जून 2009 के लिए पुरालेख

>इच्छाओं की कोई उम्र नहीं होती

जून 30, 2009

>यह कविता मैंने 1989-90 में लिखी थी। तब पटना से सीपीआई का एक दैनिक जनशक्ति निकला करता था, उसमें आलोचक व कवि डॉ.खगेन्द्र ठाकुर ने मेरी दो कविताएं छापी थीं, जिनमें एक यह भी थी। 2000 में जब मेरा तरीके से पहला कविता संकलन परिदृश्यठ के भी‍तर निकला तो मैंने उसकी कविताएं चयन का काम अनुज कवि नवीन को दिया था, तो यह कविता अपने अलग मिजाज के चलते संकलन में नहीं ली गयी थी। 2006 में जब मेरा दूसरा संकलन ग्यािरह सितंबर और अन्यल कविताएं छपी तो उसमें कविताएं चयन का काम मैंने अपने कवि मित्र आरचेतन क्रांति को दिया था,उसमें यह कविता संकलित की गयी। 2006 में कादंबिनी में यह कविता विष्णु नागर ने छापी। अब जाकर 2009 में अग्रज कवि मित्र रामकृष्णा पांडेय ने जब भोपाल से निकलने वाले अखबार नवभारत के एक विशेषांक, जिसका संपादन डॉ.नामवर सिंह ने किया, के लिए विषय आधारित कविता मांगी तो मैंने यही कविता दी उन्हें , जो वहां छपी भी। अब चौथी बार यह कविता जन संस्‍कृति मंच की स्‍मारिका में छपी है। पहली बार इस कविता का पारिश्रमिक कुछ नहीं था,कादंबिनी से 500 रूपये मिले थे और नवभारत से इस कविता के लिए 2000 मिले। तो कविता की रचनाप्रक्रिया ही नहीं उसकी प्रकाशन प्रक्रिया भी मजेदार होती है ये इच्छाएँ थीं कि एक बूढ़ा पूरी की पूरी जवान सदी के विरुद्ध अपनी हज़ार बाहों के साथ उठ खड़ा होता है और उसकी चूलें हिला डालता है ये भी इच्छाएँ थीं कि तीन व्यक्ति तिरंगे-सा लहराने लगते हैं करोड़ों हाथ थाम लेते हैं उन्हें और मिलकर उखाड़ फेंकते हैं हिलती हुई सदी को सात समंदर पार ये इच्छाएँ ही थीं कि एक आदमी अपनी सूखी हडि्डयों को लहू में डूबोकर लिखता है श्रम-द्वंद्व-भौतिकता और विचारों की आधी दुनिया लाल हो जाती है इच्छाओं की कोई उम्र नहीं होती अगर विवेक की डांडी टूटी न हो बाँहों की मछलियाँ गतिमान हों तो खेई जा सकती है कभी-भी इच्छाओं की नौका अंधेरे की लहरों के पार।अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा… कविता की प्रकाशन प्रक्रिया रोमांचित करती है।और कविता पर तो क्या कहूं।June 7, 2009 2:14 AM Udan Tashtari ने कहा… बहुत बढिया.August 22, 2008 10:15 AM दिनेशराय द्विवेदी ने कहा… इस यथार्थ कविता की प्रशंसा के लिए शब्द नहीं हैं मेरे पास।August 22, 2008 10:27 AM pallavi trivedi ने कहा… इच्छाओं की कोई उम्र नहीं होती अगर विवेक की डांडी टूटी न हो बाँहों की मछलियाँ गतिमान हों तो खेई जा सकती है कभी-भी इच्छाओं की नौका अंधेरे की लहरों के पार। कितनी सही बात…सचमुच इच्छाओं की कोई उम्र नहीं होती है!August 22, 2008 10:55 AM Mrs. Asha Joglekar ने कहा… इच्छाओं की कोई उम्र नहीं होती अगर विवेक की डांडी टूटी न हो बाँहों की मछलियाँ गतिमान हों तो खेई जा सकती है कभी-भी इच्छाओं की नौका अंधेरे की लहरों के पार। kamal kee rachna, bahut sunder.August 22, 2008 12:21 PM

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>चेखव अक्‍सर उसे प्‍यारी बच्‍ची पुकारते-लीडिया चेखव- एक प्रेम कथा

