मार्च 2009 के लिए पुरालेख

>चांदनी है सो है – गीत

मार्च 23, 2009

>चांदनी है सो है

तारों की कदमताल भी है

फिजां में घुलता सा

नाजनी तेरा खयाल भी है

चांदनी है …

जगर-मगर है रौशन है

यह नगर यूं तो

सबके उपर छा…या
तेरा जमाल भी है

चांदनी है …

जहां में कम है खुशी

तंज है गम जि या दा है

पर तबस्‍सुम है तेरा

जुल्‍फ है के जाल भी है

चांदनी है …

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>अपने लिए डायरी मैं कभी खरीद सकूंगा – कुमार मुकुल

मार्च 22, 2009

>डायरी : 26 – 2 – 1995 – पटना
आज चाचा ने डायरी दी है। नयी डायरी पाकर मुझे खुशी होती है। पर जब सोचता हूं कि इसमें क्‍या लिखूं तो पता नहीं चलता …। क्‍या लिखूं…। एक नई कविता लिखने की ईच्‍छा होती है पर कविता तुरत, कैसे लिखी जाए। पिछली बार चाचा से डायरी मांगी थी तो उन्‍होंने खरीद कर दी थी। इस बार लगता है पहले से व्‍यवस्‍था कर रखी थी। मैं एक अखबार का संपादकीय रोज लिखता हूं पर मुझे डायरी देने वाला कोई नहीं मिला। मुझे आज तक पता नहीं चला कौन लोग मुफ्त की डायरी बांटते हैं। और क्‍यों…। पहले पिता जी प्रिसीपल थे तो ढेरों सुंदर डा‍यरियां प्रकाशक दे जाते थे। पर उनके रिटायर के बाद कोई डायरी नहीं मिली पिछले कई सालों से। मैंने अपनी साली को एक डायरी खरीद कर दी थी 25 रूपये में। पिछले साल पत्‍नी को 12 रूपये की साधारण सी डायरी दी थी। पर खुद रद्दी कागज पर लिखता हूं। अपने लिए डायरी मैं कभी खरीद सकूंगा , शायद नहीं।

>‘‘मनोविज्ञान की समझ आम लोगों तक साहित्य के माध्यम से ही जाती है’’ – विष्‍णु नागर

मार्च 20, 2009

>
चर्चित कवि-कथाकार विष्णु नागर से कुमार मुकुल की बातचीत

आप कवि के साथ समर्थ व्यंग्यकार भी हैं, व्यंग्य की रचना-प्रक्रिया क्या कविता से अलग है?
कविता हो या व्यंग्य रचना-प्रक्रिया तो एक ही है। जिस तरह कविता दिमाग में आती है उसी तरह व्यंग्य भी आता है। कई बार ऐसा भी होता है कि कुछ पता नहीं चलता कि यह रचना क्या रूप ले रही है। कब वह कविता से कहानी बनने लगती है, इसका अंदाज नहीं हो पाता, हालांकि अब ऐसा अक्सर नहीं होता है। कई बार रचना पूरी होने पर ही स्थिति साफ होती है कि वह क्या बनी। कई बार व्यंग्य लिखना चाहता हूं और वह कुछ और हो जाता है – उसमें कटुता ज्यादा आ जाती है या वह व्यंग्य से अधिक व्यक्ति के मर्म को अधिक छूने वाली रचना बन जाती है पर प्रक्रिया एक ही होती है। व्यंग्य चूंकि आजकल रोज लिखना होता है तो अभ्यास होने से एक आसानी होने लगती है पर कविता उस आसानी से नहीं आती। कभी आई नहीं।

सारा साहित्य एक मनोविज्ञान को सामने लाता है, तो साहित्यकार किस हद तक मनोविज्ञानी है? क्या इस रूप में उनकी भूमिका को रेखांकित किया जा सकता है?
बिल्कुल किया जा सकता है। मनोविज्ञानी आमतौर पर रचनात्मक नहीं होतेे और वे मनोविज्ञान को कुछ फार्मूलों के तहत ज्यादा समझना चाहते हैं। आदमी उनके सामने होने पर भी उसके मन में उतरने की बजाय वे अपने सीमित टूल्स का इस्तेमाल करते हैं। इस तरह वे सामने वाले को एक आॅब्जेक्ट के रूप में देखने लगते हैं – फलतः आप उसके मनोविज्ञान को समझ कर भी नहीं समझ पाते। लेखक के लिए आदमी आॅब्ज्ेाक्ट नहीं होता – उसे उसका इस्तेमाल नहीं करना होता है – उसे वह जीवन की सहज प्रक्रिया के दौरान ही जानता-समझता है। मनोविज्ञान की समझ उसकी आम लोगों तक किसी-न-किसी किस्म के साहित्य के माध्यम से की जाती है। हमारी दुनिया के बड़े लेखकों ने भले मनोविज्ञान की पढ़ाई न की हो, पर उनसे बड़े मनोवैज्ञानिक कम ही हैं, जैसे – चेखव, प्रेमचंद आदि।

