अप्रैल 2009 के लिए पुरालेख

>तेरी यादों से

अप्रैल 28, 2009

>चाँद है
सितारे हैं
तेरी यादों से
ये सब
हारे हैं ।

>जब उसने बस में ही बच्‍चे को जन्‍म दे दिया – भीम काका के बहाने

अप्रैल 27, 2009

>क्रिकेट की भाषा में कहा जाए तो भीम काका हरफनमौला चरित्र थे कोई काम कठिन लग रहा हो तो हम उन्‍हें ही याद करते थे। मेरे पिता सहरसा जिला स्‍कूल में प्रिंसिपल थे और हम साल में गर्मी की छुट्टी में एक बार एक महीने के लिए गांव जाते थे। तब लौटते में हमारे साथ अनाज के दस पंद्रह बोरे होते थे तब अगर चाचा हमें छोडने नहीं जाते तो वह उतना सामान ले जाने की कल्‍पना ही नहीं कर पाते हम। पढाई क्‍या की थी उन्‍होंने पता नहीं , गांव के कैलाश तिवारी पहले से मिलिट्री में थे तो उन्‍हीं के साथ भाग कर मिलिट्री में बहाल हुए थे वे। हर समस्‍या का हल ढूंढने की विलक्षण क्षमता थी उनमें। वह हल अक्‍सर न्‍यायपूर्ण होता कभी कुछ उटपटांग भी होता पर उनकी बुद्धी की दाद तो देनी ही पडती थी।
एक बार जब हमलोग गांव से अनाज के बोरे लाद कर घर जा रहे थे तो पडोस के गांव अखगांव से एक गर्भवती महिला भी चढी दर्द से एंठती और चांदी बाजार पहुंचते ना पहुंचते बस के धचके उसने बस में ही बच्‍चे को जन्‍म दे दिया। संयोग से उसने मेरे ही अनाज से भरे एक बोरे पर बच्‍चे को जन्‍म दिया था। उसे तो वही उतार दिया गया पर बोरा बुरी तर खूनमखून हो चुका था। हालांकि वह प्‍लास्टिक कोटेड था सो भीतर गंदगी नहीं गयी थी पर स्‍वाभाविक तौर पर मां नाक दाबे इधर उधर भागने लगी थी। पर चाचा जो खेती बारी करते थे वह मां के नाक दाबने से मिहनत से हुयी उपज को कैसे नष्‍ट कर देते। सो पटना जंक्‍शन पर उन्‍होंने इसका हल निकाल लिया और उसे लेजाकर पास के होटल में बेच डाला। पूछने पर दुकान वाले को उनका जवाब था कि मछली की भीगी टोकरी किसी ने रख दी थी बोरे पर।
चाचा जबतक सहरसा रहते हम उनके आगे पीछे लगे रहते। तीन चार दिन बार उन्‍हें जाना होता तो हम रोने लगते । वह आदत आज भी गयी नहीं है किसी अपने से अनिच्‍छापूर्वक दूर होते वक्‍त आज भी आंखें भीग जाती हैं। ट्रेन में छोडते जाते वक्‍त कभी कभी साथ विनय भैया भी होते सांवले मछोले कद के गठीले वदन के,उनकी बांह की मछलियां आज भी खींचती हैं हमें। अक्‍सर वे अपनी पीठ पर हमें टहलने को कहते ,हम संतुलन साधते उनका बदन दबाते रहते यह आदत अब मुझे लग गयी है छोटे बेटे को बारह साल का है अक्‍सर मैं पीठ पर चलने को कहता हूं वह पीठ पर रहता है और मैं किताब उलटता रहता हूं। जब बेटा छोटा था तब उसे मेरी पीठ पर चलना मजेदार लगता था, क्‍यों कि उस समय जीवन जगत के उसके तमाम सवालों का जवाब भी मैं देता चलता था।
तो जब चाचा और भैया जब हमलोगों के साथ होते तो हम दुनिया में किसी को गदानते ही थे कुछ। चाचा गोरे लंबे सोंटा जैसी देह वाले जवान और बडी मूंछों वाले मुझसे दस साल बडे चाचा के लडके विनय भैया। दोनों जने अपने कंधे पर एक एक तौलिया रखे रहते।

