फ़रवरी 2009 के लिए पुरालेख

>मेरी पहली प्रेस कांफ्रेंस और मायावती से गांधी को लेकर सवाल

फ़रवरी 27, 2009

>श्रीकांत जी को राजेन्‍द्र माथुर सम्‍मान- कुछ संस्‍मरण नुमा

<पिछले पांच सालों से मैं दिल्‍ली में हूं ,और छठे छमाही ही पटना जा पाता हूं। पटना में मेरी दिनचर्या की शुरूआत हाती है श्रीकांतजी के घर से। जगते ही मुंह-हाथ धोकर आशियाना नगर की राह लेता हूं। इधर धूल उड़ाती स्‍कूल बसों ने सुबह का निकलना भी मुहाल कर रखा है तो बचता बचाता डेढ किलोमीटर के अपने पडोस में पहुंचता हूं श्रीकांतजी के यहां। दरवाजा खोलकर झांकते हुए आवाज देता हूं …तो आवाज आती है आ जाइए इधर कमरे में ही। देखिए तो कुछ पुराने दस्‍तावेज फैलाए वे बैठे हैं। मिलते ही लगेंगे उसकी तफसीलें बताने।

बिहार में चुनाव-जाति,बूथ लूट और हिंसा नामक अपनी पहली किताब के आने के बाद मैं जब भी श्रीकांत जी के यहां गया तो उन्‍हें इसी तरह दस्‍तावेजों में सिर खपाते पाया। पहली किताब में चुनाव और जाति के दर्जनों आंकड़ें उन्‍होंने मुझसे भी सीधे करवाये थे। हिसाब किताब से मुझे शुरू से एलर्जी है सो भीतर से मैं कुढता रहता पर काम करता जाता। अक्‍सर गलतियां करता तो बोलते वे – एकदम खतमें हैं आप,एगो काम नहीं कर सकते हैं ठीक से। मैं हंसता रहता ।

फिर तो पहली किताब की ही जो धूम रही कि दस्‍तावेज तलाशने की अध्‍ययन और खोज-पडताल में लगे रहने की उन्‍हें बीमारी सी हो गयी। पर नतीजे में हर साल एक जरूरी किताब सामने ले आते वे बिहार के दलितों के विषय पर हो या 1857 पर।

मिलने पर वे कथा की शक्‍ल में बात शुरू करते। आप लोग क्‍या कविता करते हैं , इ देखिए कविता … गोप के । जनेउ आंदोलन के समय की है यह कविता … आदि आदि।

पहली बार श्रींकांत जी के यहां अग्रज कथाकार मित्र प्रेम कुमार मणि लेकर गये थे जो उनके पडोंस में ही रहते हैं। हम पहूंचे तो श्रीकांतजी एक चौकी को लेकर परेशान थे जो उनके आंगन में पड़ी थी और जिसे उपर छत पर चढाना था। घर की गोल सीढियां ऐसी थीं कि चोकी को उपर ले जाना संभव ना था। तब मैंने कहा कि एक मोटी रस्‍सी का इंतजाम कीजिए। फिर रस्‍सी से बांध कर चौकी को खींच कर हमलोगों ने उपर किया। अब उस पर बैठकर धूप खाने का मजा लेने लगे थे हमलोग सुबह सुबह। वहीं चाय नाश्‍ता आता रहता। गप्‍प चलता रहता मार दुनिया जहान का।

सहरसा में महाप्रकाश जी,पटना में राजूजी ,अजय और श्रीकांत जी के घर का जितना अन्‍न खाया है मैने उसका क्‍या कहना…। श्रीकांत जी का पेट हमेशा खराब रहता और भाभी जी इतना अच्‍छा नाश्‍ता खाना बनातीं कि वहां कुछ देर बैठते ही भूख लग जाती। खाते खाते ही बीच में श्रीकांत जी टोकेंगे चल जल्‍दी से ओराव तनी घूम आवल जाए। फिर मणि जी, सुरेन्‍द्र किशोर,चेतकर झा या आस पास के दर्जनों लोग जो पढने लिखने में रूचि रखते हों उन्‍हें तलाश कर हम बहस-मु‍बाहिसा का एक दौर चला लेते।

