>सिगरेट और शराब के संस्‍मरण – कुमार मुकुल

>परंपरागत सामंती राजपूत परिवार से आने के बावजूद पिता ने ठेठ वैष्‍णवी जीवन शैली कहां किसके प्रभाव में अपनाई इसका पता आज तक नहीं चल सका। जिला स्‍कूल,इंटरकालेज के प्रिसिपल पिता घर में भी हमेशा एक कड़क प्रिंसिपल ही बने रहे इसलिए कभी इन चीजों को लेकर संवाद नहीं हुआ। यूं जवार में एमए करने वाले वे पहले आदमी हैं और संभवत: पढाई लिखाई का परिणाम ही कहा जा सकता है इसे कि उन्‍होंने वैष्‍णवी रहन सहन अपना लिया। आज तक मेरे घर में मांस-मछली-अंडा नहीं बना,प्‍याज भी लड़-झगड़ कर ही हम खा पाते हैं, लहसुन को काफी बाद में मान्‍यता मिली , चाय जब वे भागलपुर से सहरसा गये तब शुरू की और वह भी वहां के दबाव में कि वहां प्रचलित था कि चाय नहीं पीने से यहां घेघा हो जाता है। ऐसे में सिगरेट और शराब की बाबत तो सोचा भी नहीं जा सकता।
पिता सात भाई हैं। बाकी सब तमाम चीजों का सेवन करते हैं अन्‍य सामाजिकों की तरह। उन्‍हीं में किसी ने मांस खाना सिखाया तो किसी ने शराब चखा दी। हालांकि यह घर के आचरण का प्रभाव ही कहा जा सकता है कि मुझे आज भी ये चीजें पसंद नहीं है। मांस मछली पर भला किसे आपत्‍ती हो सकती है। शराब तो आपत्‍ती जनक है ही। पर मैं खुद कभी मांस खाने की ईच्‍छा व्‍यक्‍त नहीं करता। शराब भी दिल्‍ली के पांच छह सालों में सामाजिकता में साल छह माह में कभी कहीं चख लेता हूं पर वह भी पसंद में शामिल नहीं हो सकी।
ऐसा क्‍यों हुआ के जवाब में जब सोचता हूं तो लगता है कि तमाम कठोरता के बाद भी पिता में वैचारिक उदारता जो शिक्षण से आयी थी उसकी इसमें बड़ी भूमिका रही है। उनके भाई उनके सामने कभी शराब सिगरेट नहीं पीते हैं, पिता सबसे बडे हैं सो सब काफी आदर करते रहे हैं सतभैया के अविराम झगडे के बावजूद। मैंने हमेशा पाया कि पिता का अपने लिए जो आचरण होता है उसे लेकर वे जरूरत से ज्‍यादा दबाव नहीं बनाते थे वैचारिक रूप से। हां घर उनकी सीमा थी जिसमें वे इन चीजों को अनुमति नहीं देते थे बाकी पीछे पड़ने वाली उनकी आदत नहीं रही। कुछ उनमें ऐसा था कि मुझमें स्‍वतंत्र चेतना का विकास संभव हो सका। एक घटना उदाहरण के रूप में याद आती है। जातिगत रूढियों की तरह धर्मिक आग्रह भी अन्‍य सामान्‍य हिन्‍दू घरों की तरह हमारे यहां भी थे ही। स्‍कूल के मुस्लिम शिक्षक के आने पर शीशे के बरतन अलग से दिए जाते थे। तो सहरसा में हमारे मुहल्‍ले में राशन की दुकान के जो मालिक थे वह मुसलमान थे। तो एक बार चीनी लेने जब हम गए तो दुकानदार ने बड़े प्रेम से हमें चाय दी तो आंख बचाकर पिता ने चाय नीचे गिरा दी पर मुझे मना नहीं किया और मैं चाय पीता रहा। इसी तरह मेरे घर के सामने एक मुस्लिम पड़ोसी रहते थे। वो साफ सुथरे लोग थे परिवार की नजरों में। तो वे कभी कभी मेरे घर मांस मछली भेज देते थे तो हम उनके ही बरतन में खा लेते थे इस पर रोक नहीं थी। क्‍योंकि गांव में चाचा आदि हमें मांस मछली खिलाते ही थे प्रेम से।
