>रामजी की महज़िद- (कथा)- कुमार मुकुल

>बात तब की है जब संत तुलसीदास कहारन के घर पलकर युवा हो चुके थे । उनका व्याह हो चुका था । उनकी विदुशी ब्राह्मणी पत्नी रत्ना की संगत ने उनके भीतर भी ज्ञान-पिपासा जगा दी थी और जीवन-जगत को लेकर उपजी जिज्ञासाएं उन्हे ंबेचैन करने लगी थीं । अयोध्या की गलियों की खाक छानते वे ऐसे सदगुरू की तलाश कर रहे थे जो उन्हें सत-चिद-आनंद के रहस्यों से अवगत करा सके ।
पर सालों मारे-मारे फिरने के बाद उन्हें पता चला कि `जाति न पूछो साधो की´ और `वसुध्ौव कुटुंबकम´ आदि पेट भरने की निरा तोता-रटंती बातें हैं । वहंा तो हर ज्ञनी-महात्मा तुलसीदास का गोत्र पूछने से षुरू करता और मां-बाप का भक्षक व कुभाखर और अछूत की संज्ञाओं से उन्हें नवाज देता । भला अयोध्या की विद्वतसभा में भीख मांगकर पेट पालने वाले इस दलित ब्राह्मण को कौन टिकने देता !

“जाति के, सुजातिके, कुजातिके, पेटागिबस
खाए टूक सबके, बिदित वात दूनी (दुनिया) सो
(तुलसीदास-कवितावली)´´

तुलसी सफाई देते रहे कि वे भी `आन बाट´ से नहीं, ब्राह्मणी के गर्भ से ही बाहर आए हैं । इसके जवाब में पंडितों का अलग ही तर्क होता था । वे `जन्मना जायतो शूद्रों´ की रट लगाते हुए संस्कार सीखकर द्विज बनने की बात करने लगते । अलबता कोई भी उन्हें संस्कारित करने को तैयार न था ।

अंत में उन्होंने मंदिरों में रहकर एकलव्य की तरह स्वयंशिक्षा प्राप्त करने की ठानी पर धुरंधर पंडितों ने मलेच्छ कहकर उन्हें वहां से भी दुर-दुरा दिया ।
तब उन्हें अपनी कहारनटोली के पास वीरान पड़ी महज़िद की याद आई । अब वहीं टिककर उन्होंने चिंतन-मनन की सोची । तब उदास मन से उन्होंने अयोध्या के स्वर्णखचित मंदिरों का मोह त्याग उस महजिद का रूख किया ।
जब वे वहां पहुंचे तो यह देखकर दंग रह गए कि उस वीराने में उन्हीं की तरह मुल्लाओं के सताए मुस्लिम फकीरों ने भी धूनी रमा रखी है । उन्हें देख तुलसी की खुषी का ठिकाना न रहा । वे भी फकीरों के साथ मांग-चांग खाने और सत्संग करने में समय बिताने लगे ।
इसी क्रम में वे खुद भी तुकें भिड़ाने लगे, उनका लिखना `स्वांत: सुखाय´ था पर आस-पास की वनवासी जमात को उसी में परमानंद मिलने लगा । वहां भीड़ जूटने लगी ।
जब यह खबर पंडितों को मिली तो उन्हें आगत खतरे का आभास हुआ । उन्हे ंलगा कि कल को कहीं तुलसी का भजन-कीर्तन उनकी पंडिताई पर भारी पड़ने लगा तो———। तब उन्होंने तुलसी को बुलावा भेजा कि वह वीराने को त्याग अयोध्या में ही कोई ठिकाना बना ले । पर अब-तक तुलसी की `स्वांत: सुखाय´ की अपनी दुनिया छोड़ पंडितों की धमगिज्जर में जाने की ईच्छा मर चुकी थी । सो उन्होंने पंडितों को अपनी राय बता दी । तब पंडितों ने दंड-भेद की नीति अपनाई । पर तुलसी ने उन्हें चुनौती देते हुए पाती लिख भेजा-
धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ, जोलहा कहौ कोऊ ।
काह की बेटीसों बेटा न ब्याहब, काहकी जाति बिगार न सोऊ ।
तुलसी सरनाम गुलामु है रामको , जाको रूचै सो कहै कछु कोऊ ।
मंागि के खैबो, मसीतको सोइबो, लैबोको एकु न दैबे को दोऊ ।
(कवितावली से)