एक रचनाकार अपने रचना-कर्म से असंतुष्ट भी रहता है और उससे मोह भी रहता है। इस द्वंद्व के साथ उसे कैसे तालमेल बैठाना चाहिए?
कोई भी रचनाकार मेरे खयाल से कभी अपनी रचना से संतुष्ट नहीं होता। उसे उसकी रचना के और अपने अधूरेपन का अहसास हमेशा रहता है। रचनाकार का कोई एवरेस्ट शिखर नहीं होता, जहाँ वह झंडा फहरा आए। लेकिन जो रचा है, उसे सबके सामने लाने की इच्छा भी रहती है ताकि दूसरों की आँख से भी उसे जाँचा-परखा जा सके। इस द्वंद्व के साथ ही कोई भी रचनाकार जीता है।

आप ‘भटकते रहने में’ विश्वास करते हैं। इसके पीछे आपकी सोच क्या है?
मैं इसके शाब्दिक अर्थ में भी यानी सड़क पर भटकने में भी विश्वास रखता हूं और एक रचनाकार के रूप में भटकते रहने में भी। भटकने की आदत के चलते मुझे आपने आसपास के तमाम रास्तों का पता रहता है और नए रास्ते मिलते रहते हैं। एक रचनाकार के रूप में क्यों हम अपनी एक खास छवि ही प्रक्षेपित करने पर जोर दें? जो आपका मन करे, जैसे करे, वैसा उस रूप में लिखा जाए फिर उसे कोई मान्यता दे या ना दे। यह दूसरों की स्वतंत्राता है कि वे उसे रचना के रूप में माने या न माने और यह रचनाकार की स्वतंत्राता है कि वह लिखे और संभव हो तो प्रकाशित कराए। मेरा विश्वास है कि छवियोें में बंद होना अपनी रचनात्मकता को खत्म करना है।

माँ पर आपकी कई कविताएँ हैं। माँ को लेकर अपनी यादों से कुछ बाँटना चाहेंगे?मैंने अपने पिता को अपनी स्मृति में देखा नहीं। मैं अपने परिवार में अपनी माँ के अलावा अकेला था। तो माँ ने ही मुझे पाला-पोसा, बड़ा किया। उसी से मैं लड़ता भी रहा और प्यार भी करता रहा, पाता रहा। मेरी एक इच्छा पूरी नहीं हो पाई कि मैं उनके जीते जी उन्हें कुछ भौतिक सुख प्रदान कर पाता। यह दुख मुझे सालता है। उनका जीवन आर्थिक तंगी और उसके तनावों में ही बीता।

अन्य बीमारियों के उलट मनोरोग को भारतीय समाज एक कलंक मानता है। इस प्रवृत्ति को कैसे बदला जाए?
हमारे समाज में चिकित्सा की इतनी कम सुविधाएं रही हैं कि लोग शरीर के इलाज के अलावा मानसिक इलाज के बारे में जानते ही नहीं ? आदमी के पागल हो जाने के बाद ही यह सोचा जाता है कि उसे किसी मनोचिकित्सक को दिखाना है, कि वह समाज के किसी काम का नहीं, कि उसे पागलखाने में भर्ती कराना है। सदियों से गहरे में बैठी इस मानसिकता का नतीजा है कि जागरूक लोग भी मानसिक बेचैनियों की स्थिति में किसी मनोचिकित्सक के पास जाने से हिचकते हैं। इस प्रवृत्ति से लड़ना होगा क्योंकि अपनी कई मानसिक परेशानियों का निदान न होने पर आदमी कई बार अचानक हिंसक हो उठता है, आत्महंता हो जाता है या पागल हो जाता है। अपनी भूमिका को मीडिया कुछ हद तक निभा रहा है पर वह पर्याप्त नहीं है।

मनोवेद में और कौन-सी नई सामग्री आप चाहेंगे?चाहे वह भले ही सीधे मनोविज्ञान से न जुड़ी हो पर जिसका रवैया रचनात्मक हो तो उसका इस्तेमाल इसमें होना चाहिए। गिजुभाई जैसे बाल मनोविज्ञान के जानकार लेखकों की सामग्री को हिन्दी में मनोवेग जैसी पत्रिकाओं को उपलब्ध कराना चाहिए। वैसी सामग्री जो किसी भी रूप में लोगों के मनोविज्ञान को सामने लाती हो, चाहे वह ऊपर से मनोवैज्ञानिक न लगती हों उसका इस्तेमाल ज्यादा से ज्यादा होना चाहिए।

‘मन ही मनुष्य है’ इस उक्ति को आप कहां तक उचित मानते हैं?उक्तियों के उलझाव में मैं जाना नहीं चाहता। ये ऊपर से आकर्षक होती हैं पर कई बार पूरी सच्चाई को सामने नहीं आने देतीं। मानव इतना जटिल जीव है कि वह खुद भी नहीं जानता कि वह क्या है – रोज-रोज उसके सामने उसका अपना रहस्योद्घाटन होता रहता है। कई बार बुरे अर्थों में और कई बार बहुत अच्छे अर्थों में। मेरा खयाल है कि जो अपने व्यवहार का और समाज का भी लगातार विश्लेषण और आत्म विस्तार करता रहता है वही एक बेहतर मनुष्य हो पाता है। ऐसा करने के लिए आपके पास कई तरह के मानवीय-सांस्कृतिक औजार होने चाहिए क्योंकि जब आप अपनी क्षमता से बड़ी चुनौती के आगे खड़े होते हैं तब भी आपकी समझ में आता है कि आप कहां हैं, क्या हैं। हालांकि आज का हमारा संसार बहुत ही आत्मतुष्ट किस्म के लोगों का संसार है। और उन्हें अपनी हर छोटी-मोटी उपलब्धि पर गर्व है।