लौटते तो बारह बज रहे होते । मैं उनकी ओर देखता कि अब चलूं तो बोलते अरे कहां जाइएगा चलिए एगो प्रेस कांफ्रेंस कर लिया जाए या किसी नेता के यहां हो लिया जाए। वह पत्रकारिता सीखने का मेरा आरंभिक दौर था। उन्‍हीं के साथ खाकर मैं चल देता।

अखबार में इंट्रो कैसे लिखा जाता है यह पहले पहल उन्‍होंने ही बताया था। कहते एकदम बुरबके हैं एतना बडका बडका बात करते हैं और इंट्रो लिखना नहीं जानते। देखिए इ एके पैरा में सब प्रमुख बात को रख देना होता है इंट्रो में…। समीक्षा आदि ही उस समय तक लिखता था मैं। पहला फीचर उनके कहने पर ही लिखा था मैंने। पटना चिडिया खाने में एक आदमी बाघ के पिजडें में चला जात था उसे दुलारता नहलाता आदि। तो उसी पर मैंने लिखा- शेरों का चरवाहा …। लीड के रूप में छपा वह फीचर। फिर तो हिन्‍दुस्‍तान में लगातार लिखने लगा मैं।

एक मजेदार वाकया है। श्रीकांत जी हमेशा मुझे लिखने को उकसाते कि इस पर लिखो उस पर लिखो। फीचर इंचार्ज नागेन्‍द्र जी को जब तब कह देते कि मुकुल से लिखवाइए। जबकि वे खुद मुझे छापते रहते थे। तो एक बार जब श्रीकांत जी ने उनसे कहा कि मुकुल से कुछ लिखवाइए तो वे चिढ गए और बोले कि खुद आप क्‍यों नहीं लिखवा लेते। अगले दिन जब मैंने अखबार देखा तो एक फीचर नुमा खबर मेरे नाम से छपी थी। चूंकि उस खबर को लेने जब वे गए थे तो मैं भी उनके साथ था तो मैंने सोचा कि ऐसे ही मेरे नाम से दे दिए होंगे श्रीकांत जी पर जब मैंने अखबार पलटा तो आगे चार और फीचर मेरे नाम से था। तब मुझे याद आया पिछले दिन का वाकया जब फीचर इंचार्ज ने उन पर व्‍यंग्‍य किया था कि खुद क्‍यों नहीं छाप देते मुकुल को…।

अखबार की पहली नौकरी मुझे श्रीकांत जी ने ही दिलवायी थी जहां मैंने पहली बार एक अखबारी दफ़तर में काम करने के तौर तरीके सीखे , यूं मात्र डेढ महीने ही वहां टिक सका था मैं, तो यह तो अपनी फितरत रही है,1993-2005 के बीच दर्जन भर अखबारों पत्र- पत्रिकाओं में काम किया मैंने और अब अपने मित्र डॉ.विनय कुमार की पत्रिका मनोवेद के साथ जीता हुआ अपनी लड़ाइयां जारी रखे हूं।