उन्होंने साफ-साफ उन्हें बता दिया कि वे अगर नीच जाति से हैं तो हैं, किसी की बेटी से उन्हें बेटा नहीं ब्याहना————वे भिक्षा मांग कर और मसिजद में सोकर, गुज़ारा कर लेंगे पर ढोंगी पंडितों से दूर ही रहेंगे ।
अयोध्या के पोंगा पंडितों को चिढ़ाने के लिए यह काफी था । उन्होंने यह विचारकर संतोश किया कि देखें देव भाषा संस्कृत के सामने यह महपातर (श्राद्य कराने वाला महापात्र ब्राह्मण) तुलसी अपनी बोली-ठोेली (अवधी) को कैसे खड़ी करता है ।
उधर अपनी बिदुषी पत्नी और अयोध्या के स्वयंभू विद्वत समाज द्वारा ठुकराए गए एक वीरान महज़िद में वनवास भोगते तुलसीदास ने नाना पुराणों को खंगाल कर वनवास भोगते अपने प्रिय देवताओं राम-लक्ष्मण-सीता को खोज ही डाला । पंडितों को चिढ़ाने के लिए उन्होंने खुद को जहां श्रीराम के चरणों में बिछा दिया, वहीं पंडितों के प्रिय देवताओं का जमकर मजाक भी उड़ाया ।
इंद्रेषु न, गनेसु न, दिनेसु न, धनेसु न,
सुरेसु, सुर, गौरि, गिरापति नहि जपने ।
—————————————————————————————————————
तुलसी है बावरो सो रावरोई, रावरी सौ,
रावरेऊ जानि जिय¡ कीजिए जु अपने । (कवितावली से)

उन्होंने कहा कि उन्हें ब्रह्मा, शिव, गणेश आदि का नाम नहीं जपना है उन्हें बस राम नाम का भरोसा है । फकीरों ने टोका भी, कि किस अनाम देवता को भजने लगे तुम भी । इन्हें तो अयोध्या में भजता नहीं कोई । पर तुलसी का मन जो शबरी के जूठे बेर खाने वाले राम में रमा, तो रम गया । भावविभोर होकर जब वे जनगण को अवधी में सुनाना शुरू करते – `भए प्रगट कृपाला दीन दयाला, कौषल्या हितकारी, हरसित महतारी मुनिमन हारी————।´ तो वनवासियों की भीड़ जमा हो जाती । लोगों को लगता जैसे सचमुच रामजी प्रकट होने वाले हों । वहीं रहकर धीरे-धीरे तुलसी दास ने `रामचरित मानस´ को रच डाला और इस तरह वीरान पड़ी एक महज़िद भारतीय जनमानस में राम को पैदा करने वाली पवित्र जगह में परिणत होती चली गई ।
अयोध्या की पंडित विरादरी अब तुलसी के नाम से खौफ़ खाने लगी थी । एक दिन उन्होंने कुछ चोरों को `मानस´ की प्रति चुरा लाने को महज़िद में भेजा पर राम भक्त जनता के जागरण को देख चोर सिर पर पैर रख भाग चले ।
धीरे-धीरे रामकथा की ख्याति उस समय के महान सम्राट अकबर के कानों तक पहुंची । उन्होंने अपने सरदार और कवि अब्दुल रहीम खानखाना को तलब किया और तुलसी की बावत पूछ-ताछ की । रहीम ने भी तुलसी का गुणगान किया । रहीम तुलसी के मित्र थे । आखिर उनकी `निजमन की व्यथा´ अकबर के राजदरबार में कौन सुनने वाला था । वह तुलसी-रैदास जैसे संत कवि ही सुनते थे । लिहाजा वे उनकी मित्र-मंडली में ‘शामिल थे । इसीलिए जब अकबर ने रहीम से आग्रह किया कि आप तुलसीदास को सादर दरबार में बलाएं और नवरत्नों में ‘शामिल करें तो रहीम की खुशी का ठिकाना न रहा, कि चलो उनका एक हमदम उनके आस-पास रहेगा ।
अकबर का फरमान ले रहीम भागे-भागे तुलसी के पास आए और उनसे राजदरबार चलने का आग्रह किया । रहीम की बातें सुनकर तुलसी की आंखें भर आईं । एकबार हुआ कि चलें इस पुरानी महज़िद को त्यागकर थोड़ा जीवन रस का पान करें । यह राम जी की कृपा नहीं तो और क्या है, कि भिखमंगे के पास षाही दरबार में टिकने का फरमान आया है ।
पर अगले ही पल तुलसी दास को अपनी लालसाओं पर बड़ी ग्लानि हुई । क्या वे श्रीराम की इस प्यारी जन्मस्थली को छोड़कर राजदरबार में रह पाएंगे । वहां वे अपना सुख-दुख किसे निवेदन करेंगे । रामभक्तों से जुदा होकर वहां वे कैसे जीवित रह पाएंगे ? उन्हें उस महज़िद के कण-कण से राम नाम की ध्वनि पुकारती जाना पड़ी ।
तब अपने मन की बातें छुपाकर रहीम को उन्होंने अपने मित्र कवि कुंभनदास की तरह समझा दिया कि संतों को राजदरबार (सीकरी) से क्या काम, आते-जाते जूता (पनहिया) टूट जायेगा और हरि का नाम भी विसर जायेगा ।
पर रहीम तुलसी की मनौक्ल में लगे रहे । अंत में हाथ जोड़ तुलसी ने कहा-मित्र, राजा को तुम ही मेरा कश्ट समझा देना और कहना कि अगर वे मेरा कुछ भला करना ही चाहते हैं, तो यहीं महज़िद के अहाते में एक चबूतरा बनवा दें, राम भजन के लिए ।
अकबर ने खुशी-खुशी वहां एक सुंदर चबूतरा बनावा दिया । धीरे-धीरे उस जगह की ख्याति अयोध्या के मंदिरों के मुकाबले बढ़ती चली गई ।

