अगस्त 2009 के लिए पुरालेख

>हिंदुस्तानी समाज और आलोचना की संस्कृति – कुमार मुकुल

अगस्त 18, 2009

>हिंदुस्तानी समाज में आलोचना की दो तरह की संस्कृति है,एक वह जो दमन के प्रतिकार में आरंभ होती है, दूसरी वो जो अपने समय व समाज के प्रति असंतोष के फलस्वरूप विकसित होती है। अपने संत कवियों में हम इन दो संस्कृतियों का आधार देख सकते हैं।मांग के खइबो मसीत के सोइबो,लेबे के एक न देबे के दोउ लिखने वाले तुलसीदास की पीडा आत्मदमन से उपजी है। आज के मानदंडों पर तुलसी एक दलित साहित्यकार साबित होते हैं। जन्म से जातिनिकाला पाए अछूत के घर पले बढे,तुलसीदास का साहित्य,जाति परंपरा में अपनी जगह तलाशते एक दलित मन की गाथा है। इसीलिए वह स्वांत:सुखाय है, क्योंकि उस संस्कृतनिष्ठ ब्राह्मणवादी परंपरा में उनके द्वारा अवधी जैसी लोकभाषा में लिखी गयी कृति को कौन महत्व देता।
इसके विपरीत ब्राह्मण ते गदहा भला,आन देव ते कुत्ता,मुल्ला ते मुरगा भला,नगर जगावे सुत्ता लिखने वाले कबीरदास की लडाई समाज के कई स्तरों पर है। वह ब्राह्मणवादी परंपरा में अपनी जगह बनाने की लडाई मात्र नहीं है। कबीर स्वांत: नहीं सर्वांत:सुखाय लिखते हैं। वे तुलसीदास की तरह अपना कोई मर्यादापुरूषोत्तम नायक नहीं रचते। दशरथ पुत्र राम की जगह वे प्रकृतिस्वरूप राम को अपना आदर्श बनाते हैं। उनका राम घट घट वासी है अयोध्यावासी नहीं।
कबीर की लडाई परमपद पाने की नहीं है। वे विश्वामित्र की तरह वशिष्ठ के मुख से अपने लिए मात्र ब्रह्मर्षि शब्द सुनने के लिए विद्रोह नहीं करते।तहलका मचा रही तत्कालीन भाजपा सरकार के समय ही दलित साहित्य का जो आंदोलन हिंदी पट्टी में जोर मार रहा था वह यूं ही नहीं था। इसके विपरीत उसी समय पान दुकानों से लेकर विभिन्न पूजा पाठ आदि अवसरों पर भी कबीर के कैसेटों का बजना अलग मर्म रखता है।दरअसल ये दो संस्कृतियां हैं , जो कभी टकराती हुयी समानांतर चलती हैं कभी पूरक बनती हैं। आजादी की लडाई के दौरान भी ये धाराएं अपने ढंग से सक्रिय थीं। गांधी के राम भी दशरथ के राम नहीं थे। ऐसा गांधी खुद लिखते हैं, उनकी मां कबीर पंथी थीं। वहीं दूसरी जमात रामरचिराखा वाली थी। जो खुद को उस दौर में किनारे रखे रही, वह सोचती रही कि अंग्रेज यहां हैं तो रामजी की कोई मंशा होगी।पहली धारा में एक तरह का प्रतिक्रियावाद होता है जो एक स्वांत: सुखाय नायक रचता है। उसकी मर्यादा रचता है और इसतरह उन्हें पतित माननेवाले ब्राह्मणों के त्रिदेवों के वरक्स अपने पतितपावन देवता रचता है। वह एक व्यक्तिकगत जेहाद रचता है पर जहां से उसके नायक की मर्यादा को कथा में आघात लगनेाला होता है वहां वह कथा स्थगित कर देता है। क्योंकि आगे वाल्मीकि की तरह अगर वह लव-कुश प्रसंग में जाता तो उसे लिखना पडता – राम रथी विरथी लवकूशा…देखहीं सीता भयउ कलेशा…। पर ऐसा करने पर राम नायक नहीं बन पाते। और ऐसा कर तुलसी एक और शास्त्र नहीं रच पाते।वाल्मीकि कबीर की ही धारा के अग्रज कवि हैं। उनकी रचनात्मकता सत्ता को चुनौती दे डालती है। वे राम की मर्यादा को लवकुश द्वारा धूल धूसरित करवा देते हैं और राम को सरयू में डूब मरना पडता है। दलित होने के बाद भी वाल्मीकि दलित साहित्यकार नहीं हैं क्योंकि वे दमन के प्रतिरोध में डाकू बन जाना पसंद करते हैं।