जून 25, 2009

>अगली मुलाकात में चेखव ने लीडिया को उपन्‍यास लिखने की सलाह देते कहा – … एक स्‍त्री को ठीक उसी प्रकार लिखना चाहिए जैसे कि वह कुछ काढती है। खूब लिखो और पूरे विस्‍तार में लिखो। लिखो और काटो। फिर लिखो – फिर काटो।
इस पर लीडिया ने कहा – यहां तक कि कुछ बाकी ही न बचे…
इस पर नाराज होते चेखव ने कहा – तुम बहुत खराब औरत हो … जीवन जैसा है बस वैसा ही। लिखोगी न …
तब लीडिया ने कहा – हां, लिखूंगी। … मैं एक आजाने व्‍यक्ति की प्रेम कहानी लिखूंगी।…वह व्‍यक्ति जिसे आप जानते तक नहीं, आपको बहुत प्‍यारा हो गया है…क्‍या यह बेहद दिलचस्‍प नहीं है…
इस पर मजाक करते हुए चेखव बोलते हैं – जी नहीं। कतई दिलचस्‍प नहीं, प्‍यारी बच्‍ची।
यह संबोधन सुन लीडिया देर तक हंसती रही। चेखव अक्‍सर उसे प्‍यारी बच्‍ची पुकारते।
अंत में अगले दिन तक के लिए विदा होते चेखव ने उसे फिर उपन्‍यास लिखने की याद दिलाते कहा कि तुम लिखो कि कैसे तुम एक सैनिक अफसर के इश्‍क में कैद थीं।
फिर चेखव ने कहा कि तुम मुझ पर गुस्‍सा नहीं करोगी।…स्‍त्री को सदा स्‍नेहमयी और कोमल हृदय होना चाहिए।
अगली शाम चेखव लीडिया के घर खाने पर आमंत्रित थे। उसके पति कहीं बाहर गये थे। बच्‍चे चेखव से मिलकर सोने चले गए। हल्‍का खाते-पीते चेखव ने पहली बार अपने प्‍यार का इजहार करते कहा – क्‍या तुम्‍हें मालूम है … इतना प्‍यार तो मैं दुनिया की किसी भी अन्‍य स्‍त्री से नहीं कर सकता ।… तुमसे बिछडना कितना दुश्‍वार होगा मेरे लिए। … तुम्‍हें केवल पवित्र और निष्‍कलुष प्‍यार ही किया जा सकता है।…तुम्‍हें स्‍पर्श करते मैं डरता था,कहीं रूठ न जाओ … यह कहते उन्‍होंने लीडिया का हाथ पकडा और तुरत छोड दिया … उफ कितना ठंडा हाथ है …

>अवसाद – कविता – कुमार मुकुल

जून 23, 2009

>

अब
आईना ही
घूरता है मुझे
और पार देखता है मेरे
तो शून्‍य नजर आता है

शून्‍य में चलती है
धूप की विराट नाव
पर अब वह
चांदनी की उज्‍जवल नदी में
नहीं बदलती
चांद की हंसिए सी धार अब
रेतती है स्‍वप्‍न
और धवल चांदनी में
शमशानों की राखपुती देह
अकडती चली जाती है
जहां खडखडाता है दुख
पीपल के प्रेत सा
अडभंगी घजा लिए