Advertisements

5 Comments »

  1. 1

    >रोचक जानकारी-एक अच्छी पोस्ट. आभार.

  2. >अंत के बाद भी सिवाय भक्ति के और लेखक क्या कहना चाहता है स्पष्ट नहीं समझ पाया. वैसे मह्जीद में सोइबो का उदाहरण वामपंथियों के यहाँ मजीद ही प्रचलित रहा है.लेकिन यहाँ कुछ और जानकारी मिली.आभार.लेकिन इक और बात दलितवादी भी प्रचारित करते हैं,इसका ज़िक्र न पाकर अजूबा लगा.वैसे भक्ति-भावः में ऐसी चीज़ें हमेशा अनदेखी ही रह जाती हैं.शूद्र,गवार पशु-धन नारी /सब हैं ताड़न के अधिकारी

  3. >आ गये ना पुरारे ठर्रे पर ..तुलसी की पीडा को तो व्यक्त कर दिया पर रैदास की व्यथा का जिक्र तक नही कीया .हमारे मन्गल सिन्ह को मन्गलू अओर उनके मन्गलू को मन्गल सिन्ह .आप कवी हो लेखक हो आप शब्दो को तरोड मरोड सकते हो असल जीवन को नही .आप मे ओर मुझमे क्या अन्तर है , आप तुलसी के उस राम को लीये घूम रहे हो जो दशरथ का पुत्र था ओर मै उस राम को ढून्ड रहा हू जो रविदास ओर मीरा को प्यारा था .. मीरा ने कहा भी है ..”पायो जी मैने राम रतन धन पायो” जबकी आप जानते हो मीरी राम की नही क्रशन की दीवानी थी ..तुलसी इसलिये मशहूर नही हुआ की उसने राम कथा लीखी अपितु इसलिये विख्यात हुआ की वो एक कवी था .वो भी ब्राह्मण कवी .. . कविता मे जादु होता शब्दो का असर होता है ओर उसने जन मानस मे अपने शब्दो का जादु बिखेरा. नीच जाती के कवी को कौन पढेगा ..रविदास को कौन पढता है वो भी तो राम की ही बाते करता है हिन्दु धरम का गुनगान करता है ..परन्तु उसका गुनगान बेकार है उसकी कविता बेकार है क्यु कि वो चमार है ..ऐसौ कछु अनभै कहत न आवै।साहिब मेरौ मिलै तौ को बिगरावै।। टेक।।सब मैं हरि हैं हरि मैं सब हैं, हरि आपनपौ जिनि जांनां।अपनी आप साखि नहीं दूसर, जांननहार समांनां…( ravidas)आप दोहरा जीवन जी रहे हो कवी जी ..जब आप शब्दो से खेलते हो तो शोषण और व्यथा से पीडित व्यक्तीयो की बाते लीखते हो ओर जब असल जीवन जीते हो तो उस शोषण और व्यथा की आग मे घी दाल देते हो …हर दिन एक समान नही रहते है,,च्रक उपर नीचे होता रहता है ..मुझे कीसी कवी की ये पन्क्तीया याद आ रही है …एक दीनहाँ, एक दीनवे खड़े होकर पूछेंगे :कौन-सा रास्ताइस नरक के बाहर जाता हैएक दीनवे अपनी मज़बूत टांगों परखड़े होकर कहेंगे :हम जा रहे हैंएक दीनवे उनका तख़्त औरराज सींहासनउठा कर पलट देंगे………बुरा मत मानना अपने टिप्पणी के कहा ओर मैने मन की बाते लिख डाली ……..


RSS Feed for this entry

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: