>कहीं पुलिस वाले तमाशा ना बना दें

>23-5-2009, शनिवार शाम पांच बजे कमानी सभागार के पास पहुंचा ही था कि रामजी यादव ने तलब किया फोन पर , कहां है मित्र। मैंने कहा बस पहुंच गया मंडी हाउस। तो उन्‍होंने कहा बस आ जाइए दूरदर्शन में। इतना सुनते ही मैंने चिढते हुए कहा- कहां यार, आ जाइए बाहर ही इंतजार करता हूं। तब तक वे फोन दूरदर्शन के ही अधिकारी कवि उद्भ्रांत को थमा चुके थे। वे बोले अरे आ जाइए,गेट पर मुझसे गेटकीपर से बात करा दीजिएगा। आज छुटटी थी। पर सामान्‍यत: मैं दूरदर्शन में जाने से बचता हूं। वहां कई परिचित मित्र हैं। उद्भ्रांत जी से साल भर से ज्‍यादा हो चुका था जब यहां मिला था उनके कमरे में। खैर गया भीतर, तो पता चला कि कल ही उनकी किताबों का लोकापर्ण हुआ था और अभी वे रामजीयादव की उसी पर तैयार रपट को छपने के लिए जहां तहां भिजवा रहे हैं। उनकी एकाध किताबें मैंने भी देखीं। उनकी रचनाओं में मैं अपनी गति ज्‍यादा नहीं पाता सो, फार्मल बातें कर रह गया। जब उन्‍हें पता चला कि मेरा भी एक ब्‍लाग है जो पढा जाता है तो अपनी कुछ चीजें मेल करवाईं मुझे भी। फिर हम बाहर निकले तो उन्‍होंने पूछा कि चलिए कहीं चाय वाय पी जाए, फिर पूछा कि कहां – तो राम जी यादव ने कहा कि आज हमलोग आपके डिसपोजल पर हैं , जहां ले चलिए। इस बीच वे जरा देर के लिए हमलोगों से छिटके तो साथ ही खडे पुष्‍पराज और रामजी ने हंसते हुए कहा आज कवि जी का कुछ खर्चा कराया जाए। पुष्‍पराज चाहते थे कि बंगाली मार्केट चला जाए, कुछ मिष्‍ठान्‍न लिया जाए। पर रामजी ने कहा कि अब जहां चलना हो यह उद्भ्रांत जी पर छोडें। इस बीच उद्भ्रांत जीने बताया कि उन्‍होंने किसी मामले में ज्ञानपीठ के संपादक रवीन्‍द्र कालिया पर मुकदमा कर दिया है। फिर पूछा कि आपलोग विहिस्‍की लेंगे …। तो पुष्‍पराज और मैंने इनकार कर दिया। तो रामजीयादव ने कहा कि अब मैं जो कहूं वही हो। पिछली बार डाक्‍टर विनय के गुरूदेव ने विहिस्‍की के दोतीन पैग पिला दिया था होटल में तब वह जरा भी नहीं चढी थी तो मुझे लगा कि विहिस्‍की चढती नहीं है, सो कहा कि चलिए मैं एक पैग लूंगा बस। अब उद्भ्रांतजी ने कनाट प्‍लेस की ही एक गली में अपनी कार मोडी और एक जगह टिका दी, जहां आगे लोगों ने मूत मूत कर दीवार तर कर दी थी। फिर इधर उधर डोलते हुए शराब की एक दुकान खोज निकाली। हमारी समझ में नही आ रहा था कि वे करना क्‍या चाहते हैं…। तब पांचसौ एमएल की एक बोतल लिए वो बाहर आए और बगल की गली से चने लेने लगे। हमलोगों को भूख लग आयी थी तो चना देख हमें चिढ आ रही थी पर जब डिसपोजल पर छोड दिया था रामजी यादव ने तो कोई करे क्‍या। फिर पानी सोडा आदि लेकर चारो जने करा में ही जा बैठे। सबसे छोटा पैग पुष्‍पराज को दबाव देकर दिया