जून 2008 के लिए पुरालेख

>दिल्‍ली में सुबह – कविता – कुमार मुकुल

जून 30, 2008

>
सीढि़यों से
गलियों में
उतरा ही था
कि हवा ने गलबहियां देते
कहा – इधर नहीं उधर
फिर कई मोड़ मुड़ता सड़क पर आया
तो बाएं बाजू ख्‍ड़ी प्रागैतिहासिक इमारत ने
अपना बड़ा सा मुंह खोल कहा – हलो
मैंने भी हाथ हिलाया और आगे बढ़ गया फुटपाथ पर-
दाएं सड़क पर गाडि़यां थीं इक्‍का – दुक्‍का
सुबह की सैर में शामिल सर्र- सर्र गुजरतीं

फ्लाईओवर के पास पहुंचा तो दिखा सूरज
लाल तलमलाता सा पुल चढ़ता
मैंने उससे पहले ही कह दिया – हलो…

आगे पुल के नीचे के सबसे हवादार इलाके में
सो रहे थे मजूर अपने कुनबे के साथ
उनके साथ थे कुत्‍ते
सिग्‍नलों के हिसाब से
दौड़-दौड़ सड़कें पार करते
वे भूंक रहे थे – आ जा दी

ट्रैफिक पार कर फुटपाथ पर पहुंचा
तो मिले एक वृद्ध
डंडे के सहारे निकले सैर पर
मैंने कहा हलो – उन्‍होंने जोड़ा
हां-हां चलो
हवाएं तो संग हैं ही … अभी आता हूं

तभी दो कुत्‍ते दिखे … पट्टेदार … सैर पर निकले
उन्‍हें देखते ही आगे-आगे भागती हवा
दुबक गई मेरे पीछे
खैर कुत्‍तों ने सूंघ-सांघ कर छोड़ा हवा को
अब मैं भी लपका
लो आ गया पार्क
और जिम – खट खट खटाक
लौहदंड – डंबल भांजते युवक

ओह-कितनी भीड़ है इधर
हवाओं ने इशारा किया- चलो उधर
उस कोने वाली बेंच पर
उधर मैं भी भाग सकूंगी बे लगाम
मैंने कहा – अच्‍छा …

अब लोग थे ढेरों आते-जाते
कामचोरी की चरबियां काटते
आपनी-अपनी तोंदों के
इनकिलाब से परेशान
आफिस जाकर आठ घंटे
ठस्‍स कुर्सियों में धंसे रहने की
क्षमता जुटाते
और किशोरियां थीं
अपने नवोदित वक्षों के कंपनों को
उत्‍सुक निगाहों से चुरातीं – टहलतीं
और बच्‍चे ढलान पर फिसलते बार-बार
और पांत में चादर पर विराजमान
स्‍त्री-पुरूष
योगा-स्‍वास प्रस्‍वास और वृथा हंसी का उद्योग करते

इस आमद-रफ्त से
सूरज थोड़ा परेशान हुआ
हवा कुछ गर्मायी और हांफने लगी

सबसे पहले महिलाएं गयीं बेडौल
फिर बूढ़े, फिर किशोरियां के पीछे
कुत्‍ता चराते लड़के गये

अब उठी वह युवती
पर उससे पहले उसके वक्ष उठे
और उनकी अग्रगामिता से परेशान
अपनी बाहों को आकाश में तान
उसने एक झटका दिया उन्‍हें
फिर चल निकली
उससे दूरी बनाता उठा युवक भी
हौले-हौले
सबसे अन्‍त में खेलते बच्‍चे चले
और हवा हो गये

अब उतर आयीं गिलहरियां
आशोक वृक्ष से नीचे
मैंनाएं भी उतरीं इधर-उधर से
पाइप से बहते पानी से ढीली हुई मिट्टी को
खोद-खोद
निकालने लगे काग-कौए
कीड़ों और चेरों को

अब चलने का वक्‍त चुका है
सोचा मैंने और उठा – सड़क पर भागा
वहां हरसिंगार और अमलतास की
ताजी कलियां बिखरी थीं
जिन्‍हें बुहारने को तत्‍पर सफाई कर्मी
अपने झाड़ओं को तौलता
अपनी कमर ऐंठ रहा था

इधर नीम पर बन आये थे
सफेद बेल-बूटे
और टिकोड़े आम के बेशुमार
फिर पीपल ने अपने हरेपन से
कचकचाकर हल्‍का शोर सा किया
हवा के साथ मिलकर
तभी
मोबाइल बजा-
किसी की सुबह हुई थी कहीं …
हलो … हां हां हां
आप तैयार हों
मैं पहुंच रहा हूं …।

>हमें उस पर विश्‍वास है – कुमार मुकुल

जून 19, 2008

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जैसे सूरज मिलता है
अपनी किरणों के द्ववारा
अंधकार में डूबी धरती से
उसके कण-कण को आलोकित करता
मिलते हैं हम भी
अपनी उजास से सींचते
एक-दूजे का वजूद

संध्‍याकाल
हवा की शांत स्निग्‍धता में डूबी
जैसे बहती है नदी
अपने ही भीतर
बहते हैं हम
एक-दूसरे के भीतर
बीच में स्‍फुट से उठते हैं शब्‍द
बुलबुलों से
पर नि:शब्‍दता
ज्‍यादा बजती है
शिराओं में ह‍मारी

बातों के वहां
कोई खास मानी नहीं होते
वे बस खुशी की लहरों को
सहारा देने के लिए
एक माध्‍यम बनाते हैं
नहीं
कहीं कोई रोमांच नहीं होता
स्निग्‍धता की एक लहर में उतराते
उससे बहराना नहीं चाहते हम

फिर समय आता है हमारे मध्‍य
अपनी तेज घंटियां बजाता
जिसे अनसुना करते
सुनते हैं हम
और रफ्ता-रफ्ता
छूटते जाते हैं
आपने आप से ही

हम क्‍या चाहते हैं
हमें पता नहीं होता
हमारी हथेलियां उलझती हैं
सुलझती हैं
और एक झटके से भागते हैं हम
विपरीत दिशा में
एक-दूसरे के पास आते हुए
जाते हुए

यहां ना दूरी है ना मजबूरी है
जैसे धरती आकाश हैं
दूर हैं कि पास हैं
कि यह जो सहजता है , सरलता है
स्निग्‍धता है उजास है
सतरंगी रसाभास है
हमें उस पर विश्‍वास है …

>न्यायदंड – कविता – कुमार मुकुल

जून 10, 2008

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हम हमेशा शहरों में रहे
और गांवों की बावत सोचा किया
कभी मौका निकाल
गांव गए छुटि्टयों में
तो हमारी सोच को विस्तार मिला
पर मजबूरियां बराबर
हमें शहरों से बांधे रहीं

ये शहर थे
जो गांवों से बेजार थे
गांव बाजार
जिसके सीवानों पर
आ-आकर दम तोड़ देता था
जहां नदियां थीं
जो नदी घाटी परियोजनाओं में
बंधने से
बराबर इंकार करती थीं
वहां पहाड़ थे
जो नक्सलवादियों के पनाहगाह थे

गांव
जहां देश (देशज) शब्द का
जन्म हुआ था
जहां के लोग
यूं तो भोले थे
पर बाज-बखत
भालों में तब्दील हो जाते थे
गांव, जहां केन्द्रीय राजनीति की
गर्भनाल जुड़ी थी
जो थोड़ा लिखकर
ज्यादा समझने की मांग-करते थे

पर शहर था
कि इस तरह सोचने पर
हमेशा उसे एतराज रहा
कि ऐसे उसका तिलस्म टूटता था
वहां ऊचाइयां थीं
चकाचौंध थी
भागम-भाग थी
पर टिकना नहीं था कहीं
टिककर सोचना नहीं था
स्वावलंबन नहीं था वहां
हां, स्वतन्त्रता थी
पर सोचने की नहीं

बाधाएं
बहुत थीं वहां
इसीलिए स्वतन्त्रता थी
एक मूल्य की तरह
जिसे बराबर
आपको प्राप्त करना होता था
ईमान कम था
पर ईमानदारी थी
जिस पर ऑफिसरों का कब्जा था
जिधर झांकते भी
कांपते थे
दो टके के चपरासी

वहां न्यायालय थे
और थे जानकार बीहड़-बीहड़
न्याय प्रक्रिया के
शहर से झगड़ा सुलझाने
सब वहीं आते थे
और अपनी जर-जमीन गंवा
पाते थे न्याय

न्याय
जो बहुतों को
मजबूर कर देता
कि वे अपना गांव छोड़
शहर के सीमांतों पर बस जाएं
और सेवा करें
न्यायविदों के इस शहर की
पर ऐसा करते
वे नहीं जान रहे होते थे
कि जहां वे बस रहे हैं
वह जमीन न्याय की है
और प्रकारांतर से अन्याय था यह
और उन्हें कभी भी बेदखल कर
दंडित किया जा सकता था
और तब
जबकि उनके पास
कोई जमापूंजी नहीं होती थी
उनके लिए न्याय भी नहीं होता था

हां, न्याय के पास
दया होती थी थोड़ी
और दृष्टि भी
जिससे उनका इस तरह बसना वह
लंबे समय तक अनदेखा करता था
बदले में थोड़ा सा श्रम
करना होता था उन्हें
जिससे न्यायालय तक जाने का रास्ता
चौड़ा और पक्का होता जाता था
और न्याय प्रक्रिया के
अलंबरदारों के लिए
रेस्तरां-भवन-दफ्तर
तैयार होते जाते थे

अब उन आलीशान भवनों से
न्याय की तेज रफ्तार सफेद गाडि़यां
जब भागती थीं सड़कों पर
और अपने सीमांतो का
मुआयना करती थीं
तो वहां बसे वाशिन्दे
उन्हें धब्बों की तरह लगते थे
जिन्हें मिटाने की ताकीद वे
पुलिस-प्रशासन से करते
और लगे हाथ उसकी
मुनादी भी कर दी जाती थी
इस तरह
न्यायपूर्ण शहरों की सीमाएं
बार-बार उजाड़कर
पीछे धकेल दी जाती थीं
और बार-बार
न्याय की दया दृष्टि उन्हें आगे
नए सीमांतों पर टिकने की
मोहलत देती थी

शहर की जो न्याय प्रक्रिया थी
उसमें भी
सोचने-समझने की मनाही थी
इसीलिए आधी सदी से वे
नहीं सोच पा रहे थे
कि हिन्दोस्तां के
इन गर्म इलाकों में

सालों क्यूंकर
गर्म काला चोगा उठाए फिरते हैं
कि क्यों हिन्दी-उर्दू-तेलुगू-तमिल की
इस जमीन पर
अंग्रेजी-फारसी-संस्कृत
डटाए फिरते हैं

जैसे-शहर
एक तिलस्म की तरह था
उसकी न्याय प्रक्रिया भी
एक मिथक की तरह थी
और एक मिथक यह था
कि सोचने-विचारने के मामले में
अन्धी है वह
और जब-तक उसके कान के पास आकर
कोई अपनी फरियाद नहीं दुहराता
उसे कुछ मालूम नहीं पड़ता
इसके लिए उसके पास
ऊंची आवाज में विचरने वाले
हरकारे थे
जो सीमांत के बाशिंदों से
लंगड़ा संवाद बना पाते थे
ये हरकारे
न्यायप्रियता के ऐसे कायल थे
कि मुनादी के वक्त
आंखे मूंदकर
उसके आदेशों को प्रचारित करते थे
न्याय प्रक्रिया के
इस दोहरे अन्धेपन का लाभ
सीमान्त की डंवाडोल जमीन के
बाशिन्दे लेते थे
और उनकी खुसुर-पुसुर देखते-देखतेे
विचारधाराओं का रूप ले लेती थीं
और जब तक वे
अन्धे कानून को छू नहीं लेती थीं
उसे इसका इल्म तक नहीं होता था
कि उसकी नाक के नीचे
कैसी-कैसी विचारधाराओं ने
अपने तम्बू डाल रखे हैं
ऐसे में परेशान न्यायदंड
तुरत-फुरत
अपनी धाराओं की सेवाएं लेता था
मजेदार बात यह थी
कि न विचारधारा साफ दिखती थी
न धारा
स्थिति की गम्भीरता का पता
तब चलता था
जब दोनों टकराती थीं
और उसकी आवाज
न्याय के ऊंचे दंडों तक जाती थी

अब एक बार फिर
वही पुराना न्याय
दुहराया जाता था
जिसमें अच्छी कीमत अदाकर
विचारधाराओं को
थोड़ी मोहलत दी जाती थी
कि वे अपना तेवर सुधार सकें

न्यायदंड के आस-पास
उसकी सहूलियत के
सारे साजो-सामान भी थे
यथा जेलें थीं
आदर्श कारागृह
वहां बुद्ध की
ऊंची पत्थर की मूर्ति थी
क्योंकि वहीं वह सुरक्षित थी
और कारागृह के निवासियों को
उसकी छाया में शान्ति मिलती थी
जो मोबाइल-चैनल्स-सुरा-सुन्दरी
और मनोरम उत्तर-आधुनिक अपराधों का
सेवन करते
वहीं टेक लेते
बिरहा और चैता का गायन सुनते
लोकगीतों के रसिक सीएम, पीएम
अपने काफिलों के साथ
महीनों वहीं छुिट्टयां मनाते थे
इसके लिए उन्हें न्यायदंड की
धाराओं की
सेवाएं लेनी पड़ती थीं
फिर जेलों से बाहर आते ही वे
जेल प्रशासन की मुस्तैदी की
समीक्षा करते थे
कारागृहों का यह रूप देखकर
उत्तर रामकथा वाचकों का मन भी
विचलित हो जाता था
और धन-बल-पशुओं को
गीता का उपदेश देने
वे भी वहां जा धमकते थे

न्यायदंड के आस-पास
बिखरे हुए थाने थे
जो पूंजी-प्रसूतों को रास आते थे
बावजूद इसके ये थाने
ढहती लोककला के अद्भुत नमूने थे
जिसकी दीवार के पलस्तर के भीतर से
लाल ईंटें
अपना बुरादा झारती रहती थीं
और रात में जिन्हें
लालटेन की नीम रोशनी रास आती थी
न्यायदंड की सुरक्षा के लिए तैनात
ये थाने थे
जिनकी जीपें
जनता के उस खास वर्ग की
सेवा में जाती थीं
जो कि उसमें पेट्रोल भरा पाती थीं
जहां वैसी मुट्ठी गर्म करने वाली
जनता नहीं थी
वहां पुलिस भी नहीं थी
इसीलिए विकल्प की तरह वहां
आतंकवादी थे

राजभाषा के सारे कवि
न्यायदंड के पास ही निवास करते थे
अपनी अटारियों से वे
पृथ्वी-पृथ्वी चिल्लाते थे
पर पृथ्वी से उनका साबका इतना ही था
जितनी कि उनके गमलों में मिट्टी थी
जिसे सुबह-शाम पानी देते
वे निहारते थे हसरत से

ये कवि थे
और काले बादलों को देख
इनका खून
भय से सफेद पड़ जाता था
ये कवि थे जो न्यायदंड से
अपना प्रेमपत्र बचाने की
याचना किया करते थे

और न्यायदंड प्रेमपत्र तो नहीं
उन कवियों को जरूर बचा लेता था

वह उन्हें कीमती जूते प्रदान करता था
जो न्यायदंड को देखते ही
खुशी से मचमचाने लगते थे
वह उनकी कमरों को
बल (लोच) प्रदान करता था
जिस पर कलाबाजी खाते वे
विचारों को
महामारी की तरह देखते थे
और खुद को उससे बचाने की जुगत
भिड़ाते रहते थे
इनका एक काम
जनता की कारगुजारियों से
न्यायदंड को आगाह करना भी था

इन शहरों में
सार्वभौम कला की तरह
तोंदें थीं
जिसके हिसाब से मोटर कम्पनियां
अपनी डिजाइनें बदलती रहती थीं
नतीजतन सड़कों पर
डब्बे की शक्लवाली
बूमों-मन्तरों-काटिज आदि गािड़यां
बढ़ती जा रही थीं
यहां अपहरण और नरसंहार
एक उद्योग था
जिसकी रिर्पोटिंग को
पत्रकारिता कहते थे
और पत्रकार खबरें नहीं लिखते थे
विवस्‍त्र रक्तिम लाशें गींजते थे
उनकी जातियों का हिसाब लगाते थे
और जनता सुिर्खयों में तब आती थी
जब वह गोलबन्द हो
रैलियों में हिस्सा लेने आ धमकती थी
राजनेताओं के बाद प्रेस
चििड़याखानों के जीवों की
गतिविधि बताना
ज्यादा जरूरी समझते थे
क्योंकि उसका नगर के पर्यावरण पर
सीधा असर पड़ता था

बन्दूक पर निशाना साधते-साधते
हत्यारों-अपहत्ताओं और
निजी सेनाओं के स्त्री-शिशु संहारकों की
एक आंख कमजोर हो गई थी
इसीलिए मीडिया में जब भी
उसकी तस्वीर उभरती थी
तो उसकी एक आंख और आधा चेहरा
गमछे से ढंका होता था

इस बारे में लोगों के
जुदा-जुदा खयालात थे
कि ऐसा वे पहचाने जाने के
भय से करते थे
पर जनमत की राय यह थी कि
खौफ को सार्वजनिक करने के लिए
वे ऐसा करते थे

बुद्ध के बाद गांधी
हत्यारों की पहली पसन्द थे
मीडिया पर इश्तेहारों में
हिंसा को वे मजबूरी बतलाते
और मीडियाकर (दलाल) उनमें
गांधी की अकूत सम्भावनाएं तलाशते
थकते नहीं थे !

यह कविता 2002 के युद्धरत आम आदमी के युवा विशेषांक में छपी थी।

>अरेंज्‍ड मैरिज-1 : कविथा : कुछ कविता-कथानुमा – कुमार मुकुल

जून 2, 2008

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बना लेगी वह अपने मन की हंसी…

अक्‍सर वह
मुझसे खेलने के मूड में रहती है
खेलने की उम्र में
पहरे रहे हों शायद
गुडि़यों का खेल भी ना खेलने दिया गया हो
सो मैं गुड्डों सा रहूं
तो पसंद है उसे
मुझे बस पड़े रहना चाहिए
चुप-चाप
किताबें तो कदापि नहीं पढनी चाहिए
बस
मुस्‍कुराना चाहिए
वैसे नहीं
जैसे मनुष्‍य मुस्‍कुराते हैं-
तब तो वह पूछेगी-
किसी की याद तो नहीं आ रही
फिर तो
महाभारत हो सकता है
इसीलिए मुझे
एक गुड्डे की तरह हंसना चाहिए
अस्‍पष्‍ट
कोई कमी होगी
तो सूई-धागा- काजल ले
बना लेगी वह
अपने मन की हंसी
जैसे
अपनी भौं नोचते हुए वह
खुद को सुंदर बना रही होती है

मेरे कपड़े फींच देगी वह
कमरा पोंछ देगी
बस मुझे बैठे रहना चाहिए
चौकी पर पैर हिलाते हुए
जब-तक कि फर्श सूख ना जाए
मेरे मित्रों को देख उसे बहुत खुशी होती
उसे लग‍ता कि वे
उसके गुड्डे को देखने आए हैं
वह बोलेगी-देखिए मैं कितना ख्‍याल रखती हूं इनका
ना होती तो बसा जाते
फिर वह भूल जाती
कि वे उसकी सहेलियां नहीं हैं
और उनके कुधे पर धौल दे बातें करने लगेगी
बेतकल्‍लुफी से
बस मुझे
चुप रहना चाहिए इस बीच

मेरे कुछ बोलते ही
जैसे उसका गुड्डों का खेल
समाप्‍त होने लगता है
पहले तो खेल भंग होने के दुख में
काठ मार जाएगा उसे
फिर या तो वह रोएगी चुप-चाप
या सरापते हुए बहाएगी टेसुए-
कि बरबार कर दूंगी तुमको
फिर हम दोनेां में एक गुमनाम झगड़ा
शुरू हो जाएगा
जिसमें घर की जरूरी सार्वजनिक बातों के अलावे
अन्‍य आपसी मुद्दों पर
कोई बातचीत नहीं होगी
मेरे कपड़े साफ कर देगी वह
पर खाना देने नही आएगी
आएगी तो रोटी करीब फेंकते हुए देगी

हां
सोने से पहले
एक ग्‍लास पानी जरूर लेकर आएगी वह
-जिसे मैं चुप-चाप पी लूंगा

यह पानी का ग्‍लास
जैसे मील का पत्‍थर हो हमारे झगड़े में
अब-तक
इस एक ग्‍लास पानी के पत्‍थर को
पार नहीं कर पाए हैं हम

अक्‍सर पानी नहीं पीने के बाद
छोटे से मनाने जैसे झगड़े के बाद
फिर मिलन हो जाता
पर यह पूर्णिमा
माह में एक ही बार आता
बाकी चौथायी चांद से
चौदहवीं के चांद तक
कई स्‍तर होते हैं बीच में
पर साल में कभी-कभार
यह पूर्णिमा गायब होकर
चंद्रग्रहण का रूप ले लेता
असामाजिक अराजकतोओं के
राहू-केतु
जैसे उसके हमारे बीच के चंद्र को ग्रस लेते

इस दौर में लगातार
उसका हमला जारी रहता

मौखिक आलाप से
शारीरिक आदान-प्रदान तक
इस लड़ाई को मुझे
एक खेल की तरह निबाहना पड़ता
और अखीर में
अपनी ही लाश पर सवार होकर मुझे
चंद्रग्रहण काल की वैतरणी
खुद पार करनी पड़ती है …