जुलाई 2008 के लिए पुरालेख

>चरवाहे शहंशाह बन सकते हैं – कुमार मुकुल

जुलाई 30, 2008

>चरवाहे शहंशाह बन सकते हैं बने हैं शहंशाह
शहंशाह बन नहीं सकता चरवाहा चाहकर भी
तानाशाह बन सकता है वह

भोला-भाला व्‍यक्ति
बन सकता है पंडित ज्ञानी विराट
ज्ञानी हो नहीं सकता मूर्ख
पागल हो सकता है वह

आकाश छूती जमीन को
पाट सकते हो अटटालिकाओं से
खींच सकते हो
कई-कई और चीन की दीवार
उसे बदल नहीं सकते समतल भूमि में
खंडहर बना सकते हो
वहां बोलेंगे उल्‍लू।

>रामजी की महज़िद- (कथा)- कुमार मुकुल

जुलाई 28, 2008

>बात तब की है जब संत तुलसीदास कहारन के घर पलकर युवा हो चुके थे । उनका व्याह हो चुका था । उनकी विदुशी ब्राह्मणी पत्नी रत्ना की संगत ने उनके भीतर भी ज्ञान-पिपासा जगा दी थी और जीवन-जगत को लेकर उपजी जिज्ञासाएं उन्हे ंबेचैन करने लगी थीं । अयोध्या की गलियों की खाक छानते वे ऐसे सदगुरू की तलाश कर रहे थे जो उन्हें सत-चिद-आनंद के रहस्यों से अवगत करा सके ।
पर सालों मारे-मारे फिरने के बाद उन्हें पता चला कि `जाति न पूछो साधो की´ और `वसुध्ौव कुटुंबकम´ आदि पेट भरने की निरा तोता-रटंती बातें हैं । वहंा तो हर ज्ञनी-महात्मा तुलसीदास का गोत्र पूछने से षुरू करता और मां-बाप का भक्षक व कुभाखर और अछूत की संज्ञाओं से उन्हें नवाज देता । भला अयोध्या की विद्वतसभा में भीख मांगकर पेट पालने वाले इस दलित ब्राह्मण को कौन टिकने देता !

“जाति के, सुजातिके, कुजातिके, पेटागिबस
खाए टूक सबके, बिदित वात दूनी (दुनिया) सो
(तुलसीदास-कवितावली)´´

तुलसी सफाई देते रहे कि वे भी `आन बाट´ से नहीं, ब्राह्मणी के गर्भ से ही बाहर आए हैं । इसके जवाब में पंडितों का अलग ही तर्क होता था । वे `जन्मना जायतो शूद्रों´ की रट लगाते हुए संस्कार सीखकर द्विज बनने की बात करने लगते । अलबता कोई भी उन्हें संस्कारित करने को तैयार न था ।

अंत में उन्होंने मंदिरों में रहकर एकलव्य की तरह स्वयंशिक्षा प्राप्त करने की ठानी पर धुरंधर पंडितों ने मलेच्छ कहकर उन्हें वहां से भी दुर-दुरा दिया ।
तब उन्हें अपनी कहारनटोली के पास वीरान पड़ी महज़िद की याद आई । अब वहीं टिककर उन्होंने चिंतन-मनन की सोची । तब उदास मन से उन्होंने अयोध्या के स्वर्णखचित मंदिरों का मोह त्याग उस महजिद का रूख किया ।
जब वे वहां पहुंचे तो यह देखकर दंग रह गए कि उस वीराने में उन्हीं की तरह मुल्लाओं के सताए मुस्लिम फकीरों ने भी धूनी रमा रखी है । उन्हें देख तुलसी की खुषी का ठिकाना न रहा । वे भी फकीरों के साथ मांग-चांग खाने और सत्संग करने में समय बिताने लगे ।
इसी क्रम में वे खुद भी तुकें भिड़ाने लगे, उनका लिखना `स्वांत: सुखाय´ था पर आस-पास की वनवासी जमात को उसी में परमानंद मिलने लगा । वहां भीड़ जूटने लगी ।
जब यह खबर पंडितों को मिली तो उन्हें आगत खतरे का आभास हुआ । उन्हे ंलगा कि कल को कहीं तुलसी का भजन-कीर्तन उनकी पंडिताई पर भारी पड़ने लगा तो———। तब उन्होंने तुलसी को बुलावा भेजा कि वह वीराने को त्याग अयोध्या में ही कोई ठिकाना बना ले । पर अब-तक तुलसी की `स्वांत: सुखाय´ की अपनी दुनिया छोड़ पंडितों की धमगिज्जर में जाने की ईच्छा मर चुकी थी । सो उन्होंने पंडितों को अपनी राय बता दी । तब पंडितों ने दंड-भेद की नीति अपनाई । पर तुलसी ने उन्हें चुनौती देते हुए पाती लिख भेजा-
धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ, जोलहा कहौ कोऊ ।
काह की बेटीसों बेटा न ब्याहब, काहकी जाति बिगार न सोऊ ।
तुलसी सरनाम गुलामु है रामको , जाको रूचै सो कहै कछु कोऊ ।
मंागि के खैबो, मसीतको सोइबो, लैबोको एकु न दैबे को दोऊ ।
(कवितावली से)