किन रचनाकारों ने आपके मनोविज्ञान पर प्रभाव डाला?किसी एक का नाम लेना सरलीकरण होगा। फिर भी जिनका नाम याद आ रहा है, वे हैं – तालस्ताय, चेखव, ब्रेख्त, प्रेमचंद, रघुवीर सहाय और कुछ हद तक जैनेंद्र। असंख्य रचनाकार हैं जिन्होंने तरह-तरह से प्रभावित किया है। एक आदमी मात्रा लिखित रचना से ही प्रभावित नहीं होता। रचनात्मकता के अलिखित रूप भी उसे प्रभावित करते हैं। मसलन संगीत, भारतीय शास्त्राीय संगीत ने गहरे से मथा है मुझे। कई बार लगता है कि संगीत से बड़ी कोई रचना शब्दों में नहीं की जा सकती।

कुछ घटनाएं, जिन्होंने आपको विचलित किया हो?
रोज ही कुछ न कुछ विचलित करता है पर जो आपके साथ घटित होता है तो आदमी उससे ज्यादा विचलित होता है। जैसे – भोपाल गैस हादसे का मैं शिकार होते-होते बचा क्योंकि – हादसे के एकाध घंटे पहले मैं भोपाल से निकल गया था जबकि मेरा इरादा उसी रेलवे स्टेशन पर सोने का था। बाद में हादसे की भयानकता का अंदाजा लगा तो जीवित होतेे हुए भी कई दिनों तक या शायद महीनों तक खुद को मरा हुआ ही समझता रहा। इस हादसे के मनोवैज्ञानिक प्रभाव से निकलने में सालों लगे पर उस पर एक लाइन नहीं लिख पाया मैं, यह भी दिलचस्प है। जबकि मैं बाद में नवभारत टाइम्स के लिए कवरेज करने के लिए गया भी था। एक सप्ताह वहां रहा। आज भी भोपाल शहर को मैं बहुत पसंद करता हूं। वहां बार-बार जाने की इच्छा होती है।

मनोवेद से

>यह तारों की मदि्धम आंच है जो करोंडों बरस तक मरती नहीं – मंगलेश डबराल की कविताएं

मार्च 19, 2009

>
मंगलेश डबराल की कविताओं में विचारधारा और उसको जिलाए रखने का करूण प्रयास एक तारे की तरह टिमटिमाता रहता है। यह तारों की मदि्धम आंच है जो करोंडों बरस तक नहीं मरती। कविता का कठजीव है यह जिसके प्राण इंतजार में टिमटिमाते रहते हैं। यह इंतजार होता है विचारों के जीवनक्रिया में बदलने का इंतजार। यह कठजीव खामोशी से समय का भार सहता उसमें उपजते विचारों व नामों को चुनता चलता है और खुद को अतीत के विरोधपत्र में बदल डालता है। उनकी दुख शीषZक कविता को देखें-
लोग छोडकर जाते हैं घर द्वार
अनजान दुनिया में भटकते निरूदेश्य
रोटी के बदले में बदल देते अपने नाम और विचार
मैं उनके पीछे-पीछे चलता हूं
सर पर एक भारी गठरी उठाए हुए
मैं थामता हूं, गिरते हुए को
बचाए रखता हूं खामोशी को

मैं एक विरोधपत्र हूं
जिस पर उनके हस्ताक्षर हैं जो अब नहीं हैं
मैें सहेज कर रखता हूं उनके नाम आने वाली चिटि्ठयां
मैं दुख हूं
मुझमें एक धीमी कांपती हुई रोशनी है

पिछले दशकों में हिन्दी कविता पर रघुवीर सहाय और केदारनाथ सिंह का घटाटोप छाया रहा है। मंगलेश की कविता इस घटाटोप को चीर कर शमशेर-मुक्तिबोध-नागार्जन की कविता पीढी से जुडने की कािशश करती दिखती है। मंगलेश का एक दुख वह भी है जो मुक्तिबोध केा सलता रहता था- जीवन क्या जिया, वाला दुख। अपनी एक कविता में वे उसे इस तरह व्यक्त करते हैें- कहीं मुझे जाना था नहीं गया/कुछ मुझे करना था नहीं किया। मुक्तिबोध को ऋतुराज आदि कई कवियों ने याद किया है , उन्हें याद करते मरणोपरांत कवि कविता में मंगलेश लिखते हैं-
और बीडी का धुआं भरता रहा
उसके चेहरे की झुरिZयों में
उसकी नौकरियां छूटती रहीं
और वह जाता रहा बार-बार सभा के बाहर
गौर से देखों तो वह अब भी
जाता हुआ दिखाई देता है