>भीम काका नहीं रहे – कुछ संस्‍मरण नुमा

अप्रैल 27, 2009

>भीम चाचा की जो याद हमेशा जेहन में रहती है उसमें वे कंधे पर चावल का बोरा लिए बस में चढाने चले आ रहे, गांव के प्रवेशद्वार पर, बांध की ढलान पर, जहां बस रूकती है। जब वे मिलिट्री में थे तो अक्‍सर घर में उनकी चिट्ठी आती रहती थी,एक बार जब अंतरदेशीय आया तो उसमें लिखा था कि उन्‍होंने बंदूक खरीद ली है,तब मैंने मां को कहा था कि उन्‍हें लिख दीजिए क‍ि अगली बार हवाई जहाज खरीद लें। मैं समझता था कि बंदूक के बाद अगली शै जहाज ही है जिसे खरीदा जाना चाहिए। वे कभी-कभार हवाई जहाज से यात्रा का जिक्र करते थे तो मैं समझता थाकि उसे भी खरीद सकते हैं वे।
इंटर में पहली बार मैं अपने इलाके यानि आरा जिले में पढने के सिलसिले में आया था। महाराजा कालेज में नामांकन के बाद स्‍टेशन के पास ही पास के गांव के एक वकील साहब के लॉज में रहता था मैं भी। तब दो सौ रूपये महीने में मेरा काम चल जाता था। गांव से कभी-कभार चावल दाल आदि लाकर मेस में दे दिया करता था। तब चाचा रिटायर कर गये थे। गांव जाता तो वे कभी कभार अपनी बंदूक साफ करने का काम मुझे सौंप देते। शादी व्‍याह में भी उनकी बंदूक मैं ही चलाता। वे कंधे पर बट टिका उसे चलाने की सलाह देते पर मुझे हमेशा उसे उपर हाथ हवा में उठाकर चलाना अच्‍छा लगता,और जब बुलेट गोली मैं दागता तो कंधे जोश से कडे हो जाते। चाचा बताते कि इससे हाथी भी ढेर हो जाता है।
गांव में रहता तो चाचा के साथ हारिल के शिकार पर जाता और उस बगुले के जो दिन में सोता रहता है पेड पर। उन बगुलों के पेट से कभी मछली निकलती काटने पर तो बडा मजा आता सोचता काश बडी मछली निकले तो मछली खाने का भी आनंद मिले। शादी व्‍याह में चूंकि मैं बंदूक लेकर चलता उनकी तो स्‍वाभाविक था कि किसी को कुछ समझता नहीं था। इससे अन्‍य लोगों को तो अंतर नहीं पडता था पर जो बदमाश किस्‍म के लोग होते वे चिढते,उन्‍हें मैं चुनौती की तरह लगता या फिर वे मुझे अपनी जमात में खींचना चाहते । पर पिता की छवि ऐसी थी कि वे ऐसा सोच नहीं पाते थे। ऐसे में ही एक बार मैं एक लंगडे से आदमी से उलझ गया बाद में पता चला कि वह उस इलाके में डकैती डालता था। झगडा हुआ तो अंत तक मैं अपनी जिद पर अडा रहा और उसे ही अंतत हटना पडा मामला क्‍या था याद नहीं आ रहा , छोटे मामा ने तब कहा था इ सब लुच्‍चा लहेंडा हवन स,एहनी से मुह ना लागे के।
भीम काका लंबे गोरे खिलाडी आदमी थे। संदेश थाने पर जब बॉलीबाल का मैच होता तो नेट के पास स्‍ट्राइकर की जगह पर वे ही रहते और बहुत अच्‍छा शॉट मारते। मैं लंबा होते हुए भी उस जगह पर कभी अच्‍छा नहीं खेल पाया, लगता यह उनके अच्‍छा खेलने की वजह से पैदा हीनता बोध के चलते हुआ हो। यूं बीच वाली जगह से खेलना मुझे ज्‍यादा अच्‍छा लगता क्‍यों कि वहां से ताकत का प्रयोग मैं ज्‍यादा कर पता था, उस जगह से हुरमूठ की तरह खेलना आसान था। पर बाद में मैंने देखा कि सर्विस वाली जगह सबसे मुफीद है मेरे लिए। बाद में तो अक्‍सर सर्विस कर खेल को अंत में जीत लेना मेरी आदत बन गयी थी। अच्‍छी सर्विस मैंने विनोद चाचा से सीखी थी वे कद में छोटे थे पर नेट से सटा कर सर्विस देना या ऐन स्‍ट्रोक के वक्‍त शॉट की दिशा अचानक बदल कर धोखे से बॉल कहीं गिरा देने की कला मैंने उनसे ही सीखी थी।
जब लॉज में मैं रहता था तब कामाख्‍या नाम का एक लडका वहां आता था जिसके पास अक्‍सर एक रिवाल्‍वर होती थी , हालांकि वह हमेशा सलीके से पेश आता था, पर मेरी टार्च कलम आदि वह अक्‍सर ले जाता और लौटाना भूल जाता तो लगता वह रिवाल्‍वर रखने के चलते समझता है कि उससे दी गयी चीज मांगी ही नहीं जा सकती। तो एक बार उसे डराने को एक शादी से लौटते वक्‍त भीम चाचा की बंदूक की गोलियां साथ लेता आया और कामाख्‍या को किसी बहाने दिखाया कि मेरे पास भी हथियार हैं, यह तरीका काम कर गया और आगे उसने मेरा सामान लौटा दिया।
गांव में कभी कभार जब सोता तो चाचा का कट्टा और गोंलियां तकिए के नीचे लेकर सोचा। पर शादी और चिडिया मारने के अलावे कभी और किसी काम नहीं आयी बंदूक। चूंकि चाचा इलाके में लोकप्रिय थे और हर तबके के लोगों का समान सम्‍मान करते थे। मुस्लिम त्‍योंहारों में लाठी भांजने के खेल में भी हिस्‍सा लेते थे वे। गांव के मुसलमानों से उनकी दोस्‍ती थी, जिनसे वे मुझे भी मिलवाते। मिलिट्री में जाने से लगता है उनका अच्‍छा सामाजीकरण हुआ था पर उस सामाजीकरण का अच्‍छा उपयोग उन्‍होंने ही किया । गांव के मुखिया उनके लंगोटिया यार रहे हमेशा। एक बार मुखिया के साथ उन्‍होंने थाने में जाकर दारोगा की लाठियों से पिटाई कर दी थी। तब अंबिका स्‍वर्ण सिंह जो मंत्री थे उनकी ससुराल मुखिया के घर थी सो तमाम तमाशे के बाद भी पुलिस गांव में आकर चाचा को गिरफतार नहीं कर पायी। चाचा कुछ दिन गायब भी रहे । फिर केस चलता रहा।
इस घटना के बाद तो चाचा हीरो हो गये इलाके में। उनके मरनी के काम में मुखिया, जो अब उस पद पर नहीं है,हमेशा हर काम में आगे रहे, सुरेश मास्‍टर साहब ने मजाक भी किया कि स्‍वर्ग में आपका भी पतरा पलटा रहा होगा और जल्‍दी ही बुलाया जाएगा तो सभी हंसने लगते थे। – जारी