उन्होंने साफ-साफ उन्हें बता दिया कि वे अगर नीच जाति से हैं तो हैं, किसी की बेटी से उन्हें बेटा नहीं ब्याहना————वे भिक्षा मांग कर और मसिजद में सोकर, गुज़ारा कर लेंगे पर ढोंगी पंडितों से दूर ही रहेंगे ।
अयोध्या के पोंगा पंडितों को चिढ़ाने के लिए यह काफी था । उन्होंने यह विचारकर संतोश किया कि देखें देव भाषा संस्कृत के सामने यह महपातर (श्राद्य कराने वाला महापात्र ब्राह्मण) तुलसी अपनी बोली-ठोेली (अवधी) को कैसे खड़ी करता है ।
उधर अपनी बिदुषी पत्नी और अयोध्या के स्वयंभू विद्वत समाज द्वारा ठुकराए गए एक वीरान महज़िद में वनवास भोगते तुलसीदास ने नाना पुराणों को खंगाल कर वनवास भोगते अपने प्रिय देवताओं राम-लक्ष्मण-सीता को खोज ही डाला । पंडितों को चिढ़ाने के लिए उन्होंने खुद को जहां श्रीराम के चरणों में बिछा दिया, वहीं पंडितों के प्रिय देवताओं का जमकर मजाक भी उड़ाया ।
इंद्रेषु न, गनेसु न, दिनेसु न, धनेसु न,
सुरेसु, सुर, गौरि, गिरापति नहि जपने ।
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तुलसी है बावरो सो रावरोई, रावरी सौ,
रावरेऊ जानि जिय¡ कीजिए जु अपने । (कवितावली से)