वाल्मीकि और कबीर की तुलना में तुलसी की धारा थोडी चुप्पा किस्म की है। उनके स्वांत: सुखाय में भी समाज की आलोचना है, पर वह थोडी सीमित है। क्योंकि ऐसे समय में जब दरबारी साहित्य का बोलबाला था। राजा के स्तुतिगान में ना लगकर स्वांत: सुखाय लिखना भी आलोचना की एक तकनीक ही थी। पर इसके पीछे सत्ता मात्र की आलोचना नहीं थीं। बल्कि वहां सत्ता पर अपने राजाराम को स्थापित करने की आकांक्षा थी। जबकि कबीर किसी भी सत्ता के खिलाफ थे।रहीम तुलसी के ही मित्र थे। वे पारंपरिक रूप में दरबारी नहीं थे। क्योंकि वे सेनापति भी थे अकबर के। पर उनकी व्यथा भी तुलसी के समान थी, इसलिए वे निजमन की व्यथा मन में ही रखने की बात करते हैं। यह व्यथा को मन में रखना और तुलसी का स्वांत: सुखाय दोनों एक ही हैं। मन की व्यथा जब रचना में परिणत होती है,तो अंत:करण को सुख देती है।जबकि कबीर की व्यथा केवल मन की नहीं है, व्यापक जनजीवन की है।वेदांत या उपनिषद में हम पहली धारा की शास्त्रीयता के विरूद्ध संघर्षों की अभिव्यक्ति पाते हैं। साधना पहली धारा की मुख्य हथियार है। वह वेट एंड सी का ही शास्त्रीय रूप है। अवसर की अनुकूलता आनेतक धैर्य रखना ही साधना है जबकि दूसरी धारा का हथियार बहुआयामी संघर्ष्है। मात्र अलख जगाए रखने से काम नहीं चलता। यह दूसरी धारा थोडी निर्मम और उत्साही भी है।हिन्दी साहित्य की आलोचना में रामचंद्र शुक्ल और रामविलास शर्मा पहली धारा का प्रतिनिधित्व करते दिखते हैं। जबकि हजारी प्रसाद द्विवेदी और नामवर सिंह दूसरी धारा का । यह दूसरी धारा विवाद यानी एंटी थीसिस की रचना करती है। जबकि पहली धारा वाद से संवाद के मध्य धैर्य पूर्वक अलख जगाये रखती है। ये दोनों ही धाराएं पूरक सी हैं।एक धारा परिवर्तन में रूचि लेती है, तो दूसरी मूल्यांकन में। दूसरी धारा रूढियों में परिणत हो चुके अपने घर को जलाने से भी नहीं हिचकती – जो घर जारे आपना चले हमारे साथ …। वह दो सिरों से जलने वाली मोमबत्ती की तरह सबसे अंधेरे काल को प्रकाशित करने की कोशिश करती है। दूसरी धारा संक्रमण काल की निर्णयक शक्ति होती है।एक ही आदमी में दोनों धाराएं साथ साथ हो सकती हैं। व्यक्ति में जो धारा मुखर होती है,उसी से उसकी पहचान होती है। गांधी में जैसे दोनों ही धाराओं का संतुलन था। रामविलास शर्मा ने भी जो निराला की जीवनी आधारित साहित्य साधना की रचना की है, उसमें दूसरी धारा पर जोर है। निराला दूसरी धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं जबकि पंत-प्रसाद-महादेवी पहली धारा का। मीरा पहली धारा से हैं जबकि मारीना तस्वेतायेवा और तसलीमा नसरीन दूसरी धारा से। दूसरी धारा की स्त्री रचनाकारों का अभी हिंदी समाज में प्रकाट्य नहीं हुआ है। यूं कात्यायनी,निर्मला पुतुल को हम दूसरी धारा से जोडकर देख सकते हैं।स्वांत: सुखाय वाली तुलसी की धारा नामवर सिंह के मंच लूटनेवाले वक्तव्यों में भी दिखती है। इसे वे मेरी हिम्मत देखिए,मेरी तबीयत देखिए,सुलझे हुए मसलों को फिर से उलझाता हूं मैं … कहकर परिभाषित भी करते हैं। जबकि नामवर सिंह के ही पिछले लेखन का काल दूसरी धारा का परिचायक है।जिसे याद कर कभी शमशेर ने अकबर इलाहाबादी का शेर उद्धृत करते हुए नामवर सिंह के बारे में कहा था – हमारी बातें ही बातें हैं, सैयद काम करता था … न भूलो फर्क जो है, कहने वाले करनेवाले में …।

