मई 2009 के लिए पुरालेख

>यतीमी की एक रात – कहानी

मई 27, 2009

>
चांद एक कांइया कुत्‍ते की तरह मेरे पीछे पडा था। और मेरी आत्‍मा की रोटी पर झपाटे मार रहा था। मैं चिंथा जा रहा था। यह यतीमी की एक रात थी, जो लैम्‍पपोस्‍टों के तीखे प्रकाश में हनुमान मंदिर के अहाते में बीत रही थी। यह विवेकानंद और सुभाष का समय नहीं था जब भागने के लिए पूरी जमीन होती थी, जंगल होते थे, सूने पार्क और सूनी स‍डकें होती थीं। नदियों के कछार, पेड, पहाड होते थे। …सब अभयारण्‍य बन चुके हैं। अब कंकरीट के जंगल में लोग पत्‍तों की तरह भरे पडे हैं। एक दूसरे के हिस्‍से की धूप खाते लोग। अपनी अपनी पीडाओं की काई पर पछाड खाते लोग। पर उस छण युग की चिंताओं से बडी हो गयी थीं अस्तित्‍वहीनता की पीडाएं और पहले मैं लडा था,पर जमीन अपनी नहीं होने की नैतिकता में घर छोड दिया था मैंने।
तुम मेरे टुकडों पर पलते हो- यही कहा होगा पिता ने। समझा रहे थे आलोक दो। हर बाप यही कहता है। जाओ, उससे कहो कि यह शरीर भी उसका है। ओर इस उप-उत्‍पादन को तुम्‍हारे आनंद ने नहीं समय की दुश्चिंताओं ने पाला है। लौट जाओ-यह शरतचन्‍द्र के देवदास का युग नहीं। तुम्‍हारी उम्र तेरह-चौदह की नहीं। तुम अकेले भी नहीं। तुम्‍हारी पत्‍नी है। और किसी के लिए नहीं तो अपनी सहकर्मिणी की पीडाओं के लिए लौट जाओ।

यह जानते हुए भी कि अभी मैं लौट नहीं पाउंगा। मैंने उन्‍हें लौटने का विश्‍वास दिलाया और स्‍टेशन आ गया। यूं अपनी कल्‍पनाओं में ते मैं लौट ही चुका था। इस लौटान ने मुझे थकाना शुरू कर दिया था। पास कुछ रूपये थे तो सोचा कि किसी होटल में कमरा ले लूं। पर इस तरह रूपये जाया करना ठीक नहीं लगा। मैं इधर उधर टहलने लगा। कई बार का देखा प्‍लेटफार्म आज बदला बदला सा लग रहा था। शायद एक घर और बिस्‍तर की गुंजाइश वहां ढूंढने की वजह से ऐसा हो रहा था। आज विश्‍वकर्मा पूजा थी। रेलवे स्‍टेशन के अहाते में भी एक मूर्ति थी। वहां भंगियों और कुलियों के लडके डिस्‍को-भांगडा कर रहे थे। एक मुस्लिम युवक भी सा‍थ साथ ताल दे रहा था। कुछ देर मैं नाच देखता रहा, साथ इधर उधर भी देख लेता कि जेब ना कट जाए।
तभी उधर से कुछ सादे कुछ वर्दी में पुलिस वाले गुजरे। उनमें एक ने नाचते लौंडे पर सिक्‍के फेंके, जिनमें कुछ भगवान के चरणों में जा गिरे। फिर एक मिलिट्रीमेन आया और तटस्‍थ भाव से सिर झुका कर चल गया।
अब मैं आगे बढा। ए.एच.व्‍हीलर की दुकान के आगे काफी लोग सो रहे थे। पर वहां उमस थी। बाहर छोटे से पार्क में लोग बिखरे बिखरे सो रहे थे। मैंने सोचा कि सोया जाए यहीं फिर मच्‍छरों का ख्‍याल कर मैं मंदिर की ओर बढ गया। भूख लग रही थी। नमरी के सिवा पांच-सात रूपये खुदरा थे। सोचा इतने में घर लौट जाना है। सो तीन रूपये के दो उबले अंडे खाए, बगल की चाट की दुकान से पानी पीया और मंदिर के हाते में बने सीढीनुमा बैठके पर बैठ गया। आहाते में लोग ठुंसे सो रहे थे।

