दिसम्बर 2008 के लिए पुरालेख

>प्रेम के बारे में

दिसम्बर 16, 2008

>
प्रेम के बारे में

क्या बता सकता हूं मैं
प्रेम के बारे में
कि मेरे पास कोई प्रमाण नहीं है
सिवा मेरी आंखों की चमक के
जो जून की इन शामों में
आकाश के सबसे ज़्यादा चमकते
दो नक्षत्रों को देख
और भी बढ़ जाती है

हुसैन सागर का मलिन जल
जिन सितारों को
बार-बार डुबो देना चाहता है
पर जो निकल आते हैं निष्कलुष हर बार
अपने क्षितिज पर

क्या बताऊ मैं प्रेम के बारे में
या कि
उसकी निरंतरता के बारे में

कि उसे पाना या खोना नहीं था मुझे
सुबहों और शामों की तरह
रोज-ब-रोज चाहिए थी मुझे उसकी संगत
और वह है
जाती और आती ठंडी-गर्म सांसों की तरह
कि इन सांसों का रूकना
क्यों चाहूंगा मैं
क्यों चाहूंगा मैं
कि मेरे ये जीते-जागते अनुभव
स्मृतियों की जकड़न में बदल दम तोड़ दें
और मैं उस फासिल को
प्यार के नाम से सरे बाजार कर दूं
आखिर क्यूं चाहूं मैं
कि मेरा सहज भोलापन
एक तमाशाई दांव-पेंच का मोहताज हो जाए
और मैं अपना अक्श
लोगों की निगाहों में नहीं
संगदिल आइने में देखूं।

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>अगर समझ सको तो, महोदय पत्रकार … वीरेन डंगवाल – कुछ संस्‍मरण नुमा : कुमार मुकुल