आता है
जाता है

कि चीखती है
आशा की प्रेतनी
सफेद जटा फैलाए

हू हू हू
हा हा हा
आ आ आ

हतवाक दिशाए
सिरा जाती हैं अंतत:
सिरहाने
मेरे ही

मेरे ही कंधों चढ
धांगता है मुझे ही
समय का सर्वग्रासी कबंध

कि पुकार मेरे भीतर की
तोडती है दम
मेरे भीतर ही डांसती है रात

कि शिथिलगात मेरे

दलकते जाते हैं

दलकते जाते हैं …

>उदास राहों में जो घुंघरूओं से लेटे हैं – कुछ गीत गजल नुमा

जून 19, 2009

>उदास राहों में जो घुंघरूओं से लेटे हैं
छू दो तो बज उठेंगे ये सब हमारे बेटे हैं

उदास राहों में…

मरे नहीं हैं अभी गम खा के सोए हैं
जमाने भर का दुख अपनी बांह में समेटै हैं

उदास राहों में…

बिसूरते होंठ जो फट गए अभावों से
इन्‍हें मरहम भी न दें क्‍या हम इतना हेठें हैं

उदास राहों में…

>मेरे ‘सुखी पारिवारिक जीवन’ में अब कोई रोशन दिन नहीं होगा – लीडिया

जून 18, 2009

>चेखव और लीडिया पहली मुलाकात के तीन साल बाद जब मिलते हैं वे तो बडे मजाकिया लहजे में बातें करते हैं। वे सोचते हैं कि उनका संबंध जरूर पूर्वजन्‍म का है और शायद वे पिछले जन्‍म में प्रेमी हों और एक साथ डूबकर मरे हों। हंसी की इन बातों के बाद चेखव उलाहना देते हैं कि कितनी बुरी हो तुम , जाकर कुछ भेजा नहीं , मैंने तुमसे कहानियां मांगी थी …। अभी उनकी बातचीत आरंभ ही हुयी थी कि चेखव को उनके प्रशंसक ले गये। यहां मजेदार यह है कि आज कल की तरह उस काल में रूस में भी लेखकों के साथ अफवाह उडाने वालों का एक तबका भिडा रहता था, सो उनमें किसी ने उडा दिया कि पार्टी में चेखव ने नशे में धुत्‍त होकर कहा कि वे लीडिया के पति से उसे तलाक दिला कर शादी करने वाले हैं। यह सब सुनकर लीडिया की समझ में कुछ आ नहीं रहा था कि वह क्‍या करे …। अंत में चेखव से लीडिया की भेंट हुयी तो चेखव ने कहा कि मुझे लेकर दुनिया भर के ऐसे ही अफवाह हैं – कि , मेरी शादी एक अमीरजादी से हुयी है, कि अपने मित्रों की पत्नियों से मेरे संबंध हैं वगैरह वगैरह…।
फिर चेखव ने लीडिया से विदा ली तो उदासमना लीडिया ने सोचा – मेरे सुखी पारिवारिक जीवन में अब कोई रौशन दिन नहीं होगा …।
इस मुलाकात के बाद चेखव के साथ उनका पत्राचार चलने लगा। लीडिया चोरी छुपे डाकघर जाकर चेखव के पत्र लाती । कभी कभार एकाध पत्र वह अपने पति मिखाइल को दिखा देती थी। इस पर उसके पति ने कहा कि मेरी दिलचस्‍पी इसमें नहीं कि चेखव तुम्‍हें क्‍या लिखते हैं अगर दिखा सको तो तुम यह दिखाओं कि अपने पत्र में तुम उन्‍हें क्‍या लिखती हो। पर लीडिया ने कभी अपने पत्र चेखव को नहीं दिखाए।
कुछ दिनों बाद चेखव फिर पीटर्सबर्ग आए तो लीडिया उनसे मिली। तब चेखव ने उससे उसके बच्‍चों के बारे में पूछ – तो लीडिया ने बहुत उत्‍साह से उन्‍हें इस बारे में बताया।
बातचीत में लीडिया ने चेखव को सलाह दे डाली कि अब आपको शादी कर लेनी चाहिए। तो चेखव ने कहा कि मुझे इसकी फुर्सत कहां है, फिर उन्‍होंने लीडिया से सवाल किया कि …. क्‍या तुम सुखी हो
लीडिया को अब जवाब नहीं सूझ रहा था – वह बोली – मेरे पति बहुत भले हैं और बच्‍चे भी। पर किसी का भला लगना और सुखी होना दोनों में अंतर है ना …मुझे लगता है जैसे मैं घिर गयी हूं … मेरा कोई अस्तित्‍व नहीं रहेगा। क्‍या इसी का नाम सुख है ..।
इस पर चेखव ने उत्‍तेजना में परिवार और स्‍त्री की पराधीनता की आलोचना करते कहा कि अपनी प्रतिभा को पहचानो।
फिर बात बदल कर चेखव ने कहा अगर मैंने शादी की होती तो मैं अपनी पत्‍नी से अलग रहने के लिए कहता … ताकि ज्‍यादा से ज्‍यादा समय साथ बिताने से आपसी व्‍यवहार में जो असावधानी या अशिष्‍टता का पुट आ जाता है, वह हमारे बीच न आ पाए।
घर पहुंचने पर उनके पति ने दरवाजा खोलते हुए कहा कि तुम्‍हारे बिना हम सब अनाथ हो जाते हैं …।
अपने घर में पति के पास लेटी लीडिया सोच रही थी कि उसे चेखव से प्‍यार है … ।