दिल्ली के कवियों की एक मजबूरी हो जाती है कि जनता से बनती दूरी के लिए वे एक विकल्प तैयार करते हैं। रघुवीर सहाय राजनीति केा तो विष्णु खरे फिल्मों को अपना वैकल्पिक आधार बनाते हैं मंगलेश संगीत को ओ चुनते दिखते हैं। संगतकार,रचना प्रक्रिया,अमीर खां आदि कविताएं इसका उदाहरण हैं। इन कविताओं में मंगलेश दूर के सुहावने ढोल होने के भीतर की पीडा को अभिव्यक्त करते हैं।गुणी ढोलकिया केशव अनुरागी की पीडा को वे इस तरह आवाज देते हैं-
लेकिन मैं हूं एक अछूत,कोन मुझे कहे कलाकार
मुझे ही करना होगा आाजीवन पायलागन
महाराज, जय हो सरकार

मंगलेश राजनीतिक रूप से सजग रचनाकार है। अपने समय और समाज के विकास क्रम पर उनकी नजर रहती है और इधर की कविताओं ताकत की दुनिया, यह नंबर मौजूद नहीं आदि में वे इन चीजों पर अपने ढंग से विचार भी करते हैं। मौजूदा समय की क्ररता को रेखांकित करते संकलन की भूमिका में वे लिखते भी हैं- यह क्रूरता उस समय भी दिखी जब अमीरों को अमीर राहत, और गरीबों को गरीब राहत दी जा रही थी।हिंदू राहत अलग थी,मुसलमान राहत और दलित राहत अलग।
यूं कविता और कवि की बाबत उनकी राय यह है कि – लिखी जाने के बाद वह रचनाकार को छोड देती है, उससे मुक्त और निवैZयक्तिक हो जाती है , उससे दूर चली जाती है। आगे देरिदा को कोट करते वे लिखते हैं कि – कविता में किसी शब्द का कोई अर्थ नहीं रह जाता, बल्कि वह शब्द वही वस्तु होता है जिसके लिए वह शब्द प्रयुक्त किया गया है। कुल मिलाकर मंगलेश की चिंता है कि भ्रष्ट सत्ता-राजनीति ही सबसे बडा रोजगार है जिसमें लोग पूरी अश्लीलता से लगे हुए हैं।

अभिनय

एक गहन आत्मविश्वास से भरकर
सुबह निकल पड़ता हूँ घर से
ताकि सारा दिन आश्वस्त रह सकूँ
एक आदमी से मिलते हुए मुस्कराता हूँ
वह एकाएक देख लेता है मेरी उदासी
एक से तपाक से हाथ मिलाता हूँ
वह जान जाता है मैं भीतर से हूँ अशांत
एक दोस्त के सामने ख़ामोश बैठ जाता हूँ
वह कहता है तुम दुबले बीमार क्यों दिखते हो
जिन्होंने मुझे कभी घर में नहीं देखा
वे कहते हैं अरे आप टीवी पर दिखे थे एक दिन

बाज़ारों में घूमता हूँ निश्शब्द
डिब्बों में बन्द हो रहा है पूरा देश
पूरा जीवन बिक्री के लिए
एक नई रंगीन किताब है जो मेरी कविता के
विरोध में आई है
जिसमें छपे सुन्दर चेहरों को कोई कष्ट नहीं
जगह जगह नृत्य की मुद्राएँ हैं विचार के बदले
जनाब एक पूरी फ़िल्म है लम्बी
आप ख़रीद लें और भरपूर आनन्द उठाएँ

शेष जो कुछ है अभिनय है
चारों ओर आवाज़ें आ रही हैं
मेकअप बदलने का भी समय नहीं है
हत्यारा एक मासूम के कपड़े पहनकर चला आया है
वह जिसे अपने पर गर्व था
एक ख़ुशामदी की आवाज़ में गिड़गिड़ा रहा है
ट्रेजडी है संक्षिप्त लम्बा प्रहसन
हरेक चाहता है किस तरह झपट लूँ
सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार ।
(1990)
पुरानी तस्वीरें
पुरानी तस्वीरों में ऐसा क्या है
जो जब दिख जाती हैं तो मैं गौर से देखने लगता हूँ
क्या वह सिर्फ़ एक चमकीली युवावस्था है
सिर पर घने बाल नाक-नक़्श कुछ कोमल
जिन पर माता-पिता से पैदा होने का आभास बचा हुआ है
आंखें जैसे दूर और भीतर तक देखने की उत्सुकता से भरी हुई
बिना प्रेस किए कपड़े उस दौर के
जब ज़िंदगी ऐसी ही सलवटों में लिपटी हुई थी

इस तस्वीर में मैं हूँ अपने वास्तविक रूप में
एक स्वप्न सरीखा चेहरे पर अपना हृदय लिए हुए
अपने ही जैसे बेफ़िक्र दोस्तों के साथ
एक हल्के बादल की मानिंद जो कहीं से तैरता हुआ आया है
और एक क्षण के लिए एक कोने में टिक गया है
कहीं कोई कठोरता नहीं कोई चतुराई नहीं
आंखों में कोई लालच नहीं

यह तस्वीर सुबह एक नुक्कड़ पर एक ढाबे में चाय पीते समय की है
उसके आसपास की दुनिया भी सरल और मासूम है
चाय के कप, नुक्कड़ और सुबह की ही तरह
ऐसी कितने ही तस्वीरें हैं जिन्हें कभी-कभी दिखलाता भी हूँ
घर आए मेहमानों को

