अगस्त 2008 के लिए पुरालेख

>कविता भाषा का परिष्‍कार मांगती है – आलोक धन्‍वा

अगस्त 31, 2008

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>तेरे अंदर का झूठ – कुमार मुकुल

अगस्त 31, 2008

>तुझे लगे
कि दुनिया में
सत्‍य
सर्वत्र
हार रहा है

समझो
तेरे अंदर का झूठ
तुझको ही
कहीं मार रहा है।

>जो हलाल नहीं होता…दलाल हो जाता है – कुमार मुकुल

अगस्त 29, 2008

>करीब चौदह साल पहले अपनी तीसरी अखबारी नौकरी छोड़ने के बाद मैंने यह कविता लिखी थी एक डायरी की शक्‍ल में। जैसा कि अक्‍सर होता है मेरे साथ मैं कुछ लिखकर रख देता हूं और फिर बरसों बाद उसे देखता हूं तो वह कविता, कहानी, डायरी जो लगती है उस रूप में सामने रखता हूं। कुछ कविताएं तत्‍काल भी आती हैं पर अधिकांश रचनाओं को इसीलिए सामने आने में दसेक साल से ज्‍यादा लग जाते हैं,जबतक कि मैं उनसे संतुष्‍ट ना हो जाउं। 2007 में जब मित्रों को यह डायरी पढाई तो सबने कहा कि इसे सामने आना चाहिए, तब अभिषेक श्रीवास्‍तव ने इसे एक उपयोगी कविता कह जनपथ पर डाला भी था। इधर अनिल चमडि़या ने फिर इस कविता की याद दिलाते कहा कि यार इसे कहीं छपाना चाहिए, तो छप तो यह आगे-पीछे जाएगी ही, इसे फिर से पढें आप।

मेरे सामने बैठा
मोटे कद का नाटा आदमी
एक लोकतांत्रिक अखबार का
रघुवंशी संपादक है

पहले यह समाजवादी था
पर सोवियत संघ के पतन के बाद
आम आदमी का दुख
इससे देखा नहीं गया
और यह मनुष्‍यतावादी हो गया

घोटाले में पैसा लेने वाले संपादकों में
इसका नाम आने से रह गया है
यह खुशी इसे और मोटा कर देगी
इसी चिंता में
परेशान है यह
क्‍योंकि बढ़ता वजन इसे
फिल्‍मी हीरोइनों की तरह
हलकान करता है
और टेबल पर रखे शीशे में देखता
बराबर वह
अपनी मांग संवारता दिखता है

राज्‍य के संपादकों में
सबसे समझदार है यह
क्‍योंकि वही है
जो अक्‍सर अपना संपादकीय खुद लिखता है
मतलब
बाकी सब अंधे हैं
जिनमें वह
राजा होने की
कोशिश करता है

राजा,
इसीलिए
गौर से देखेंगे
तो वह शेर की तरह
चेहरे से मुस्‍कुराता दिखता है
पर भीतर से
गुर्राता रहता है

पहले
उसके नाम में
शेर के दो पर्यायवाची थे
समाजवाद के दौर में
एक मुखर पर्यायवाची को
इसने शहीद कर दिया
पर जबसे वह मानवधतावादी हुआ है
शहीद की आत्‍मा
पुनर्जन्‍म के लिए
कुलबुलाने लगी है
जिसकी शांति के लिए उसने
अपने गोत्र के
शेर के दो पर्याय वाले मातहत को
अपना सहयोगी बना लिया है

यह अखबार
इसका साम्राज्‍य है
जिसमें एक मीठे पानी का झरना है
इसमें इसके नागरिकों का पानी पीना मना है
गर कोई मेमना
(यहां का हर नागरिक मेमना है)
झरने से पानी पीने की हिमाकत करता है
तो मुहाने पर बैठे शेर की आंखों में
उसके पूर्वजों का खून उतर आता है
और मेमना अक्‍सर हलाल हो जाता है
जो हलाल नहीं हुआ
समझो, वह दलाल हो जाता है

दलाल
कई हैं इस दफ्तर में
जिनकी कुर्सी
आगे से कुछ झुकी होती है
जिस पर दलाल
बैठा तो सीधा नज़र आता है
पर वस्‍तुत: वह
टिका होता है
ज़रा सी असावधानी
और दलाल
कुर्सी से नीचे…