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>तितलियां – कविता – कुमार मुकुल

अगस्त 17, 2009

>यह कविता 2000 में लिखी थी तब मैं पटना से अमर उजाला दैनिक का संवाददाता था। आलोचना के वर्तमान अंक में यह कविता प्रकाशित है।

नवंबर के इस महीने में
सीटीओ के फैक्स रूम में
तितलियां भरी पड़ी हैं
सब की सब
भूरी धूसर व काली हैं
नीली
प्लास्टिक पेंट चढ़ी दीवारों
पर
एक फुट के घेरे में
पांच-छह तितलियां बैठी हैं
वहीं एक मोटी सफेद छिपकली
लटकी है दीवार से
उनकी ओर से मुंह फेरे

फिर नीचे देखता हूं
रजिस्टर के किनारों पर
शीशे की दीवार पर
और तितलियों से भी
ज्यादा मटमैले हो चुके
घरर-घरर आवाज निकालते
एअर कंडीशनर पर
फैक्स के तार पर
बिजली के स्वीच पर
टेलीप्रिंटर के पीछे
मैं गिनने लगता हूं उठकर
एक-दो-तीन पांच-दस
सोलह-चैबीस अट्ठाइस
अरे रे
कितनी तितलियां हैं यहां
क्या कोई
भाग नहीं रहा इनके पीछे !

नीचे भी गिरी हैं दो-तीन
अधमरी कुचली गई पांवों से
खंडित पंखों वाली

टेलीप्रिंटर पर बैठे
हिंदू के संवाददाता
बालचंद से
पूछता हूं मैं
देखिए तो
कितनी तितलियां हैं यहां
तीस के करीब
कुछ
दराज और आलमीरे के पीछे भी होंगी

बालचंद पूछते हैं
कि तितलियां हैं ये
इनमें तो
रंग ही नहीं है बाकी
फिर गंभीर होते बोलते हैं वे
जानते हैं
ये तितलियां यहां क्यों आई हैं
मरने आई हैं ये
देखिए
कैसी
निस्पंद हैं सब मृत सी

शायद
ठीक हैं वे
अब मुझे पटना संग्रहालय में
शीशे के पीछे
रसायनों के लेप से सुरक्षित
हजारों मृत तितलियों की
याद आती है
उनका भी रंग
करीब-करीब ऐसा ही
धूसर पड़ चुका है
फैक्सरूम में
एक तितली को छूता हूं मैं
पहली दफे वह
कोई प्रतिक्रिया नहीं करती
तीसरी बार कुरेदने पर
उस पड़ती है चिमगादड़ों सी
खुले में भागने का अंदाज
गायब है उसका
एक मशीनी लय में
उसके पंख झपक रहे हैं
फिर वह बैठ जाती है रजिस्टर पर

उधर
आधे दर्जन तितलियों के बीच
वह छिपकली
तटस्थ है कैसी !
वह क्यों नहीं खा रही तितलियों को
क्या उसे भी उनकी मौत की ख़बर है

बालचंद बताते हैं कि
छिपकलियां भी चुनाव करती हैं
फैले पंखों के चलते
रुचि नहीं ले रहीं वे

सामने
प्लास्टिक के ट्रे में पड़े काग़ज़ों पर
निस्पंद बैठी
एक तितली दिखती है
मैं बालचंद को दिखाता हूं
कि इधर आकर देखिए
इसके पंखों के बीच
दो-तीन रंगीन बिंदिया हैं
उठकर आते हैं वे
मैं दिखलाता हूं
देखिए उसमें कितने रंग हैं
सफेद-लाल-काला-कत्थई
मेरे विश्लेषण को अनदेखा करते
अपना गंभीर निर्णय सुनाते हैं बालचंद
‘मैंने कहा ना
कि तितलियां मर रही हैं
देखिए यह तितली मर रही है
इसीलिए इसके पंख ऐसे खुले हैं
जमीन के समानांतर’