और अब यह क्या है कि मैं अक्सर तस्वीरें खिंचवाने से कतराता हूँ
खींचने वाले से अक्सर कहता हूँ रहने दो
मेरा फोटो अच्छा नहीं आता मैं सतर्क हो जाता हूँ
जैसे एक आइना सामने रख दिया गया हो
सोचता हूँ क्या यह कोई डर है है मैं पहले जैसा नहीं दिखूंगा
शायद मेरे चेहरे पर झलक उठेंगी इस दुनिया की कठोरताएं
और चतुराइयाँ और लालच
इन दिनों हर तरफ़ ऐसी ही चीजों की तस्वीरें ज़्यादा दिखाई देती हैं
जिनसे लड़ने की कोशिश में
मैं कभी-कभी इन पुरानी तस्वीरों को ही हथियार की तरह उठाने की सोचता हूँ
वसंत
इन ढलानों पर वसन्त
आएगा हमारी स्मृति में
ठंड से मरी हुई इच्छाओं को फिर से जीवित करता
धीमे-धीमे धुंधवाता ख़ाली कोटरों में
घाटी की घास फैलती रहेगी रात को
ढलानों से मुसाफ़िर की तरह
गुज़रता रहेगा अंधकार

चारों ओर पत्थरों में दबा हुआ मुख
फिर उभरेगा झाँकेगा कभी

किसी दरार से अचानक
पिघल जाएगी जैसे बीते साल की बर्फ़
शिखरों से टूटते आएंगे फूल
अंतहीन आलिंगनों के बीच एक आवाज़
छटपटाती रहेगी
चिड़िया की तरह लहूलुहान
(रचनाकाल : 1970)

>बस कंडक्‍टर और बाइबिल – रोजनामचा

मार्च 18, 2009

>मैं और केशव डीटीसी की बस में चढे और सात का टिकट ले कंडक्‍टर के आगे वाली सीट पर बैठ गया। केशव का साथ नया नया था तो हम लगातार पत्रकारिता,देश और राजनीति आदि पर बहस करते जा रहे थे। तभी मेरी सीट के पीछे से एक हाथ हमारे बीच बढा और बाइबिल की छोटी सी किताबनुमा कापी सामने दिखाई दी। एकाध सेकेंड की सोच विचार के बाद मैंने वह किताब ले ली। केशव भी हैरान सा देख रहा था । मुझे लगा कि पीछे कोई ईसाई धर्म का प्रचार‍क होगा। हमने उसे देखने की जहमत नहीं उठायी। बस किताब को उलटने पलटने लगा। चश्‍मा मैंने लगाया नहीं था सो किताब के छोटे अक्षर दिख नहीं रहे थे। बीस साल पहले एक दुकान से बाइबिल खरीदी थी मैंने और पढी भी थी सो इस किताब में रूचि नही थी। सो किताब उलटते हुए मैं सोच रहा था कि इसका क्‍या किया जाए। चूंकि घर ले जाने पर कचरे में बढोतरी होती । यूं ही समीक्षा का काम होने से किताबे जरूरत से ज्‍यादा आती रहती हैं ओर उन्‍हें मित्रों को देना पडता है। केशव की भी रूचि नहीं दिख रही थी मैंने पीछे मुडकर देखा और पहचानने की कोशिश की कि किसने यह किताब दी है।
तो कंडक्‍टर सीधेपन से मुस्‍कराया। मैंने कहा कि यह किताब मैंने पढ रखी है यह मेरे पास है । किताब लेते हुए उसने कहा – यह कोई नया धर्म है शायद ,इसे वे फैलाना चाहते हैं, मैंने सोचा आपलोग पढने लिखने वाले लोग हैं शायद आपके किसी काम की हो। मैं हंसा। उसकी भोली मुखमुद्रा से लगा रहा था कि वह जताना चाह रहा है कि उसे सही गलत का अंदाजा नहीं कि मुझे किताब देकर उसने कोई गलती तो नहीं की। उसने बेमन से किताब रख ली। किसी प्रचारक ने उसे सौंप दी होगी अपनी डयूटी के तहत।

