अप्रैल 2008 के लिए पुरालेख

>आ अब लौट चलें – कुमार मुकुल

अप्रैल 19, 2008

>जब घर की याद सताए

होमियोपैथी में किसी रोग विशेष का इलाज नहीं कियाजाता बल्कि इसमें रोगी के लक्षणों के आधार पर दवा का चुनाव किया जाता है। फिर वैसे ही लक्षण पैदा करनेवाली दवा की खुराकें देकर उस लक्ष‍ण को दूर किया जाता है। इस तरह रोग भी जड़ से दूर हो जाता है। आयुर्वेद की तरह होमियोपैथी में भी इलाज `टिट फॉर टैट´ (जैसे को तैसा) के सिद्धान्त पर होता है, जिसे हमारे यहा¡ `विष: विषस्य औषधम´ का सिद्धान्त भी कहा जाता है। पर जहां आयुर्वेद में खुराक थोड़ी मोटी होती है, वहीं होमियोपैथी में सूक्ष्म खुराकें देकर रोगी को स्वस्थ किया जाता है।
होमियोपैथी में माना जाता है कि पहले किसी भी व्यक्ति में आई गड़बड़ी अपने मनोवैज्ञानिक लक्षण प्रकट करती है। फिर यही लक्षण, जब दवा दिए जाते हैं, तो कई तरह के विकार पैदा होते हैं। या ये मनोवैज्ञानिक लक्षण भी समय के दबाव में बदलते रहते हैं।
ऐसे में बदलते लक्षणों के अनुसार होमियोपैथ दवाओं में परिवर्तन कर उसे दूर करते हैं।
अब अगर आज अपने गांव-घर से दूर कहीं विदेश में आप फंसे हैं, और आपमें घर लौट चलने की इच्छा प्रबल हो रही हो, तो इसे भी होमियोपैथी में एक लक्षण माना जाएगा और इसका इलाज कर आपको संभावित बीमारियों से बचाया जाएगा।
ऐसे लड़के-लड़कियों के लिए जो पढ़ाई के लिए हॉस्टल में डाल दिए गए हों, और वहां उनका मन नहीं लग रहा हो, घर की याद सता रही हो, वे घर भाग जाना चाहते हों, तो उन्हें कैपसिकम-6 की कुछ खुराकें रोज दीजिए। उनका घर वापसी का विचार इससे थमेगा और वे पढ़ाई में मन लगा सकेंगे। ऐसे रोगियों के गाल लाल होते हैं और घर की याद में उन्हें नींद नहीं आती।
पर किसी रोगी में होम सिकनेस हो और घर की याद करते वक्त उस पर एक अनाम उदासी तारी हो जाती हो, ऐसे में आप मर्क सोल-30 को याद कर सकते हैं। ऐसे लोगों में घर को लेकर एक नॉस्टेल्जिया विकसित हो जाता है, जिसे यह दवा दूर कर रोगी को सामान्य होने में मदद करती है।
घर की याद में अगर कोई रोगी अपने आवेगों को संभाल नहीं पाता हो और रोने लगता हो, तो ऐसे लड़के या लड़की को मैग्निशिया म्यूर-200 की एक खुराक तीसरे दिन दिया करें। उसका रोना-धोना घट जाएगा।
पर घर की याद में अगर मन-मस्तिष्क पर दबाव ज्यादा पड़े और परिणामत: उसकी भूख ही मारी जाए, तब आप एसिड फॉस की पहली पोटेंसी का प्रयोग कर सकते हैं या किसी भी रोग में अगर घर लौटने की इच्छा प्रबल हो, तो आप उसे इस दवा से ठीक कर सकते हैं।

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>गैस भी हृदय रोग का कारण बन सकता है – कुमार मुकुल

अप्रैल 14, 2008

>पेट में गैस बनने से कई तरह की परेशानिया¡ पैदा होती हैं। सिर दर्द, पेट दर्द से लेकर हृदय दर्द तक के मूल में पेट में गैस का बनना हो सकता है। एक हृदय रोगी छाती में दर्द से परेशान थे। वे डीएमसीएच और एम्स में अपना इलाज करा रहे थे। साल भर पहले उन्हें हृदय रोग ने परेशान किया था। तब वह आरिम्भक अवस्था में था और एम्स (दिल्ली) में इलाज के बाद नार्मल हो गया था। इधर फिर जब दर्द हुआ और जांच हुई तो हृदय स्वस्थ पाया गया और दर्द का कारण शान्त नहीं किया जा सका।
रोगी की जब मुझसे भेंट हुई, तो मैंने लक्षणों के आधार पर उन्हें जैल्सीमियम 30 और कैक्‍टस 30 दिया। उनकी बीमारी थी कि मोटरसाइकिल पर बाहर घूमते-फिरते रहने पर वे स्वस्थ रहते हैं, पर घर में आते ही चक्कर और दर्द बढ़ जाता है। हृदय में जकड़ने के लक्षण भी थे। इन दो दवाओं से स्थिति नियंत्रण में आ गई। पर अब भी दर्द जा नहीं रहा था। फिर मेरा ध्‍यान कार्बोवेज पर गया। इसमें था कि गैस के कारण हर्ट पर दबाव बढ़ जाता है। और परेशानी बढ़ जाती है। तब रोगी को कार्बोवेज 30 दिया गया। इससे स्थिति काबू में आ गई। आगे एम्स में भी चिकित्सक इसी नतीजे पर पहुंचे कि उनका हर्ट स्वस्थ है और दर्द का कारण कहीं पेट में है। तब कारण पता करने के लिए रोगी का बेरियम टेस्ट किया गया। इस टेस्ट में रोग का कारण गैस ही निकला।
गैस से हुई परेशानी में अगर हम शरीर के हिस्सों को ध्‍यान में रखें, तो तीन दवाओं से रोग का निराकरण किया जा सकता है। अगर गैस के चलते पूरे पेट में ऊपर पसली से लेकर नीचे बड़ी आंत तक परेशानी हो, तो रोगी को चायना दी जा सकती है। ऐसे में अगर रोगी पतला हो और उसे कमजोरी से चक्कर आते हों, तो उसे चायना 6 की दस बूंदें सुबह व शाम कुछ सप्ताह दी जानी चाहिए।
पर अगर गैस के चलते परेशानी पेट के निचले हिस्से में हो और दबाव बड़ी आंत पर ज्यादा हो, तो लाइकोपोडियम 30 से उसका उपचार किया जा सकता है। पेट अगर साफ नहीं होता हो और आपको कई बार पाखाना जाना पड़ता हो, तो इसमें भी लाड़ को कम करता है। ऐसे में नक्स वोमिका भी काम करती है और आप लक्षणों के आधार पर उनसे कोई दवा चुन सकते हैं।
गैस का दबाव अगर केवल छाती के ऊपरी क्षेत्रा में हो और पसली के नीचे दबाव ज्यादा हो और हृदय का भी दबाव पड़ रहा हो, तो आप कार्बोवेज का प्रयोग कर सकते हैं। लाइको की तरह कार्बोवेज भी गहरा असर करनेवाली दवा है।
गैस में इन दवाओं के साथ आपको खान-पान पर ज्यादा ध्‍यान देना होगा। एक सलाह जो आम है कि आप सुबह में मुंह धो‍कर एक गिलास सत्तू जरूर पी लें। चाय आप कम पीएं और तला हुआ न खाएं।