>उम्र भर एक मुलाकात चली आती है – चेखव व लीडिया के प्रेम पसंग

जून 18, 2009

>अपनी भयाक्रांत शीर्षक कविता में होर्खे लुइस बोर्खेस लिखते हैं – यह प्रेम है।मुझे गोपन रहना होगा अथवा पलायन करना होगा। इस कैदखाने की दीवारें बढ़ती जाती हैं, जैसे किसी डरावने स्‍वप्‍न में।
लीडिया एविलोव की पुस्‍तक मेरी जिन्‍दगी में चेखव को पढते हुए जैसे प्‍यार के निहितार्थ नये सिरों से खुलते हैं। अपने सहज, सरल ढंग से। कैदखाने की दीवारें और डरावने स्‍वप्‍न वहां भी हैं पर वे बोर्खेस की कविता की तरह भयाक्रांत नहीं करते बल्कि खीचते हैं जैसे समुद्र खींचता है चाहे आप तैरना जानते हों या ना जानते हों …। इसे पढते हुए लगता है कि प्‍यार अपने अनुभवों के प्रति एक निजी आ्ग्रह है जो रूढिगत आचरणों को दरकिनार करता अपनी रौ में बढता जाता है। यह कबीर की आंखिन देखी है जिसे आंख वाला दुनियावी दबाव में अपनी नजरों से दूर नहीं कर पाता, चाहे इसकी जो कीमत उठानी पडे।
इस पुस्‍तक को पढते लगा जैसे सारा लेखन आदमी के प्‍यार की ही अभिव्‍यक्ति होता है। अपने देखे-गुने हुए के प्रति एक सच्‍ची जिच से ही लेखन पैदा होता है। चेखव कहते हैं – लेखक को वही लिखना चाहिए जो उसने देखा और भोगा है-पूरी सच्‍चाई और ईमानदारी के साथ। … जीवन का अनुभव विचार को जन्‍म दे सकता है लेकिन विचार अनुभव को जन्‍म नहीं दे सकता। यहां विचार एक रूढि की तरह आता है और अनुभव विचार का पर्यायवाची हो जाता है। मतलब हर बार नये समय संदर्भों में अनुभवों के आधार पर विचारों का पुनरमूल्‍यांकन करने की जो हिम्‍मत करता है वही लेखक होता है वही प्रेमी होता है। और यह मूल्‍यांकन पूरी जटिलात और समय के विडंबना बोध को साथ लेकर चलता है वह विचारों का सरलीकरण नहीं करता।
जब लीडिया की पहली मुलाकात हुई थी तब वह पच्‍चीस की और एक बच्‍चे की मां थी , चेखव तब अटठाईस के थे और अविवाहित। लीडिया लिखती है- … पर उस एक नजर में क्‍या कुछ नहीं था। … उमंग,उल्‍लास और आनंद की जैसे हजार आतिशें जल उठीं।
जब चेखव को पता चला कि उनका एक बच्‍चा भी है तो उसकी आंखों में देखते उन्‍होंने पूछा- आपका बेटा भी है… अरे वाह …।
लीडिया में लेखिका बनने की गहरी ईच्‍छा थी, जब उसकी शादी तय हुई तो मासिक रूसी विचार के संपादक गाल्‍तसेव ने कहा कि – बस फिर तो हो गया। अब भूल जाओ कि लेखिका-वेखिका बनोगी…। तब लीडिया ने संकल्‍प लिया कि वह शादी को लेखन में बाधा नहीं बनने देगी। पर बाद उसे लगा कि वह उसकी भूल थी कि विवाहित जीवन में लेखन के लिए समय ही नहीं था। पर यह चीज कहीं न कहीं उसके भीतर बैठी रही। शादी के बाद भी वह कहानियां लिखती रही छपवाती रही और अपने प्रिय लेखक चेखव या चेखान्‍ते को लेकर उसका प्रेम दस सालों तक बना रहा। अंतिम सालों में उसने चेखव की कहानियों के संकलन में उनकी काफी मदद भी की और उसकी लेखकीय जिद के रूप में हम इस खूबसूरत किताब को देख सकते हैं जिसमें चेखव से कुल आठ-दस मुलाकातों को जैसे पुनरजीवित कर दिया गया हो।
अपने भीतर के लेखक को बचाने की जिद में लीडिया ने अपने पति से तलाक की भी मांग की। तब वह पहले बच्‍चे की मां बनने वाली थी और चेखव से उसका परिचय भी नहीं हुआ था। पति ने समझाया कि यह गलतफहमी पर टिकी जिद है और लीडिया ने भी सोचा और पाया कि उसका पति उसके लिए कुछ भी उठा नहीं रखता, पर प्रेम के यह क्‍या मायने हुए कि एक दूसरे की तारीफ में गर्क होते रहें , प्रेम तो मिलकर बाकी दुनिया के लिए एक नयी राह तलाशना है , और लिखना उसी की ओर जाती एक राह है।
संतान हो जाने पर लीडिया के लिए तलाक की बात सोचना भी संभव ना रहा और उसने महसूस किया कि मेरे पंख कतर दिए गए हैं …। यूं अब दोनों के बीच का तनाव घटने लगा था, लिखने को लेकर उसका पति उसे तंग करना बंद कर चुका था फिर भी लीदिया को समझ नहीं आ रहा कि इस उदासी और उब की वजह क्‍या है, जबकि उसकी कहानियां छपने लगी थीं।
पहली मुलाकात के तीन साल बाद चेखव से लीदिया की दूसरी मुलाकात हुई तब वह तीन बच्‍चों की मां बन चुकी थी। एक गोष्‍ठी में वह चेखव का इंतजार करती सोच रही थी कि – क्‍या उन्‍हें मेरी याद होगी, कि उस अनुभूति को जिसने तीन बरस पहले मेरे भीतर उजाला भर दिया था हम फिर जी सकेंगे…। यहां मीर याद आते हैं, उम्र भर एक मुलाकात चली आती है…। चेखव भी उस मुलाकात को उसी तरह याद रखे थे – वे बोले – तीन साल पहले जब हम मिले थे तो क्‍या तुम्‍हें ऐसा नहीं लगा था कि हमारा परिचय पहली बार हुआ हो, मगर हमारी जान पहचान पुरानी है और हमने एक लम्‍बे बिछोह के बाद एक दूसरे को पाया है … कि यह अनुभूति इकतरफा हो ही नहीं सकती…।
उस मुलाकात के समय के संवादों को देखा जाए तो वे आम प्रेमियों के संवादों की तरह थे , रोमान और उत्‍तेजना और एक निष्‍कपट बाल सुलभ जिज्ञासा से भरे हुए।……. जारी

