्रों में चले दिन भर के इस रचना पाठ में करीब चौबीस रचनाकार भाग ले रहे थे। जिसमे 16 कवि और 8 कथाकार थे। शाम को खाने की टेबल पर नये पुराने कई रचनाकार एक साथ उपस्थित थे। कैलाश वाजपेयी, विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी,कमल कुमार, हेमंत शेष,प्रमोद त्रिवेदी, राधेश्‍याम तिवारी,एकांत श्रीवास्‍तव, गगल गिल आदि। कुछ लोग जिनका पाठ दोपहर बाद के सत्र में था वे अगले दिन पहुंचे जैसे कविता,जितेन्‍द्र श्रीवास्‍तव आदि। कुछ स्‍थानीय रचनाकार सत्‍यपाल सहगल आदि भी आमंत्रित थे। इसतरह एक अच्‍छा मेल जोल भी हो गया।

होटल के बडे से हाल में 150 कुर्सियां लगीं थीं और आश्‍चर्यजनक रूप से पाठ आरंभ होते होते वे सारी भर गयीं। आरंभ में गुणशेखरन चिंतित थे लोगों की आमद को लेकर। फिर सबने अच्‍छा पाठ किया। मेरा पाठ भी बहुत अच्‍छा रहा। मुझे पटना खुदा बख्‍श लाइब्रेरी का अपना कविता पाठ याद आया। लोगों ने पाठ के दौरान कविता की अपनी समझ के अनुसार अच्‍छी हौसला आफजाई की। राधेश्‍याम तिवारी ने भी अच्‍छा पाठ किया। सबसे अच्‍छा पाठ कुबेरदत्‍त ने किया। उनका उच्‍चारण और कविता में जो व्‍यंग्‍य की धार थी वह काबिलेतारीफ थी।

लौटते में रात देर हो रही थी तो राधेश्‍याम तिवारी ने कहा कि आज इधर ही रूक जाइए। सो उन्‍हीं के यहां रूक गया। वहां सुबह मैंने उनके कुछ अच्‍छे गीत पढे और चकित रह गया। एक गीत प्रस्‍तुत है यहां-

टहनी-टहनी गले मिलेगी
पात परस से डोलेंगे

हवा कहां मानेगी
वह तो जाएगी सबके भीतर
बिना द्वार का इस दुनिया में
बना नहीं कोई भी घर

एक दरवाजा बंद करोगे
सौ दरवाजे खोलेंगे

इतने लोग यहां बैठे हैं
फिर भी कोई बात नहीं
बिजली चमकी,बादल गरजे
पर आई बरसात नहीं

कोई बोले या न बोले
लेकिन हम तो बोलेंगे

दिन बीते फिर रात आ गई
लौट-लौट आए फिर दिन
लेकिन डंसती रही सदा ही
दुख की यह काली नागिन

फिर भी कंधे अपने हैं
बोझ खुशी से ढो लेंगे।

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