>व्‍यंग्‍य

>दुश्‍मन

हैदराबाद के उस अखबार के दफ्तर में प्रवेश के पहले ही दिन मेरे सांस्‍थानिक अभिभावक ने मुझे उसकी बाबत बता दिया था – कि देखिए वहां एक दुश्‍मन भी है आपका। पर आपको इससे क्‍या लेना-देना है- आज के जमाने में दुश्‍मनी कौन निभाता है,काम से काम रखिएगा, पर इसका यह मतलब नहीं कि उससे डर के रहिएगा। अरे रे उसकी औकात ही क्‍या है …पर क्‍या कीजिएगा कि समय ही ऐसा है कि …
जिस संस्‍थान में मुझे काम करना था उसके बास का गोतिया था वह- ठीक है, गोतिया शब्‍द खुद दुश्‍मनी का परिचायक है नहीं तो उसे भैयाड़ी नहीं कहा जाता- पर इस शब्‍दावली के गांव में जो अर्थ निकलते हैं महानगर की एक लोकतांत्रिक सी संस्‍था में उसके विपरीत मानी हो ही जाना है्…
अब गांव में बास चाहे इसकी जमीन पर नजर रखता हो पर इस अज्ञात कुलशीलों की भीड़ महानगर में वह उसे गले लगाकर नहीं रखे तो करे क्‍या …
मेरे संस्‍थापक ने शब्‍दों से उसका जो खाका खींचा था तो लगा कि मेरा दुश्‍मन गांव के किसी बिगड़ैल बाभन जैसा होगा पर जब उसे देखा तो वह किराने के सेठ जैसा निकला … मैंने सोचा कि क्‍या दुर्गति है – इसकी तो यूं ही किसी दिन धुकधुकी निकल जाएगी सीढियां चढते। फिर शायद मुझे ही एुबुलेंस बुलानी पड़े। पर हाय रे विधाता – इस बनडमरू को ही मेरा दुश्‍मन बनाना था।मैं चिंता में पड़ गया कि इससे दुश्‍मनी क्‍या खाक निभेगी। और एक लोकतांत्रिक संस्‍थान में दुश्‍मन के बगैर रहा ही कैसे जा सकता है- फिर दुश्‍मन तो था ही वह नामालूम सा ही सही …

कचरा दिल्‍ली क्‍यों नहीं जा सकता

गांधी मैदान पटना के दक्षिण की सड़क पर चलता हुआ मैं इक्‍कीसवीं सदी की ओर जा रहा हूं। कल किसी और सड़क पर चलता हुआ भी मैं इक्‍कीसवीं सदी की ओर ही जा रहा होउंगा। यहां तक कि परसों अगर गांव की नदी से नहाकर खेतों की ओर जा रहा होउं तब भी मेरा जाना इक्‍कीसवीं सदी की ओर ही होगा। मैं अगर कहीं नहीं भी जाता रहूं, घर में बैठा रहूं तब भी गांधी मैदान वाली सड़क अगली सदी में जा रही होगी। मतलब इक्‍कीसवीं सदी में जाना एक सनातन सत्‍य है, उसको हमारे विकास या स्थिरता से कोई अंतर नहीं पड़ता।
तो इक्‍कीसवीं सदी को जाती इस सड़क के बाएं नेताजी सुभाष बाबू की मूर्ति है। जो गंगा की ओर इशारा कर रही है। मानो कह रही हो गंगा की ओर चलो। पर जिन्‍होंने सुभाष बाबू को पढा होगा वे जानते हैं कि सुभाष बाबू का इशारा दिल्‍ली की ओर है। उनका नारा था… दिल्‍ली चलो। यह नारा उन्‍होंने दूसरे विश्‍वयुद्ध के समय दिया था। तब से वह दिल्‍ली नहीं पहुंच पाए हैं। मूर्ति तो यही कह रही है। जिस राजनेता ने यह मूर्ति लगवाई है उसका लक्ष्‍य भी दिल्‍ली जाना ही होगा। वैसे तमाम राजनेता आज अमेरिका और थाइलैंड जा रहे हैं। शायद दिल्‍ली का रास्‍ता अमेरिका या थाइलैंड होकर ही जाता है। सुभाष बाबू भी दिल्‍ली जापान होकर जाना चाह रहे थे। विवे‍कानंद भी अमेरिका होकर ही भारत आए थे।
फिलहाल सुभाष बाबू की मूर्ति के आगे कचरा है और मवेशी बंधे हैं। मवेशियों की पगही कोई खोल दे तो वे भी शायद दिल्‍ली जाना पसंद करेंगे। पर क्‍या कचरा भी चलकर दिल्‍ली जाएगा। साहब अगर कचरा पटना के मुहल्‍लों से निकलकर शहर के मध्‍य राजपथ पर लगी इस मूर्ति तक आ सकता है तो वह दिल्‍ली क्‍यों नहीं जा सकता।

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