>एक तथाकथित कवि

अप्रैल 2, 2008

>दैनिक अमर उजाला में ज्ञानोदय विवाद के समय चर्चित कवि-पत्रकार विमल कुमार ने साहित्‍य में मारधाड़ और सनसनी की शैली को स्‍थापित करने के लिए रविन्‍द्र कालिया की खबर ली थी। पर शशिभूषण के आत्‍मवक्‍तव्‍य के बाद यह साफ हो गया है कि मारधाड़ साहित्‍य में ही नहीं उसके बाहर हकीकत में भी जारी है। इससे पहले रमणिका गुप्‍ता ने अपने यहां रहते समय हरे द्वारा वहां की आदिवासी लड़कियों से मारपीट की बात करते हुए कहा था कि निर्मला पुतुल के साथ उसने पहले तो मेरा निवास छोड़ा फिर एक दिन निर्मला को मारपीट कर बाहर कर दिया, सवाल किसी पुरस्‍कार में निर्मला को मिले पैसे का था। उसके बाद आज तक निर्मला यहां दिखी नहीं है ,सच्‍चाई तो वही बता सकती हैं। पर यह पत्र और तमाम प्रकरण इसकी पुष्‍टी करते हैं। जनमत के संपादक सुधीर सुमन ने भी कहा था कि वह संगठन की लड़कियों को अश्‍लील मैसेज किया करता था । शशिभूषण से मेरा ज्‍यादा साबका नहीं है,कुल चार-पांच मुलाकातें होंगी कादम्बिनी और हंस की। पर पिछले सप्‍ताह उनका कहानी पाठ युवा रचनाकारों की साप्‍ताहिक गोष्‍ठी में रखा गया था। इससे पहले भी राकेश बिहारी,पंखुड़ी सिन्‍हा,अरविन्‍द शेष,कविता,उमाशंकर , अजया नावरिया आदि का कहानी पाठ वहां हो चुका था। शशीभूषण के पाठ के समय वहां अच्‍युतानंद मिश्र,अरविन्‍द शेष,कुमार मुकुल,प्रेम भारद्वाज,उमाशंकर आदि मौजूद थे। लोगों ने जब उनके जबड़े का हाल पूछा तो थोड़ी परेशानी के बाद उन्‍होंने सारी बात बतायी कि यह टूटा नहीं है , तोड़ा गया है । तब सबने कहा कि वे अपना बयान दें तो हम सब उसे पाठकों तक ले जाएं। आगे बैठक में रोहित प्रकाश,राजीवरंजन गिरी,मृत्‍युंजय आदि भी आ पहुंचे थे। इस बीच इसी मुद्दे पर इंडिया टूडे में जितेन्‍द्र श्रीवास्‍तव,लालबहादुर ओझा आदि से भी इस पर बातें हुई तो वे भी इसे सामने लाने को लेकर चिंतित थे। श्रीवास्‍तव ने अपनी नयी आलोचनात्‍मक किताब दिखाते कहा भी कि देखिए इसमें मेरा मूल लेख है जिसमें कवि हरेप्रकाश का नाम नहीं है उसे रवीन्‍द्र कालिया ने जोड़ दिया था हरे के दबाव में। यहां नीचे हरे के लेखन का नमूना इसलिए दिया जा रहा है कि वे अंदाजा लगा सकें कि ज्ञानोदय के विवाद के पीछे कौन था , जैसी कि शिरीष मौर्य ने आशंका जताई थी। हरे के गाली प्रेम के बारे में विजय कुमार, कर्मेंन्‍दु शिशिर आदि तो बताते ही रहे हैं। पंकज चतुर्वेदी ने मेरे और मदन कश्‍यप के सामने पीकर रात में गालियां बकने को लेकर हरे से सफाई मांगी थी। सवाल है कि यह सब कम बेशी चलता रहता है पर जब वह मारधाड़ की सीमा में प्रवेश करने लगे तो इस पर विचार तो करना होगा-क्‍योंकि इहां कुम्‍हड़ भतिया कोउ नाहिं…। भोजपुरी में कहावत भी है – कि गारी ह तरकारी पर मार बड़ भारी। पर क्‍या अब साहित्‍य यही सब होना बाकी रह गया है।

कथादेश के दफ्तर में महीनों पहले एक संध्‍याकालीन गोष्‍ठी में नामवर सिंह,विश्‍वनाथ त्रिपाठी,कमला प्रसाद,अरूण प्रकाश,रवीन्‍द्र त्रिपाठी ,रणेन्‍द्र और हरिनारायण जी के साथ संयोग से मैं भी उपस्थित था। उसमें ज्ञानोदय विवाद का जिक्र चलने पर नामवर जी ने कहा था कि मेरे वक्‍वव्‍य को ज्ञानोदय में गलत तरीके से छापा गया। मैंने कालिया को संबोधित करते कहा था कि – तूने जाने क्‍या चुना है यह किधर का रास्‍ता…। पर इसे हरे प्रकाश ने अपनी टिप्‍पणी का शीर्षक बना दिया। जब कि वह मेरा वक्‍तव्‍य था। अब इस सारे प्रकरण को सामने आने के बाद यह साफ है कि इस सारी गड़बडी के पीछे हरे के लटके हैं । आरा के कवि कुमार वीरेंद्र हरे के साथ मिलने पर मजाक करते थे अक्‍सर कि हरे की माया अपार है। तेा लीजिए अब उस माया को पारघाट लगाने का समय आ गया है।

