मई 2008 के लिए पुरालेख

>दांत किटकिटाने का मतलब पेट में कीड़ा होना ही नहीं – कुमार मुकुल

मई 27, 2008

>हर बार दांत किटकिटाने का मानी पेट में कीड़ा होना नहीं होता। कीड़ों के लिए अनुकूल वातावरण होने पर एक बार उन्हें दवा से मार देने के बाद भी वे बार-बार पनप जो हैं। मीठा और मांस-मछली अधिक खाने से भी पेट में कीड़े पनप जाते हैं। इन आदतों पर नियंत्रण करना होगा।
कीड़े कई तरह के होते हैं, उनके लिए अलग-अलग दवाए¡ लेनी पड़ती हैं। पेट में अगर राउंड वर्म यानी गोलकृमि हों, तो आप होम्योपैथिक दवा सिना का प्रयोग कर सकते हैं। सिना रोगी मोटा और गुलाबी चेहरेवाला होता है। वह चिड़चिड़ा, भुक्खड़ और मीठा पसन्द करनेवाला होता है। अपनी नाक वह खोदता रहता है। ऐसे रोगी सिना 30 की तीन खुराकें रोज ले सकते हैं।
टेप वर्म यानी फीता कृमि के लिए आप क्यूप्रम आक्सीडेटेम निग्रम 1 एक्स की कुछ खुराकें ले सकते हैं। फीता कृमि के लिए आप रोगी को कद्दू के बीजों को छलकर भीतर का हिस्सा खिलाए¡, तो इससे भी कृमि बेहोश हो गुदा मार्ग से बाहर आ सकते हैं। जब कीड़े बाहर आ रहे हों, तब आप उन्हें निकलने दें। बीच से खींच कर उसे तोड़ें नहीं, नहीं तो बाकी बचा हिस्सा जो भीतर रह जाएगा, वह फिर से नया कृमि बन जाएगा।
अगर रोगी को सूत्रा कृमि यानी थे्रड वर्म हो, तो उसे आप चेलोन क्यू की चार-पा¡च बू¡दें एकाèा खुराके देकर कृमि से छुटकारा दलिा सकते हैं। कृमि अगर गुदा प्रवेश में खुजली पैदा करते हों, तो वहा¡ वैजलीन या ओलिव आयल का प्रयोग करने से राहत मिलती है।
यह तो कीड़ों की दवा हुई, पर दा¡त किटकिटाने के अन्य कारण भी हो सकते हैं। ऐसे में नीचे की दवाओं को उनके लक्ष्ज्ञणों का मिलान कर रोगी को
ठीक किया जा सकता है। बेलाडोना 30 का रोगी भी दा¡त किटकिटाता है। ऐसे में अगर रोगी को प्यास नहीं लगती हो और उसे दूèा-मांस नापसन्द हो, भूख कम हो, तो बेला से उसे आराम पहु¡चाया जा सकता है। एंटिम क्रूड के रोगी की जीभ पर सफेदी जमी रहती है और वह आग के पास बैठना पसन्द नहीं करता। इस लक्षण पर आप क्रूड की छह पावन की रोजाना तीन खुराकें देकर उसे दा¡त किटकिटाने से बचा सकते हैं।
आर्स एल्बम का रोगी भी दा¡त बजाता है। पर उसे बेला के विपरीत प्यास अिèाक लगती है। उसे मोटा तकिया लेना पसन्द होता है। वह दूèा भी पसन्द करता है। ऐसे रोगी को आप आर्स 30 की रोज तीन खुराकें देकर उसे स्वस्थ कर सकते हैं। कैनेबिस इंडिका का रोगी अगर दा¡त बजाए, तो देखना होगा कि क्या वह भुलक्कड़ है। कैनेबिस रोगी भी वाचाल होता है और उसे डरावने सपने आते हैं।

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>कचरा दिल्‍ली क्‍यों नहीं जा सकता – कुमार मुकुल – व्‍यंग्‍य

मई 27, 2008

>गांधी मैदान पटना के दक्षिण की सड़क पर चलता हुआ मैं इक्‍कीसवीं सदी की ओर जा रहा हूं। कल किसी और सड़क पर चलता हुआ भी मैं इक्‍कीसवीं सदी की ओर ही जा रहा होउंगा। यहां तक कि परसों अगर गांव की नदी से नहाकर खेतों की ओर जा रहा होउं तब भी मेरा जाना इक्‍कीसवीं सदी की ओर ही होगा। मैं अगर कहीं नहीं भी जाता रहूं, घर में बैठा रहूं तब भी गांधी मैदान वाली सड़क अगली सदी में जा रही होगी। मतलब इक्‍कीसवीं सदी में जाना एक सनातन सत्‍य है, उसको हमारे विकास या स्थिरता से कोई अंतर नहीं पड़ता।
तो इक्‍कीसवीं सदी को जाती इस सड़क के बाएं नेताजी सुभाष बाबू की मूर्ति है। जो गंगा की ओर इशारा कर रही है। मानो कह रही हो गंगा की ओर चलो। पर जिन्‍होंने सुभाष बाबू को पढा होगा वे जानते हैं कि सुभाष बाबू का इशारा दिल्‍ली की ओर है। उनका नारा था… दिल्‍ली चलो। यह नारा उन्‍होंने दूसरे विश्‍वयुद्ध के समय दिया था। तब से वह दिल्‍ली नहीं पहुंच पाए हैं। मूर्ति तो यही कह रही है। जिस राजनेता ने यह मूर्ति लगवाई है उसका लक्ष्‍य भी दिल्‍ली जाना ही होगा। वैसे तमाम राजनेता आज अमेरिका और थाइलैंड जा रहे हैं। शायद दिल्‍ली का रास्‍ता अमेरिका या थाइलैंड होकर ही जाता है। सुभाष बाबू भी दिल्‍ली जापान होकर जाना चाह रहे थे। विवे‍कानंद भी अमेरिका होकर ही भारत आए थे।
फिलहाल सुभाष बाबू की मूर्ति के आगे कचरा है और मवेशी बंधे हैं। मवेशियों की पगही कोई खोल दे तो वे भी शायद दिल्‍ली जाना पसंद करेंगे। पर क्‍या कचरा भी चलकर दिल्‍ली जाएगा। साहब अगर कचरा पटना के मुहल्‍लों से निकलकर शहर के मध्‍य राजपथ पर लगी इस मूर्ति तक आ सकता है तो वह दिल्‍ली क्‍यों नहीं जा सकता।

>विकसित होते समय संदर्भों की कहानियां – कुमार मुकुल

मई 17, 2008

>जैसे विष्‍णु खरे की ताकत को समझने के लिए पाठक से एक सीमित खास तैयारी की उम्‍मीद की जाती है युवा रचनाकार पंखुरी सिन्‍हा की कहानियों का आस्‍वाद लेने के लिए भी कुछ वैसी ही तैयारी चाहिए। क्‍योंकि विवरण की बारीकियों से जिस तरह इन कहानियों की शुरूआत होती है वह शुरू में पाठकों को बोर करती सी लगती हैं पर अगर किनारे पर हाथ पांव मारने से आगे लहरों में धंसने का साहस पाठक करता है आगे गहराई में जाकर भी वह एक निश्चिंतता से तैरते हुए दूसरे किनारे तक आसानी से जा सकता है।

पंखुरी के दूसरे संग्रह ‘किस्‍सा-ए -कोहनूर’ की कहानियां कला फिल्‍मों की तरह प्रभाव छोड़ती हैं,जिनमें क्रियाओं से ज्‍यादा सोचने को दिखाया जाता है। सोच के कई स्‍तर इनमें एक साथ दिखायी पड़ते हैं। कहीं विचार कहीं भाव कहीं इनका द्वंद्व अभिव्‍यक्‍त होता है जिनमें। और जैसे कला फिल्‍में लोकप्रिय फिल्‍मों के नायक आधारित मिथ को तोड़ने की कोशिश करती हैं ये कहानियां भी कथा के रूप या फार्मेट को तोड़ती हैं। कथा के पारंपरिक रूप को जो कहानी सबसे कम तोड़ती है वह पहली कहानी ‘समानान्‍तर रेखाओं का आकर्षण’ है। यह एक लड़की के अपने से कम उम्र लड़के के प्रति आकर्षण की कहानी है। लड़की उसे एक बार प्राप्‍त कर लेती है पर अगली बार लड़क खुद को नियंत्रित कर लेता है। कहानी कई बातों को अपने ढंग से सामने ला पाती है। कहानी दिखाती है कि बाजार किस तरह प्रेम की कंडिशनिंग करता है कि प्रेम आकर्षण की परिभाषा से आगे नहीं बढ़ पाता। दूसरी बात कि बाजार और भूमंडलीकृत दुनिया में एक लड़की की स्थिति में परिवर्तन आया है और अब वह भी आपने प्रेम और आकर्षण को पुरूषों के मुकाबिल उतनी ही ताकत से सामने रख पाने की सामर्थ्‍य रखने लगी है। यह कहानी संग्रह की बाकी कहानी की अपेक्षा ज्‍यादा गति से घटित होती है।

संग्रह की कई कहानियां भारतीय समाज के वैचारिक संकट को भी दिखलाती हैं। यह लेखिका का भी संकट है – कि वह निरूपाय ,अकेली है,संकट को वह देखती है,पहचानती है पर उससे दो-चार होने की ताकत वह अभी जुटा नहीं पायी है। ‘शत्रु का चेहरा’ कहानी में इसे देखा जा सकता है। संकट यही है कि शत्रु का कोई मुकम्‍मल चेहरा नहीं बनता और यही लेखिका की परेशानी का सबब है। शत्रु का चेहरा ना तलाश पाने की ‘कड़वाहट’ में कथा नायिका जलूस का साथ नहीं दे पाती और भाग खड़ी होती है। उसे अपने भागने का अहसास भी है -‘ … वह भाग ही रही है। जाने कहां से भागकर कहां को जा रही है। जाने किससे भाग रही है।’ दरअसल मंजिल हर बार साफ नहीं दिखती,वह सफर में होती है या उसके बाद ही मिलती है। इसलिए मंजिल ना दिखे तेा भागने की बजाय उस राह पर चलना ही सही होगा।पंखुड़ी की कहानियों में विद्रोह और विचार जहां तहां छोटे-छोटे विस्‍फोट के रूप में आते हैं। पर उनमें एक तारतम्‍य या निरंतरता ना होने से वो बदलाव की ताकत नहीं बना पाते और लेखिका को संघर्ष की राह से भागने को मजबूर होना पड़ता है। शत्रु की पहचान के लिए इन विद्रोही स्‍वरों को एक सूत्र में जोड़ना होगा। दरअसल चेहरा तो है ही शत्रु का पर आंतरिक ताकत के अभाव में उसे सामने रखने की हिम्‍मत अभी बटोरनी है लेखिका को।यूं देश और दुनिया के अंतरविरोधों को पूरी जटिलता के साथ जिस तरह ये कहानियां अभिव्‍यक्‍त करती हैं वैसा सामान्‍यत: कविता में होता है। इन्‍हें खोलने की कोशिश में जैसे पूरी दुनिया खुलती चली जाती है।और इस दृष्ठि से देखा जाए तो यह एक नयी शुरूआत है और आगे उनसे उम्‍मीद की जा सकती है।

पंखुरी की कहानियों से गुजरने के बाद चन्‍दन पाण्‍डेय के पहले कहानी संग्रह ‘भूलना’ से गुजरते हुए यह अहसास गहराता है कि हिन्‍दी कहानी धीरे-धीरे अपना चोला बदलती एक नये मुकाम की ओर अग्रसर है। पंखुड़ी के यहां अगर आकलन स्‍पष्‍ट है तो चंदन के यहां कल्‍पना भविष्‍य के आभासी यथार्थ को एक नयी जमीन मुहय्या कराती दिखती है। आपने समय और समाज के अंतरविरोधों को उसके क्रूर चेहरे के साथ सामने ला देने में चन्‍दन की कहानियां समर्थ हैं। इस मायने में अकेले से हैं अपनी युवा जमात में।

चन्‍दन की कहानी ‘सिटी पब्लिक स्‍कूल, वाराणसी’ को ही लें। यह किशोर जीवन पर इक्‍कीसवीं सदी की मार को जिस तरह बहुस्‍तरीयता में पकड़ती है वह विस्मित करता है। पूंजी का क्रूरतम चेहरा, बेचारा स्‍कूल टीचर आज माट साहब से भी ज्‍यादा दुर्गती को प्राप्‍त हो रहा है। और जन्‍म लेने से पहले ही प्रेम की सुकोमल भावनाओं पर आधुनिक पूंजी के दंश को कहानी पढ़कर ही जाना जा सकता है।

कभी शमशेर ने भविष्‍य के होने वाले कवि के लिए के लिए कहा था कि उसे विज्ञान,कला,‍इतिहास और तमाम आधुनिक प्रविधियों की जानकारी होनी चाहिए। युवा कविता के अन्‍वेषियों में तो ज्ञान की वह ललक और उसका प्रयोग नहीं दिखता है पर चन्‍दन जैसे युवा कथाकरों को पढते हुए संतोष होता है कि अपनी तमाम अत्‍याधुनिक सूचनाओं का प्रयोग वे कुशलता से कर पारहे हैं । पूंजी प्रसूत समकालीन क्रूरताओं का चेहरा दिखाने में चन्‍दन का सानी नहीं है । लीलाधर जगूड़ी की कविता मंदिर लेन और विष्‍णु खरे की कुछ कविताएं पहले यह काम सफलता से करती दिखती थीं, आज वही काम चन्‍दन की कहानियां करती दिखाई देती हैं। उनकी करीब करीब सारी कहानियां इसका उदाहरण हैं।

संग्रह की पहल कहानी ‘रेखाचित्र में धोखे की भूमिका’ का आरंभ तो पंखुड़ी की कहानियों की तरह एक बारीक विवरणात्‍मकता से होता है पर आगे यह अपने समय के मारे गंवई प्रेमियेां की कथा में तब्‍दील हो जाती है। क्रूरता का चेहरा सर्वत्र एक सा है क्‍या सिटी स्‍कूल और क्‍या गांव-पथार। संग्रह की शीर्षक कहानी भूलना व्‍यवस्‍था के अत्‍याधुनिक चेहरे की कठोरता को उसकी गलघोंटू छवियों के साथ सामने लाती है। इसी तरह ‘परिन्‍दगी है कि नाकामयाब है’ ग्रामीण जीवन में जमीन जायदाद के प्रति लोगों के अंधमोह से उपजी दारूण स्थितियों को अपना विषय बनाती है। यह दिखलाती है कि धन कि लालसा कैसे एक स्‍त्री को भी पुरूषों की तरह एक क्रूरतम चेहरा प्रदान करती है। शिवपूजन सहाय ने ‘देहाती दुनिया’ में लिखा था कि गांव के लोग भोले तो क्‍या भाले जरूर होते हैं। तो ग्रामीणों के इस भालेपन की नोंक इस कहानी के हर पृष्‍ठ पर एक तीखा दबाव बनाती दिखती है।

‘उलटबांसी’ कविता का दूसरा कथा संग्रह है। चन्‍दन के मुकाबले कविता की कहानियां ज्‍यादा सकारात्‍मक हैं। नये युग में व्‍यक्ति और समाज के अंतरसंघर्षों को उदघाटित करती हैं कविता की कहानियां। ‘उलटबांसी’ कहानी में ही जिस तरह एक मां अंतत: शादी का निर्णय लेती है वह समाज की बदलती अंतरसंरचना की झलक दिखाता है। मां, बाप, पिता, पति आदि तमाम शब्‍द आज नये अर्थ ग्रहण कर रहे हैं। इस कहानी में अपूर्वा सवाल खड़े करती पूछती है – ‘नदियां बदलती हैं आपना रास्‍ता,फिर मां से ही अथाह धीरज की अपेक्षा क्‍यों …. मां पर्वत नहीं थी और पर्वत भी टूटता है छीजता है समय के साथ-साथ’।

यहां यह खयाल कितना वाजिब है कि आखिर क्‍यों प्रकृति के जड़ संबोधनों को जीवित करने में आदमी अपनी भावनाओं-विचारों की हत्‍या कर खुद को पत्‍थर में तब्‍दील कर दे। कथा में एक मां पहली बार निर्णय लेती है अपने जीवन में और चाहती है कि उसके बेटे उसका साथ दें। बेटे साथ नहीं देते पर समय साथ देता है। तभी तो मां के पत्‍थर होते जेहन में इस तरह का विचार पहली बार वजूद में आता है । और चारों ओर के पथरीले आवरण को तोड़ अपनी जगह बनाता है। आखिर ये विचार भी तो मां की संतानें हैं अन्‍य भावनाओं की तरह। हिन्‍दी कविता में युवा कवि पवन करण की पहचान ही इस तरह के आधुनिक सवालों को स्‍त्री के संदर्भ में उठाने के चलते बनी है। कविता की कहानियां उसी बात को शिद्दत से रेखांकित कर पाती है।

‘उलटबांसी’ की कहानियां प्रेम और उससे पैदा उहापोह की कहानियां हैं। प्रेम को लेकर जो विचार प्रेमीजनों के दिलो-दिमाग को मथते रहते हैं उनका एक दर्शन प्रस्‍तुत करती हैं कहानियां। जैसे कि – प्‍यार सच्‍चा हो तो बड़ी से बड़ी बात छोटी लगती है , या प्रेम वह है जिसकी खातिर आदमी खुद को आमूल-चूल बदल डाले। कहानी लौटते हुए हेा या आशिया-ना सबका मुख्‍य बिंदु प्रेम की उहापोह ही है। ‘आशिया-ना’ प्रेम में बिना विवाह किए सहजीवन में रहने से नये जोड़ों के सामने आई समस्‍याओं को लेकर बुनी गयी कहानी है। कि सहजीवन की परेशानियां प्रेमियों को दर-बदर करती हैं पर आशा है कि दूर के तारे की तरह टिमटिमाती रहती है।

कुलमिलाकर पंखुरी सिन्‍हा के यहां जीवन जगत का आकलन है तो कविता के यहां प्रेमियों के मनोजगत की छानबीन। यथार्थ भी जहां तहां पांव पसारता है पर एक उधेड़बुन चलती रहती है। कविता की कहानियां प्रेम पर एक जिरह छेड़ती हैं , एक अनंत जिरह। ‘जिरह:एक प्रेमकथा’ का एक पात्र जिरह करता कहता है – दरअसल कहानी और जिन्‍दगी दो अलग-अलग चीजें हैं, दो अलग-अलग धरातल हैं । मैं चाहता हूं कि उनके बीच का यह फेंस टूटे। शायद कविता आगे की अपनी कहानियों में यह फेंस तोड़ सकें।

>हाय, आप चाय लेंगे – कुमार मुकुल

मई 9, 2008

>चाय का आफर मिलने पर अगर कोई चाय पीनेवाला आदमी इनकार करे, तो देखना होगा कि वह वाकई चाय से होनेवाली खामियों के प्रति सचेत हुआ है याफिर उसका फिजिक ही चाय पचा पाने लायक नहीं रह गया है। ऐसे में आप उसे फासफोरस 30 का प्रयोग करने की राय दे सकते हैं।
फासफोरस के रोगी को चाय पचती ही नहीं है। उसका मेटाबोलिज्म (चायपचय) ऐसा बिगड़ा होता है कि वह सामान्य चीजों को भी पचा पाने लायक नहीं रह जाता है। फासफोरस रोगी दुबला-पतला होता है। खास कर उसकी छातियां सिकुड़ी होती हैं। उसके जोड़ कमजोर होते हैं। उसकी चमड़ी पतली और साफ होती है। पर जो लोग वाकई चाय बहुत पीते हों और उनकी आंतें जवाब दे रही हों और परिणामस्वरूप कब्ज भयंकर होती जा रही हो, तो आप हाइड्रेिस्टस को याद कर सकते हैं। आंतें जब मल-निष्कासन में असफल होती जाती हैं, ऐसे में हाइड्रेिस्टस क्यू रामबाण सिद्ध होता है। ऐसा रोगी खुद को कुशाग्रबुिद्ध समझता है। उसे साइनस भी रहती है। पुराने कब्ज की भी हाइड्रेिस्टस अच्छी दवा है और लम्बे समय तक चाय पीना कब्ज को बढ़ावा देता है। ऐसे में इसकी भूमिका स्वयंसिद्ध होती है। ऐसे में सामान्य दवाएं, जो पेट साफ करने में असफल सिद्ध हों तो आप होम्योपैथी की यह दवा दस बूंद सुबह-शाम ले सकते हैं। चाय पीने से कैंसर तक होने की संभावना भी रहती है। ऐसे में हाइड्रेिस्टस कैंसर से आपका बचाव करता है।
चाय पीने से अगर पेट में ऐंठन होती हो और कोई भी खाद्य पदार्थ अनुकूल पड़ता हो, तो आप चाय को छोड़ फेरमफास 12 एक्स का प्रयोग कर सकते हैं। चाय की गड़बिड़यों को एक हद तक चायना भी एक हद तक संभालती है। चाय से जो स्नायविक गड़बिड़यां होती हैं, कमजोरी और पेट में गैस भी, ऐसे में चायना काफी काम की सिद्ध होती है। चाय पीने से अनिद्रा की शिकायत भी बढ़ती जाती है। इस सबको आप चायना 30 की कुछ खुराकें लेकर ठीक कर सकते हैं।
यू¡ चाय से पैदा होनेवाली न्यूरोलाजिकल गड़बिड़यों को थूजा भी दूर कर देता है। अिèाक चाय पीने से अगर आपका खून गन्दा हो गया हो और चेहरे पर लाल फुंसियां निकल रही हों, तो इस गन्दगी को उभारने के लिए आप आरम्भ में हीपर सल्फ की भी कुछ खुराकें ले लें, तो बेहतर होगा।
यूं जिनको चाय से अभी कोई हानि न दिखती हो, पर उससे होनेवाले खतरों के प्रति वे सचेत हों और चाय छोड़ना चाहते हों, तो अपने लक्ष्णों का मिलान कर वे हीपर सल्फ, हाइड्रेिस्टस या कैल्के सल्फ की कुछ खुराकें ले सकते हैं।
चाय अक्सर अल्युमीनियम के भगोने में खदका कर बनाई जाती है। चाय के अलावा यह अल्युमीनियम भी घुल कर पेट की प्रणाली को बार्बाद करने में कम भूमिका नहीं निभाता है। चाय के विकल्प के रूप में कुछ दिन आप नींबू की चाय पी कर काम चला सकते हैं। दिल्ली में आइआइटी के छात्रों को उसी रंग का जो पेय उपलब्‍ध कराया जाता है, उसमें सौंफ आदि पचासों जड़ी-बूटियां मिली होती हैं। अखंड ज्योति द्वारा प्रचारित प्रज्ञा पेय भी चाय का विकल्प हो सकता है।

>दुश्‍मन – कुमार मुकुल – व्‍यंग्‍य

मई 6, 2008

>हैदराबाद के उस अखबार के दफ्तर में प्रवेश के पहले ही दिन मेरे सांस्‍थानिक अभिभावक ने मुझे उसकी बाबत बता दिया था – कि देखिए वहां एक दुश्‍मन भी है आपका। पर आपको इससे क्‍या लेना-देना है- आज के जमाने में दुश्‍मनी कौन निभाता है,काम से काम रखिएगा, पर इसका यह मतलब नहीं कि उससे डर के रहिएगा। अरे रे उसकी औकात ही क्‍या है …पर क्‍या कीजिएगा कि समय ही ऐसा है कि …
जिस संस्‍थान में मुझे काम करना था उसके बास का गोतिया था वह- ठीक है, गोतिया शब्‍द खुद दुश्‍मनी का परिचायक है नहीं तो उसे भैयाड़ी नहीं कहा जाता- पर इस शब्‍दावली के गांव में जो अर्थ निकलते हैं महानगर की एक लोकतांत्रिक सी संस्‍था में उसके विपरीत मानी हो ही जाना है्…
अब गांव में बास चाहे इसकी जमीन पर नजर रखता हो पर इस अज्ञात कुलशीलों की भीड़ महानगर में वह उसे गले लगाकर नहीं रखे तो करे क्‍या …
मेरे संस्‍थापक ने शब्‍दों से उसका जो खाका खींचा था तो लगा कि मेरा दुश्‍मन गांव के किसी बिगड़ैल बाभन जैसा होगा पर जब उसे देखा तो वह किराने के सेठ जैसा निकला … मैंने सोचा कि क्‍या दुर्गति है – इसकी तो यूं ही किसी दिन धुकधुकी निकल जाएगी सीढियां चढते। फिर शायद मुझे ही एुबुलेंस बुलानी पड़े। पर हाय रे विधाता – इस बनडमरू को ही मेरा दुश्‍मन बनाना था।मैं चिंता में पड़ गया कि इससे दुश्‍मनी क्‍या खाक निभेगी। और एक लोकतांत्रिक संस्‍थान में दुश्‍मन के बगैर रहा ही कैसे जा सकता है- फिर दुश्‍मन तो था ही वह नामालूम सा ही सही …

>नगरपुरूषों से सवाल करती नगरवधुएं – कुमार मुकुल

मई 3, 2008

>
अजन्‍ता देव की कविताएं

नृत्‍या, गीत, चित्रकला और कविता के क्षेत्र में सक्रिय 1958 में जोधपुर में जन्‍मीं फिलहाल भारतीय सूचना सेवा से संबद्ध अजन्‍ता देव की कविताओं की पचास पृष्‍ठों की एक पुस्तिका आई है – एक नगरवधू की आत्‍मकथा। इसमें संकलित कविताएं नगरबधू के बहाने जिस तरह स्‍त्री की सतत पीड़ा को अभिव्‍यक्‍त करती हैं, वह अवाक करने वाली है –

मैं हर दिन बदलती हूं चोला
श्रेष्‍ठजनों की सभा में
आत्‍मा नहीं हूं मैं
कि पहने रहूं एक ही देह
मृत्‍यु की प्रतीक्षा में ।

पारंपरिक शब्‍दावलियों का प्रयोग कर जिस तरह अजन्‍ता परंपरा से चले आरहे पाखंड का शिरोच्‍छेद करती हैं वह विस्मित करता है।

… पर मैं नहीं पृथ्‍वी सी
कि धारण करूं विराट
… मुझे तो चाहिए एक पोशाक
जिसे काटा गया हो मेरी रेखाओं से मिलाकर
इतना सुचिक्‍कन कि मेरी त्‍वचा
इतने बेलबूटे कि याद न आये
हतभाग्‍य पतझर
सारे रंग जो छीने गये हों
अन्‍य जीवन से

इतना झीना जितना नशा
इतना गठित जितना षडयंत्र

ये पंक्तियां जीवनजगत के तमाम सुगठित व्‍यापारों की पोल खोलती हैं, उसके झीनेपन के बहाने खुद पर तारी किए गए नशे की पोल, षडयंत्रों के सुव्‍यवस्थित होने की पोल और अन्‍य जीवन से छीने कर उसे खुश करने को लाए गए तमाम रंगों की पोल।

यूं ही कभी
हठात मत चले आना
मेरे रंग महल में
आया था जैसे भर्तृहरि सा जोगी
और देखकर
मेरी निष्‍प्रभ आंखें फीके अधर पीली त्‍वचा
और उजड़े केश
कह गया था
हाय
प्रात: नभ का चंद्रमा।

ये कविताएं स्‍त्री के सौंदर्य के नाम पर जो खेल चलता है उसकी तहें बाहर करती हैं कि सौंदर्य तो हमेशा आरोपित आकाक्षाओं का स्‍वरूप होता है। कि उसकी सच्‍चाई को स्त्रियों के आंसुाओं से बनी शराब को चखकर कर ही जान सकते हैं श्रेष्‍ठजन। पर नगरवधुएं उनसे पूछती हैं कि क्‍या वे उसमें तैरते काजल का स्‍वाद भी जानते हैं। जिसे वे रोज चखते हैं। कि वह काजल उनकी झूठी भावविगलित प्रशंसा को सहन करने को अर्जित उनके कपट से काले पड़ गए उनके हृदयों की राख से ही बनता है।

>पगला कहीं का – कुमार मुकुल

मई 2, 2008

>जब कोई प्यार से आपके गाल थपथपाता हुआ कहता है, पगला कहीं का, तो आप उसे स्नेह की अभिव्यक्ति मानते हैं। पर आपकी किसी क्रिया पर आपका संगी अचानक चिल्ला कर कहे कि पगला गए हो क्या, तो आपको विचार करना चाहिए कि कहीं आपका नर्वस सिस्टम उत्तेजित तो नहीं हो रहा।
मस्तिष्क और उसके स्नायु मंडल में जब किसी कारण उत्तेजना पैदा होती है, तब आदमी अपने होश खाने लगता है। पहले तो वह प्रलाप की अवस्था में जाता है, फिर कभी ह¡सना, अकारण रोना, दा¡त काटते दौड़ना आदि क्रिया करने लगता है। ऐसे में उसे लक्षणों के हिसाब से अगर होमियोपैथी दवा दी जाए, तो उसे का¡के और आगरा जाने से बचाया जा सकता है। पागलपन की ऐसी अवस्था में बेलाडोना हायोसायमस और स्ट्रैमोनियम को लक्षणों के हिसाब से दिया जाना चाहिए। डॉण् नैश इन तीनों दवाओं को पागलपन की मुख्य प्राथमिक दवा मानते हैं। किसी भी बीमारी में अप्रत्याशित तेजी के लिए बेलाडोना को याद किया जाता है। अगर रोगी हर काम बहुत तेजी से करे, अचानक अपना गला दबाने की कोशिश करे, या सामनेवाले को अपनी हत्या करने को कहे, खाना खाने की जगह प्लेट-चम्मच चबाने की कोशिश करे, तो ऐसे में बेलाडोना 30 की कुछ खुराकें उसे नियंत्रित कर सकती हैं। रोगी की आ¡खें लाल हों और वह एक जगह नजर गड़ा कर देखता हो, अपने कपड़े फाड़ डालता हो और किसी के द्वारा माने जाने के काल्पनिक भय से इधर-उधर भागता हो, तो ऐसे में बेलाडोना ही काम करता है।
पागलपन का रोगी अगर उतना हिंसक न हो, बल्कि उनके मनोविकार ज्यादा प्रकट हो रहे हों, जैसे अकारण ह¡सना, गाना, बेहूदी बातें करना, उड़ने का अनुभव करना आदि, तो ऐसे में हायोसायमस 30 की कुछ खुराकें उसे नियंत्रिात कर सकती हैं। हायोसायमस के मूलार्क के कुछ चम्मच पी लेने से स्वस्थ आदमी में भी ये लक्षण उभर सकते हैं।
पर विकट पागलपन की दवा है स्ट्रोमोनियम। इसमें रोगी की बकवास की प्रवृत्ति ऊपर की दोनों दवा से ज्यादा होती है। स्ट्रेमो रोगी अ¡धेरे से डरता है जबकि बेला का रोगी अ¡धेरा पसन्द करता है। स्ट्रेमो रोगी बेला के विपरीत अकेला रहना नहीं चाहता है।
अगर रोगी आत्महत्या के इरादे से भाग जाने की फिराक में रहता हो और इसमें बाधक बननेवाले की हत्याकरने की बात करता हो, तो ऐसे में मेलिलोटस 6 की कुछ खुराकें उसे शान्त करती है। मेलि रोगी को लगता है कि उसके पेट में कुछ गड़बड़ है। उसमें भूत बैठा है। पर रोगी पागल हो जाने की आशंका खुद व्यक्त करता हो या उसका समय जल्दी नहीं बीतता प्रतीत होता हो या अपना रास्ता उसे अनावश्यक लम्बा लगता हो, तो ऐसे में भुलक्कड़ रोगी को कैनेबिस इंडिका का मूलार्क या 6 पावर की दवा लेनी चाहिए। अगर किसी को लगे कि वह बहुत धनी हो और अपने नए कपड़े भी वह जोश में फाड़ डाले या पुराने कपड़े में खुद को राजा महसूस करे, तो उसे सल्फर-1 एम की एक खुराक देकर देखें।