उन्होंने कहा कि उन्हें ब्रह्मा, शिव, गणेश आदि का नाम नहीं जपना है उन्हें बस राम नाम का भरोसा है । फकीरों ने टोका भी, कि किस अनाम देवता को भजने लगे तुम भी । इन्हें तो अयोध्या में भजता नहीं कोई । पर तुलसी का मन जो शबरी के जूठे बेर खाने वाले राम में रमा, तो रम गया । भावविभोर होकर जब वे जनगण को अवधी में सुनाना शुरू करते – `भए प्रगट कृपाला दीन दयाला, कौषल्या हितकारी, हरसित महतारी मुनिमन हारी————।´ तो वनवासियों की भीड़ जमा हो जाती । लोगों को लगता जैसे सचमुच रामजी प्रकट होने वाले हों । वहीं रहकर धीरे-धीरे तुलसी दास ने `रामचरित मानस´ को रच डाला और इस तरह वीरान पड़ी एक महज़िद भारतीय जनमानस में राम को पैदा करने वाली पवित्र जगह में परिणत होती चली गई ।
अयोध्या की पंडित विरादरी अब तुलसी के नाम से खौफ़ खाने लगी थी । एक दिन उन्होंने कुछ चोरों को `मानस´ की प्रति चुरा लाने को महज़िद में भेजा पर राम भक्त जनता के जागरण को देख चोर सिर पर पैर रख भाग चले ।
धीरे-धीरे रामकथा की ख्याति उस समय के महान सम्राट अकबर के कानों तक पहुंची । उन्होंने अपने सरदार और कवि अब्दुल रहीम खानखाना को तलब किया और तुलसी की बावत पूछ-ताछ की । रहीम ने भी तुलसी का गुणगान किया । रहीम तुलसी के मित्र थे । आखिर उनकी `निजमन की व्यथा´ अकबर के राजदरबार में कौन सुनने वाला था । वह तुलसी-रैदास जैसे संत कवि ही सुनते थे । लिहाजा वे उनकी मित्र-मंडली में ‘शामिल थे । इसीलिए जब अकबर ने रहीम से आग्रह किया कि आप तुलसीदास को सादर दरबार में बलाएं और नवरत्नों में ‘शामिल करें तो रहीम की खुशी का ठिकाना न रहा, कि चलो उनका एक हमदम उनके आस-पास रहेगा ।
अकबर का फरमान ले रहीम भागे-भागे तुलसी के पास आए और उनसे राजदरबार चलने का आग्रह किया । रहीम की बातें सुनकर तुलसी की आंखें भर आईं । एकबार हुआ कि चलें इस पुरानी महज़िद को त्यागकर थोड़ा जीवन रस का पान करें । यह राम जी की कृपा नहीं तो और क्या है, कि भिखमंगे के पास षाही दरबार में टिकने का फरमान आया है ।
पर अगले ही पल तुलसी दास को अपनी लालसाओं पर बड़ी ग्लानि हुई । क्या वे श्रीराम की इस प्यारी जन्मस्थली को छोड़कर राजदरबार में रह पाएंगे । वहां वे अपना सुख-दुख किसे निवेदन करेंगे । रामभक्तों से जुदा होकर वहां वे कैसे जीवित रह पाएंगे ? उन्हें उस महज़िद के कण-कण से राम नाम की ध्वनि पुकारती जाना पड़ी ।
तब अपने मन की बातें छुपाकर रहीम को उन्होंने अपने मित्र कवि कुंभनदास की तरह समझा दिया कि संतों को राजदरबार (सीकरी) से क्या काम, आते-जाते जूता (पनहिया) टूट जायेगा और हरि का नाम भी विसर जायेगा ।
पर रहीम तुलसी की मनौक्ल में लगे रहे । अंत में हाथ जोड़ तुलसी ने कहा-मित्र, राजा को तुम ही मेरा कश्ट समझा देना और कहना कि अगर वे मेरा कुछ भला करना ही चाहते हैं, तो यहीं महज़िद के अहाते में एक चबूतरा बनवा दें, राम भजन के लिए ।
अकबर ने खुशी-खुशी वहां एक सुंदर चबूतरा बनावा दिया । धीरे-धीरे उस जगह की ख्याति अयोध्या के मंदिरों के मुकाबले बढ़ती चली गई ।

>आलोचना के संपादक अकादमी पुरस्‍कार प्राप्‍त कवि अरूण कमल का भोगवादी गद्य – कुमार मुकुल

जुलाई 15, 2008

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अरूण कमल का गद्य : पारचूनी परचम