>कोई भी पूजा – कुमार मुकुल

अगस्त 26, 2008

>किसी ऊंचाई पर रहो
किसी वर्ग में
अन्त में आओगे
धरातल पर
वही देगी ठौर

हाशिया पर पड़े लोगों की
अंगुलियां पकड़कर ही
जा सकोगे किसी ऊंचाई पर

झुिग्गयों से निकल
निर्माणधीन इमारतों के चारो ओर
घूम-घूमकर
जब-तक हगेंगे नहीं
भवन-निर्माता मजूरों के बच्चे
कोई भी पूजा
तुम्हारी आलीशानियत को
शुद्ध नहीं करेगी

पहले उनके कुत्ते मूतेंगे
तुम्हारी जमीन पर
तब तुम्हारे बुल-डाग्स के लिए
बनेगी अटारी।

>बच्चों का कैंसर : एएलएल – कुमार मुकुल

अगस्त 23, 2008

>
कैंसर यानि कर्कट रोग को सामान्यत: असाध्‍य और कुछ हद तक दु:साध्‍य बीमारी के रूप में जाना जाता है। इसमें भी ब्लड कैंसर, जिसे हिंदी में रक्त कर्कट कहा जा सकता है, का नाम सुनकर आज भी लोगों की रूह कांप जाती है। यह अभी भी कम लोगों को पता है कि बच्चे भी कैंसर का शिकार होते हैं। क्योंकि आम राय में यह बीमारी बुरी आदतों का नतीजा होती है और स्वभावत: आदतें बड़ी उम्र में ही दुष्प्रभाव डालना शुरू करती हैं। पर कटु सच यही है कि आज बड़ी संख्या में बच्चे ब्लड कैंसर का शिकार हो रहे हैं।
कैंसर अस्पतालों में अगर आप असमय गंजे हो चुके बच्चों को देखेंगे तो सामान्यत: यह कल्पना भी नहीं कर पाएंगे कि अल्पवय में खल्वाट हो चुके सिरों पर बिना कोई शिकन लाए धमा-चौकड़ी में मग्न ये बच्चे उसी समय ब्लड कैंसर के आक्टोपसी पंजों से जूझ रहे होते हैं। और यह मजेदार तथ्य है कि कैंसर की मरणांतक पीड़ा को खेल-खेल में भुगत रहे इन बच्चों में से अिधकांश इस रक्त कर्कट को पराजित कर देते हैं। हां, यह एक विडंबनापूर्ण सच्चाई है कि एएलएल (एक्यूट लिम्फोब्लािस्टक यूकेमिया) से ग्रस्त बच्चों में से सत्तर-अस्सी फीसदी बच्चे इलाज के बाद रोगमुक्त हो जाते हैं। जबकि इसी बीमारी से ग्रस्त अधिक उम्र के लोगों में मात्र तीस प्रतिशत के ही कठिनाई से रोग मुक्त होने की उम्मीद रहती है।
रक्त की सफेद कोशिकाओं का कैंसर दो तरह को होता है। पहला एएलएल जिसमें कोशिका के लिम्फोसाइटस प्रभावित होते हैं और दूसरा ।डस् जिसमें कोशिका के मेवायड्स रोगग्रस्त होते हैं। बच्चों को अधिकांशत: एएमएल होता है और कीमोथेरेपी और रेडियेशन से इसे काफी हद तक ठीक कर लिया जा सकता है। एएलएल बड़ों को भी होता है पर दवाओं की टािक्सटी (जहरीलापन) झेलने की क्षमता बड़ों में बच्चों से काफी कम होने के कारण उनमें कई तरह की जटिल जेनेटिक असामान्यताएं पैदा होती हैं। फलत: बड़ों में एएलएल से पूर्णत: रोगमुक्त होने का अनुपात काफी कम होता है। ।डस् बड़ों के अनुपात में बच्चों को ज्यादा होता है। एक साल से कम उम्र के बच्चों को एएलएल ज्यादा होता है और वह एएमएल से ज्यादा खतरनाक होता है।
एएलएल के भी तीन प्रकार होते हैं। एल-1,एल-2,एल-3 कई शोधकर्ता एल-3 को एएलएल नहीं मानते हैं। इसे वे बरकिट्स लिंफोमा/ल्यूकेमिया पुकारते हैं। एल-3 बाकी दोनों एएलएल के मुकाबले अलग आचरण करता है।
एल-1 और एल-2 का उपचार एल-3 के मुकाबले थोड़ा भिन्न होता है।