उसे छूता हूं मैं
वाकई
कोई हरक़त नहीं होती पंखों में
मर चुकी हैं वो
बालचंद बताते हैं कि
इस तरह तभी पंख खोलती है तितली
जब वह उड़ान भर रही होती है
पर उस बखत
पंखों के बीच का कोण
घटता-बढ़ता रहता है हमेशा
पर इस तरह
180 डिग्री का कोण बनाने का मतलब
कि पंखों के बीच का तनाव
समाप्त हो चुका है
और मर चुकी हैं वो

वाकई गहरी नज़र है बालचंद की
इस कमरे में कोई खिड़की नहीं
एक दरवाज़ा है
उसमें भी पल्ला है छोटा-सा
हाथ घुसाकर
फैक्स का काग़ज़ देने भर
फिर इतनी बड़ी संख्या में
कहां से आ घुसी हैं वे
क्यों आ घुसी हैं

फिर सबकी सब
ऐसी धूसर क्यों हैं
क्या तितलियों का सतरंगापन
एक पुराकथा होने जा रही है

बाहर निकलकर हम
चाय की दुकान पर आते हैं
वहां भी तितलियां काफी है
वैसी ही धूसर एकरंगापन लिए
जैसे नए बसते शहरी इलाक़ों में
अल्लसुबह
सूरज के सात रंगों को धूसर करते
एक सी बेश-भूषा वाले मजूर
भरे रहते हैं
अपने श्रम के मोल के इंतज़ार में

दुकान पर तितलियां
चाय के जूठे ग्लास पर बैठी हैं
और फेंकी गई कत्थई
काली चाय की पत्तियों पर…
जहां बैठा बाल श्रमिक
ग्लास धोता
उनसे छेड़-छाड़ करता
अपना मन बहला रहा है
क्या बच्चे का मन बहलाने
यहां आ गई हैं तितलियां
या चाय की शहरी आदत ने
जुटा दिया हैं उन्हें

चाय की पत्तियों
और तितलियों
और बच्चों के रंग में
कैसी समानता है
दुकान के ऊपर
कंदब की डाल लटकी है
औ कदंब फूले-फले हैं
कदंब के फूल भी
तितलियों जैसे धूसर हैं
फल नारंगी हैं
और ज्यादा पके फल
फिर धूसर हो रहे हैं
उन पर भी बैठ रही हैं तितलियां

कस्बाई महानगर का
धुआं और शोर की आमदवाला
इलाका है यह
धूल का तो साम्राज्य ही है यहां
और उस धूलिया माहौल में
अस्तित्व के अपने संघर्ष में
रंग खो रही हैं तितलियां
(खदान मजदूरों सा

यहां से दस किलोमीटर दूर
धूल-धुआं-शोर से अलग
अपने पुस्तैनी मकान की खिड़की से
बाहर घास-पात पर
बैठती तितलियों को
देखा उसके बाद
तो छोटे बेटे को उन्हें दिखाते
फिर याद किया उनका रंग
यहां भी वैसी ही तितलियां थीं
कुछ उनसे ज़्यादा सादी
और सादे नारंगी रंग की

पर वह पीली तितली
कहीं नहीं दिखी
जो मेरे बचपन में
कंटीली झाड़ के ऊपर खिले
अपने जैसे ही पीले फूलों पर
मडराया करती थी
हम उनके पीछे भागते थे
दबे पांव
और पांवों में गड़ जाते थे महीन कांटें
जिन्हें पांवों से निकाल
हम फिर भागते थे
पर पकड़ में नहीं आती थीं वे

हां
हेलिकाप्टर की शक्ल वाली
जलते बल्ब के नीचे
वैसी ही खडर-खडर
आवाज़ करने वाली
टिकलियों को
घागों से बांधकर
जरूर उड़ाया था बचपन में

सचमुच की
रंगीन तितलियां जब
गायब हो रही हैं परिदृश्य से
प्लास्टिक की बहुरंगी तितलियां
घर कर रही हैं

अजय के यहां बेटे ने
प्लास्टिक की नीली-काली
तितलियों की
मांग कर दी
जो चिपकी थीं दीवार पर
जबकि घर पर खिड़की के बाहर
उड़ान भरती तितलियों को देख
डर रहा था वह
कि पापा काट लेगी तितली
या वह आनंद के लिए
तितलियों द्वारा काटे जाने के भय को
कल्पना में
वृहद आयाम दे रहा था

क्या तितलियां बदल रही हैं
या समाप्त हो रही हैं

क्या कल को वे भी
पक्षियों की तरह
स्मृतियों के भरोसे
आएंगी कविता में !