“कविता और समय´´ पुस्तक में संकलित `कविता का आत्म संघर्ष´ शीर्षक टिप्पणी में मुक्तिबोध के आत्मसंघर्ष को याद करते हुए अरुण कमल लिखते हैं- “कौन-सा शब्द हम चुनें और कौन-सा छोड़ दें। यह बहुत महत्‍वपूर्ण होता है।…बहुत बार तो हम सिर्फ शब्दों के प्रचलन को जांच करके पता लगा सकते हैं कि कवि का समाज से संपर्क कैसा है, कौन से विषयों को वह चुनता है और फिर उसकी पूरी दृष्टि कैसी है। यानी विषय से शुरू करके एक शब्द का, बल्कि हम तो कहेंगे एक मात्राा तक का जो चुनाव होता है वहां तक यह बहुत ही महत्‍वपूर्ण प्रक्रिया चलती रहती है।´´
उपरोक्त गंभीर वक्तव्य पुस्तक की `टिप्पणियां´ के अंतर्गत संकलित अपेक्षाकृत हल्के माने गए निबंधों में से एक से है। पुस्तक के आरंभिक `आलोचना´ खंड का अंतिम आलेख `हिंदी के हित का अभिमान वह´ नामवर सिंह पर है। आलोचना खंड में ही रघुवीर सहाय पर `न्याय की लड़ाई के पक्ष में´ शीर्षक से लिखते हुए अरुण कमल कहते हैं- “किसी भी कवि की निपुणता और उसके संपूर्ण काव्य-आचार तथा जीवन-दृष्टि की जांच एक उपयुक्त कविता के जरिए हो सकती है।´´ इसी को ध्‍यान में रख मैंने अरुण कमल के गद्य विवेक को समझने के लिए नामवर सिंह पर लिखा उनका यह आलेख चुना है। ध्‍यान से पढ़ने पर यह आलेख व्यंग्याभिनंदन लगता है। यानी व्यंग्य और अभिनंदन का मिश्रण। नामवर सिंह पर लिखित यह आलेख ग्यारह पृष्ठों में है जिसमें तीन पृष्ठ सीधे उनकी पुस्तक `कहना न होगा´ से उद्ध्‍ृत हैं।
अपने अभिनंदनालेख के अंतिम पैरों में गंभीर होते हुए अरुण कमल लिखते हैं- “आलोचक पर लिखा जाए और कुछ भी आलोचना न की जाए तो शोभा नहीं देता। आलोचना तो पवित्री (बोल्ड लेटर में) है जिसके बिना कोई भी साहित्य-भोज न तो आरंभ हो सकता है, न पूर्ण, न पवित्र।´´
लेखन में मात्रा और ध्‍यान की महत्ता बताने वाले अरुण कमल की ध्‍वनियों का संसार बाजारपरक और खाऊ किस्म का लगता है। वे आलोचना शोभा बढ़ाने (अभिनंदन) के लिए लिखते हैं। फिर आलोचना उनके लिए पवित्री (चरणामृत-परसादी) भी है और साहित्य भोज। अगर अरुण कमल मलयज से उनके समय के विवेक की सफाई मांग सकते हैं तो क्या हमें भी यह अधिकार मिलता है कि हम उनसे इन महाप्राण ध्‍वनियों का निहितार्थ पूछें? इसी पुस्तक में अरुण कमल रघुवीर सहाय की कविता पंक्ति पर आपत्ति करते लिखते हैं कि “यह कहने का भद्दा ढंग है´´ आलोचना पर बात करने का अरुण कमल का उपरोक्त ढंग कैसा है? क्या वह भोगवादी है? और पूंजीवादी भी, जिसका अच्छा खाका मुक्तिबोध अपनी `पूंजीवादी समाज के प्रति´ कविता में खींचते हैं।
“इतना काव्य, इतने शब्द, इतने छन्द-जितना ढोंग, जितना भोग है निबंध।´´
आगे अरुण कमल नामवर सिंह द्वारा अपने प्रिय आलोचक एफआर लिविस पर की गई टिप्पणी को ही नामवर जी के लिए उद्धृत कर देते हैं। इस तरह घर से एक पाई (शब्द) लगाए बिना ही रंग चोखा कर लेते हैं। फिर वे लिखते हैं, “हो सकता है डॉ नामवर सिंह में कई भटकाव हों…भटकना पसंद करूंगा। नामवर सिंह के साथ…।´´ `हो सकता है´, `शायद´, `संभावित´, `लेकिन´ के बहुप्रयोग वाली अरुण कमल की यह भाषा ही भटकाने वाली है। भटकना अरुण कमल को पसंद भी है! पर क्या यह अभिनंदन नामवर सिंह को भटका सकेगा! या वह पहले ही भटक चुके हैं? कहीं पर एक बार नामवर सिंह ने अपनी खूबी बताते हुए लिखा था- “मेरी हिम्मत देखिए मेरी तबीयत देखिए, सुलझे हुए मसले को फिर से उलझाता हूं मैं।´´