>सिगरेट और शराब के संस्‍मरण – कुमार मुकुल

मार्च 13, 2009

>परंपरागत सामंती राजपूत परिवार से आने के बावजूद पिता ने ठेठ वैष्‍णवी जीवन शैली कहां किसके प्रभाव में अपनाई इसका पता आज तक नहीं चल सका। जिला स्‍कूल,इंटरकालेज के प्रिसिपल पिता घर में भी हमेशा एक कड़क प्रिंसिपल ही बने रहे इसलिए कभी इन चीजों को लेकर संवाद नहीं हुआ। यूं जवार में एमए करने वाले वे पहले आदमी हैं और संभवत: पढाई लिखाई का परिणाम ही कहा जा सकता है इसे कि उन्‍होंने वैष्‍णवी रहन सहन अपना लिया। आज तक मेरे घर में मांस-मछली-अंडा नहीं बना,प्‍याज भी लड़-झगड़ कर ही हम खा पाते हैं, लहसुन को काफी बाद में मान्‍यता मिली , चाय जब वे भागलपुर से सहरसा गये तब शुरू की और वह भी वहां के दबाव में कि वहां प्रचलित था कि चाय नहीं पीने से यहां घेघा हो जाता है। ऐसे में सिगरेट और शराब की बाबत तो सोचा भी नहीं जा सकता।
पिता सात भाई हैं। बाकी सब तमाम चीजों का सेवन करते हैं अन्‍य सामाजिकों की तरह। उन्‍हीं में किसी ने मांस खाना सिखाया तो किसी ने शराब चखा दी। हालांकि यह घर के आचरण का प्रभाव ही कहा जा सकता है कि मुझे आज भी ये चीजें पसंद नहीं है। मांस मछली पर भला किसे आपत्‍ती हो सकती है। शराब तो आपत्‍ती जनक है ही। पर मैं खुद कभी मांस खाने की ईच्‍छा व्‍यक्‍त नहीं करता। शराब भी दिल्‍ली के पांच छह सालों में सामाजिकता में साल छह माह में कभी कहीं चख लेता हूं पर वह भी पसंद में शामिल नहीं हो सकी।
ऐसा क्‍यों हुआ के जवाब में जब सोचता हूं तो लगता है कि तमाम कठोरता के बाद भी पिता में वैचारिक उदारता जो शिक्षण से आयी थी उसकी इसमें बड़ी भूमिका रही है। उनके भाई उनके सामने कभी शराब सिगरेट नहीं पीते हैं, पिता सबसे बडे हैं सो सब काफी आदर करते रहे हैं सतभैया के अविराम झगडे के बावजूद। मैंने हमेशा पाया कि पिता का अपने लिए जो आचरण होता है उसे लेकर वे जरूरत से ज्‍यादा दबाव नहीं बनाते थे वैचारिक रूप से। हां घर उनकी सीमा थी जिसमें वे इन चीजों को अनुमति नहीं देते थे बाकी पीछे पड़ने वाली उनकी आदत नहीं रही। कुछ उनमें ऐसा था कि मुझमें स्‍वतंत्र चेतना का विकास संभव हो सका। एक घटना उदाहरण के रूप में याद आती है। जातिगत रूढियों की तरह धर्मिक आग्रह भी अन्‍य सामान्‍य हिन्‍दू घरों की तरह हमारे यहां भी थे ही। स्‍कूल के मुस्लिम शिक्षक के आने पर शीशे के बरतन अलग से दिए जाते थे। तो सहरसा में हमारे मुहल्‍ले में राशन की दुकान के जो मालिक थे वह मुसलमान थे। तो एक बार चीनी लेने जब हम गए तो दुकानदार ने बड़े प्रेम से हमें चाय दी तो आंख बचाकर पिता ने चाय नीचे गिरा दी पर मुझे मना नहीं किया और मैं चाय पीता रहा। इसी तरह मेरे घर के सामने एक मुस्लिम पड़ोसी रहते थे। वो साफ सुथरे लोग थे परिवार की नजरों में। तो वे कभी कभी मेरे घर मांस मछली भेज देते थे तो हम उनके ही बरतन में खा लेते थे इस पर रोक नहीं थी। क्‍योंकि गांव में चाचा आदि हमें मांस मछली खिलाते ही थे प्रेम से।
चाचा लोग मिलिट्री में रहे दो तीन एक दारोगा भी थे। तो पीने पिलाने का चलन था ही घर में। तो छोटे चाचा हैं वे बहुत प्‍यारे आदमी थे पर पीते भी काफी थे पर कभी पीकर दंगा नहीं करते थे। वे अपने बच्‍चों को भी एकाध ठेपी चखा दिया करते थे। तो मुझे भी चखाया एकाध बार । मुझे बहुत तीखा और बेकार लगा वह। सो कोई रूचि नहीं जगी। मैं ने देखा कि उनके बेटों में एक बड़ा होकर वैष्‍णवी स्‍वभाव का होता चला गया और पीने को लेकर वह अपने पिता से अब खफा रहता है। इससे यह साबित होता है कि आदतें केवल संघत का नतीजा नहीं हातीं। और बच्‍चों को सारी गलत सही चीजों का अनुभव करा दिया जाए तो वे खुद सही चीजों का चुनाव कर लेंगे।
इंटर के बाद ईच्‍छा शक्ति मजबूत करने और जांचने का एक दौर चला था लंबे समय तक उसके तहत मैंने सिगरेट का एक पैकैट अपने आलमीरे में ला रखा था। वह तीन चार साल तक रखा रहा मैंने कभी उसे पीने की जरूरत नहीं समझी। बादमें एक दिन मुझे कुछ सिगरेटें गायब मिलीं तो पता चला कि छोटे भाई ने सिरगरेट पीना सीख लिया है और उसी ने गायब कर दिया है। इससे मुझे यह सीख मिली कि ईच्‍छा शक्ति मापने का मेरा तरीका गलत था। इससे अपनी ईच्‍छा शक्ति तो ठीक ही रहेगी दूसरे में गलत ईच्‍छा ओं का बीजारोपन संभव है।
यूं ईच्‍छा शक्ति के इस खेल ने मुझे निजी तौर पर मजबूत भी किया। एक बार जिला स्‍कूल के एक शिक्षक की शादी में पिता की जगह उनका प्रतिनिधित्‍व मैं कर रहा था। तो खान पान के दौरान जब सिगरेट की ट्रे सामने आयी तो लड़कों में किसी ने व्‍यंग्‍य किया कि मेरी मजाल कहां है सिगरेट पीने की , खबर पिता तक चली जाएगी तो …। बात मुझे लग गयी और मैंने उसी समय सिगरेट जलायी और खासंते हुए उसे पीया। यह जिंदगी में पी गयी पहली सिगरेट थी।
इसके बाद अबतक कुल जमा पांच छह बार सिगरेट पी होगी मैंने। वह किसी साथी के दबाव में ही। तमाम नाम मैं याद कर सकता हूं। एक मित्र अमरेन्‍दू और राजू जी के दबाव में पी थी एक अग्रज कवि अरूण कमल ने पिलायी थी साइंस कालेज में , यूं वे भी सिगरेट के व्‍यसनी नहीं हैं पर उन्‍होंने पता नहीं उस दिन किसी सरूर में सिगरेट सुलगा कर मुझे भी ऑफर की तो हमेशा की तरह इस निर्देश के साथ सिगरेट ली कि आप आगे कभी फिर पीने को नहीं कहेंगे। एकाध बार एक दो सोंट चेतन के साथ ली । अंतिम बार पिछले माह एक सिगार पी थी धर्मेंद्र श्रीवास्‍तव के कहने पर। पता चला कि चालीस रूपये की एक है। पी तो वह बुरी नहीं लगी सिगरेट की तरह। उल्‍टे वह मीठी लग रही थी मैंने सोचा इसे तो मीठे पान की तरह खाया जा सकता है। पर इतनी मंहगी चीज का पीना जनहित में तो नहीं है जनता के लेखक के लिए …. जारी