>चंडीगढ में साहित्‍य अकादमी का कविता पाठ

अगस्त 9, 2009

>अपने युवा साथी और कवि देवेन्‍द्र कुमार देवेश का जुलाई के अंतिम सप्‍ताह में एक दिन फोन आया कि आपको चंडीगढ में कविता पढने जाना है, सहमति चाहिए। उसी शाम उनसे भेंट हुयी तो अकादमी के उपसचिव डॉ.एस.गुणशेखरन का एक पत्र मुझे मिला जिसमें इससे संबंधित जानकारी मुझे मिली। 1 अगस्‍त‍ की दोपहर आइएसबीटी पर कवि,पत्रकार राधेश्‍याम तिवारी के साथ हमने चंडीगढ के लिए एसी बस ली। बस अभी दिल्‍ली से निकली ही थी कि उसका एसी फेल हो गया और हम पसीने पसीने होते रात साढे आठ बजे चंडीगढ पहुंचे।
चंडीगढ बस अड्डे पर उतरा तो उसकी सफाई देख दंग रह गया। क्‍या दिल्‍ली का बस अड्डा ऐसा नहीं हो सकता। बस से उतरते ही बाकी नगरों की तरह आटो व रिक्‍शा वाले पीछे लग गये। पास ही केन्‍द्र सरकार का होटल था जिसमें ठहरने की व्‍यवस्‍था थी। आटो वाले ने कहा कि चालीस लेंगे, हम आगे बढ गये। रिक्‍शे वाला पीछे था अभी , बोला पैंतीस लेंगे फिर तीस,पच्‍चीस और अंत में बीस पर टिक कर वह पीछे लगा रहा। आखिर आजिज आ हम उसके साथ चल दिए तो उसने एक रिक्‍शेवाले को हमें सौंप दिया। तब पता चला कि वह दलाल था रिक्‍शेवालों का। दूसरे दिन दोपहर जब हम होटल से निकल रिक्‍शे पर बैठे तो वहां भी एक दलाल ने हमें रिक्‍शेवाले को सौंपा सीधे कोई रिक्‍शावाला वहां नहीं था जिसपर हम सवार होते। इस तरह का यह पहला अनुभव था।
बाकी शहर चकाचक था। और रिक्‍शेवाला जहां मन वहां से ट्रैफिक की गलत दिशा में बिना सोचे समझे रिक्‍शा जिस तरह मोड दे रहा था उससे हमें डर लगा, पर पास से गुजरती पुलिस गाडी के लिए यह कोई मुददा नहीं था। शहर में कचरा कहीं नहीं था सडक पर खोमचे वाले कहीं नहीं थे। रौशनी थी और सडकें थीं सरपट। बीच में रिक्‍शेवाले ने कहा साहब इससे बहुत कम पैसे में हम इससे बहुत अच्‍छे होटल में ठहरा देंगे तब हमने बताया कि हमें अपनी जेब से नहीं खर्चना है।
होटल पार्क व्‍यू हम पहुंचे आख्रिरकार और आसानी से हमें हमारा कमरा दिखा दिया गया।
हम नहा धोकर फारिग हुए ही थे कुबेरदत्‍त के साथ सांवले से एक युवक ने कमरे में प्रवेश किया। उसने हमारी ठहरने और खाने की सहूलियतों की बाबत हमें जानकारी दी। बाद में पता चला कि वे ही सचिव गुणशेखरन हैं, फिर बडी गर्मजोशी से उन्‍होंने हाथ मिलाया। उनका हाथ बहुत सख्‍त था सो मुझे बहुत अच्‍छा लगा। वरिष्‍ठ कवि वीरेन डंगवाल, युवा पत्रकार मृत्‍युंजय प्रभाकर और युवा नाटयकर्मी राकेश के हाथ याद आए। यह हाथ उन सब पर भारी पड रहा था। सो दूसरे दिन मैंने उनसे पूछ डाला कि भई आपका हाथ बहुत सख्‍त है , अच्‍छा लगा तो अलग से इसपर कुछ देर बात हुयी उनसे। उन्‍होंने हाथ दिखाते तमिल के दबाव वाली हिंदी में बताया कि पिछले महीने मेरे हाथ में बाइक चलाते फ्रैक्‍चर हो गया था नहीं तो और मजबूती से हाथ मिलाता हूं मैं। कि ऐसे हाथ मिलाने से हमारे संबंध हाथों की तरह मजबूत होते हैं। और भी कई बातें बताई उन्‍होंने। इस बीच हमने करीब दसियों बार हाथ मिलाया और मेरे दाहिने हाथ का दर्द जाता रहा। अंत तक मैं भी उनके वजन के बराबर के दबाव से हाथ मिला पा रहा था।