काव्य भाषा की समझ अरुण कमल को चाहे जितनी हो पर अपने समय की समझ खूब है। तभी तो बाजार की भाषा पर हमले की तेजी को देखते उन्हें प्रतिकार में कविता पर `अंधाधुंध टिप्पणी करने की जरूरत पड़ती है। इस टिप्पणी का शीर्षक `पारचून´ देते हैं वे। `पारचून´ में वे लिखते हैं “यदि ईश्वर है तो यह पूरी पृथ्वी उसके लिए पारचून की एक दुकान ही तो है, कविता भी ऐसी ही अच्छी लगती है, ढेर-ढेर चीज़ें, बेइंतहा, सृष्टि की एक अद्भुत नुमाइश-पारचून की दुकान।´´
कुल लब्बो-लुआब यह कि आलोचना अगर पवित्री (परसादी) है तो कविता पारचून की दुकान। चलिए कविता की कुछ तो इज्जत रखी। परसादी की तरह `मोफत´ की तो नहीं कहा। यूं आज मोफतखोरों का ही बोल-बाला है।
अकादमी पुरस्कार मिलने के बाद एक अंग्रेजी अखबार को दिए साक्षात्कार में अरुण कमल खुद को माक्र्सवादी बताते हैं। चलिए माक्र्सवाद का नया अर्थशास्त्र `पारचून´ में दृष्टिगोचर हुआ। पर सवाल उठता है कि फिर वे कवि श्रीकांत वर्मा को बाजार और उदारीकरण की पक्षधर कांग्रेस के प्रवक्ता होने के चलते क्यों कोसते हैं!
`मगध´ पर लिखते अरुण कमल लिखते हैं“मैं लगातार किंचित विस्मय के साथ सोचता रहा कि एक समर्थ कवि जो शासक दल का उच्चािधकारी और प्रवक्ता है, वह आज कैसी कविताएं लिख सकता है…एक कवि जो तत्कालीन जीवन के कष्टों और विडंबनाओं का साक्षी नहीं हो सकता, अन्याय और संहार का प्रतिवाद नहीं कर सकता। वह काल और शाश्वत जीवन के बारे में लिखने का अधिकारी है? पता नहीं ये विचार कवि द्वारा श्रीकांत वर्मा पुरस्कार लेने के पहले के हैं या बाद के। पुरस्कार के निर्णय में क्या आज भी श्रीकांत वर्मा की कांग्रेेसी सांसद पत्नी की भागीदारी नहीं है! क्या श्रीकांत वर्मा के बेटे की जालसाजी उजागर होने के बाद कवि के विचार उस पुरस्कार के प्रति बदले हैं? नहीं, तो श्रीकांत वर्मा से ऐसे सवालों के मानी क्या हैं? श्रीकांत वर्मा की पुस्तक `मगध´ उनके विवादास्पद व्यक्तित्व के बाद भी जिस निर्विवादिता को प्राप्त कर चुकी है, क्या उससे अरुण कमल को जलन होती है?
फिर अकादमी पुरस्कार भी क्या उसी कांग्रेसी या भाजपाई संस्कृति का एक हिस्सा नहीं है जिसके लिए अरुण कमल श्रीकांत वर्मा के कविता के अिèाकार को ही सवालों के घेरे में ला देते हैं। अकादमियों के स्वरूप पर प्रकाश डालते नामवर सिंह लिख चुके हैं- “नेहरू की दृष्टि में संस्कृति एक `एलीटिस्ट´ अवधारणा थी और उन्होंने रवींद्रनाथ की परंपरा में ही भद्रवर्गोचित अकादमियों की स्थापना की।´´
अरुण कमल की भाषा में `भोग´ और `चारण´ वृत्ति को बढ़ावा देने वाली ध्‍वनियां सर्वाधिक हैं। उनके लेखन का अधिकांश आपको एक किंकर्तव्यविमूढ़ता में ला खड़ा करता है। वे नामवर सिंह पर लिखते हैं कि `आलोचक का सबसे पहला काम शायद यही रहा है और है भी- लोगों को जगाए रखाना, जब सब सो रहे हों तब जाकर कुंडी पीटना।´ क्या साहित्य में जगाने से मतलब नींद खराब करना होता है! फिर `पहला´ के पूर्व `सबसे´ का अनोखा प्रयोग! दरअसल कहने को बातों का टोटा होने पर ही ऐसी जड़ाऊ भाषा गढ़नी पड़ती है।