एएलएल के इन प्रकारों में अंतर का आाधार उनकी कोशिकाओं का आकार-प्रकार होता है। एल-1 की कोशिकाओं का आकार जहां छोटा और समानुरूप होता है वहीं एल-2 की कोशिकाओं में कुछ कोशिकाएं जहां बड़ी होती हैं वहीं कुछ छोटी होती हैं।
एएलएल का असर अलग-अलग बच्चों में अलग-अलग होता है। कुछ बच्चे जहां तेजी से रोगमुक्ति की ओर बढ़ते हैं, वहीं कुछ की रोगमुक्ति में समय लगता है। एएलएल का असर कितना गहरा है इसे कुछ टेस्ट्स से जाना जाता है। बच्चे की उम्र और टीएलसी,टोटल ल्‍यूकोसाइट काउंट, के आधार पर यह तय किया जाता है कि मरीज की स्थिति क्‍या है। काउंटस एक लाख से अधिक हो तो बीमारी गंभीर मानी जाती है।
मोटा-मोटी काउंट के आधार पर मरीजों की तीन श्रेणियां बनाई जाती है। बहुत अच्छा, सामान्य और खतरनाक। यूके में पहली श्रेणी के सामान्य तोर पर दवा देते हैं और तीसरी ख़तरनाक श्रेणी पर शुरू से कड़ी निगाह रखनी पड़ती है।
रोग की सही स्थिति के ज्ञान के लिए रोगियों को अपने सारे टेस्ट ध्‍ौर्यपूर्वक कराने चाहिए। देखा जाता है कि कैंसर की शंका होते ही रोगी और मरीज घबरा जाते हैं और आशा करते हैं कि डाक्टर तुरत-फुरत उनका इलाज आरंभ कर दें। जबकि डाक्टर को सही ढंग से इलाज करने के लिए सारे टेस्ट रिपोर्ट्स देखना जरूरी होता है।
जीन टेक्नालोजी के विकास के साथ एएलएल की चिकित्सा में भी कई सहूलियतें बढ़ी हैं। आज उसका जेनेटिक पहलू जानना इलाज में कई तरह से मददगार होता जा रहा है।
एएलएल की चिकित्सा में उसका फीनो टाइप लिम्‍फोब्‍लास्‍ट, मार्बर्स, जानने से सुविधा होती है। इसके लिए रोगी के लिम्फोब्लास्ट, मार्बर्स, डीएनए इंडेक्स और जैनेटिक टेस्ट का सहारा लिया जाता है। लिम्फोब्लास्ट से यह पता चलता है कि रोगी में टीसेल्‍स इम्‍यूनोफीनोटाइप है या बी सेल्स। इस आधार पर दवाओं का अलग-अलग कोर्स होता है।
फिलाडेिल्फया क्रोमोजोम-यह एक तरह की जेनेटिक एबनार्मलिटी है।
एक कोशिका में जीन के 23गुणा दो बराबर 46 जोड़े होते हैं। इनके स्वरूप में जब कई तरह की गडबिड़यां होती हैं तो कैंसर जैसी बीमारी होती है।
एक तरह की गड़बड़ी को मोनोसोमी कहा जाता है। इसमें क्रोमोजान के जोड़े में से एक खो जाता है।
दूसरे तरह की गडत्रबड़ी को हायपरडिप्ल्वायडी पुकारा जाता है। इसमें 46 से अधिक क्रोमोजोम होते हैं। जैसे 50 या अधिक । जीन की गड़बड़ी यह होती है कि उसकी एक बांह टूटकर दूसरे से जुड़ जाती है। इसे ट्रांसलोकेशन पुकारा जाता है। जीन की इसी गड़बड़ी को फिलाडेिल्फया क्रोमोजीन कहा जाता है। क्योंकि इसका पता पहली बार अमेरिका के फिलाडेिल्फया नामक जगह पर शोध कर रहे वैज्ञानिकों ने लगाया यही क्रोमोजोम की यह गड़बड़ी सामान्यत: क्रोनिक मेल्वायड ल्यूकेमिया सीएमएल में पायी जाती हैं पर एएलएल के कुछ मरीज भी इसके शिकार होते हैं। ऐसे मरीजों को विशेष ध्‍यान और सतर्कता की जरूरत होती है।
फिलाडेिल्फया की गड़बड़ी में 23 क्रोमोजीमों के जोड़ों में से 9वें क्रोमोजोम में 22 वें क्रीमोजोम का एक हिस्सा टूटकर आ मिलता है। (9:22)
शरीर की कोशिकाओं में दोतरह के जीन हमेशा वर्तमान रहते हैं? एक को कैंसर रोधी जीन कहा जाता है तो दूसरे को आन्कोजीन (कैंसरस) पुकारा जाता है। इनके अनुपात में गड़बड़ी आने पर ही कैंसर होता है। यह गड़बड़ी कैसे आती है।