अपने हाथ की तरह गुणशेखरन अपने इरादों के भी सख्‍त लगे। उन्‍होंने बताया कि वे हिन्‍दी को ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों के बीच ले जाना चाहते हैं। कि इससे पहले अकादमी का ज्‍यादातर कार्यक्रम दिल्‍ली में केंद्रित रहता था। वह भी ज्‍यादा त‍र आलोचना ओर विचार आधारित रहता था। हमने इसे रचना आधारित करने की कोशिश की है। हमने कविता और कहानी पाठ आरंभ कराया है वह भी साथ साथ जिससे दोनों विधाओं के लोग आपस में संवाद कर सकें। कि पहली बार पिछले महीनों देहरादून में अकादमी का इस तरह का पहला पाठ हुआ था जिसमें कवि कथाकार शामिल थे। चंडीगढ में यह इस तरह का पहला पाठ था अकादमी का। उन्‍होंने बताया कि दोनों पाठों में हमने किसी रचनाकार को रिपीट नहीं किया है। हम ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों को जोडना चाहते हैं।

चार सत्रों में चले दिन भर के इस रचना पाठ में करीब चौबीस रचनाकार भाग ले रहे थे। जिसमे 16 कवि और 8 कथाकार थे। शाम को खाने की टेबल पर नये पुराने कई रचनाकार एक साथ उपस्थित थे। कैलाश वाजपेयी, विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी,कमल कुमार, हेमंत शेष,प्रमोद त्रिवेदी, राधेश्‍याम तिवारी,एकांत श्रीवास्‍तव, गगल गिल आदि। कुछ लोग जिनका पाठ दोपहर बाद के सत्र में था वे अगले दिन पहुंचे जैसे कविता,जितेन्‍द्र श्रीवास्‍तव आदि। कुछ स्‍थानीय रचनाकार सत्‍यपाल सहगल आदि भी आमंत्रित थे। इसतरह एक अच्‍छा मेल जोल भी हो गया।

होटल के बडे से हाल में 150 कुर्सियां लगीं थीं और आश्‍चर्यजनक रूप से पाठ आरंभ होते होते वे सारी भर गयीं। आरंभ में गुणशेखरन चिंतित थे लोगों की आमद को लेकर। फिर सबने अच्‍छा पाठ किया। मेरा पाठ भी बहुत अच्‍छा रहा। मुझे पटना खुदा बख्‍श लाइब्रेरी का अपना कविता पाठ याद आया। लोगों ने पाठ के दौरान कविता की अपनी समझ के अनुसार अच्‍छी हौसला आफजाई की। राधेश्‍याम तिवारी ने भी अच्‍छा पाठ किया। सबसे अच्‍छा पाठ कुबेरदत्‍त ने किया। उनका उच्‍चारण और कविता में जो व्‍यंग्‍य की धार थी वह काबिलेतारीफ थी।

लौटते में रात देर हो रही थी तो राधेश्‍याम तिवारी ने कहा कि आज इधर ही रूक जाइए। सो उन्‍हीं के यहां रूक गया। वहां सुबह मैंने उनके कुछ अच्‍छे गीत पढे और चकित रह गया। एक गीत प्रस्‍तुत है यहां-

टहनी-टहनी गले मिलेगी
पात परस से डोलेंगे

हवा कहां मानेगी
वह तो जाएगी सबके भीतर
बिना द्वार का इस दुनिया में
बना नहीं कोई भी घर

एक दरवाजा बंद करोगे
सौ दरवाजे खोलेंगे

इतने लोग यहां बैठे हैं
फिर भी कोई बात नहीं
बिजली चमकी,बादल गरजे
पर आई बरसात नहीं

कोई बोले या न बोले
लेकिन हम तो बोलेंगे

दिन बीते फिर रात आ गई
लौट-लौट आए फिर दिन
लेकिन डंसती रही सदा ही
दुख की यह काली नागिन

फिर भी कंधे अपने हैं
बोझ खुशी से ढो लेंगे।