>खाब सा इक उनका वजूद है : कुछ गीत-गजल नुमा

जून 18, 2009

>
यह 1997 का साल था, जब पहली बार मेरा झुकाव गीत-गजल लिखने की ओर हुआ। इसके पहले मैं गीत-गजल को कविता के मुकाबले आसान विधा मानता था, जब इस दौर में मैंने लगातार दर्जन भर गीत लिखे तो मुझे पहली बार अहसास हुआ कि यह भी कविता के मुकाबले की विधा है और निराल, टैगोर जैसे तमाम महारथी इस विधा में काम कर चुके हैं। तब अपने इन गीतों को अपनी फटी आवाज में गाता भी था मै , तो मित्र कहते कि मेरी आवाज सहगल की तरह कांपती है। तब तक कविता लिखते दस साल हो चुके थे। पटना में पडोसी मित्र राजूरंजन प्रसाद और उनके साले मोती मेरे उन दिनों के साझीदार रहे हैं, राजूजी को जब मैं विद्यापति का गीत जय जय भैरवि गाकर सुनाता तो वे बहुत खुश होते थे। यह गीत आभा भी बहुत अच्‍छा गाती थी।
तब मैंने गीतों का चार पन्‍नों का एक पैम्‍फलेट नुमा कटिंग पेस्टिंग कर तैयार किया था जिसे उसके पसंद करने वालों को मैं दिया करता था। समन्‍वय की बैठकों में जब कुछ लोग पुराने फिल्‍मी गीत गाकर अपना इकबाल बुलंद करते तो मुझे भी अपने गीत सुनाने पडते थे तब नवीन,राजेश चंद,प्रमोद सिंह,अरूण नारायण,धर्मेंद्र सुसांत,अभ्‍युदय आदि मेरी अच्‍छी हौसला अफजाई करते थे । मित्र कहते कि इन गीतों का अच्‍छा कैसेट बन सकता है। खैर इतनी फुर्सत कहां है, इन झमेलों की। तो उसी पैम्‍फलेट से कुछ गीत कारवां के पाठकों के लिए। इनमें एक एक गीत मेरे दो कविता संग्रहों में संग्रहित है।