>चांद को लेकर चली गई है दूर बहुत बारात – काफी हाउस में साहित्‍यकारों की हुड़दंग – होली मिलन

मार्च 10, 2009

>

कनॉट प्‍लेस स्थित काफी हाउस, मोहन सिंह प्‍लेस में पिछले शनिवार 7 मार्च को हर साल की तरह राजधानी के कवियों-कथाकरों-गीतकारों-गजलकारों ने होली पर अपनी-अपनी हांकी। जिसमें कुछ बकवास और कुछ रंग-रास साथ साथ चलते रहे। यूं इसे नाम ही ब्रहृमांड मूर्ख महा-अखाड़ा दिया गया था। इस अखाड़े के ताउ थे मूर्खधिराज राजेन्‍द्र यादव। इसमें हर शनिवार यहां बैठकी करनेवाले लेखक शामिल थे। पहले इस बैठकी में इकबाल से लेकर विष्‍णु प्रभाकर तक शामिल होते थे। तब हिन्‍दी उर्दू अंग्रेजी की अलग अलग टेबलें लगती थीं। इधर के वर्षों में यह आयोजन व्‍यंग्‍यकार रमेश जी के सौजन्‍य से होता रहा है। वे अपनी टेबलों पर विराजमान लेखकों के बीच खड़े होकर घंटों अपनी होलियाना बेवकूफियों का इजहार करते रहे।

बैठक में पंकज बिष्‍ट को काफी हाउस का अंतिम पिटा मोहरा पुकारा गया। इस अवसर पर भी रचनाकार अपनी रचनाएं सुनाने से बाज ना आए और उन्‍होंने अपनी अपनी धाक जमाने की कोशिश की। कुछ की जमी भी। सुरेश सलिल ने एक शेर सुनाया –



कोई सलामत नहीं इस शहर में का‍‍तिल के सिवा</span>

फिर उन्‍हें चांद की याद सताने लगी-

चांद को लेकर चली गई है दूर बहुत बारात

आओ चलकर हम सोजाएं बीत गई है रात

फिर लक्ष्‍मीशंकर वाजपेयी ने सुनाया-

चाहे मस्जिद बाबरी हो या हो मंदिर राम का

जिसकी खातिर झगड़ो हो वह पूजाघर किस काम का

फिर वे जमाने से शिकवा में लग गए-

एक जमाने में बुरा होगा फरेबी होना

आज के दौर में ये एक हुनर लगता है

रेखा व्‍यास ने अपना दर्द गाया फिर –

जब से बिछ़डे हैं रोए नहीं हैं हम

बाल जो छुए थे तूने धोए नहीं हैं

फिर रमेश जी ने राजेन्‍द्र यादव को खलनायक बताते हुए साधना अग्रवाल को खलनायिका घोषित किया। फिर अनवार रिजवी ने मिर्जा मजहब जानेसार का चर्चित शेर सुनाया-