तो पहली नौकरी का किस्‍सा यह था कि तब पटना के सबसे बड़े दैनिक हिन्‍दुस्‍तान में लगातार लिखने लगा था मैं छोटे फीचरों से लेकर पूरे पेज के आलेखों तक मार तमाम विषयों पर लिखकर मेरी छपास पुष्‍ट हो चुकी थी। तो एक दिन मेरे साथी दीपक गुप्‍ता ने मेरे घर आकर सूचना दी कि वह नौकरी पर बनारस जा रहा है। अब घर पहुंचते ही अपनी आभा जी ने मेरी खबर ली बडा पत्रकार बनते हैं , दीपक गये नौकरी पर, आप टापते रहिए यहां की गलियां। तो उसी शाम जब मैं हिन्‍दुस्‍तान गया तो श्रीकांत जी ने सीधे पूछा- नौकरी करनी है। मैंने पूछा- कहां। वे खिसिया गये – कहां क्‍या, करनी है कि नहीं , मन मसोस कर मैंने कहा – हां करनी है। तब उन्‍होंने बताया कि बनारस से एक हिन्‍दी साप्‍ताहिक निकल रहा है आइडियल एक्‍सप्रेस उसमें आपके त्रिलोचन जी सलाहकार संपादक हैं। त्रिलोचन जी का नाम सुनना था कि मैंने हां कर दी। और अगली ही शाम अपना बोरिया-बिस्‍तर ले मैं बनारस जा पहुंचा।

पर डेढ माह बार जब पहली छुटटी पर पटना आया तो वहां से पाटलिपुत्र टाइम्‍स फिर से निकलने वाला था। तो कई युवा साथी उसमें जा रहे थे तो मैं भी पटना रूक गया। अब फिर पटना की तो एक ही दिनचर्या थीं। जब भी फुरसत हो श्रीकांतजी के साथ लग जाना। अपने साथ रखते वे हमेशा ख्‍याल रखते कि मैं कहीं पान आदि पर भी एक भी पैसा खर्च ना करूं,अगर कभी मैं ऐसा करने की कोशिश करता तो वे नराज हो जाते – हमारे साथ घूमना है तो यह फंटूसी नहीं चलेगी।

फिर तो उनका साथ ही साथ था। आगे जब अमर उजाला की रिपोर्टिंग करनी थी तब तक उनके साथ घूम घूम कर मेरी अच्‍छी ट्रेनिंग हो चुकी थी। उनसे जो समय बचता वह उनके छोटे भाई अजय कुमार , जो अभी प्रभात खबर में संपादक है उनकी मोटरसाइकिल पर घूमते बीतता। बाद में अजय के साथ मेरा घूमना बढता गया।

श्रीकांत ने बिहार के तमाम चोटी के नेताओं से मेरा घरेलू परिचय कराया , यह अपनी कमजोरी रही कि आज उनमें से किसी से भी मेरे संबंध जीवित नहीं रहे। हालांकि उनमें एकाध अभी भी जब मिलजाते हैं तो टोक देते हैं।

लालू प्रसाद हो या नीतिश कुमार या जगदानंद सिंह या मंगनी लाल मंडल या सरयू राय, या सुशील मोदी या शिवानन्‍द तिवारी सबसे उनका घरेलू रिश्‍ता था, जहां भी जाते हम खाते पीते घर की तरह घूमते और चले आते। इनमें एक मंगनी लाल मंडल को छोड बाकी में मेरी रूचि नहीं रही हालांकि मंडल जी के यहां भी कभी गया नहीं मैं अकेले, पर वे अच्‍छे लगे। इसका कारण यह था कि उनकी किताबों में रूचि थी और उनसे मिलने हम किताबों के लिए ही गए थे और उन्‍होंने नौकरों से चाय नाश्‍ता मंगवाने के बदले खुद अपने हाथों से आत्‍मीयता से खिलाने पिलाने की कोशिश की थी। दूसरी बार जब दिल्‍ली में उनसे मिला तब भी वे बदले नहीं थे।

नहीं तो एकाध राजनीतिज्ञों के यहां तो मैंने जाना इसलिए छोड दिया क्‍यों कि अपने मातहतों को वे जिस बुरी आवाज में डांटते थे कि मुझे अच्‍छा नहीं लगता था और मैं उनसे बचता था। पहली बार जब लालू प्रसाद के यहां उनके साथ गया था तो नाश्‍ते की टेबल पर वहां फूलन देवी मौजूद थीं,सादे कपडों में बेहद सीधी सादी महिला लगीं वह।

लालू प्रसाद का रवैया बहुत मजेदार होता। एकबार रात के बारह बजे अचानक एक खबर के संदर्भ में पहुंचे हमलोग , शायद बिहार में राष्‍ट्रपति शासन लगने वाला था तब। पत्रकारों का काफिला खबरों की टोह में वहां जमा था। ऐसे मौकों पर मैं अक्‍सर तटस्‍थ रह माहौल आंकता रहता, खबरों में मेरी रूचि कम ही रहती तो जमात में किसी न किसी से मिल ही जाती। हम भी अपनी खबरे शेयर करते। आखिर पत्रकारिता एक टीमवर्क है।

तो वह चांदनी रात थी , कुछ ऐसा हुआ कि लालू प्रसाद और राबड़ी देवी अकेले रह गए और सारे पत्रकार भीतर टीवी पर खबरें सुनने चले गए। तो पहले लालू प्रसाद ने पूछा कि – कवना अखबार से बाड़..। जब जाना कि अमर उजाला से हूं तो मूडी हिलायी फिर कुछ देर बाद वे चांदनी रात सामने लगे धान के पौधों और गरई मछली की चर्चा करने लगे। मैं समझ गया – खबरें बनाने का उनका तरीका अच्‍छा था यह। इसी तरह वे कभी मछली बनाते तो कभी आलू दिखाते खबरों में बने रहते।

अपनी पहली प्रेस कांफ्रेस में मैं श्रीकांत जी के साथ ही पहुंचा था। गांधी मैदान के पास के बडे होटल ,शायद मगध, में मायावती और कांशी राम ठहरे थे। प्रेस कांफ्रेंस में अक्‍सर मैं देखता कि लोग चुप रहते और राजनीतिज्ञ खबरे लिखाते , सवाल उन खबरों पर ही होते । स्‍वतंत्र सवाल कम ही किये जाते। वहां भी वही हो रहा था। मैं नया मुल्‍ला था तो ज्‍यादा प्‍याज खाना ही था – सो मैंने मायावती से एक सवाल पूछा- कि जब गांधी को इस देश में गांधिवदियों ने ही अप्रासंगिक बना डाला है तो फिर उनका विरोध वे क्‍यों करती रहती हैं। इस सवाल में अप्रासंगिक शब्‍द मायावती जी की समझ में नहीं आया , पर अंग्रेजी के पत्रकारों ने पलक झपकते इसका तर्जुमा करते कहा कि इनका मतलब गांधी के इर्रेलिवेंट हो जाने से है, तब जाकर मायावती ने जवाब दिया कि यह हमार स्‍टैंड है ,न कि अंध विरोध कर रहे हैं हम।

जारी

>व्‍यंग्‍य

फ़रवरी 19, 2009

>दुश्‍मन

हैदराबाद के उस अखबार के दफ्तर में प्रवेश के पहले ही दिन मेरे सांस्‍थानिक अभिभावक ने मुझे उसकी बाबत बता दिया था – कि देखिए वहां एक दुश्‍मन भी है आपका। पर आपको इससे क्‍या लेना-देना है- आज के जमाने में दुश्‍मनी कौन निभाता है,काम से काम रखिएगा, पर इसका यह मतलब नहीं कि उससे डर के रहिएगा। अरे रे उसकी औकात ही क्‍या है …पर क्‍या कीजिएगा कि समय ही ऐसा है कि …
जिस संस्‍थान में मुझे काम करना था उसके बास का गोतिया था वह- ठीक है, गोतिया शब्‍द खुद दुश्‍मनी का परिचायक है नहीं तो उसे भैयाड़ी नहीं कहा जाता- पर इस शब्‍दावली के गांव में जो अर्थ निकलते हैं महानगर की एक लोकतांत्रिक सी संस्‍था में उसके विपरीत मानी हो ही जाना है्…
अब गांव में बास चाहे इसकी जमीन पर नजर रखता हो पर इस अज्ञात कुलशीलों की भीड़ महानगर में वह उसे गले लगाकर नहीं रखे तो करे क्‍या …
मेरे संस्‍थापक ने शब्‍दों से उसका जो खाका खींचा था तो लगा कि मेरा दुश्‍मन गांव के किसी बिगड़ैल बाभन जैसा होगा पर जब उसे देखा तो वह किराने के सेठ जैसा निकला … मैंने सोचा कि क्‍या दुर्गति है – इसकी तो यूं ही किसी दिन धुकधुकी निकल जाएगी सीढियां चढते। फिर शायद मुझे ही एुबुलेंस बुलानी पड़े। पर हाय रे विधाता – इस बनडमरू को ही मेरा दुश्‍मन बनाना था।मैं चिंता में पड़ गया कि इससे दुश्‍मनी क्‍या खाक निभेगी। और एक लोकतांत्रिक संस्‍थान में दुश्‍मन के बगैर रहा ही कैसे जा सकता है- फिर दुश्‍मन तो था ही वह नामालूम सा ही सही …

कचरा दिल्‍ली क्‍यों नहीं जा सकता

गांधी मैदान पटना के दक्षिण की सड़क पर चलता हुआ मैं इक्‍कीसवीं सदी की ओर जा रहा हूं। कल किसी और सड़क पर चलता हुआ भी मैं इक्‍कीसवीं सदी की ओर ही जा रहा होउंगा। यहां तक कि परसों अगर गांव की नदी से नहाकर खेतों की ओर जा रहा होउं तब भी मेरा जाना इक्‍कीसवीं सदी की ओर ही होगा। मैं अगर कहीं नहीं भी जाता रहूं, घर में बैठा रहूं तब भी गांधी मैदान वाली सड़क अगली सदी में जा रही होगी। मतलब इक्‍कीसवीं सदी में जाना एक सनातन सत्‍य है, उसको हमारे विकास या स्थिरता से कोई अंतर नहीं पड़ता।
तो इक्‍कीसवीं सदी को जाती इस सड़क के बाएं नेताजी सुभाष बाबू की मूर्ति है। जो गंगा की ओर इशारा कर रही है। मानो कह रही हो गंगा की ओर चलो। पर जिन्‍होंने सुभाष बाबू को पढा होगा वे जानते हैं कि सुभाष बाबू का इशारा दिल्‍ली की ओर है। उनका नारा था… दिल्‍ली चलो। यह नारा उन्‍होंने दूसरे विश्‍वयुद्ध के समय दिया था। तब से वह दिल्‍ली नहीं पहुंच पाए हैं। मूर्ति तो यही कह रही है। जिस राजनेता ने यह मूर्ति लगवाई है उसका लक्ष्‍य भी दिल्‍ली जाना ही होगा। वैसे तमाम राजनेता आज अमेरिका और थाइलैंड जा रहे हैं। शायद दिल्‍ली का रास्‍ता अमेरिका या थाइलैंड होकर ही जाता है। सुभाष बाबू भी दिल्‍ली जापान होकर जाना चाह रहे थे। विवे‍कानंद भी अमेरिका होकर ही भारत आए थे।
फिलहाल सुभाष बाबू की मूर्ति के आगे कचरा है और मवेशी बंधे हैं। मवेशियों की पगही कोई खोल दे तो वे भी शायद दिल्‍ली जाना पसंद करेंगे। पर क्‍या कचरा भी चलकर दिल्‍ली जाएगा। साहब अगर कचरा पटना के मुहल्‍लों से निकलकर शहर के मध्‍य राजपथ पर लगी इस मूर्ति तक आ सकता है तो वह दिल्‍ली क्‍यों नहीं जा सकता।

>अरेंज्‍ड मैरिज – कुमार मुकुल – कुछ कथा कहानी नुमा

फ़रवरी 11, 2009

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बना लेगी वह अपने मन की हंसी…

अक्‍सर वह
मुझसे खेलने के मूड में रहती है
खेलने की उम्र में
पहरे रहे हों शायद
गुडि़यों का खेल भी ना खेलने दिया गया हो
सो मैं गुड्डों सा रहूं
तो पसंद है उसे
मुझे बस पड़े रहना चाहिए
चुप-चाप
किताबें तो कदापि नहीं पढनी चाहिए
बस
मुस्‍कुराना चाहिए
वैसे नहीं
जैसे मनुष्‍य मुस्‍कुराते हैं-
तब तो वह पूछेगी-
किसी की याद तो नहीं आ रही
फिर तो
महाभारत हो सकता है
इसीलिए मुझे
एक गुड्डे की तरह हंसना चाहिए
अस्‍पष्‍ट
कोई कमी होगी
तो सूई-धागा- काजल ले
बना लेगी वह
अपने मन की हंसी
जैसे
अपनी भौं नोचते हुए वह
खुद को सुंदर बना रही होती है

मेरे कपड़े फींच देगी वह
कमरा पोंछ देगी
बस मुझे बैठे रहना चाहिए
चौकी पर पैर हिलाते हुए
जब-तक कि फर्श सूख ना जाए
मेरे मित्रों को देख उसे बहुत खुशी होती
उसे लग‍ता कि वे
उसके गुड्डे को देखने आए हैं
वह बोलेगी-देखिए मैं कितना ख्‍याल रखती हूं इनका
ना होती तो बसा जाते
फिर वह भूल जाती
कि वे उसकी सहेलियां नहीं हैं
और उनके कुधे पर धौल दे बातें करने लगेगी
बेतकल्‍लुफी से
बस मुझे
चुप रहना चाहिए इस बीच

मेरे कुछ बोलते ही
जैसे उसका गुड्डों का खेल
समाप्‍त होने लगता है
पहले तो खेल भंग होने के दुख में
काठ मार जाएगा उसे
फिर या तो वह रोएगी चुप-चाप
या सरापते हुए बहाएगी टेसुए-
कि बरबार कर दूंगी तुमको
फिर हम दोनेां में एक गुमनाम झगड़ा
शुरू हो जाएगा
जिसमें घर की जरूरी सार्वजनिक बातों के अलावे
अन्‍य आपसी मुद्दों पर
कोई बातचीत नहीं होगी
मेरे कपड़े साफ कर देगी वह
पर खाना देने नही आएगी
आएगी तो रोटी करीब फेंकते हुए देगी

हां
सोने से पहले
एक ग्‍लास पानी जरूर लेकर आएगी वह
-जिसे मैं चुप-चाप पी लूंगा

यह पानी का ग्‍लास
जैसे मील का पत्‍थर हो हमारे झगड़े में
अब-तक
इस एक ग्‍लास पानी के पत्‍थर को
पार नहीं कर पाए हैं हम

अक्‍सर पानी नहीं पीने के बाद
छोटे से मनाने जैसे झगड़े के बाद
फिर मिलन हो जाता
पर यह पूर्णिमा
माह में एक ही बार आता
बाकी चौथायी चांद से
चौदहवीं के चांद तक
कई स्‍तर होते हैं बीच में
पर साल में कभी-कभार
यह पूर्णिमा गायब होकर
चंद्रग्रहण का रूप ले लेता
असामाजिक अराजकतोओं के
राहू-केतु
जैसे उसके हमारे बीच के चंद्र को ग्रस लेते

इस दौर में लगातार
उसका हमला जारी रहता

मौखिक आलाप से
शारीरिक आदान-प्रदान तक
इस लड़ाई को मुझे
एक खेल की तरह निबाहना पड़ता
और अखीर में
अपनी ही लाश पर सवार होकर मुझे
चंद्रग्रहण काल की वैतरणी
खुद पार करनी पड़ती है …

फ़रवरी 7, 2009

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