खाब सा इक उनका वजूद है
हर तरफ बस वो ही मरदूद है

खाब सा इक …

सीखचों के पार उपर चांद है
चिमगादडों की इधर उछल-कूद है

खाब सा इक …

हवा है तेज धूल भी खूब है
खडक उनकी किधर मौजूद है
खाब सा इक …

>लोगों की पसंद के आईने में ब्‍लॉग

जून 13, 2009

>

‘कारवॉं’ ————- ‘कस्‍बा’, ‘भडास’,’मोहल्‍ला’ से आगे ——— ‘मानसिक हलचल’,’उडन तश्‍तरी’ आदि सबसे आगे———————–करीब डेढ साल पहले अविनाश के ब्‍लाग मोहल्‍ले पर आए मेरे लेख पर जब पच्‍चीस तीस कमेंट आए तो पहली बार मुझे पता चला था कि यह ब्‍लाग क्‍या बला है…। तब तक मेरे पास कंपूटर नहीं था । कहीं कहीं देखकर मैंने धीरे धीरे जाना कि यह एक वैकल्पिक मीडिया की जगह लेता जा रहा है। मोहल्‍ला पर मेरे लेख के आने के कुछ माह बाद ही जब मनोवेद का संपादन करने के क्रम में घर पर ही कंपूटर आदि की सुविधा हुयी तो मैंने भी अपना ब्‍लाग कारवॉं शुरू किया। मोहल्‍ला तब भी सक्रियता क्रम में एक से दस नंबर के भीतर रहता था। पत्रकारिता विरादरी से होने के चलते मोहल्‍ला के बाद जिन ब्‍लागों को जाना वे कस्‍बा और भडास आदि थे। भडास की चर्चा अक्‍सर अविनाश आदि से ही सुनी थी। ब्‍लाग का स्‍वरूप निजी होता है सो अपने ब्‍लाग पर कुछ कुछ लिखते और साथियों की चीजें यदा कदा देते रहने के अलावे मेरी कभी इसमें रूचि नहीं रही कि मेरा ब्‍लाग नंबर वन हो। इसके लिए नियमित श्रम भी जरूरी था और इसके विपरीत मै महीने महीने भर बीच बीच में गायब हो जाता हूं पटना तो एक लाईन लिख नहीं पाता ब्‍लाग पर।
पर इधर जब मैंने चिट्ठाजगत पर यूं ही देखा तो यह देखना मजेदार रहा कि कारवॉं मोहल्‍ला कस्‍बा और भडास से ज्‍यादा लोगों द्वारा पसंद किया जाता है। जहां कारवां को 143 लोग पसंद करते हैं वहीं मोहल्‍ला को 128 और कस्‍बा को 133 और भडास को 130 लोगों द्वारा पसंद किया जाता है। जबकि सक्रियता क्रम में कारवां 159 पर है और ये ब्‍लाग 14,9 और तीसरे स्‍थान पर हैं।
इससे भी मजेदार यह है कि जो ब्‍लाग लोगों की पसंद में सबसे आगे हैं वे इनमें से कोई नहीं हैं। सबसे ज्‍यादा लोगों द्वारा बुकमार्क किए गए ब्‍लागों में सबसे उपर Blogs Pundit by E-Guru Rajeev (189),मानसिक हलचल (160),उड़न तश्तरी …. (155)आदि हैं। मानसिक हलचल और उडन तश्‍तरी सक्रियता क्रम में भी सबसे आगे हैं। नीचे चिट्ठाजगत पर कल रात इस से संबंधित जो आंकडे मुझे दिखे वह नीचे है, पाठक इसे देखकर कुछ चीजों का अंदाजा लगा सकते हैं। साफ है कि सक्रियता क्रम का मतलब हुआ कि आप ब्‍लाग पर कितनी और किस तेजी से सामग्री डालते हैं और पसंद का मतलब हुआ कि आपके डाले हुए में लोग क्‍या पढना पसंद करते हैं।
यूं देखाजाए तो यह ब्‍लाग की दुनिया गाल बजाने पर ही ज्‍यादा टिकी दिखती है, कुल आठ नौ हजार ब्‍लागर में तीन चार सौ लोग चर्चित ब्‍लागों को पढते हैं, ये अधिकांश ब्‍लागर ही होंगे। इनमें मात्र डेढ दो सौ लोग इन ब्‍लागों को पसंद करते हैं। बाकी हमारी अपनी उछल कूद का नंबर है , और यह खुशफहमी कि सारी दुनिया हमें देख रही है । यूं यह साइबर दुनिया है और इसका यथार्थ भी साइबर ही होगा, जमीनी नहीं। आगे हम कोशिश करेंगे की इस साइबर दुनिया के यथार्थ को जानें और उस जानकारी को आपस में बांटें ताकि हम बडी जमात को अपनी ओर आकर्षित कर सकें और अपने विचारों व कार्यों की आपसदारी और भागीदारी को बढा सकें।