कुछ देर बाद अधेड खिचडी चेहरे वाला एक व्‍यक्ति मेरे पास चुके मुके बैठ गया। फिर बोला – यहां नींद कैसे आ जाती है…। वह मेरी ही ओर मुखातिब था। तो मैंने कहा – हां , कष्‍ट है , पर लोग सो ही लेते हैं। उसके वक्‍तव्‍य की प्रासंगिकता पर मुझे संदेह हुआ, कि कहीं पाकेटमार तो नहीं। तब तक बंदरों की तरह उछलता वह दूसरी ओर बढ गया। तब पीछे बैठा व्‍यक्ति बोला – देख रहे हैं वह बूढा केवल नौजवानों से बतिया रहा है। बात मेरी समझ में नहीं आयी। उसने फिर कहा – अरे , दलाल है, साले नींद की चिंता करते हैं। यह रात भर यूं ही घूमता पटठे फंसाता फिरेगा।
मैं थका था। नींद तेजी से आ रही थी। पैर फैलाने की भी जगह नहीं थी। इसीलिए वह बूढा मुझे करूणा का प्रतीक लग रहा था।
मंदिर की रात्री डयूटी का सिपाही लाठी फटकारता घूम रहा था। साढे ग्‍यारह बज रहे थे। मंदिर के पट बंद होने का समय हो चला था। घंटे- घडियाल के साथ आख्रिरी अरदास शुरू हुयी। पहले बडा पट धीरे धीरे बंद हुआ । फिर छोटा पट औंर अंत में कम्‍प्‍यूटर चालित तुलसी के दोहों का लिखा जाता लाल पट भी काला पड गया। और भगवान सो गए। अब पहरेदार ने बेंत से कोंच कर कुछ फटेहाल लोगों को उठाना शुरू किया। जा भाग- भाग प्‍लेटफार्म पर। ये पाकेटमार व अन्‍य धंधेबाज थे। हो सकता है खुद को जगाने की डयूटी वे इस पहरूए को दे गए हों। फिर वह पहरेदार पास आकर बोला आप क्‍यों बैठे हैं…। जगह नहीं मिल रही क्‍या …। देखिए सोए आदमी के बगल में बैठना अपराध है। जाइए आप लोग तो शरीफ आदमी हैं,आप ही सब के लिए तो जगह खाली करायी है। उधर लेट जाइए। मैं उठता तब-तक वह आगे बढ गया। आस पास चर्चा छिड गयी कि ऐसा वैसा कोई कानून है भी या नहीं। तय हुआ कि कानून है, पर क्‍या हम चोर हैं, उन्‍हीं ससुरों के चलते तो रतजगी कर रहे हैं। तभी कोई चिल्‍ला उठा – चोर, चोर। भगदड मच गयी। काफी लोग जग गए। कोई भागता सडक पर पकडा गया। एक काला बूढा अधनंगा आदमी था, चप्‍प्‍ल चुराता पकडा गया था। भगदड में खाली जगह देख मैं लेट गया। अपना छोटा सा हैंड बैग सर के नीचे रख सोने की कोशिश करने लगा। संगमरमरी स्‍लेट पर आध घंटे सोने के बाद थकान मिट गई, और नींद खुल गयी। सामने खंबे की ओट से चांद उपर आ रहा था। उसकी गति काफी धीमी लग रही थी, मानो मुझ पर निगाह रखे हो। आजिज आकर मैं घर से भागने की स्थितियों पर विचार करने लगा। तमाम घटनाओं के अक्‍श चांद में उभरने लगे। पिता,बहन,बहनोई,भाई, मां और मैं। चीखते-चिल्‍लाते सब। सबके उपर चिचियाता मैं। ओह कैसी आदिम-‍इयत थी। क्रोध में मैंने मां-पिता को धक्‍का दे दिया था।ओह , मेरे हाथ सलामत हैं, किसी का भी शाप नहीं लगा मुझे। श्राप नहीं लगा करते कलयुग में। कैसे हतप्रभ थे पिता , मेरी वाचालता , मेरी उदंडता पर। पूजा से उठे वे अगरबत्‍ती दिखा रहे थे और उबल पडा था मैं। उनके पवित्रतम क्षणों में मैंने यह भददी हरकत की थी। अवश, अवाक थे वो। उनकी आंखों में चढता रक्‍त उनकी नजर को धुंधला कर रहा था। अपने उग्रतम क्षणों में कितने निरीह थे वो।
पर वर्षों से हो रहा मेरा मानसिक उत्‍पीडन। जाने कब से मैं खुद को यतीम, टुअर समझने लगा था। ऐसे में मेरे वो उन्‍मुक्‍त ठहाके और उन्‍हें नम करता पडोस के चाचा जी का वात्‍सल्‍य। और चाची मां। कभी बेटा तो नहीं कहा- पर उन्‍हें देख सदा मैं बछडे सा हुमकात था। और उनकी सजल आंखों में गाय की पूंछ हिलने लगती थी। फिर मोनू की छोटी सच्‍ची जिदें, गोलू की मुझे परखती चुप्‍पी, बबली का बेधडक मेरा स्‍क्रू ढीला बतलाना और गुडिया का कुछ करने की उमंग में आधी बातें भीतर ही रख लेना। तो क्‍या अपने अनाथाश्रम के मालिकों की खातिर अपने माता , पिता , भाई-बहनों की इस दूसरी दुनिया का त्‍याग कर दूं मैं।
पर पता नहीं क्‍यों इन और ऐसी तमाम पीडाओं का वजूद पिता की आंखों की अवशता के आगे कांपने लगता है। पिता-पिता-पिता:पुत्र-पुत्र-पुत्र , एक बीज वृक्ष। अपना हृदय खोलो पिता, फैलाओ उसे कि अंकुर फेंक सकूं मैं। अचानक क्रम भंग हुआ। मैं उठा और टिकट काउंटर की ओर बढा कि प्‍लेटफार्म टिकट ले दो घंटे भीतर टहल सकूं। प दो बज गए थे और वह बंद हो चुका था। कोई गाडी नहीं थी। व्‍हीलर की दुकान बंद हो चुकी थी। उसके आगे किताबें पसार एक व्‍यक्ति बैठा था। भकोसे सी सूरतें लिए कुछ औरतें अपनी नींद के खरीददारों के साथ अंदर-बाहर कर रही थीं। मैं लौट गया। मेरी जगह खाली थी। चार बजे मैं जगा और टेम्‍पो की खोज में टहलने लगा। पांच बजे तक टहलता रहा। तब टेम्‍पो मिला। अंधेरा छंट रहा था। सोचा इतना सबेरे घर पहुंचना ठीक नहीं। लोग सोचेंगे, जैसे तैसे रात काट भागा आ रहा है। सो बीच में चिडियाखाने पर ही उतर आया। भीतर काफी लोग टहल रहे थे।, लडके जागिंग कर रहे थे। एक बेंच पर बैठ गया मैं। किरणें फूट रही थीं। और अंधकार वृक्षों की शरण ले रहा था। आखिर वह पत्‍तों में सिमटता गया और मैं आगे बढता रहा। पोलो के मैदान में बच्‍चे फुटबाल खेल रहे थे। खेलने का जी हुआ मेरा भी पर आगे बढ गया मैं। एक युवक हिरणी को घास खिला रहा था। मैंने भी उसकी पीठ सहलाई फिर घास उखाडकर खिलाया। छूछे सहलाना उसे रास नहीं आ रहा था। फिर सडक पर आया मैं। एक आश्‍वासन की तरह सूर्य मेरी पीठ पर उग रहा था। घर के निकट पार्क में पिता टहल रहे थे। वो मेरी ही ओर आ रहे थे। मैंने सोचा- कुछ बोलेंगे तो चुप-चाप लौट जाउंगा। फिर उनका अवश चेहरा याद आया। अब वे पास आचुके थे। नजरें मिलीं , वे रूके और बोले- कहां चले गए थे। मेरी आंखों में आंसू उबल पडे। चुप-चाप साथ हो गया मैं। पिता ने तमाम बातें कहीं- मैं चुप रहा। घर पास आ रहा था। पडोसी सोच रहे होंगे। पिता हमें ढूंढ कर ला रहे हैं। मैं सोच रहा था- पिता खो गए थे, खो गया था उनका वात्‍सल्‍य। क्‍या मां को भी इसी तरह खोज सकूंगा मैं। और बहनों को भी।
सामने की छत पर पडोसन हमारे भाग जाने की खुशी और जल्‍दी लौट आने का गम छुपाती तटस्‍थता दिखा रही थी। मेरा युवा पडोसी बगलें झांक रहा है- मैं उससे पूछता हूं, क्‍या हाल है…। घर पर सब मुस्‍करा रहे थे। मैं सीधा शयन कक्ष पहुंचा- पत्‍नी रो रही थी। मिले-पूछा पेखी हुयी। बराबर हो हम हमाम पहुंचे। जैसे कुछ हुआ ही न हो। नहा खाकर सो गया मैं। पीठ पर धूप पडी तो एंठिया लेता तरनाता जगा , जैसे पालने में सोया होउं।