मां के गर्भ में एक्‍सरे के असर से या का अनाज में पेस्टीसाईड का असर भी एएलएल का कारक हो सकता है।
मां के खाने का भी असर होता है। पर कुछ ज्यादा फल खाने वाली महिलाओं के बच्चों को भी एएलएल देखा गया है।
एएलएल के वैसे मरीज जो फिलाडेिल्फया क्रोमोजीन के शिकार होते हैं उन्हें रोगमुक्ति के लिए बोनमैरो ट्ररांसप्लांट की जरूरत पड़ती है। ट्रांसप्लांट में कभी-कभार जान जाने का भी खतरा पैदा हो सकता है? आजकल ट्रसंप्लांट के विकल्प के रूप में एक दवा ईजाद हुई है इसे ग्लीभेक कीमो कहा जाता है? यह कैसे काम करता है। यह दवा (टेबलेट) कीमो के साथ देनी होती है। इसे जीवन भर खाना पड़ता है। ग्लीभेक कीमो के कुछ केसेज में यह काम नहीं भी कर सकता है। ट्रांसप्लांट और ग्लीभेक का खर्च करीब-करीब बराबर आता है।
एएलएल के फिलाडेिल्फया वाले मरीजों में एक तरह के प्रोटीन की वृिद्ध को रोग के उत्प्रेरककार के रूप में देखा जाता है। ग्लीभेक दवा उस प्रोटीन के अनुपात को कम करती है?
ब्लड कैंसर की एक विशेषता यह है कि इसमें सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती? अन्य कैंसरों से यह इसी मामले में अलग होता है। अन्य कैंसरों की तरह इसमें फस्र्ट, सेकेंड, थर्ड स्टेजेज नहीं होते। चूंकि इसमें गड़बड़ी खून में ही होता है। इसका मुख्य इलाज केमोथेरापी (केमिस्ट्री थेरापी) ही है। मतलब दवा और सिंकाई से। एएलएल के मरीजों को जब कीमो पड़ती है तो इसके असर से कोशिकाएं तेजी से मरती हैं। दवा से कैंसर कोशिकाएं अधिक मरती है। इसके चलते शुरू में थोड़ी कठिनाई होती है और दवा चलने के बाद ब्लड काउंट घर जाने पर रोगियों को भर्ती कर उन पर निगाह रखी जाती है। क्योंकि ऐसे रोगियों में प्रतिरोधी सफेद कोशिकाओं के तेजी से क्षरण के कारण उन्हें इंफेक्शन का खतरा रहता है। इलाज के दौरान जिन 20 प्रतिशत से 30 प्रतिशत मरीजों की जान जाती है वह रोग के कारण नहीं, दवा के बाद हुए इंफेक्शन से होती है। इसीलिए शुरू में रोग के इलाज के दौरान विशेष सफाई की जरूरत रहती है।
कुछ समय तक कीमी चलने के बाद सामान्य कोशिकाएं फिर से बढ़ने लगती हैं और कैंसर कोशिकाएं नष्ट होती जाती है? जल्दी ही कैंसर कोशिकाएं नियंत्रित हो जाती हैं।
पर बीमारी पुन: वापिस ना हो इसके लिए दवाओं का चार-पांच महीने का कोर्स चलाया जाता है। हर महीने बोन मैरो टेस्ट कर कैंसर कोशिकाओं की स्थिति को जाना जाता है।
बच्चों का अन्य तरह का कैंसर छह माह के इलाज से ठीक हो जाता हैं पर ।स्स् का इलाज लंबा चलता है। करीब दो-तीन साल तक।
ब्लड कैंसर में चूंकि बीमारी खून को ही प्रभावित करती है इसलिए यह अन्य कैंसरों से जटिल होता है। केमोथेरापी से सफलतापूर्वक रोग के विकास को नियंत्रित कर लिया जाता है। पर इसकी जटिलता का मुख्य कारण यह है कि अभी तरह ऐसा कोई तरीका इजाद नहीं किया जा सका है जिसके तहत यह पता किया जा सका है जिसके तहत यह पता किया जा सके कि अब मरीज के खून में एक भी कैंसर कोशिका नहीं है।
