>यह लचीलापन ही शायद प्‍यार है – आत्‍मकथात्‍मक कहानी का अंश

>फिर हमारी तकरार और प्‍यार दोनों बढते गए। हमारी हमारी भावुकता ने हमारी बुद्धि का लचीलापन बरकरार रखा और यह लचीलापन ही शायद प्‍यार है। जिसमें हम एक दूसरे की कमियों और अपने प्रति की गयी उसकी अवमाननओं को छुपाते उसके प्रति अपना स्‍नेह बचाए रखते हैं। प्‍यार अंधापन नहीं है,एक तीसरी आंख है वह जो बुद्धि और भावना के मध्‍य अपनी सजलता लिए विद्यमान रहती है।

गोदरेज में लगे आईने में देख वह अपनी नेकटाई ठीक किया करता था। तब मुझे पहली बार यह अहसास हुआ कि अस्तित्‍व की निजता बचाए रखने के लिए एक आईना जरूरी है। पर मैं अपना अस्तित्‍व कभी इतना समेट नहीं सका कि उसकी गरदन में एक गांठ लगा तहा कर किसी खाने में रख सकूं। आईना एक जरूरी औजार है अपनी सीरत गढने के लिए। अपनी कविता की पहली कमाई के पचास रूपये में मैंने एक आधाकद आईना खरीदा था। जिसमें मैं अपनी शक्‍ल कभी ब्रूसली सा कभी मेराडोना सा देखा करता था। आईना देख मैंने कई बातें जानी कि फेंटा फैलाकर हंसने से असमय झुर्रियां पड जाती हैं। लिहाजा हौले हौले तो मैं कभी नहीं मुस्‍करा सका हां अपनी हंसी के चौखटेपन को ठहाकों के भंवर में खोलना जरूर सीख गया। फिर मेरी शक्‍ल सूरत और लहजा और लिहाजों का नियमक एक अरसे तक आईना बना रहा। आगे धीरे धीरे आईने की जगह लोगों की आंखों ने ले लीं। आंखें, जो तमाम क्षुद्रता में भी हमें आदमकद दिखाती हैं।

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  1. >प्यार को आपने बखूबी पहचाना है। दुआ है, यह पहचान खोने न पाए।-Zakir Ali ‘Rajnish’ { Secretary-TSALIIM & SBAI }


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