अरुण कमल के अनुसार नामवर सिंह हिंदी के हित का अभिमान हैंµ“पूंजीभूत मेधा, नाभि, बंजारा, अकेले ही संपूर्ण प्रतिपक्ष हैं।´´ “और अविस्मरणीय अनुभव है उन्हें सुनना-निष्कम्प स्वर और `सस्वर गद्य´। `विचार दुर्भ्रिक्ष´ में विचारों का छप्पन भोग। इस छप्पन भोग के बिना शोभा ही नहीं बनती अरुण कमल के पैरे की। आखिर दुर्भिक्ष में भी `छप्पन भोग´ की पुरोहित कामना किस मानस को दर्शाती है?
मतलब साफ है कि कहीं आलोचना पवित्राी है, कहीं छप्पन भोग, कहीं दुधारू। या यूं कहें कि जो दुधारू है, वही आलोचना है। कहावत भी है कि दुधारू गाय की दो लात सही। सो अरुण कमल की नजर गाय के दूध पर रहती है। जब तक प्रशस्ति है तब-तक दुधारू है। फिर उन्होंने कविता को खूंटा बना डाला है। भला खूंटे से बंधे बिना, दुधारू हुए बिना आलोचना कैसे हो सकती है! जाने खुद पर ऐसी दुधारू शैली में आलेख देख नामवर सिंह क्या सोचते होंगे? क्योंकि “वागाडंबर भाषा का सबसे बड़ा दोष है´´ यह नामवर सिंह का ही कथन है।
कभी आलोचना को वे सिल (सिलबट्टा) बताते हैं जिस पर विवेक की छूरी सान चढ़ती है, कभी उसे ऐसा शिकारी कुत्ता बताते हैं जो सूंघ नहीं सकता। कुल मिला कर अरुण कमल के नामवर सिंह पर लिखे इस लेख के आधार पर आलोचना पर एक पॉप गीत तैयार किया जा सकता। वो जो गाना है ना गोविंदा वाला, “…मेरी मरजी। आलोचना तेरा ये करूं वो करूं मेरी मरजी।´´
फिर वे लिखते हैं कि नामवर सिंह के निष्कर्ष रचना के निष्कर्ष हैं। पर वे कौन से निष्कर्ष हैं, इस पर वे एक पंक्ति नहीं लिखते। भई जैसे `कहना न होगा´ से लेकर तीन पृष्ठ भरे वैसे ही नामवर सिंह पर `पहल´ के अंक से कुछ पृष्ठ निष्कर्ष पाठकों को उपलब्ध करा देते उद्धरण के रूप में। जैसे- एफआर लिविस पर टिप्पणी उपलब्ध कराई है।
आगे वे आलोचक के कर्तव्य की गंभीरता बतलाते हुए लिखते हैं“ढेर सारी कविताओं के, बीच ऐसी कविताओं को पहचानना भी दुष्कर है, जो कि एक श्रेष्ठ आलोचक को करना होता है- गाड़ी दौड़ में सबसे तेज दौड़ने वाली गाड़ी के साथ-साथ नजर टिकाए हुए – दौड़ना।´´ यहां कविता लेखन को घुड़दौड़ बना दिया गया। और आलोचक सट्टेबाज। नामवर सिंह का जो वक्तव्य अरुण कमल को मार्मिक लगा वह यह है कि “मैं तो चारण हूं, प्रत्येक राज-कवि का गुण गाने को तत्पर।´´ अकादमी पुरस्कार के बाद राज-कवि होने में काहे का संदेह।
आगे अरुण कमल लिखते हैं, “सृजन का अर्थ है शिष्ठ-भाषा को लोकभाषा के पास गर्भाधान हेतु ले जाना।´´ मतलब एक सांड भाषा दूसरी गाय भाषा। आगे वे दो तरह की आलोचना भी बताते हैं। एक पत्रकारी आलोचना जो दाएं-बाएं मुंह मारती चलती है, दूसरी अफसरी आलोचना जो गठिया पीिड़त बिना देह हुक्म चलाती है। क्या उनका आशय अज्ञेय, रघुवीर सहाय और अशोक वाजपेयी से है! और नामवर सिंह को वे दोनों के विरुद्ध पाते हैं। `कहना न होगा´ पर वे लिखते हैं, इसमें है, “विचार की एक मुख्यधारा और फिर सहायक नदियां। एक मुख्य घर और दालान बैठका।´´ गतिशील नदी और घर-बैठका का तुलनात्मक भानुमतीय विवेचन अरुण कमल के वश की ही बात है। वे कहते हैं कि नामवर सिंह की इस किताब के आधार पर `गाइड´ या `मैनुअल´ तैयार किया जा सकता है। कुल मिलाकर अरुण कमल कविता की अकादमिक पढ़ाई से बाहर आलोचना का काम समझ ही नहीं पाते। अंत में वे नामवर सिंह को तालस्तोय बताते हुए उनमें `लोमड़ी´ और `साही´ की क्षमताएं एक साथ देख पाते हैं। अच्छा है `साही´ पर एक केले का थंब गिरा देने की जरूरत है और लोमड़ी की बाजारू मुफ्तखोरी से तो लड़ने की जरूरत पड़ेगी ही।