हरे के सैकड़ों किस्‍से हैं कारस्‍तानियों के । जब समकालीन कविता से इसे निकाला गया तो ये जनाब विनय कुमार को गीदड़ भभकियां दूसरे से भिजवाते थे कि डाक्‍टरवा की गाड़ी का शीशा फोड़वा देंगे। बाद में विनय कुमार से फिर संबंध विकसित किया इसने जब देखा कि कवि गजलकार के रूप में उनका कद आगे बढा। फिर भी जब यह मुझसे मिलता तो अचानक कह देता डाक्‍टरवा को कहो कि ठीक से खर्च करे पत्रिका पर आदि आदि। इसी तरह मंडलोई मेरे पड़ेासी हैं और जब तब उनसे मुलाकात होती है तो एक दिन इसने कहा- मंडलोई … है वह अगर चाहे तो महीने में दो हजार का काम दे सकता है दूरदर्शन में। ऐसे में मैं अचानक कुछ बोल नहीं पाता था क्‍येां कि यह अचानक रंग बदलता। हालांकि विष:विषस्‍य औषधम का सिद्धांत है मेरा तो मुझे सख्‍त होते देर नहीं लगती क्‍येांकि मुझे भले आदमी कि वह परिभाषा पसंद है जिसमें ब्रेख्‍त कहते हैं कि भला वह है जिसे देख दुष्‍ट डरें और भले खुश हेां। इसलिए मैंने खुद इससे दूरी बना ली। कादंम्बिनी में इसे पहचानना छोड़ दिया। यों इसका यह खुद महारथी है स्‍वतंत्र‍ मिश्र,अच्‍युतानंद,रमेश प्रजापति आदि इसके अशोभनीय व्‍यवहार की बातें कर चुके थे इसलिए भी मैं दूर हुआ इससे। इससे मेरा परिचय भी दिल्‍ली का ही है। पटना में गिनती की मुलाकातें हैं। क्‍यों कि बहुत छोटा है यह। हैदराबाद में था तो इसकी चिटिठयां आती थीं – आदर्य भैया कर के। बातें बहुत हैं हरि अनंत … या खल अनंत…। तो और लोग भी आगे कहेंगे। इतना सारा इसलिए कि किसी की जान को खतरा पहुंचाने की हद तक जा पहुंची इस सत्‍यकथा की परख जरूरी है जिससे ऐसी कूढमगजी में आगे समय जाया ना हो। एक और बात कुणाल द्रारा मुझे भेजे गए गंदे मैसेज के पीछे भी यह था क्‍येांकि उससमय ये साथ ही आसपास रहते थे। पर कुणाल से मेरी ऐसी कोई बात नहीं थी कि वह अचानक पहली बार मुझे गंदे मैसेज भेजे। उसकी कहानियां मुझे प्रिय हैं । शायद अब वह इस घनचक्‍कर से निकल गया हो। तो पढिए आगे की पोस्‍ट में शशीभूषण का आत्‍मवक्‍तव्‍य…

महिलाओं को लेकर हल्‍की बातें करने की शिकायत मुझसे बोधिसत्‍व ने भी की थी चैट पर, वह अभी सुरक्षित है मेल में मेरे -कुमार मुकुल

हरे वचन – लटके झटके – हरेप्रकाश उपाध्‍याय के ब्‍लाग से

निर्मला जीं की कविताएँ तो फिर कभी , अभी तो मैं उस आलोचक महोदय पर कविता लिखूंगा , जब तक कविता नहीं लिख लेता ब्लॉग पर नहीं आऊंगा । कविता लिख लिया तो इस ब्लॉग पर पोस्ट कर दूंगा । इससे उनका कुछ नहीं उखडेगा। लेकिन उससे क्या उनहोने मेरा ही क्या उखाड़ लिया है ? चलिए इसी बहाने एक कविता तो लिखूंगा ।

चर्चित युवा कवि रवीन्द्र विदिशा के हैं . अभी भोपाल मे अख़बार मे काम करते हैं , पहले मास्टरी करते थे , मन नही लगा तो छोड़कर कुछ दिन आकर दिल्ली मे भांड भी झोका और दिल उचटा तो भोपाल चले गए वैसे भोपाल मे पहले भी आलू-प्याज बेचा है . खाने मे मुर्गे का मांस और पीने मे बियर पसंद करते है , जब भी थोडी सी पीते है , ग़ालिब इन्हे बहुत याद आते है . इनका मोबाइल -०९८२६७८२६६०). हाँ शादी -शुदा है , इसलिए लड़कियां इन्हे फोन न करें , इनकी प्रेमिका सह बीबी भी कविताएँ लिखती हैं और खूब लिखती हैं

आप मेरे बारे में सब जानते हैं बल्कि मुझसे जयादा जानते हैं । मेरे बारे में ब्लाग पर भी छपते रहता है , अखबारों में छपता है । टीवी में कुछ नही आता , सब टीवी वाले मुझसे जलते हैं । खैर उससे कुछ नही होगा मैं बड़ा आदमी हूँ तो हूँ , आपके कहने या नही कहने से छोटा थोड़े हो जाऊंगा और जब मैं इतना बड़ा आदमी हूँ तो अपने बारे में मैं खुद क्यों कुछ बताऊं ?