कहानी द पब्लिक एजेंडा में प्रकाशित हो चुकी है

>कहीं पुलिस वाले तमाशा ना बना दें

मई 26, 2009

>23-5-2009, शनिवार शाम पांच बजे कमानी सभागार के पास पहुंचा ही था कि रामजी यादव ने तलब किया फोन पर , कहां है मित्र। मैंने कहा बस पहुंच गया मंडी हाउस। तो उन्‍होंने कहा बस आ जाइए दूरदर्शन में। इतना सुनते ही मैंने चिढते हुए कहा- कहां यार, आ जाइए बाहर ही इंतजार करता हूं। तब तक वे फोन दूरदर्शन के ही अधिकारी कवि उद्भ्रांत को थमा चुके थे। वे बोले अरे आ जाइए,गेट पर मुझसे गेटकीपर से बात करा दीजिएगा। आज छुटटी थी। पर सामान्‍यत: मैं दूरदर्शन में जाने से बचता हूं। वहां कई परिचित मित्र हैं। उद्भ्रांत जी से साल भर से ज्‍यादा हो चुका था जब यहां मिला था उनके कमरे में। खैर गया भीतर, तो पता चला कि कल ही उनकी किताबों का लोकापर्ण हुआ था और अभी वे रामजीयादव की उसी पर तैयार रपट को छपने के लिए जहां तहां भिजवा रहे हैं। उनकी एकाध किताबें मैंने भी देखीं। उनकी रचनाओं में मैं अपनी गति ज्‍यादा नहीं पाता सो, फार्मल बातें कर रह गया। जब उन्‍हें पता चला कि मेरा भी एक ब्‍लाग है जो पढा जाता है तो अपनी कुछ चीजें मेल करवाईं मुझे भी। फिर हम बाहर निकले तो उन्‍होंने पूछा कि चलिए कहीं चाय वाय पी जाए, फिर पूछा कि कहां – तो राम जी यादव ने कहा कि आज हमलोग आपके डिसपोजल पर हैं , जहां ले चलिए। इस बीच वे जरा देर के लिए हमलोगों से छिटके तो साथ ही खडे पुष्‍पराज और रामजी ने हंसते हुए कहा आज कवि जी का कुछ खर्चा कराया जाए। पुष्‍पराज चाहते थे कि बंगाली मार्केट चला जाए, कुछ मिष्‍ठान्‍न लिया जाए। पर रामजी ने कहा कि अब जहां चलना हो यह उद्भ्रांत जी पर छोडें। इस बीच उद्भ्रांत जीने बताया कि उन्‍होंने किसी मामले में ज्ञानपीठ के संपादक रवीन्‍द्र कालिया पर मुकदमा कर दिया है। फिर पूछा कि आपलोग विहिस्‍की लेंगे …। तो पुष्‍पराज और मैंने इनकार कर दिया। तो रामजीयादव ने कहा कि अब मैं जो कहूं वही हो। पिछली बार डाक्‍टर विनय के गुरूदेव ने विहिस्‍की के दोतीन पैग पिला दिया था होटल में तब वह जरा भी नहीं चढी थी तो मुझे लगा कि विहिस्‍की चढती नहीं है, सो कहा कि चलिए मैं एक पैग लूंगा बस। अब उद्भ्रांतजी ने कनाट प्‍लेस की ही एक गली में अपनी कार मोडी और एक जगह टिका दी, जहां आगे लोगों ने मूत मूत कर दीवार तर कर दी थी। फिर इधर उधर डोलते हुए शराब की एक दुकान खोज निकाली। हमारी समझ में नही आ रहा था कि वे करना क्‍या चाहते हैं…। तब पांचसौ एमएल की एक बोतल लिए वो बाहर आए और बगल की गली से चने लेने लगे। हमलोगों को भूख लग आयी थी तो चना देख हमें चिढ आ रही थी पर जब डिसपोजल पर छोड दिया था रामजी यादव ने तो कोई करे क्‍या। फिर पानी सोडा आदि लेकर चारो जने करा में ही जा बैठे। सबसे छोटा पैग पुष्‍पराज को दबाव देकर दिया गया फिर मैंने एक छोटा पैग लिया बाकी दोनों ने बांटा। खाली पेट होने से वह छोटा पैग भी जल्‍दी ही चढने लगा। हल्‍का खुमार लगने लगा तो मेरे दिमाग ने सतर्कता की घंटी बजा दी, जैसा कि अमूमन होता है। फिर बची विहिस्‍की को बांटने की बात चली तो मैंने साफ इनकार कर दिया। इस बीच उद्भ्रांत जीने बताया कि रेवती रमण ने उनकी किताब पर जबरदस्‍त भूमिका लिखी है, कि मैं तो पढकर रोने लगा। फिर कुछ देर बार वे उस समीक्षा को याद कर वाकई रोने लगे। रामजीयादव गले लगलगकर उनसे बतियाने लगे थे अब। हम दोनों पीछे तो आपस में हंसे जा रहे थे उन्‍हें देखकर , चूंकि पुष्‍पराज दो घूंट लेने के बाद भी अछूत सा व्‍यवहार कर रहा था उनलोगों से। और बचकर जाना चाह रहा था , मैं भी जाना चाह रहा था पर रामजीयादव को मैंने कह रखा था कि आज अपने डेरे पर ले चलूंगा सो बैठना मेरी मजबूरी थी।इसी बीच रामजीयादव को नामव‍र सिंह की याद आ गयी। कल की गोष्‍ठी में वे भी उपस्थित थे तो उनकी चर्चा चल निकली। तब इसी बीच रामजीयादव ने नामवर जी को फोन लगा दिया और नमस्‍कार कर अपना बनारसी परिचय देते कहा- कि मैं भी आपके प्रशंसकों में हूं, इसी शहर में बारह साल से हूं पर अपने प्रिय आलोचक से कभी मिल नहीं पाया क्‍यों कि आप हमेशा अपने चाहनेवालों से ऐसे घिरे रहते हैं कि हिम्‍मत ही नही हुयी। नामवर जी ने कहा कि – ऐसा नहीं है, आपको जब मन हो आ जाइए। फिर तय हुआ कि कल आते हैं सुबह ग्‍यारह बजे। अब नामवर जी की हामी मिल गयी थी तो कुछ नशा तो ऐसे ही बढ जाना था सो दोनों जने ढाई सौएमएल की एक और उठा लाए बोतल। इस बार मैंन साथ नहीं दिया और पैग लेते लेते रामजीयादव को चढ गयी। पहले तो वे गलबहियां दे देकर बातें करने लगे उद्भ्रांत जी से फिर पेशाब करने बढ गए गाडी के आगे तो पंद्रह मिनट तक पेशाब ही करते रहे। मुझे रावण की याद आ गयी और मैंने सोचा कि लगता आज कैलाश यहीं टिकाना पडेगा । फिर कुछ देर में रामजीयावद को उल्टियां आने लगीं । अधिकांश खाया पीया निकल चुका तोमुझे राहत हुयी कि चलिए जो होना था सो यहीं हो हवा गया वर्ना मेरे डेरे पर तो तमाशा हो जाता। पर उनकी उल्‍टी रूक नहीं रही थी। तब वे पीछे की सीट पर जाकर सोगए। अब मैं जाने को बेताब था वहां से। पर उद्भ्रांतजी की चढी थी तो उनकी कहानी तो किसीने सुनी नहीं थीं तो उसके बिना नशा उतरे कैसे और गाडी चले कैसे…। मेरी बहुत रूचि थीं नही उनकी बातों में सो मैं टालता रहा। आखिर उन्‍होंने शेखी बघारते गाडी चलायी कि इस उम्र में भी मैं होश में हूं और यह रामजीयादव जरा सी ली नहीं कि यह हाल। आखिर कस्‍तूरबा गांधी मार्ग पर अमेरिकन एंबेसी के पास लगी पुलिस गाडी के पीछे उद्भ्रांत जीने गाडी रोकी। रूकने के बाद उन्‍हें अहसास हुआ कि गलत जगह गाडी रोकी उन्‍होंने। रामजी यादव सो चुके थे तो मैंने उन्‍हें जगा कि भैया चलो देखें बस मिलती है कि नहीं। पर बाहर आते ही उन्‍हें फिर उल्‍टी आने लगी पेट में कुछ था नहीं सो बस ओ ओ कर रहे थे। वहीं सामने चार पुलिसवाले खडे थे आसपास, परवे ध्‍यान नहीं दे रहे थे। पर उद्भ्रांत जी को स्थिति उचित नहीं लग रही थी। सो वे वहां से आगे बढ गये कही पान वान खाने । बार बार वे पीछ मुड कर देखते जाते थे। तभी पुलिस वाले को यह बोध हुआ कि गाडी सडक पर कुछ बीच में लगी है, तो मैं उद्भ्रांत जी को खोजने चला कि गाडी हटवायी जाए वहां से। उधर रामजीयादव ओ ओ किए जा रहे थे। मुझे लगा कि कहीं पुलिस वाले तमाशा ना बना दें।मैं कुछ ही दूर गया था कि एक पुलिसवाला लपका मेरे पीछे आया कि आप कहां चले जा रहे हैं गाडी छोडकर। यह अमेरिकन एंबेसी है इसके आगे इस तरह गाडी नहीं खडी कर सकते आप। मैंने कहा भईया , गाडी वाले को ही ढूंढने जारहे हैं, पर उद्भ्रांत कहीं दिखनहीं रहे थे। तो पुलिस वाले ने मेरी बांह पकड कहा चलिए आप गाडी के पास। तब मैंने कहा कि हम सब पत्रकार हैं। यहीं हिन्‍दुस्‍तान में काम करते हैं। सोचा कुछ होगा तो हिन्‍दुस्‍तान से कुछ लोगों को बुलाया जाएगा,वहां दर्जन भर परिचितों में कोई तो होगा ही। पर वह मूढ समझ रहा था कि हम गाडी छोड भाग रहे हैं। खैर उद्भ्रांत उसी समय पान चुभलाते आते दिख गए। उन्‍होंने जब देख दूर से कि मामला बिगडा लगा रहा है , तो आते ही रामजीयादव की ओर ईशारा करते बोले कि यह आदमी पिए हुए है,फिर रामजीयादव कोडांटा कि जाओ घर जाओ। घबरा गयेथे वो। मैं रामजीयादव का हाथ पकडे था, पर वे बार बार पुलिसवाले की ओर लपक रहे थे यह बोलते हुए कि यह अमेरिका है कि हिन्‍दुस्‍तान, कि तू कहा के हव, भाई जी , यूपी के ही ना, हम भी कानपुर के हैं। पुलिस वाला अपने को छुडाता हंस रहा था। खैर मैंने खींच कर रामजीयादव को अलग किया कि कहीं वास्‍तव में तमाशा ना हो जाए। आखिर उद्भ्रांत गए और हम बस का इंतजार करने लगे। जिस तरह रामजीयादव डोल रहे थे तो हमने एक आटो को हाथ दिया। सौ रूपये में उसने कटवरिया सराय जाना तय किया। कटवरिया में आटो से उतरकर रामजीयादव को फिर उबकाई आने लगी। मुझे चिढ होने लगी कि यह क्‍या ससुरा औरतों की तरह ओ ओ किए जा रहा है। उनका वजन मुझसे ज्‍यादा है नहीं तो कंधे पर डाल दूसरी मंजिल के अपने कमरे में ले जा पटकता। खैर खींच खांच कर उन्‍हें कमरे तक ले आया। खाली बिडावन पर लिटा दिया। कुछ देर बार उनका जुता खींच कर उतारा हिन्‍दी फिल्‍म की नायिकाओं की तरह। फिर दो ब्रेड सेंक जैम लगा खाकर सो गया दूसरे कमरे में। सुबह चार बजे रामजीयादव की नींद खुली तो पेशाबखाने से बाहर आ बोले भईवा चाय बनाव।