कारवॉं
3496 सम्बंधित लेख
अन्य विशेषताएँ
पुस्तकचिह्न 143
• हवाले 8 चिट्ठे 19 लेख
• सक्रियता क्रं० 156

कस्बा
336 सम्बंधित लेख
अन्य विशेषताएँ
पुस्तकचिह्न 133
• हवाले 72 चिट्ठे 176 लेख
• सक्रियता क्रं० 14

भडास
1 सम्बंधित लेख
अन्य विशेषताएँ
पुस्तकचिह्न 130
• हवाले 92 चिट्ठे 210 लेख
• सक्रियता क्रं० 9

मोहल्ला
283 सम्बंधित लेख
अन्य विशेषताएँ
पुस्तकचिह्न 128
• हवाले 124 चिट्ठे 350 लेख
• सक्रियता क्रं० 3

चिट्ठे का नाम (कितनों की पसंद)
Blogs Pundit by E-Guru Rajeev (189)
मानसिक हलचल (160)
फुरसतिया (159)
उड़न तश्तरी …. (155)
घुघूतीबासूती (154)
आलोक पुराणिक की अगड़म बगड़म (153)
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DHAI AKHAR ढाई आखर (146)
mamta t .v. (146)
हाशिया (146)

सक्रियता क्र० – चिट्ठे का नाम, (कुल 8698 चिट्ठों में से)
1. मानसिक हलचल
2. उड़न तश्तरी ….
3. मोहल्ला
4. हिन्द-युग्म
5. छींटें और बौछारें
6. सारथी
7. फुरसतिया
8. दीपक भारतदीप की शब्द- पत्रिका
9. भड़ास blog
10. दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका
11. शब्दों का सफर
12. निर्मल-आनन्द
13. चिट्ठा चर्चा
14. कस्बाा qasba
15. रचनाकार
16. आलोक पुराणिक की अगड़म बगड़म
17. ताऊ डॉट इन
18. मेरा पन्ना
19. कबाड़खाना
20. शिवकुमार मिश्र और ज्ञानदत्त पाण्डेय का ब्लॉग
21. घुघूतीबासूती
22. अज़दक
23. चोखेर बाली
24. तीसरा खंबा
25. दीपक भारतदीप का चिंतन
26. अनवरत
27. दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
28. उन्मुक्त
29. आवाज़
30. नारी
31. अमीर धरती गरीब लोग
32. यूनुस ख़ान का हिंदी ब्लॉ ग : रेडियो वाणी —-yunus khan ka hindi blog RADIOVANI
33. लो क सं घ र्ष !
34. प्रत्यक्षा
35. मेरी छोटी सी दुनिया
36. दुनिया मेरी नज़र से – world from my eyes!!
37. Rudra Sandesh
38. महाजाल पर सुरेश चिपलूनकर (Suresh Chiplunkar)
39. साहित्य शिल्पी
40. छुट-पुट

>कि अब वही है साक्षात घटोत्‍कची वारिस

जून 12, 2009

>अपनी नजरों में
जितना बडा
या महान होना था
हो चुका वह कवि
और कुछ होने की बाबत
जानता नहीं वह
सो
होता जा रहा है पंडित फिर से
वही तोंद बजाता
गाल फुलाता
पाखंड भरे गुस्‍से से
शेखी से रोता रोना
अपने ना पूछे जाने का
सार्वजनिक तौर पर कोसता
अपने अदृश्‍य शत्रुओं को
और दृश्‍य शत्रुओं को सुरापान कराता
मुंहफट , दीवाना होने का नाटक सा करता
कि आंखों की तरेर से चलताउ काम करवाता
सोचता
कि सोच चुका सारा
अब कोंचना है
अपने विवेक को
बस कोंचते जाना है
कि अब कोई श्री या अकादमी या पीठ
मिले ना मिले
ठेंगे से
कि अब वही है साक्षात
घटोत्‍कची वारिस
तमाम
पुरस्‍कारों, सम्‍मानों, उपाधियों का
कि चतुर्दिक घेरें वे उसे
नहीं तो मरकर भी
मार डालेगा वह
न जाने कितनी अक्षौहिणी जन सेनाओं को
कि डम डम डम …
अब इस प्रण से उसे
नहीं सकता कोई डिगा …।

