>पीपल की होली – ‘सभ्‍यता और जीवन’ से एक कविता – कुमार मुकुल

>यूकलिप्‍टस के पड़ोसी पीपल नेअबके होली में वो रंग जमायाकि उसके सारे साथी दंग रह गएसहस्‍त्रबाहु सी भुजाओं सेछिड़क रहा था वह सुग्‍गापंखी रंगसुनहली आभा से दिप रहा था अंग-अंग उसकाअतिथि तोता-मैना और काली कोयलियासब लूट रहे थे महाभोज का आनंदपरसने का अंदाज भी था नयाहर शाखा पर पुष्‍ट पकवान थे बफेडिनर की तरहबस खाने का ढ़ंग था हिन्‍दुस्‍तानी प्‍योरचोंच के आगे क्‍या चम्‍मच का चलता जोरभोजनोपरांत अतिथियों ने गाया समूहगानमस्‍ती में डूब गया सारा जहानपता ही ना चला कैसे बीता दिनचांदनी से कब चह-चहा गया आसमान।समुद्र के आंसू के बाद सभ्‍यता और जीवन मेरी किशोर से युवा होते कवि की कविताओं का दूसरा संकलन था जिसे पूर्व की तरह पिता ने छपवाया था। 1990 में जब यह छपा था तब मैं सहरसा छोड़ पटना आ चुका था। पटना में आते ही सायंस कालेज में हिन्‍दी के प्राध्‍यापक और हिन्‍दी की उस समय की तमाम पत्र-पत्रिकाओं पहल,आलोचना आदि में आलोचना लिखने वाले भृगुनंदन त्रिपाठी के साथ मेरा रोज का घूमना शुरू हुआ। संकलन पढ़ उन्‍होंने राय दी कि तुम्‍हारे यहां दर्शन कविता पर हावी होता दिखता है उससे बचो , इस संकलन को स्‍थगित कर दो और जमकर पढो लिखो। मैंने उनकी बात पर अमल किया। संकलन कहीं समीक्षा के लिए नहीं भेजा यूं ही कुछ जगह भेजा जहां से पत्र आए उत्‍साहित करने वाले। इस पुस्‍तक पर ब्‍लर्ब इन्‍दौर प्रलेस के अध्‍यक्ष और कवि रामविलास शर्मा ने लिखा था। मैं पहले उन्‍हें आलोचक रामविलास शर्मा समझता था पर नवभारत टाइम्‍स में जब एक लेख छपा कि रामविलास शर्मा दो हैं तब मैंने यह बात जानी। पर शर्मा जी से मुझे पर्याप्‍त स्‍नेह मिला।

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2 Comments »

  1. >पीपल का होली भोज पसंद आया । धन्यवाद ।

  2. 2

    >पीपल की होली कविता पढ़ी, दिल को छू गयी। उम्मीद है आपकी कविताएं आगे पढ़ने का सौभाग्य मिलेगा। आपका -पवन निशान्त


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