दिसम्बर 7, 2008

>हिन्‍दी कविता में जो कुछ प्‍यारे से लोग हैं उनमें एक हैं वीरेन डंगवाल। जिस गर्मजोशी से वे गले मिलते हैं मैं तो संकोच में पड़ जाता हूं और उनसे हाथ मिलाना तो एक अनुभव ही होता है जैसे पूरा वजूद ही हाथों से सौंप देते हैं वो, इस मजबूती से नये लड़कों में नाटक से जुडे राकेश ही हाथ मिला पाते हैं, जैसे हाथ छूटना ही नहीं चाहते …। उनसे पिछली मुलाकत तब हुई थी जब वे गले के कैंसर का आपरेशन कराकर घाव भरने का इंतजार कर रहे थे। मदन कश्‍यप भी साथ थे। डाक्‍टरों ने उन्‍हें बोलने से भी मना किया था पर जबतक वे रहे बोलने से बाज ना आए और हाथ मिलाया तो उसी अंदाज में।
उनसे पहला परिचय तब हुआ जब मैं बेरोजगार था, 1999 – 2000 का साल रहा होगा दिल्‍ली से काम खोजने में नाकाम होकर मैं पटना लौटा तो श्रीकांतजी ने एक माह बाद खबर दी कि अरूण कमल आपको खोज रहे थे बात कर लीजिएगा। मैंने अरूण जी से पूछा तो पता चला कि वीरेन डंगवाल ने पूछा था कि कुमार कहीं काम कर रहा है क्‍या …। मैं कविता की दुनिया में नया था और उस समय के भारत के नंबर एक रहे अखबार का सलाहकार संपादक की ऐसी जिज्ञासाएं थीं यह मेरे लिए आश्‍चर्यजनक था। मैंने काफी हिम्‍मत कर उनसे पूछा कि आपने याद किया था- तो बिना किसी भूमिका मे उन्‍होंने कहा अरे यार कुछ लिखो। मेरी समझ में कुछ नहीं आया। मैंने कुछ दिन बाद फिर पूछा कि क्‍या लिखूं – तो वे फिर बोले कि पहले कुछ लिख कर भेजो तो फिर देखते हैं।
मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था अब तक एकाध अखबार में काम कर चुका था एकाध साल। आखिर एक कालम लिखना तय किया। बिहार : तंत्र जारी है नाम से बिहार की राजनीतिक स्थिति पर एक व्‍यंग्‍य नुमा रिपोर्ताज लिख कर भेजा उन्‍हें। फिर सप्‍ताह भर बाद उनसे पूछा कि मेरा कुरियर मिला तो उन्‍होंने कहा अरे यार वह तो छप गया दूसरा अभी नहीं भेजा तुमने। फिर उन्‍होंने कहा कि- रपटें भी लिख लेते हो तो कुछ लिखों। तब मैंने एकाध खबर लिखी तो वे भी छप गयीं। फिर मैं अमर उजाला में साप्‍ताहिक कालम के अलावे रपटें लिखने लगा और अगले तीन सालों तक पटना से उसका रिपोर्टर रहा।
इससे पहले मै फीचर का आदमी था। पर अब रिपोर्टरों के साथ बैठकी होने लगी। अपना स्‍कूटर बेच कर मैंने हीरोपुक मोपेड लिया और दौड़ भाग करना सीख गया। दिनभर में एक दो जरूरी रपटें भेजनी होती थीं बाकी अखबारों के संवाददाता भी ऐसा ही करते थे। तब सीटीओ के पत्रकार कक्ष में हिन्‍दू के के बालचन, जेपी यादव जो अब इंडियन एक्‍सप्रेस में हैं, राजस्‍थान पत्रिका के प्रियरंजन भारती, नवभारत टाइम्‍स के सुकांत सोम आदि बैठते थे। अभी प्रभात खबर पटना के संपादक अजय भी तब बराबर वहां आते थे और श्रीकांत जी तो आते ही थे। तब बेरोजगार रहे गुंजन सिन्‍हा भी आते थे। अभी हाल में जेपी और बालचन दिल्‍ली आ गए तो उनसे मिलकर पुराने दिन याद हो आए।
इन सबकी संगत में हमारी रिपोर्टिंग चल निकली। नागार्जुन के बेटे सुकांत जी हममें सबसे सीनियर थे पर अक्‍सर उनका अखबार उनके साथ न्‍याय नही करता था उनकी खबर को बायलाइन कम ही मिलती थी। पर मेरी हर खबर को बायलाइन मिलती और अक्‍सर पहले पन्‍ने पर लीड भी मिलती इससे मेरी साख अच्‍छी बन गयी थी। हमलोग आपस में खबरों को बांटा भी करते थे। एक इस प्रेस कांफ्रेंस में चला गया तो दूसरा दूसरे में फिर खबरें शेयर कर लीं हां उन्‍हें लिखने का अंदाज सबका अलग होता था राजनीतिक दृष्टिकोण अलग होता था।
साल भर बाद वीरेनजी ने चाहा कि मैं अखबार के किसी एडीशन में नियमित काम करूं तो उन्‍होंने मेरठ जाकर मुख्‍य संपादक से मिलने को कहा मैं गया भी पर वे मुझे अखबार के नये एडीशन में चंडीगढ भेजना चाहते थे जनवरी के उन ढंडे दिनों में चंडीगढ जाकर नये अखबार की लांचिंग के लिए कसरत करने की मेरी हिम्‍मत नहीं हुयी सो मैं मेरठ गया और संपादक को अपनी चिट भिजवायी तो मुझे बुलाने की जगह वे ही बाहर मेरी कुर्सी के सामने आ खडे हुए और जब पूछा कि बताइए क्‍या कहना है तो जानने के बाद कि ये संपदक हैं मैं पहले हकबकाया फिर उठकर खडा हुआ और यूं ही कहा सब ठीक है, कि आप पटना में व्‍यूरो खोल दें तो अच्‍छा रहे। उन्‍होंने आश्‍वश्‍स्‍त किया और स्‍थनीय संपदक से मिलने को भेजा वहां चंडीगढ एडीशन के बारे में सूचना मिली पर मैं पटना एडीशन की जिद करता रहा। आखिर पटना लौट आया तब वीरने जी का फोन आया तो मैंने सब बातें बतायीं तो उन्‍होंने पूछा तुमने अपनी काम की फाईल आदि उन्‍हें दिखायी मैंने कहा नही उन्‍होंने फाईल आदि के बारे में पूछा नहीं तो वीरने दा नाराज हुए – कि तुम बिहारी बड़े चुतिया हो यार…। सुनकर मुझे हंसी आयी जो उन्‍हें फोन पर दिख तो रही नहीं थी … । खैर आगे की बातें फिर बाद में होंगी अभी उनकी एक कविता पढिए …


पत्रकार महोदय

‘इतने मरे’
यह थी सबसे आम, सबसे ख़ास ख़बर
छापी भी जाती थी
सबसे चाव से
जितना खू़न सोखता था
उतना ही भारी होता था
अख़बार।

अब सम्पादक
चूंकि था प्रकाण्ड बुद्धिजीवी
लिहाज़ा अपरिहार्य था
ज़ाहिर करे वह भी अपनी राय।
एक हाथ दोशाले से छिपाता
झबरीली गरदन के बाल
दूसरा
रक्त-भरी चिलमची में
सधी हुई छ्प्प-छ्प।

जीवन
किन्तु बाहर था
मृत्यु की महानता की उस साठ प्वाइंट काली
चीख़ के बाहर था जीवन
वेगवान नदी सा हहराता
काटता तटबंध
तटबंध जो अगर चट्टान था
तब भी रेत ही था
अगर समझ सको तो, महोदय पत्रकार !

जारी …

विष्णु बैरागी
जितना खू़न सोखता था
उतना ही भारी होता था
अख़बार।
आज दिन भर साथ चलेंगी ये पंक्तियां ।