>खाब सा इक उनका वजूद है : कुछ गीत-गजल नुमा

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यह 1997 का साल था, जब पहली बार मेरा झुकाव गीत-गजल लिखने की ओर हुआ। इसके पहले मैं गीत-गजल को कविता के मुकाबले आसान विधा मानता था, जब इस दौर में मैंने लगातार दर्जन भर गीत लिखे तो मुझे पहली बार अहसास हुआ कि यह भी कविता के मुकाबले की विधा है और निराल, टैगोर जैसे तमाम महारथी इस विधा में काम कर चुके हैं। तब अपने इन गीतों को अपनी फटी आवाज में गाता भी था मै , तो मित्र कहते कि मेरी आवाज सहगल की तरह कांपती है। तब तक कविता लिखते दस साल हो चुके थे। पटना में पडोसी मित्र राजूरंजन प्रसाद और उनके साले मोती मेरे उन दिनों के साझीदार रहे हैं, राजूजी को जब मैं विद्यापति का गीत जय जय भैरवि गाकर सुनाता तो वे बहुत खुश होते थे। यह गीत आभा भी बहुत अच्‍छा गाती थी।
तब मैंने गीतों का चार पन्‍नों का एक पैम्‍फलेट नुमा कटिंग पेस्टिंग कर तैयार किया था जिसे उसके पसंद करने वालों को मैं दिया करता था। समन्‍वय की बैठकों में जब कुछ लोग पुराने फिल्‍मी गीत गाकर अपना इकबाल बुलंद करते तो मुझे भी अपने गीत सुनाने पडते थे तब नवीन,राजेश चंद,प्रमोद सिंह,अरूण नारायण,धर्मेंद्र सुसांत,अभ्‍युदय आदि मेरी अच्‍छी हौसला अफजाई करते थे । मित्र कहते कि इन गीतों का अच्‍छा कैसेट बन सकता है। खैर इतनी फुर्सत कहां है, इन झमेलों की। तो उसी पैम्‍फलेट से कुछ गीत कारवां के पाठकों के लिए। इनमें एक एक गीत मेरे दो कविता संग्रहों में संग्रहित है।

खाब सा इक उनका वजूद है
हर तरफ बस वो ही मरदूद है

खाब सा इक …

सीखचों के पार उपर चांद है
चिमगादडों की इधर उछल-कूद है

खाब सा इक …

हवा है तेज धूल भी खूब है
खडक उनकी किधर मौजूद है
खाब सा इक …

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