देखा गया है कि कीमो से शरीर की अधिकांश कैंसर कोशिकाएं मर जाती हैं पर शरीर की बनावट के चलते आदमी के ब्रेन में दवाओं का असर नहीं होता? मस्तिष्क को दवाओं के दुष्प्रभाव से बचाने के लिए शरीर के भीतर अपनी एक व्यवस्था है। इसे ब्लड ब्रेन बैरियर कहा जाता है। जब हम कोई दवा खाते हैं तो यह बैरियर दवाओं को बाकी शरीर की तरह सीधे ब्रेन (मस्तिष्क) में जाने से रोकता है।
इसी कारण जब कीमोथेरापी से एएलएल का आरंभ में इलाज शुरू हुआ तो जांच में कैंसर कोशिका नील दिखने पर भी बीमारी रक्त का नमूना लेकर जब जांचा गया तो कारण पता चला कि बैरियर के कारण ब्रेन तक दवा ठीक से नहीं पहुंचती थी और कैंसर कोशिकाएं वहां छुपी रह जाती थीं। तब इसका हल निकाला गया-रेडियोथेरापी इसमें ब्रेन के उस हिस्से की बिजली से सिंकाई की जाती है जहां कैंसर कोशिकाओं के छिपे होने की आशंका होती है।
इस तरह चार-पांच माह के भीतर कीमो और सिंकाई से सामान्यत: बीमारी को निर्मल कर दिया जाता है। कुछ लड़कों में देखा गया है कि उनकी बीमारी टैस्टीजर में छुपी रह जाती है। दरअसल ब्रेन की तरह का एक साधारण सा बैरियर टेस्टीज में भी करता है। टेस्टीज में बीमारी निकलने पर उसकी भी सिंकाई कराई जाती है।
सुरक्षात्मक दृष्टि से आगे डेढ़-दो साल तक कुछ दवाएं चलती रहती है। तीन-तीन महीने के दवाओं के कोर्स के बाद हर बार बोन मैरो टेस्ट कर कैंसर कोशिका की वापसी तो नहीं हुई यह जांचा जाता है। स्थिति लगातार नार्मल होने पर रोगी को रोगमुक्त करार दिया जाता है।
देर तक एएलएल होने का पता नहीं चलने पर मरीज के शरीर में टयूमर और गििल्टयां निकल सकती हैं। त्वचा पर भी गांठ उमर सकती है। इस बीमारी का गुर्दे और हड्डी पर बुरा असर पड़ सकता है। बीमारी बढ़ने पर हडि्डयों पर दाग-धब्बे दिखाई पड़ने लगते हैं। ग्रे से इसे जाना जा सकता है।
ब्लड कैंसर से कभी-कभी इलाज में देर होने पर आंख भी प्रभावित होती है और वहां टयूमर बनने लगता है। और देर करने पर आंख ट्यूमर के साथ बाहर आने लगती है। समय पर इलाज शुरू नहीं करने पर आंख जा भी सकती है। आंखों में ट्यूमर का मामला अधिकतर ।डस् में देखा जाता है, ।स्स् में ज्यादातर गांठे होती हैं जो गले के नीचे और अन्य जोड़ों पर होती हैं। एएलएल से तिल्ली बढ़ जाती है और लीवर भी प्रभावित होता है। इस सबका बराबर ध्‍यान रखना पड़ता है।
खून में कैंसर कोशिकाओं की उपस्थिति की जांच का एकमात्रा तरीका बोनमैरो टेस्ट है। इससे भी कोशिकाओं की स्थिति की शत-प्रतिशत जांच संभव नहीं हो पाती? ऐसे में कुछ ( ») मरीजों में अगर कहीं कैंसर कोशिकाएं छुपी-बची रह जाती हैं तो वे फिर से बीमारी को जगा देती हैं। ऐसे में दो-ढाई साल के बाद जब दवा बंद कर दी जाती है तब बीमारी फिर से उभर जाती है।
इसका पता तब चलता है जब मरीज बच्चे को बुखार आना या अन्य लक्षण आरंभ होता है। तब जांच करने पर अगर फिर से बीमारी के वापस होने का पता चलता है तो फिर से कीमोथेरापी आरंभ करनी पड़ती है। फिर इसी तरह पहले ज्यादा स्ट्रांग कीमो का प्रयोग करना पड़ता है।
कभी-कभी एक मरीज को दो-तीन बार बीमारी वापस आते पाया गया है। हर बार मरीज पहले से ज्यादा कमजोर होता जाता है और दवा की रेसीस्टेंसी भी घटती जाती है ऐसे मरीजों में। फिर खतरा बढ़ता जाता है।