गया फिर मैंने एक छोटा पैग लिया बाकी दोनों ने बांटा। खाली पेट होने से वह छोटा पैग भी जल्‍दी ही चढने लगा। हल्‍का खुमार लगने लगा तो मेरे दिमाग ने सतर्कता की घंटी बजा दी, जैसा कि अमूमन होता है। फिर बची विहिस्‍की को बांटने की बात चली तो मैंने साफ इनकार कर दिया। इस बीच उद्भ्रांत जीने बताया कि रेवती रमण ने उनकी किताब पर जबरदस्‍त भूमिका लिखी है, कि मैं तो पढकर रोने लगा। फिर कुछ देर बार वे उस समीक्षा को याद कर वाकई रोने लगे। रामजीयादव गले लगलगकर उनसे बतियाने लगे थे अब। हम दोनों पीछे तो आपस में हंसे जा रहे थे उन्‍हें देखकर , चूंकि पुष्‍पराज दो घूंट लेने के बाद भी अछूत सा व्‍यवहार कर रहा था उनलोगों से। और बचकर जाना चाह रहा था , मैं भी जाना चाह रहा था पर रामजीयादव को मैंने कह रखा था कि आज अपने डेरे पर ले चलूंगा सो बैठना मेरी मजबूरी थी।इसी बीच रामजीयादव को नामव‍र सिंह की याद आ गयी। कल की गोष्‍ठी में वे भी उपस्थित थे तो उनकी चर्चा चल निकली। तब इसी बीच रामजीयादव ने नामवर जी को फोन लगा दिया और नमस्‍कार कर अपना बनारसी परिचय देते कहा- कि मैं भी आपके प्रशंसकों में हूं, इसी शहर में बारह साल से हूं पर अपने प्रिय आलोचक से कभी मिल नहीं पाया क्‍यों कि आप हमेशा अपने चाहनेवालों से ऐसे घिरे रहते हैं कि हिम्‍मत ही नही हुयी। नामवर जी ने कहा कि – ऐसा नहीं है, आपको जब मन हो आ जाइए। फिर तय हुआ कि कल आते हैं सुबह ग्‍यारह बजे। अब नामवर जी की हामी मिल गयी थी तो कुछ नशा तो ऐसे ही बढ जाना था सो दोनों जने ढाई सौएमएल की एक और उठा लाए बोतल। इस बार मैंन साथ नहीं दिया और पैग लेते लेते रामजीयादव को चढ गयी। पहले तो वे गलबहियां दे देकर बातें करने लगे उद्भ्रांत जी से फिर पेशाब करने बढ गए गाडी के आगे तो पंद्रह मिनट तक पेशाब ही करते रहे। मुझे रावण की याद आ गयी और मैंने सोचा कि लगता आज कैलाश यहीं टिकाना पडेगा । फिर कुछ देर में रामजीयावद को उल्टियां आने लगीं । अधिकांश खाया पीया निकल चुका तोमुझे राहत हुयी कि चलिए जो होना था सो यहीं हो हवा गया वर्ना मेरे डेरे पर तो तमाशा हो जाता। पर उनकी उल्‍टी रूक नहीं रही थी। तब वे पीछे की सीट पर जाकर सोगए। अब मैं जाने को बेताब था वहां से। पर उद्भ्रांतजी की चढी थी तो उनकी कहानी तो किसीने सुनी नहीं थीं तो उसके बिना नशा उतरे कैसे और गाडी चले कैसे…। मेरी बहुत रूचि थीं नही उनकी बातों में सो मैं टालता रहा। आखिर उन्‍होंने शेखी बघारते गाडी चलायी कि इस उम्र में भी मैं होश में हूं और यह रामजीयादव जरा सी ली नहीं कि यह हाल। आखिर कस्‍तूरबा गांधी मार्ग पर अमेरिकन एंबेसी के पास लगी पुलिस गाडी के पीछे उद्भ्रांत जीने गाडी रोकी। रूकने के बाद उन्‍हें अहसास हुआ कि गलत जगह गाडी रोकी