>गीदड़ की बहादुरी – बाल कथा – कुमार मुकुल

जून 7, 2009

>एक बार गीदड़ों की एक बैठक चल रही थी। जंगल के अपने-अपने अनुभवों की सब बारी-बारी से चर्चा कर रहे थे। एक गीदड़ ने कहा, देखो मैं तो देखता रहता हूं। जब शेरनी अपने बच्चों के साथ पानी पीने नदी की ओर जाती है, तब मैं उसके शिकार पर हाथ मार लेता हूं’ दूसरे गीदड़ ने कहा, ‘मैं तो बस शाम होते ही जंगल से लगी झाड़ियों में दुबक जाता हूं। कोई-न-कोई खरगोश हाथ आ ही जाता है।’
इस बीच एक युवा गीदड़ अपनी पूंछ ऐंठता आया और बोला, ‘मुझे तो शेर मिले, तो उसे भी दूं एक पटखनी।’
‘क्या!’ सभी गीदड़ एक स्वर में बोले, ‘नहीं सच में! शेर से लड़ने के लिए किसी हथियार की जरूरत नहीं है। बस जरा अपनी आंखें लाल करनी है। जरा मूछों को कड़ा करना है और उस पर छलांग मारकर उसे दबोच लेना है।’
गीदड़ अपनी चालाकी का वर्णन अभी कर ही रहा था कि शेर की दहाड़ सुनाई पड़ी। दहाड़ सुनकर सभी गीदड़ भाग खड़े हुए। पर वह गीदड जो अपनी ताकत का बखान कर रहा था, वहीं खड़ा रहा। गीदड़ को रास्ते में अकड़ते देख शेर को बड़ा गुस्सा आया। उसने उसके पास जाकर जोर की दहाड़ लगीयी। तब गीदड़ ने भी अपना चेहरा कड़ा किया और दहाड़ने की कोशिश की। पर उसकी दहाड़ रोने में बदल गयी। शेर को उसकी हालत पर आश्चर्य हुआ। उसने पूछा, ‘यह क्या पागलपन है। भाग यहां से।’ फिर भी गीदड़ वहीं डटा रहा तो शेर ने उसे एक झापड़ रसीद किया। गीदड़ झाड़ियों में अपने साथियों के पास जा गिरा। वहां गीदड़ों ने उसे घेर लिया और कहा, ‘वाह! आखिर शेर से भिड़ ही गये। पर शेर ने तुमसे क्या कहा। वह दहाड़ क्यों रहा था?’
गीदड़ ने कहा, ‘वह धमका रहा था कि चल भाग यहां से। नहीं तो खुदा के पास पहुंचा दूंगा। पर मैंने भी डांटा कि अब जंगल में तुम्हारा राज ज्यादा नहीं चलने को।’
‘पर तुम रो क्यों रहे थे।’ बीच में एक गीदड़ ने पूछा। ‘मूर्ख मैं रो नहीं रहा था। इसी बीच उसने मुझे यहां फेंक दिया। नहीं तो बच्चू को आज मजा ही चखा देता।’ आगे उसने कहा, ‘अभी मेरी आंखें जरा लाल नहीं हुई थी और मूंछे थोड़ी और कड़ी करनी थी। फिर देखते कि कौन टिकता।’
तभी शेर उसी रास्ते से लौटता दिखा। उसे देख गीदड़ फिर उसके रास्ते मे आ गया। शेर ने कहा, ‘पागल हो गये हो। मरने का इरादा है।’ गीदड़ ने निर्भीकता से कहा, ‘नहीं मैं तो आपकी तरह आंखें लाल कर पंजे चौड़े करने की कोशिश कर रहा हूं, ताकि शिकार में आपकी कुछ मदद कर सकूं।’ ‘क्या शेर ने उस गीदड़ की गर्दन दबोच कर उसे ऊपर उछाल दिया। गीदड़ नीचे गिरा तो उसके प्राण-पखेरू उड़ चुके थे।
इस घटना के बाद बूढ़े गीदड़ ने बाकी गीदड़ों को समझाया, ‘ज्यादा शेखी अच्छी बात नहीं। मैंने उसे कितना समझाया था कि तुम बहादुर हो, शेर से मुकाबले की जगह कोई और काम करो। हमलोग गीदड़ हैं, और गीदड़ शेर का शिकार नहीं करते। पर वह माना नहीं। बेचारा।’