>विषधारी मत डोल कि मेरा आसन बहुत कडा है

मई 25, 2009

>बचपन में पिता की टेबल पर जिन किताबों से मेरा साबका पडता था उनमें शेक्‍सपीयर के कम्‍पलीट वर्क्‍स के अलावे मुक्तिबोध की भूरी-भूरी खाक धूल,नामवर सिंह की दूसरी परंपरा की खोज के अलावा दिनकर की कविताओं का संकलन चक्रवाल भी एक था। शेक्‍सपीयर की सरल अंग्रेजी में लिखी कहानी नुमा नाटक जो कोर्स में भी चलता था , तो रट गया था मैं। चूंकि पिता अंग्रेजी शिक्षक थे तो इससे छुटटी भी नहीं थी। पर चोरी-चोरी मैं शेक्‍सपीयर की मूल किताब में रेप ऑफ ल्‍यूकेरिया या ऐसा ही कुछ नाम था उस नाटक का, को पढा करता था। नामवर सिंह की किताब में जो कवितांश थे बस उन्‍हें पढकर कुछ समझने की कोशिश करता , मुक्तिबोध तबतक समझ में आते नहीं थे पर दिनकर की तो दर्जनों रचनाएं कंठस्‍थ थीं। एक बटोही कविता थी , जिसकी पंक्तियां मैं तब गाता फिरता था-पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले। रश्मिरथी का तो बडा हिस्‍सा याद था। फिर व्‍याल विजय कविता तो मैं छत पर रातों में जोर जोर से अपनी फटी आवाज में गाया करता था। तब आज सा सघन शहर नहीं था और पिता जिला स्‍क्‍ूल में प्रिंसिपल थे तो उनके रसूख का फायदा मैं उठाकर इसतरह अपनी हेकडी जताया करता था। यूं भी क्‍वार्टर के सामने का विशाल खेल का मैदान और चांदनी रातें सहज गाने को प्रेरित करती थीं।बडें ही रोब से मैं कनफटी आवाज में गाता- विषधारी मत डोल कि मेरा आसन बहुत कडा है,कृष्‍ण आज लघुता में भी सांपों से बहुत बडा है…। पर वस्‍तुस्थिति यह थी कि तब मैं बहुत डरपोक था। इंटर में पढता था और शरीर से इतना कमजोर कि सोचता आगे कैसे जिंदगी कटेगी। दो तीन नाखूनों पर नेल पालिस कर उसमें चांद तोर बनाया करता। एकाध नाखून रंगने की आदत काफी बाद तक थी। एक बार आलोक धन्‍वा ने टोका कि यह क्‍या है मुकुल, तुम तो सांप पकडते हो। यह मउगों वाली आदत। शायद उसी के बाद यह आदत छोडी थी।उस समय शनिवार की छुटटी में गांव जाता तो प्‍लास्टिक के जूते पहनता था कि रात में दिशा मैदान जाते सांप ना काट ले। मेरे गांव में सांप भी बहुत निकलते थे वह भी सब गेहुंअन और दिन में विशालकाय धामिन। खेतों में जाते कभी कभी तो विचित्र दृश्‍य दिखता, कि एक सांप दूसरे को निगल रहा है। आधा उसके मुंह के भीतर है आधा बाहर। ऐसे में हम ईंट फेंकते तो सांप इधर उधर छिप जाता। अक्‍सर रात में कुछ सी सी की आवाज आती तो दादी चाची बोलती यह सांप बोल रहा है। कभी कभी कमरे में चूहे के बिल में सांप रहता तो हम टार्च से दख सहत जाते कि बाप रे ऐसा होता है गेंहुअन। एक बार एक नट ने गेंहुअन पकडा तो उसे छूकर देखा , वह ठंडा था।पर डर की स्थिति यह होती है कि बहुत देर तक हम किसी को डराए नहीं रख सकते। क्‍योंकि किसी को डराए रखने में उससे ज्‍यादा शक्ति खर्च होती है जि‍तना कि सामने वाले के डरे रहने में , इसलिए जल्‍द ही शक्ति संतुलन बिगड जाता है। डराने वाला अकड जाता है बंदूक ताने ताने और एक समय ऐसा आता है जब वह सरेंडर कर जाता है। इसीतरह जीवन में भी कोई डर लगातार नहीं टिक सकता। ब्‍लड कैंसर से अपने पिता की मौत देखकर अग्रज कवि पंकज सिंह ने एक अच्‍छी कविता लिखी है , जिसकी पहली पंक्ति है – समय को गुजरने देना चाहिए। अब वह कितना भी बुरा हो,उसे गुजरना ही है। डर कितना भी बलवान हो उसे भी मिटना ही है। और अक्‍सर बाजी पलटती है। बाहुबलियों में कई के किस्‍से हमने पढे अखबारों में जिनके साथ बचपन में अत्‍याचार किया गया वे आगे बहुबली कहलाए। तो मेरा सांपों के प्रति डर मी और अन्‍य डर भी समय के साथ गुजर गए। फिर उल्‍टा मैं ज्‍यादा निडर होता गया। बीए में जाते जाते सांपों से डरने की जगह मैं उन्‍हें पकडना सीख चुका था। अक्‍सर मैं छोटे सांप पकडता। उन्‍हें मैं पहचानता भी था बायोलाजी के छात्र होने के नाते। डर को दूर करने में ज्ञान की बडी भूमिका होती है। वैसे हाथ भर के ऐसे सांपों को जिन्‍हें मैं ठीक ठीक नहीं पहचानता था उन्‍हें मैं आसानी से खीचकर दूर फेंक देता था। और लोग मुझे बहादुर कहते। तो यह इंटर में कमजोर माने जाने का परिणाम था। एक बार जब मैं सहरसा में फुटबाल खेल रहा था तो काला सा एक सांप निकला तो मैंने उसे एंडी से कुचल कर मार डाला। हां उस समय मेरी फूर्ती का जवाब नहीं था। गांव के डहंडल कहाने वाले लडके भी मेरे मुकाबले नहीं टिकते थे तब। मेरे मुकाबले मेरा छोटा भाई आता था पर वह चालाकी का प्रयोग कर अक्‍सर बाल को आउट कर देता, इस पर मुझे बहुत गुस्‍सा आता। बैकी के रूप में जब मै गेंद लेकर बढता तो गोल कर चीखता वापस आता। ऐसे में सांप ससुरे की क्‍या बिसात … बेचारा।पर इस सब पर विचार करने का दौर भी तब आरंभ हो चुका था। मैं जानता था कि यह सही नहीं है। सांप निरीह हैं और उन्‍हें मारना बहादुरी नहीं है। तब वीरता शीर्षक कविता में मेरा यह भाव प्रकट भी हुआ था- जिसकी पहली पंक्ति थी- सर्प सर्प की चिल्‍लाहट सुन, लोग चारों ओर भागे, कुछ कायरों के अन्‍दर ,तब वीरता के भाव जागे। यह कायर मैं ही था। हंस में पिछले सालों छपी लंबी कविता घर तो यह मेरा है में भी सांपों के बारे में जो पारा है उसमें यह भाव व्‍यक्‍त हुआ है। तो सांपों को पकडने की आदत मेरी हीनता ग्रंथी का ही नतीजा थी। और सारे बहादुर इसी तरह की हीनता ग्रंथी के शिकार होते हैं। एक बार अग्रज पत्रकार मित्र और पडोसी श्रीकांत के घर के बाहर मैंने एक हरहरा ग्रास स्‍नेक देखा तो उसे पूछ से उठा कर उनके कमरे में चला गया तो वे चिल्‍ला पडे जोर से तो भागकर मैं बाहर आया और इस क्रम में उस सांप के काटे जाने से बचते हुए उसे फेंक दिया।इसी तरह एक बार मदन कश्‍यप के यहां सायकिल से जा रहा था तो रास्‍ते में एक संपोले को पकड के अपने छोटे से बैग में डाल चेन चढा दिया और कैरियर में दाब लिया पर वहां निकालने पर उसे मरा पाया। सोचता हूं तो पाता हूं कि इंटर के डरपोक लडके के डर किस तरह ताकत में बदलते गए। असल में सांपों को देख मेरे भीतर भी एक सांप सनसनाता हुआ अपने फन काढ खडा हो जाता है और इस तरह जहर जहर को काट देता है। पर ऐसा नहीं है कि सांपों को पकडने के क्रम में मैं सचेत नहीं रहता था। एक बार गांव में आंधी में आम चुनने भागा गया था तो साथ पानी भी पडा तो आम तो काफी चुने झोले भर पर चलने लगा तो सामने के खेत में खडे पीपल की ओर जाता एक बडा सा गेंहुअंन भागा जा रहा था तो मैं उसके पीछे लपका पर उसने मेरी आवाज सुन जब हाथ भर उंचा फन खडा कर दिया तो मेरी हिम्‍मत जवाब दे गयी और मैं भाग कर मेड पर आ गया। बाद में चाचा के लडके प्रभात ने बताया कि उस सूखे पीपल पर यह सांप सालों से रहता है। उसी समय एक बनगोह दिख गया पास से गुजरता तो सांप से डर का जो शर्म पैदा हो गयी थी उसे धोने के लिए मैं हु ले ले करता उसके पीछे भागा …