पटना से प्रकाशित पाक्षिक न्‍यूज ब्रेक में यह टिप्‍पणी चार-पांच साल पहले प्रकाशित हो चुकी है।

>हीरोइन से मुलाकात – ‘ख’ महाशय के किस्‍से – कुमार मुकुल

जुलाई 14, 2008

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पुराना किस्सा है । तब ‘ख’ महाशय की हल्की भूरी मूछें उगनी आरंभी ही हुई थीं । जीवन की पहली प्रतियोगिता परीक्षा देकर वे बॉम्बे जनता से मुगल सराय लौट रहे थे । गाड़ी में लड़के भरे थे भागलपुर के कुछ बाद एक परिवार चढ़ा जिसमें एक खूबसूरत लड़की थी । उम्र होगी यही चौदह-पंद्रह ‘ख’ महाशय भी पंद्रह पार कर गए थे ।

‘ख’ महाशय ने लड़की को देखा तो सोचने लगे कि शायद लड़की बॉंम्बे जा रही है, हीरोइन बनने । सुंदर लड़की को बॉम्बे जनता में देखने के बाद इससे ज्यादा सोचने की कूबत अभी नहीं हुई थी ‘ख’ महाशय की ।

लड़की के भावी हीरोइन होने के ख्याल ने उनको थोड़ा सक्रिय कर दिया । उन्होंने लड़कों की भीड़ में उसके परिवार को उनकी आरक्षित सीटें दिलाने में मदद की । खुद उपर की सीट पर अब अपना बैग छोड़ नीचे आ बैठै
फिर सब नार्मल हो गया लड़की ने एक बार ‘ख’ महाशय से नीचे से पानी का बोतल मांगा तो लपककर `क´ ने बोतल दिया । उनका विचार पक्का हुआ कि इतनी खुली तो हीरोइन ही हुआ करती होंगी फिर शाम और रात होने लगी सभी खाने-पीने के बाद ऊंघने लगे ।

लड़की ‘ख’ महाशय के सिर के उपर वाली सीट पर लेट गई थी , गाड़ी बढ़ी जा रही थी अपनी समगति में । थोड़ी देर बाद ‘ख’ महाशय भी उंघने लगे, एक झपकी के बाद गाड़ी जब मोकामा पुल पार करने लगी तो ‘ख’ महाशय के चेहरे के आगे अचानक अंधेरा सा छा गया । दरअसल उपर सो रही लड़की की लंबी जुल्फें खुल कर नीचे लहराने लगी थीं ।

पहले तो ‘ख’ महाशय थोड़ा उजबुजाए फिर उन्हें बालों की महक अच्छी लगने लगी । आगे ‘ख’ महाशय ने सोचा कि बालों को समेट कर उपर कर दिया जाए । अखिर वे उठे और बालों को समेटने लगे । इतने कोमल मुलायम बाल उनकी कल्पना से बाहर थे । आखिर बालों को समेटने के बाद उन्‍होंने लड़की के हाथों को उठाकर बालों को उपर अटकाने की कोशिश की । इसमें लड़की की नींद उचटी और उसने अपना मुखड़ा घुमाकर उनकी ओर कर दिया ।

अब ‘ख’ महाशय खड़े थे सो खड़े रह गए । कोमल बालों की याद तलहथी से जा नहीं रही थी सो उन्होंने फिर से बालों में हाथ दे दिया और लगे संवारने । फिर उनके हाथ चेहरा सहलाने लगे । पूरा डब्बा एक लय-एक गति में डूबा उंघ रहा था ।

