>प्रेम के बारे में

>
प्रेम के बारे में

क्या बता सकता हूं मैं
प्रेम के बारे में
कि मेरे पास कोई प्रमाण नहीं है
सिवा मेरी आंखों की चमक के
जो जून की इन शामों में
आकाश के सबसे ज़्यादा चमकते
दो नक्षत्रों को देख
और भी बढ़ जाती है

हुसैन सागर का मलिन जल
जिन सितारों को
बार-बार डुबो देना चाहता है
पर जो निकल आते हैं निष्कलुष हर बार
अपने क्षितिज पर

क्या बताऊ मैं प्रेम के बारे में
या कि
उसकी निरंतरता के बारे में

कि उसे पाना या खोना नहीं था मुझे
सुबहों और शामों की तरह
रोज-ब-रोज चाहिए थी मुझे उसकी संगत
और वह है
जाती और आती ठंडी-गर्म सांसों की तरह
कि इन सांसों का रूकना
क्यों चाहूंगा मैं
क्यों चाहूंगा मैं
कि मेरे ये जीते-जागते अनुभव
स्मृतियों की जकड़न में बदल दम तोड़ दें
और मैं उस फासिल को
प्यार के नाम से सरे बाजार कर दूं
आखिर क्यूं चाहूं मैं
कि मेरा सहज भोलापन
एक तमाशाई दांव-पेंच का मोहताज हो जाए
और मैं अपना अक्श
लोगों की निगाहों में नहीं
संगदिल आइने में देखूं।

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2 Comments »

  1. >कि मेरे ये जीते-जागते अनुभवस्मृतियों की जकड़न में बदल दम तोड़ दें।बहुत सुंदर…….. बहुत सुंदर…

  2. 2

    >Prem ki gahri, nishkalush anubhutiaur vartmaan samay ki vikrit soch ko ek saath abhivyakt karti is jivant rachna ke liye badhai. Mere blog se apne pasand ki koi bhi rachna aap karvan par le sakte hain.


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