>अपने बारे में सोचता हूं

मई 25, 2009

>अपने बारे में सोचता हूं कि क्‍या हूं तो देखता हूं कि मैं किसानी चेतना का आदमी हूं,झट से जमीन धर लेना चाहता हूं। दिल्‍ली में भी वही फूल पत्‍ते पत्‍थर मिटटी देखता ढूंढता रहता हूं। चलने से थक जाता हूं तो दौडना चाहता हूं भाग लेना चाहता हूं इस बेमकसद चलते रहने से। मैं क्‍या होना चाहता हूं इस बारे में भी जब सोचता हूं तो पाता हूं कि जो हूं वह तो कभी होना चाहा नहीं। बचपन कोर्स में एक लेख पढा था किसी का खेती बाडी पर तो अपनी कापी में एक लेख लिखा था कि मैं पढा लिखा किसान होना चाहता हूं। पर कभी पिता को वह लेख या चिटठी पढा नहीं स‍का वह कापी ताखे पर पडी रह गयी। कडे प्रशासक रहे पिता के सामने जाने की हिम्‍मत ही नहीं हुयी तब। यूं जब पढने लिखने का दौर आया तो चाहा कि कुछ समाजसुधारक बनूं। मैंने हमेशा साहित्‍यकारों से समाजसेवियों को बडा पाया। गांधी नेहरू सुभाष आदि का भी महत्‍व उनके इसी रूप को लेकर है। इन्‍हें लेखको से महत्‍वपूर्ण माना सदा। इन्‍होंने किताबें भी लिखी जो लेखकों से कमतर नहीं साबित हुयीं।यूं जब कवि कहाने लगा तो पिता चाहते थे कि चिकित्‍सक होउं। पर नंबर इंटर साइंस में चारसौबीस आए। दो साल केवल गांव घूमा सिनेमा देखा सोन के बालू में लोटा बगीचा घूमा। पिता ने बाद में पूछा तो टका सा जवाब दे दिया कि जिंदगी भर पढाते रहे रामचरितमानस,दिनकर का चक्रवाल,गीता के स्थितप्रज्ञ के लक्षण तो डाक्‍टर कहां से बन जाउं। बाद में होमियोपैथी पढी अपनी रूची से जी भर तो लगा पिता की दबी ईच्‍छा को पूरी कर रहा होउं इस तरह।कवि होने या कहाने की कथा भी अजीब है। मेरे त‍ीन साथी थे सहरसा में राजेश आशिक,अच्‍युतानंद कर्ण और शैली। जब मैं बीए पोलिटिकल सायंस का छात्र था तो यही संगी थे। ये तीनों कविताएं करते थे अपने जाने में। मैं देखता कि इनकी क्षणिकाएं व लघुकथाएं उस समय के दैनिक प्रदीप आर्यावर्त में छपती हैं और ये सीना फुलाए घूमते हैं तो मैंने भी अखबार देखना शुरू किया। फिर जो वे लिखते थे उसे देख सोचा यही है कविता करना तो मैंने भी कुछ वैसा ही लिखकर भेज दिया अखबारों में। और यह मजेदार रहा कि मेरी पहली ही लघुकथा प्रदीप में छपी और उसके पारिश्रमिक के रूप में पंद्रह रूपये का मनिआर्डर भी आया पटना से। तो आज से पच्‍चीस साल पहले मिले इस पहली रचना पर मिले पारिश्रमिक ने जैसे मेरे भीतर लिखने की इस क्रिया को लेकर एक बदलाव ला दिया। बाकी क्षणिकाएं भी छपीं। फिर पढने लिखने बहसने का लंबा दौर चला तो चीजें बदलती गयीं। आज लेखन की दुनिया में वे तीनों कहीं नहीं हैं। जबकि मेरे एमए करने के समय राजेश अखबारों में रपटें लिखता था उसके पिता भी प्रोफेसर के अलावे अखबार के संवाददाता भी थे। शैली ने ब्राहमण होकर एक राजपूत राजस्‍थानी लडकी से शादी की। फिर कोई एनजीओ आदि ज्‍वायन किया। पत्रकारिता भी की। लखनउ में मकान बना वहीं बस गया उसका पता अब नहीं है मेरे पास। अच्‍युता को मैट्रिक में वजीफा मिला था पर कविता ने उसे बरबार कर दिया ऐसा कहा जा सकता है। वह कविता तो अच्‍छी नहीं कर पाया इस चक्‍कर में बाकी बरबार कर लिया।

>भीम काका हरफनमौला चरित्र थे

मई 25, 2009

>क्रिकेट की भाषा में कहा जाए तो भीम काका हरफनमौला चरित्र थे कोई काम कठिन लग रहा हो तो हम उन्‍हें ही याद करते थे। मेरे पिता सहरसा जिला स्‍कूल में प्रिंसिपल थे और हम साल में गर्मी की छुट्टी में एक बार एक महीने के लिए गांव जाते थे। तब लौटते में हमारे साथ अनाज के दस पंद्रह बोरे होते थे तब अगर चाचा हमें छोडने नहीं जाते तो वह उतना सामान ले जाने की कल्‍पना ही नहीं कर पाते हम। पढाई क्‍या की थी उन्‍होंने पता नहीं , गांव के कैलाश तिवारी पहले से मिलिट्री में थे तो उन्‍हीं के साथ भाग कर मिलिट्री में बहाल हुए थे वे। हर समस्‍या का हल ढूंढने की विलक्षण क्षमता थी उनमें। वह हल अक्‍सर न्‍यायपूर्ण होता कभी कुछ उटपटांग भी होता पर उनकी बुद्धी की दाद तो देनी ही पडती थी।एक बार जब हमलोग गांव से अनाज के बोरे लाद कर घर जा रहे थे तो पडोस के गांव अखगांव से एक गर्भवती महिला भी चढी दर्द से एंठती और चांदी बाजार पहुंचते ना पहुंचते बस के धचके उसने बस में ही बच्‍चे को जन्‍म दे दिया। संयोग से उसने मेरे ही अनाज से भरे एक बोरे पर बच्‍चे को जन्‍म दिया था। उसे तो वही उतार दिया गया पर बोरा बुरी तर खूनमखून हो चुका था। हालांकि वह प्‍लास्टिक कोटेड था सो भीतर गंदगी नहीं गयी थी पर स्‍वाभाविक तौर पर मां नाक दाबे इधर उधर भागने लगी थी। पर चाचा जो खेती बारी करते थे वह मां के नाक दाबने से मिहनत से हुयी उपज को कैसे नष्‍ट कर देते। सो पटना जंक्‍शन पर उन्‍होंने इसका हल निकाल लिया और उसे लेजाकर पास के होटल में बेच डाला। पूछने पर दुकान वाले को उनका जवाब था कि मछली की भीगी टोकरी किसी ने रख दी थी बोरे पर।चाचा जबतक सहरसा रहते हम उनके आगे पीछे लगे रहते। तीन चार दिन बार उन्‍हें जाना होता तो हम रोने लगते । वह आदत आज भी गयी नहीं है किसी अपने से अनिच्‍छापूर्वक दूर होते वक्‍त आज भी आंखें भीग जाती हैं। ट्रेन में छोडते जाते वक्‍त कभी कभी साथ विनय भैया भी होते सांवले मछोले कद के गठीले वदन के,उनकी बांह की मछलियां आज भी खींचती हैं हमें। अक्‍सर वे अपनी पीठ पर हमें टहलने को कहते ,हम संतुलन साधते उनका बदन दबाते रहते यह आदत अब मुझे लग गयी है छोटे बेटे को बारह साल का है अक्‍सर मैं पीठ पर चलने को कहता हूं वह पीठ पर रहता है और मैं किताब उलटता रहता हूं। जब बेटा छोटा था तब उसे मेरी पीठ पर चलना मजेदार लगता था, क्‍यों कि उस समय जीवन जगत के उसके तमाम सवालों का जवाब भी मैं देता चलता था।तो जब चाचा और भैया जब हमलोगों के साथ होते तो हम दुनिया में किसी को गदानते ही थे कुछ। चाचा गोरे लंबे सोंटा जैसी देह वाले जवान और बडी मूंछों वाले मुझसे दस साल बडे चाचा के लडके विनय भैया। दोनों जने अपने कंधे पर एक एक तौलिया रखे रहते।