फिर ‘ख’ महाशय ने लड़की के ओठों केा छुआ ऊंगलियों से फिर कुछ हुआ कि उसके हाथ चूम लिए । फिर तो चुम्बनों की लड़ी लगा दी ।

आखिरी बार जब गाड़ी ने मुगलसराय लगने के पहले सीटी दी तो डब्बे के बाकी लड़कों के साथ ‘ख’ महाशय भी जगे । एक लड़के ने पीछे से हांक दी- उतरने का इरादा नहीं है क्या ? तब ‘ख’ महाशय ने पाया कि वे खड़े-खड़े लड़की के हाथों पर उंघ रहे हैं और उसके बाल उनके हाथों में हैं । उनका बैग । लड़की के सिरहाने था । अब लड़की को टुढ्डी से हिलाते हुए ‘ख’ महाशय ने बैग छोड़ने के लिए आवाज दी ।

लड़की आंखें मलती उठी और देखा कि ‘ख’ महाशय नीचे उतर रहे हैं । उतरते-उतरते ‘ख’ महाशय ने एक बार गरदन घुमा कर देखा-तो पाया कि लड़की मुस्कुराते हुए हाथ हिला रही है । ‘ख’ महाशय ने निश्‍चय किया कि लड़की जरूर हिरोइन बनने जा रही है वे सोचने लगे कि हिरोइन बनने के बाद वे उसे पहचानेंगे कैसे, उन्हें इतना तो याद आ रहा था कि लड़की मधुबाला जैसी सुंदर थी पर रात-अधेरा-नींद चेहरा कुछ साफ हो नहीं रहा था ।

>’ख’ महाशय के किस्‍से – कुमार मुकुल

जुलाई 12, 2008

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साहब की सोहबत

सुबह नहा धोकर कसरत करने के बाद ‘ख’ महाशय को लगा कि बाहर कोने में बैठना चाहिए, वहां ठंडी हवा होगी `रिल्के´ की कहानियों का अनुवाद हाथ में ले प्लास्टिक की एक कुर्सी उठाए आ गए एक पेड़ के नीचे । हां, यहां हवा तेज है । नहाने से अभी भीगे बालों से जब हवा लगी तो सिहरन सी हुई । फिर कुर्सी पर बैठे महाषय ‘ख’ किताब पलटने लगे । अचानक उन्हें लाने में खड़बड़-खड़बड़ की आवाज सुनाई दी । उन्होंने देखा कि सामने उगी लंबी घासों में धोबिन चिडि़यों का झुंड सक्रिय हैं ।

‘ख’ महाशय रूक कर उन्हें देखने लगे, वे उछल-उछल कर घास-पात को चोंच से उठा-उठाकर अपना भोजन तलाश रही थीं ।’ख’ महाशय ने सोचा-अच्छा तो ये सुबह-सुबह काम शुरू कर देती है, तो-काम ही जीवन है अब ‘ख’ महाशय खुद की बावत सोचने लगे । उन्होंने उठकर इस तरह चिडि़यों सा कोई काम किया या नहीं । हां- उठा, हाथ-मुह धोया । नहाया-कसरत किया । अब पढ रहा हूं, पर इसमें चिडि़यों की तरह कोई मिहनत का काम तो नहीं हुआ
‘ख’ महाशय यह सोच ही रहे थे कि पड़ोसी का कुत्ता दीवार फान लॉन में आ गया । अरे, यह कैसे छूट गया । डरे से वे कुछ समझते कि कुत्ता भी लॉन में चिडि़यों की तरह कुछ ढूंढने लगा । तो, यह भी काम कर रहा है । पर, अरे यह तो घास खा रहा है- ताबड़तोड़ ।

थोड़ी सी घास चरने के बाद उसने कुछ विचित्र हरकतें कीं, फिर लॉन के ही एक कोने में उल्टी कर दी । वे हां-हां करते दौड़ा तब-तक कुत्ता दीवार फांद अपने बाड़े में जा चुका था । ‘ख’ महाशय सोंचने लगे तो यह कुत्ता काम करने नहीं उल्टी करने आया था । मतलब, साहबों की सोहबत । रात में ज्यादा खाना, साहब तो बाथरूम गये होंगे यह आया इधर ।