प्रिय साहित्य भेजने के लिए आभार । कृतज्ञ हूँ जितेंद्र जी मैं । हिंदी में जारी चुतियापा से दूर रहकर और कुछ अच्छा करें और मुझे भी सहभागी मानें और बनायें ।

दरअसल मैं एक समुद्री यात्रा पर चला गया था । वहाँ मैं अपना ब्लॉग भला कैसे देखता या आपका ही कैसे देखता । समुद्री यात्रा में मेरा कुछ नहीं उखडा , मोबाइल और डूब गया ।

शिरीष कुमार मौर्य

कोई कहता है उसका नाम काट दिया गया तो कोई बताता है कि उसका नाम आगे से पीछे धकेल दिया गया। कहीं से खबर मिली कि कहानीकारों के वे दिलचस्‍प परिचय दरअसल एक प्रतिभाशाली युवतर कवि के बेहद उर्वर दिमाग की उपज हैं।

ज्ञानरंजन-रविन्‍द्र कालिया को सं‍बोधित

तुम दो चार अपने पिछलग्‍गुओं को तो देखो कि वे किस तरह से कुछ टुकडों के लिए सारा जीवन साहित्‍य में संघर्षशील रहे विजय कुमार पर हमला कर रहे हैं।

अविनाश के ब्‍लाग मोहल्‍ला पर हरेप्रकाश को संबोधित कुमार मुकुल के वक्‍तव्‍य के अंश

पुरस्कार आदि तो मिल ही जाते हैं, आप भी झटक ही लेंगे। झटकना शब्द बुरा तो नहीं लगा? पर हुजूर, आपने ही राष्‍ट्रीय सहारा में सविता सिंह पर लखटकिया पुरस्कार झटकने का फिकरा कसा था।

पर बेवक्त का धमकी भरा फोन, गंदा मैसेज हमें रास नहीं आता। आलेखों से पंक्तियां और नाम काटना जोड़ना भी आप सीख ही गये होंगे। देवी प्रसाद मिश्र और अनिल त्रिपाठी ने नया ज्ञानोदय में हुई ऐसी खुराफातों पर बात की तो मुझे आश्‍चर्य हुआ था, पर अब नीलाभ का संस्मरण पढने के बाद मेरा वहम जाता रहा।

सीखना हो तो दूर जाने की जरूरत नहीं, जितेन्द्र श्रीवास्तव से ही आप विशाल हृदयता की सीख ले सकते हैं। आपने अंकुर मिश्र सम्मान वाले भाषण में उन्हें शहर में लोटा, लालटेन, पीढ़ा नहीं होने का विलाप करने वाले कवि के रूप में चिन्हित किया था। रचना समय में उनकी कविताएं इधर पढ़ी, तब आपके भाषण का भेद खुला। पर जितेन्द्र जी ने अपने लेख में जिन अच्छे कवियों की लिस्ट निकाली है, उसमें पहला नाम आप ही का है।

कवियों में तुनुकमिजाजी, नफरत की वकालत करते हुए आपने गालियां पढ़ने की जो अप्रतिम सलाह दी थी अपने भाषण में, उस पर आपलोगों ने शब्‍दश: अमल शुरू कर दिया है और यह अच्छा है।

कुमार विकल को भी आप बहुत पसंद करते हैं। गालिब को भी बहुत कष्‍ट देते हैं। राजकमल चौधरी को भी थोड़ा पढ़ लीजिए तो कॉकटेल लेखन में सहूलियत होगी। हां, इसका ध्यान रखिए कि इनलोगों ने मयखोरी के मुकाबले लिखा जोरदार है और ये काकटेल पीते भले हों, लिखते नहीं थे। कुमार विकल की पंक्तियां यहां याद आ रही हैं- शहर का नाम जंगल हो/ आदमी के बस मुखौटे हों/ सुविधाएं सभी सुअर की हों/ इसी मंगलव्यवस्था के लिए/ राजसत्ता से कारखानों तक/ पूजागृहों से शराबखानों तक/ एक खुश आदमी दनदनाता है। अब तय आपको करना है कि आप आपातकाल के नायकों को मानदंड बनाने वालों की ओर से पत्रिका का बाज़ार बढ़ाने के लिए लेखन के नाम पर मॉडलिंग की तत्काल सेवाएं देते रहेंगे या अपने प्रखर भाषण को तरजीह देंगे।