>भीम चाचा

मई 25, 2009

>भीम चाचा की जो याद हमेशा जेहन में रहती है उसमें वे कंधे पर चावल का बोरा लिए बस में चढाने चले आ रहे, गांव के प्रवेशद्वार पर, बांध की ढलान पर, जहां बस रूकती है। जब वे मिलिट्री में थे तो अक्‍सर घर में उनकी चिट्ठी आती रहती थी,एक बार जब अंतरदेशीय आया तो उसमें लिखा था कि उन्‍होंने बंदूक खरीद ली है,तब मैंने मां को कहा था कि उन्‍हें लिख दीजिए क‍ि अगली बार हवाई जहाज खरीद लें। मैं समझता था कि बंदूक के बाद अगली शै जहाज ही है जिसे खरीदा जाना चाहिए। वे कभी-कभार हवाई जहाज से यात्रा का जिक्र करते थे तो मैं समझता थाकि उसे भी खरीद सकते हैं वे।इंटर में पहली बार मैं अपने इलाके यानि आरा जिले में पढने के सिलसिले में आया था। महाराजा कालेज में नामांकन के बाद स्‍टेशन के पास ही पास के गांव के एक वकील साहब के लॉज में रहता था मैं भी। तब दो सौ रूपये महीने में मेरा काम चल जाता था। गांव से कभी-कभार चावल दाल आदि लाकर मेस में दे दिया करता था। तब चाचा रिटायर कर गये थे। गांव जाता तो वे कभी कभार अपनी बंदूक साफ करने का काम मुझे सौंप देते। शादी व्‍याह में भी उनकी बंदूक मैं ही चलाता। वे कंधे पर बट टिका उसे चलाने की सलाह देते पर मुझे हमेशा उसे उपर हाथ हवा में उठाकर चलाना अच्‍छा लगता,और जब बुलेट गोली मैं दागता तो कंधे जोश से कडे हो जाते। चाचा बताते कि इससे हाथी भी ढेर हो जाता है। गांव में रहता तो चाचा के साथ हारिल के शिकार पर जाता और उस बगुले के जो दिन में सोता रहता है पेड पर। उन बगुलों के पेट से कभी मछली निकलती काटने पर तो बडा मजा आता सोचता काश बडी मछली निकले तो मछली खाने का भी आनंद मिले। शादी व्‍याह में चूंकि मैं बंदूक लेकर चलता उनकी तो स्‍वाभाविक था कि किसी को कुछ समझता नहीं था। इससे अन्‍य लोगों को तो अंतर नहीं पडता था पर जो बदमाश किस्‍म के लोग होते वे चिढते,उन्‍हें मैं चुनौती की तरह लगता या फिर वे मुझे अपनी जमात में खींचना चाहते । पर पिता की छवि ऐसी थी कि वे ऐसा सोच नहीं पाते थे। ऐसे में ही एक बार मैं एक लंगडे से आदमी से उलझ गया बाद में पता चला कि वह उस इलाके में डकैती डालता था। झगडा हुआ तो अंत तक मैं अपनी जिद पर अडा रहा और उसे ही अंतत हटना पडा मामला क्‍या था याद नहीं आ रहा , छोटे मामा ने तब कहा था इ सब लुच्‍चा लहेंडा हवन स,एहनी से मुह ना लागे के।भीम काका लंबे गोरे खिलाडी आदमी थे। संदेश थाने पर जब बॉलीबाल का मैच होता तो नेट के पास स्‍ट्राइकर की जगह पर वे ही रहते और बहुत अच्‍छा शॉट मारते। मैं लंबा होते हुए भी उस जगह पर कभी अच्‍छा नहीं खेल पाया, लगता यह उनके अच्‍छा खेलने की वजह से पैदा हीनता बोध के चलते हुआ हो। यूं बीच वाली जगह से खेलना मुझे ज्‍यादा अच्‍छा लगता क्‍यों कि वहां से ताकत का प्रयोग मैं ज्‍यादा कर पता था, उस जगह से हुरमूठ की तरह खेलना आसान था। पर बाद में मैंने देखा कि सर्विस वाली जगह सबसे मुफीद है मेरे लिए। बाद में तो अक्‍सर सर्विस कर खेल को अंत में जीत लेना मेरी आदत बन गयी थी। अच्‍छी सर्विस मैंने विनोद चाचा से सीखी थी वे कद में छोटे थे पर नेट से सटा कर सर्विस देना या ऐन स्‍ट्रोक के वक्‍त शॉट की दिशा अचानक बदल कर धोखे से बॉल कहीं गिरा देने की कला मैंने उनसे ही सीखी थी।जब लॉज में मैं रहता था तब कामाख्‍या नाम का एक लडका वहां आता था जिसके पास अक्‍सर एक रिवाल्‍वर होती थी , हालांकि वह हमेशा सलीके से पेश आता था, पर मेरी टार्च कलम आदि वह अक्‍सर ले जाता और लौटाना भूल जाता तो लगता वह रिवाल्‍वर रखने के चलते समझता है कि उससे दी गयी चीज मांगी ही नहीं जा सकती। तो एक बार उसे डराने को एक शादी से लौटते वक्‍त भीम चाचा की बंदूक की गोलियां साथ लेता आया और कामाख्‍या को किसी बहाने दिखाया कि मेरे पास भी हथियार हैं, यह तरीका काम कर गया और आगे उसने मेरा सामान लौटा दिया।गांव में कभी कभार जब सोता तो चाचा का कट्टा और गोंलियां तकिए के नीचे लेकर सोचा। पर शादी और चिडिया मारने के अलावे कभी और किसी काम नहीं आयी बंदूक। चूंकि चाचा इलाके में लोकप्रिय थे और हर तबके के लोगों का समान सम्‍मान करते थे। मुस्लिम त्‍योंहारों में लाठी भांजने के खेल में भी हिस्‍सा लेते थे वे। गांव के मुसलमानों से उनकी दोस्‍ती थी, जिनसे वे मुझे भी मिलवाते। मिलिट्री में जाने से लगता है उनका अच्‍छा सामाजीकरण हुआ था पर उस सामाजीकरण का अच्‍छा उपयोग उन्‍होंने ही किया । गांव के मुखिया उनके लंगोटिया यार रहे हमेशा। एक बार मुखिया के साथ उन्‍होंने थाने में जाकर दारोगा की लाठियों से पिटाई कर दी थी। तब अंबिका स्‍वर्ण सिंह जो मंत्री थे उनकी ससुराल मुखिया के घर थी सो तमाम तमाशे के बाद भी पुलिस गांव में आकर चाचा को गिरफतार नहीं कर पायी। चाचा कुछ दिन गायब भी रहे । फिर केस चलता रहा।इस घटना के बाद तो चाचा हीरो हो गये इलाके में। उनके मरनी के काम में मुखिया, जो अब उस पद पर नहीं है,हमेशा हर काम में आगे रहे, सुरेश मास्‍टर साहब ने मजाक भी किया कि स्‍वर्ग में आपका भी पतरा पलटा रहा होगा और जल्‍दी ही बुलाया जाएगा तो सभी हंसने लगते थे। – जारी