उन्‍होंने। रामजी यादव सो चुके थे तो मैंने उन्‍हें जगा कि भैया चलो देखें बस मिलती है कि नहीं। पर बाहर आते ही उन्‍हें फिर उल्‍टी आने लगी पेट में कुछ था नहीं सो बस ओ ओ कर रहे थे। वहीं सामने चार पुलिसवाले खडे थे आसपास, परवे ध्‍यान नहीं दे रहे थे। पर उद्भ्रांत जी को स्थिति उचित नहीं लग रही थी। सो वे वहां से आगे बढ गये कही पान वान खाने । बार बार वे पीछ मुड कर देखते जाते थे। तभी पुलिस वाले को यह बोध हुआ कि गाडी सडक पर कुछ बीच में लगी है, तो मैं उद्भ्रांत जी को खोजने चला कि गाडी हटवायी जाए वहां से। उधर रामजीयादव ओ ओ किए जा रहे थे। मुझे लगा कि कहीं पुलिस वाले तमाशा ना बना दें।मैं कुछ ही दूर गया था कि एक पुलिसवाला लपका मेरे पीछे आया कि आप कहां चले जा रहे हैं गाडी छोडकर। यह अमेरिकन एंबेसी है इसके आगे इस तरह गाडी नहीं खडी कर सकते आप। मैंने कहा भईया , गाडी वाले को ही ढूंढने जारहे हैं, पर उद्भ्रांत कहीं दिखनहीं रहे थे। तो पुलिस वाले ने मेरी बांह पकड कहा चलिए आप गाडी के पास। तब मैंने कहा कि हम सब पत्रकार हैं। यहीं हिन्‍दुस्‍तान में काम करते हैं। सोचा कुछ होगा तो हिन्‍दुस्‍तान से कुछ लोगों को बुलाया जाएगा,वहां दर्जन भर परिचितों में कोई तो होगा ही। पर वह मूढ समझ रहा था कि हम गाडी छोड भाग रहे हैं। खैर उद्भ्रांत उसी समय पान चुभलाते आते दिख गए। उन्‍होंने जब देख दूर से कि मामला बिगडा लगा रहा है , तो आते ही रामजीयादव की ओर ईशारा करते बोले कि यह आदमी पिए हुए है,फिर रामजीयादव कोडांटा कि जाओ घर जाओ। घबरा गयेथे वो। मैं रामजीयादव का हाथ पकडे था, पर वे बार बार पुलिसवाले की ओर लपक रहे थे यह बोलते हुए कि यह अमेरिका है कि हिन्‍दुस्‍तान, कि तू कहा के हव, भाई जी , यूपी के ही ना, हम भी कानपुर के हैं। पुलिस वाला अपने को छुडाता हंस रहा था। खैर मैंने खींच कर रामजीयादव को अलग किया कि कहीं वास्‍तव में तमाशा ना हो जाए। आखिर उद्भ्रांत गए और हम बस का इंतजार करने लगे। जिस तरह रामजीयादव डोल रहे थे तो हमने एक आटो को हाथ दिया। सौ रूपये में उसने कटवरिया सराय जाना तय किया। कटवरिया में आटो से उतरकर रामजीयादव को फिर उबकाई आने लगी। मुझे चिढ होने लगी कि यह क्‍या ससुरा औरतों की तरह ओ ओ किए जा रहा है। उनका वजन मुझसे ज्‍यादा है नहीं तो कंधे पर डाल दूसरी मंजिल के अपने कमरे में ले जा पटकता। खैर खींच खांच कर उन्‍हें कमरे तक ले आया। खाली बिडावन पर लिटा दिया। कुछ देर बार उनका जुता खींच कर उतारा हिन्‍दी फिल्‍म की नायिकाओं की तरह। फिर दो ब्रेड सेंक जैम लगा खाकर सो गया दूसरे कमरे में। सुबह चार बजे रामजीयादव की नींद खुली तो पेशाबखाने से बाहर आ बोले भईवा चाय बनाव।

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