>खुजली पहले मन में होती है फिर त्वचा पर

अगस्त 15, 2008

>खुजली को सामान्यत: एक भद्दी पर आसान बीमारी माना जाता है। पर एक तरह से यह रोगों की दुनिया में पहला कदम होता है। पहले आदमी को मानसिक खुजली होती है, यानी बेचैनी होती है। फिर वह शारीरिक खुजली का रूप ले लेती है।
खुजली दरअसल आपके विकारों को त्वचा के माध्‍यम से बाहर करने का शरीर का प्रारिम्भक तरीका है-जब मल-मूत्र पसीने के रास्ते शरीर अपनी गन्दगी को बाहर करने में असमर्थ होता जाता है, तब वह उसको त्वचा पर स्फोट के रूप में बाहर करता है।
सामान्यत: लोग खुजली होने पर दूरदर्शनी विज्ञापनों में प्रचारित दवाओं का सहारा ले उसे दबा देना चाहते हैं। कई बार आसानी से डेरोबिन, बी-टेक्स जैसे मलहम उसे ऊपर से ठीक भी कर देते हैं। ऐसे में या तो वह फिर त्वचा पर दूसरी जगह उभरता है या फिर त्वचा की ओर हो रहे दूषित द्रव को ये दवाएं भीतर से अन्य अंगों की ओर मोड़ देती हैं।
अब यह द्रव जिस अंग को अपना केन्द्र बनाता है, उस अंग को ये क्षति पहुंचाते हैं और उसे किसी रोग का नाम दे दिया जाता है। फेफड़े की ओर का रुख हो जाता है, तो टीवी होती है। जोड़ों की ओर हुआ, तो उसे गठिया पुकारा जाता है। हृदय की ओर हुआ, तो उसे हृदय रोग कहा जाता है। इसी तरह जिस अंग को यह द्रव दूषित करता है, उसे एक रोग का नाम मिल जाता है। आंखों की ओर होता है, तो गुहौरी या आंखों से कीच अपने, लाली रहने की बीमारी हो जाती है। ये सभी जीर्ण काटि के रोग होते हैं।
यहां भी स्थिति संभाली जा सकती है और उचित दवा के प्रयोग से उसे रोका जा सकता है। पर इस स्थिति के बाद आप हमेशा स्वस्थ रहने के लिए किसी दवा के मोहताज हो जाते हैं।
पर इस स्थिति में भी सही इलाज न हो, तो कैंसर जैसी असाध्‍य बीमारी की चपेट में आप आने लगते हैं।
कैंसर कभी भी अचानक नहीं हो जाता। जैसा कि कहा जाता है कि कोई आदमी पान-बीड़ी कुछ भी नहीं लेता या साधु था, उसे कैंसर हो गया। पर आप पता करेंगे कि उसे पहले कई छोटी बीमारियां रही होंगी, जिन्हें वह अज्ञानवश दबाता चला गया होगा।
कई बार खुजली का कारण पेट में या शरीर में पैदा हो गए कृमि (कीड़े) भी होते हैं। ऐसे में खुजली की जगह पर लवेंडर आयल का एकाध सप्ताह प्रयोग किया जा सकता है। इसके बाद उचित दवा लेनी पड़ती है।