>अपने लिए डायरी मैं कभी खरीद सकूंगा

मई 25, 2009

>डायरी : 26 – 2 – 1995 – पटनाआज चाचा ने डायरी दी है। नयी डायरी पाकर मुझे खुशी होती है। पर जब सोचता हूं कि इसमें क्‍या लिखूं तो पता नहीं चलता …। क्‍या लिखूं…। एक नई कविता लिखने की ईच्‍छा होती है पर कविता तुरत, कैसे लिखी जाए। पिछली बार चाचा से डायरी मांगी थी तो उन्‍होंने खरीद कर दी थी। इस बार लगता है पहले से व्‍यवस्‍था कर रखी थी। मैं एक अखबार का संपादकीय रोज लिखता हूं पर मुझे डायरी देने वाला कोई नहीं मिला। मुझे आज तक पता नहीं चला कौन लोग मुफ्त की डायरी बांटते हैं। और क्‍यों…। पहले पिता जी प्रिसीपल थे तो ढेरों सुंदर डा‍यरियां प्रकाशक दे जाते थे। पर उनके रिटायर के बाद कोई डायरी नहीं मिली पिछले कई सालों से। मैंने अपनी साली को एक डायरी खरीद कर दी थी 25 रूपये में। पिछले साल पत्‍नी को 12 रूपये की साधारण सी डायरी दी थी। पर खुद रद्दी कागज पर लिखता हूं। अपने लिए डायरी मैं कभी खरीद सकूंगा , शायद नहीं।

>यह कोई नया धर्म है शायद

मई 25, 2009

>मैं और केशव डीटीसी की बस में चढे और सात का टिकट ले कंडक्‍टर के आगे वाली सीट पर बैठ गया। केशव का साथ नया नया था तो हम लगातार पत्रकारिता,देश और राजनीति आदि पर बहस करते जा रहे थे। तभी मेरी सीट के पीछे से एक हाथ हमारे बीच बढा और बाइबिल की छोटी सी किताबनुमा कापी सामने दिखाई दी। एकाध सेकेंड की सोच विचार के बाद मैंने वह किताब ले ली। केशव भी हैरान सा देख रहा था । मुझे लगा कि पीछे कोई ईसाई धर्म का प्रचार‍क होगा। हमने उसे देखने की जहमत नहीं उठायी। बस किताब को उलटने पलटने लगा। चश्‍मा मैंने लगाया नहीं था सो किताब के छोटे अक्षर दिख नहीं रहे थे। बीस साल पहले एक दुकान से बाइबिल खरीदी थी मैंने और पढी भी थी सो इस किताब में रूचि नही थी। सो किताब उलटते हुए मैं सोच रहा था कि इसका क्‍या किया जाए। चूंकि घर ले जाने पर कचरे में बढोतरी होती । यूं ही समीक्षा का काम होने से किताबे जरूरत से ज्‍यादा आती रहती हैं ओर उन्‍हें मित्रों को देना पडता है। केशव की भी रूचि नहीं दिख रही थी मैंने पीछे मुडकर देखा और पहचानने की कोशिश की कि किसने यह किताब दी है।तो कंडक्‍टर सीधेपन से मुस्‍कराया। मैंने कहा कि यह किताब मैंने पढ रखी है यह मेरे पास है । किताब लेते हुए उसने कहा – यह कोई नया धर्म है शायद ,इसे वे फैलाना चाहते हैं, मैंने सोचा आपलोग पढने लिखने वाले लोग हैं शायद आपके किसी काम की हो। मैं हंसा। उसकी भोली मुखमुद्रा से लगा रहा था कि वह जताना चाह रहा है कि उसे सही गलत का अंदाजा नहीं कि मुझे किताब देकर उसने कोई गलती तो नहीं की। उसने बेमन से किताब रख ली। किसी प्रचारक ने उसे सौंप दी होगी अपनी डयूटी के तहत।

>सिगरेट और शराब की बाबत

मई 25, 2009

>परंपरागत सामंती राजपूत परिवार से आने के बावजूद पिता ने ठेठ वैष्‍णवी जीवन शैली कहां किसके प्रभाव में अपनाई इसका पता आज तक नहीं चल सका। जिला स्‍कूल,इंटरकालेज के प्रिसिपल पिता घर में भी हमेशा एक कड़क प्रिंसिपल ही बने रहे इसलिए कभी इन चीजों को लेकर संवाद नहीं हुआ। यूं जवार में एमए करने वाले वे पहले आदमी हैं और संभवत: पढाई लिखाई का परिणाम ही कहा जा सकता है इसे कि उन्‍होंने वैष्‍णवी रहन सहन अपना लिया। आज तक मेरे घर में मांस-मछली-अंडा नहीं बना,प्‍याज भी लड़-झगड़ कर ही हम खा पाते हैं, लहसुन को काफी बाद में मान्‍यता मिली , चाय जब वे भागलपुर से सहरसा गये तब शुरू की और वह भी वहां के दबाव में कि वहां प्रचलित था कि चाय नहीं पीने से यहां घेघा हो जाता है। ऐसे में सिगरेट और शराब की बाबत तो सोचा भी नहीं जा सकता।पिता सात भाई हैं। बाकी सब तमाम चीजों का सेवन करते हैं अन्‍य सामाजिकों की तरह। उन्‍हीं में किसी ने मांस खाना सिखाया तो किसी ने शराब चखा दी। हालांकि यह घर के आचरण का प्रभाव ही कहा जा सकता है कि मुझे आज भी ये चीजें पसंद नहीं है। मांस मछली पर भला किसे आपत्‍ती हो सकती है। शराब तो आपत्‍ती जनक है ही। पर मैं खुद कभी मांस खाने की ईच्‍छा व्‍यक्‍त नहीं करता। शराब भी दिल्‍ली के पांच छह सालों में सामाजिकता में साल छह माह में कभी कहीं चख लेता हूं पर वह भी पसंद में शामिल नहीं हो सकी।ऐसा क्‍यों हुआ के जवाब में जब सोचता हूं तो लगता है कि तमाम कठोरता के बाद भी पिता में वैचारिक उदारता जो शिक्षण से आयी थी उसकी इसमें बड़ी भूमिका रही है। उनके भाई उनके सामने कभी शराब सिगरेट नहीं पीते हैं, पिता सबसे बडे हैं सो सब काफी आदर करते रहे हैं सतभैया के अविराम झगडे के बावजूद। मैंने हमेशा पाया कि पिता का अपने लिए जो आचरण होता है उसे लेकर वे जरूरत से ज्‍यादा दबाव नहीं बनाते थे वैचारिक रूप से। हां घर उनकी सीमा थी जिसमें वे इन चीजों को अनुमति नहीं देते थे बाकी पीछे पड़ने वाली उनकी आदत नहीं रही। कुछ उनमें ऐसा था कि मुझमें स्‍वतंत्र चेतना का विकास संभव हो सका। एक घटना उदाहरण के रूप में याद आती है। जातिगत रूढियों की तरह धर्मिक आग्रह भी अन्‍य सामान्‍य हिन्‍दू घरों की तरह हमारे यहां भी थे ही। स्‍कूल के मुस्लिम शिक्षक के आने पर शीशे के बरतन अलग से दिए जाते थे। तो सहरसा में हमारे मुहल्‍ले में राशन की दुकान के जो मालिक थे वह मुसलमान थे। तो एक बार चीनी लेने जब हम गए तो दुकानदार ने बड़े प्रेम से हमें चाय दी तो आंख बचाकर पिता ने चाय नीचे गिरा दी पर मुझे मना नहीं किया और मैं चाय पीता रहा। इसी तरह मेरे घर के सामने एक मुस्लिम पड़ोसी रहते थे। वो साफ सुथरे लोग थे परिवार की नजरों में। तो वे कभी कभी मेरे घर मांस मछली भेज देते थे तो हम उनके ही बरतन में खा लेते थे इस पर रोक नहीं थी। क्‍योंकि गांव में चाचा आदि हमें मांस मछली खिलाते ही थे प्रेम से।चाचा लोग मिलिट्री में रहे दो तीन एक दारोगा भी थे। तो पीने पिलाने का चलन था ही घर में। तो छोटे चाचा हैं वे बहुत प्‍यारे आदमी थे पर पीते भी काफी थे पर कभी पीकर दंगा नहीं करते थे। वे अपने बच्‍चों को भी एकाध ठेपी चखा दिया करते थे। तो मुझे भी चखाया एकाध बार । मुझे बहुत तीखा और बेकार लगा वह। सो कोई रूचि नहीं जगी। मैं ने देखा कि उनके बेटों में एक बड़ा होकर वैष्‍णवी स्‍वभाव का होता चला गया और पीने को लेकर वह अपने पिता से अब खफा रहता है। इससे यह साबित होता है कि आदतें केवल संघत का नतीजा नहीं हातीं। और बच्‍चों को सारी गलत सही चीजों का अनुभव करा दिया जाए तो वे खुद सही चीजों का चुनाव कर लेंगे। इंटर के बाद ईच्‍छा शक्ति मजबूत करने और जांचने का एक दौर चला था लंबे समय तक उसके तहत मैंने सिगरेट का एक पैकैट अपने आलमीरे में ला रखा था। वह तीन चार साल तक रखा रहा मैंने कभी उसे पीने की जरूरत नहीं समझी। बादमें एक दिन मुझे कुछ सिगरेटें गायब मिलीं तो पता चला कि छोटे भाई ने सिरगरेट पीना सीख लिया है और उसी ने गायब कर दिया है। इससे मुझे यह सीख मिली कि ईच्‍छा शक्ति मापने का मेरा तरीका गलत था। इससे अपनी ईच्‍छा शक्ति तो ठीक ही रहेगी दूसरे में गलत ईच्‍छा ओं का बीजारोपन संभव है। यूं ईच्‍छा शक्ति के इस खेल ने मुझे निजी तौर पर मजबूत भी किया। एक बार जिला स्‍कूल के एक शिक्षक की शादी में पिता की जगह उनका प्रतिनिधित्‍व मैं कर रहा था। तो खान पान के दौरान जब सिगरेट की ट्रे सामने आयी तो लड़कों में किसी ने व्‍यंग्‍य किया कि मेरी मजाल कहां है सिगरेट पीने की , खबर पिता तक चली जाएगी तो …। बात मुझे लग गयी और मैंने उसी समय सिगरेट जलायी और खासंते हुए उसे पीया। यह जिंदगी में पी गयी पहली सिगरेट थी।इसके बाद अबतक कुल जमा पांच छह बार सिगरेट पी होगी मैंने। वह किसी साथी के दबाव में ही। तमाम नाम मैं याद कर सकता हूं। एक मित्र अमरेन्‍दू और राजू जी के दबाव में पी थी एक अग्रज कवि अरूण कमल ने पिलायी थी साइंस कालेज में , यूं वे भी सिगरेट के व्‍यसनी नहीं हैं पर उन्‍होंने पता नहीं उस दिन किसी सरूर में सिगरेट सुलगा कर मुझे भी ऑफर की तो हमेशा की तरह इस निर्देश के साथ सिगरेट ली कि आप आगे कभी फिर पीने को नहीं कहेंगे। एकाध बार एक दो सोंट चेतन के साथ ली । अंतिम बार पिछले माह एक सिगार पी थी धर्मेंद्र श्रीवास्‍तव के कहने पर। पता चला कि चालीस रूपये की एक है। पी तो वह बुरी नहीं लगी सिगरेट की तरह। उल्‍टे वह मीठी लग रही थी मैंने सोचा इसे तो मीठे पान की तरह खाया जा सकता है। पर इतनी मंहगी चीज का पीना जनहित में तो नहीं है जनता के लेखक के लिए …. जारी