चाचा लोग मिलिट्री में रहे दो तीन एक दारोगा भी थे। तो पीने पिलाने का चलन था ही घर में। तो छोटे चाचा हैं वे बहुत प्‍यारे आदमी थे पर पीते भी काफी थे पर कभी पीकर दंगा नहीं करते थे। वे अपने बच्‍चों को भी एकाध ठेपी चखा दिया करते थे। तो मुझे भी चखाया एकाध बार । मुझे बहुत तीखा और बेकार लगा वह। सो कोई रूचि नहीं जगी। मैं ने देखा कि उनके बेटों में एक बड़ा होकर वैष्‍णवी स्‍वभाव का होता चला गया और पीने को लेकर वह अपने पिता से अब खफा रहता है। इससे यह साबित होता है कि आदतें केवल संघत का नतीजा नहीं हातीं। और बच्‍चों को सारी गलत सही चीजों का अनुभव करा दिया जाए तो वे खुद सही चीजों का चुनाव कर लेंगे।
इंटर के बाद ईच्‍छा शक्ति मजबूत करने और जांचने का एक दौर चला था लंबे समय तक उसके तहत मैंने सिगरेट का एक पैकैट अपने आलमीरे में ला रखा था। वह तीन चार साल तक रखा रहा मैंने कभी उसे पीने की जरूरत नहीं समझी। बादमें एक दिन मुझे कुछ सिगरेटें गायब मिलीं तो पता चला कि छोटे भाई ने सिरगरेट पीना सीख लिया है और उसी ने गायब कर दिया है। इससे मुझे यह सीख मिली कि ईच्‍छा शक्ति मापने का मेरा तरीका गलत था। इससे अपनी ईच्‍छा शक्ति तो ठीक ही रहेगी दूसरे में गलत ईच्‍छा ओं का बीजारोपन संभव है।
यूं ईच्‍छा शक्ति के इस खेल ने मुझे निजी तौर पर मजबूत भी किया। एक बार जिला स्‍कूल के एक शिक्षक की शादी में पिता की जगह उनका प्रतिनिधित्‍व मैं कर रहा था। तो खान पान के दौरान जब सिगरेट की ट्रे सामने आयी तो लड़कों में किसी ने व्‍यंग्‍य किया कि मेरी मजाल कहां है सिगरेट पीने की , खबर पिता तक चली जाएगी तो …। बात मुझे लग गयी और मैंने उसी समय सिगरेट जलायी और खासंते हुए उसे पीया। यह जिंदगी में पी गयी पहली सिगरेट थी।
इसके बाद अबतक कुल जमा पांच छह बार सिगरेट पी होगी मैंने। वह किसी साथी के दबाव में ही। तमाम नाम मैं याद कर सकता हूं। एक मित्र अमरेन्‍दू और राजू जी के दबाव में पी थी एक अग्रज कवि अरूण कमल ने पिलायी थी साइंस कालेज में , यूं वे भी सिगरेट के व्‍यसनी नहीं हैं पर उन्‍होंने पता नहीं उस दिन किसी सरूर में सिगरेट सुलगा कर मुझे भी ऑफर की तो हमेशा की तरह इस निर्देश के साथ सिगरेट ली कि आप आगे कभी फिर पीने को नहीं कहेंगे। एकाध बार एक दो सोंट चेतन के साथ ली । अंतिम बार पिछले माह एक सिगार पी थी धर्मेंद्र श्रीवास्‍तव के कहने पर। पता चला कि चालीस रूपये की एक है। पी तो वह बुरी नहीं लगी सिगरेट की तरह। उल्‍टे वह मीठी लग रही थी मैंने सोचा इसे तो मीठे पान की तरह खाया जा सकता है। पर इतनी मंहगी चीज का पीना जनहित में तो नहीं है जनता के लेखक के लिए …. जारी

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