खुदा के वास्‍ते इसको न टोको

यही इस शहर में कातिल रहा
है

इसके बाद ममता वाजपेयी ने फूल-पत्‍तों के दर्द को जबान दी-

मेरी मंजिल कहां मुझको क्‍या खबर

कह रहा था फूल एक दिन पत्तियों से

>कौन मक्‍कार उन्‍हें दिखाता है जंगल की तरह – कुमार मुकुल

मार्च 2, 2009

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श्रीकांतजी के बहाने – कुछ संस्‍मरण
श्रीकांत के साथ रहकर मैंने जाना कि पत्रकारिता एक ठीम वर्क है और इस रूप में वह सत्‍ता है , जन की सत्‍ता किसी भी सत्‍ता के मुकाबिल एक ठोस सत्‍ता। पत्रकार कोई सर्वज्ञानी शख्सियत तो है नहीं कि वह सारी दुनिया की खबर रखें हां अपने इस टीमवर्क की बदौलत वह सबको काबू में रखता है। वह जनता के पत्रों को आकार देता है, वह पत्रकार है। इस रूप में वह जन से जुड़ी तमाम विरादरियों से जुड़ा होता है। श्रीकांत से जुड़ी उस विरादरी से जुडकर अनजाने ही मैं भी जनता की उस ताकत का हिस्‍सेदार हो गया, अब मेरी आवाज में भी दम आने लगा,बातों की विश्‍वसनीयता बढने लगी।
जेपी यादव,के बालचन,प्रियरंजन भारती,अजय कुमार,प्रबल महतो और अन्‍य दर्जन भर पत्रकार इस टीम के हिस्‍से थे। यह टीम खबरों का चरित्र तय करती थी। इसके लिए मार तमाम बहसें होती थीं। किसी भी खबर को दबा पाना संभव नहीं था क्‍योंकि एक जगह अगर संपादक खबर दबा दे तो दूसरी जगह उसका आना तय होता था फिर उस अखबार को भी अगले दिन उस खबर को जगह देनी होती थी जिसे वह अपने निजी आग्रह में कम आंक रहा था। इस टीम वर्क के चलते जन की सामान्‍य खबरें भी बडी हो जाती थीं और बाजार में उछाली जा रही खबरों का कद यह टीम छोटा कर देती थी।
श्रीकांत जब लालू प्रसाद को हीरो बना रहे होते थे तो दरअसल वे लालू के पीछे की जनता को जगह दे रहे होते थे। लालू प्रसाद के नाटक में जो जनता की छवियां थीं उसे ही वे आगे बढाते थे। राजनीतिकों को यह भरम हो सकता है कि वे बडे अदाकार है पर जनता सबसे बडी अदाकारा है इसे वह बराबर उन्‍हें महसूस कराती रहती है। पर जब मूल्‍यांकन करना होता था तो वहां श्रीकांत जन की ओर झुक जाते थे। इस तरह वे अपनी राजनीतिज्ञों से जुडी छवि को बराबर साफ करते रह पाते थे। नतीजा जब उन्‍हें लालू प्रसाद से सबसे जुडा देखा जा रहा था तभी उनकी पहली किताब आई,बिहार में चुनाव -जाति बूथ लूट और हिंसा, इस किताब के कुछ पन्‍ने पटना हाई कोर्ट ने उदाहरण के तौर पर लालू प्रसाद की सरकार के खिलाफ दिए गए एक फैसले में उद्धत किए थे।
यही पत्रकारिता की कला थी। जिसके श्रीकांत महारथी थे। इस तरह यह टीम अपने समय की राजनीति को तय भी करती थी जनता के पक्ष में। इस टीम वर्क के कई मजेदार परिणाम आते थे। तब मैं अमर उजाला के लिए पटना से रपटें लिखा करता था। एक बार जब अखबार के कानपुर एडीशन के संपादक और अग्रज कवि वीरेन डंगवाल ने मुझे कानपुर बुलाया तो मुझे यह देख हैरत हुई कि वहां के रिपोर्टर मुझे लेकर उत्‍साहित थे,वे पूछ रहे थे कि मैंने पटना में रहते हुए कलकत्‍ता में पकडे गए चारा घोटाले से जुडे एक आइएएस की गिरफतारी की खबर कलकत्‍ता के रिपोर्टर से पहले कैसे लिखा दी थी। तो यह था टीम वर्क का नतीजा। टीम वर्क के चलते हमारी खबरें खाली और अश्‍लील नहीं हाती थीं और हम जनता का सही चेहरा दिखा पाते थे और ऐसा नहीं कर पाने वालों को कवि आलोक धन्‍वा की तरह उंगली दिखाते हुए टोक पाते थे – वे नील के किनारे किनारे चल कर यहां तक आयी थीं …कौन मक्‍कार उन्‍हें जंगल की तरह दिखाता है …।
मेरे घर में मेरी बेरोजगारी को लेकर हमेशा मुझे नीचा दिखाया जाता था निकम्‍मा…। तो वही दौर था कि मैं भी कुछ कंपटीशन आदि क्‍यों नहीं कंपीट करता। इसी दौरान बीपीएससी का प्रश्‍नपत्र अगले दिन मेंरे हाथ लगा। देखा तो उसमें दर्जनों गलतियां थीं। मैंने तब नवभारत में संवाददाता रहे प्रबल से इसकी चर्चा की तो उन्‍होंने झटके सो कहा कल लिखकर दो तो -जरा देखें। तब मैं किसी अखबार में नहीं था। फीचर लिखा करता था पर खबरों के लिए तो किसी अखबार से जुडना होता था। पर प्रबल के कहने पर मैंने बीपीएससी के प्रश्‍नपत्र की गलतियां लिखकर रपट के रूप में दे दीं प्रबल को और अगले दिन मुझे यह देखकर हैरत हुयी कि अखबार के पहले पन्‍ने पर बाटम लीड के रूप में वह खबर छपी थी और बाईलाइन में मेरा नाम चस्‍पॉं था। मैं तो भीतर से गदगद हो गया। बाद में पता चलाकि उस खबर के आधार पर बीपीएससी ने हिन्‍दी माध्‍यम से परीक्षा देने वालों को कुछ नंबर एक्‍स्‍ट्रा दिए। तो यह था टीम वर्क का नतीजा।