>पत्रकारिता एक ठीम वर्क

मई 25, 2009

>श्रीकांतजी के बहाने – कुछ संस्‍मरणश्रीकांत के साथ रहकर मैंने जाना कि पत्रकारिता एक ठीम वर्क है और इस रूप में वह सत्‍ता है , जन की सत्‍ता किसी भी सत्‍ता के मुकाबिल एक ठोस सत्‍ता। पत्रकार कोई सर्वज्ञानी शख्सियत तो है नहीं कि वह सारी दुनिया की खबर रखें हां अपने इस टीमवर्क की बदौलत वह सबको काबू में रखता है। वह जनता के पत्रों को आकार देता है, वह पत्रकार है। इस रूप में वह जन से जुड़ी तमाम विरादरियों से जुड़ा होता है। श्रीकांत से जुड़ी उस विरादरी से जुडकर अनजाने ही मैं भी जनता की उस ताकत का हिस्‍सेदार हो गया, अब मेरी आवाज में भी दम आने लगा,बातों की विश्‍वसनीयता बढने लगी। जेपी यादव,के बालचन,प्रियरंजन भारती,अजय कुमार,प्रबल महतो और अन्‍य दर्जन भर पत्रकार इस टीम के हिस्‍से थे। यह टीम खबरों का चरित्र तय करती थी। इसके लिए मार तमाम बहसें होती थीं। किसी भी खबर को दबा पाना संभव नहीं था क्‍योंकि एक जगह अगर संपादक खबर दबा दे तो दूसरी जगह उसका आना तय होता था फिर उस अखबार को भी अगले दिन उस खबर को जगह देनी होती थी जिसे वह अपने निजी आग्रह में कम आंक रहा था। इस टीम वर्क के चलते जन की सामान्‍य खबरें भी बडी हो जाती थीं और बाजार में उछाली जा रही खबरों का कद यह टीम छोटा कर देती थी। श्रीकांत जब लालू प्रसाद को हीरो बना रहे होते थे तो दरअसल वे लालू के पीछे की जनता को जगह दे रहे होते थे। लालू प्रसाद के नाटक में जो जनता की छवियां थीं उसे ही वे आगे बढाते थे। राजनीतिकों को यह भरम हो सकता है कि वे बडे अदाकार है पर जनता सबसे बडी अदाकारा है इसे वह बराबर उन्‍हें महसूस कराती रहती है। पर जब मूल्‍यांकन करना होता था तो वहां श्रीकांत जन की ओर झुक जाते थे। इस तरह वे अपनी राजनीतिज्ञों से जुडी छवि को बराबर साफ करते रह पाते थे। नतीजा जब उन्‍हें लालू प्रसाद से सबसे जुडा देखा जा रहा था तभी उनकी पहली किताब आई,बिहार में चुनाव -जाति बूथ लूट और हिंसा, इस किताब के कुछ पन्‍ने पटना हाई कोर्ट ने उदाहरण के तौर पर लालू प्रसाद की सरकार के खिलाफ दिए गए एक फैसले में उद्धत किए थे।यही पत्रकारिता की कला थी। जिसके श्रीकांत महारथी थे। इस तरह यह टीम अपने समय की राजनीति को तय भी करती थी जनता के पक्ष में। इस टीम वर्क के कई मजेदार परिणाम आते थे। तब मैं अमर उजाला के लिए पटना से रपटें लिखा करता था। एक बार जब अखबार के कानपुर एडीशन के संपादक और अग्रज कवि वीरेन डंगवाल ने मुझे कानपुर बुलाया तो मुझे यह देख हैरत हुई कि वहां के रिपोर्टर मुझे लेकर उत्‍साहित थे,वे पूछ रहे थे कि मैंने पटना में रहते हुए कलकत्‍ता में पकडे गए चारा घोटाले से जुडे एक आइएएस की गिरफतारी की खबर कलकत्‍ता के रिपोर्टर से पहले कैसे लिखा दी थी। तो यह था टीम वर्क का नतीजा। टीम वर्क के चलते हमारी खबरें खाली और अश्‍लील नहीं हाती थीं और हम जनता का सही चेहरा दिखा पाते थे और ऐसा नहीं कर पाने वालों को कवि आलोक धन्‍वा की तरह उंगली दिखाते हुए टोक पाते थे – वे नील के किनारे किनारे चल कर यहां तक आयी थीं …कौन मक्‍कार उन्‍हें जंगल की तरह दिखाता है …।मेरे घर में मेरी बेरोजगारी को लेकर हमेशा मुझे नीचा दिखाया जाता था निकम्‍मा…। तो वही दौर था कि मैं भी कुछ कंपटीशन आदि क्‍यों नहीं कंपीट करता। इसी दौरान बीपीएससी का प्रश्‍नपत्र अगले दिन मेंरे हाथ लगा। देखा तो उसमें दर्जनों गलतियां थीं। मैंने तब नवभारत में संवाददाता रहे प्रबल से इसकी चर्चा की तो उन्‍होंने झटके सो कहा कल लिखकर दो तो -जरा देखें। तब मैं किसी अखबार में नहीं था। फीचर लिखा करता था पर खबरों के लिए तो किसी अखबार से जुडना होता था। पर प्रबल के कहने पर मैंने बीपीएससी के प्रश्‍नपत्र की गलतियां लिखकर रपट के रूप में दे दीं प्रबल को और अगले दिन मुझे यह देखकर हैरत हुयी कि अखबार के पहले पन्‍ने पर बाटम लीड के रूप में वह खबर छपी थी और बाईलाइन में मेरा नाम चस्‍पॉं था। मैं तो भीतर से गदगद हो गया। बाद में पता चलाकि उस खबर के आधार पर बीपीएससी ने हिन्‍दी माध्‍यम से परीक्षा देने वालों को कुछ नंबर एक्‍स्‍ट्रा दिए। तो यह था टीम वर्क का नतीजा।