>समुद्र के आंसू – सम्‍मति – डॉ.प्रभाकर माचवे

>एक दिन मैंनेपूछा समुद्र सेदेखा होगा तूने, बहुत कुछआर्य, अरब, अंग्रेजों का उत्‍थान-पतनसिकन्‍दर की महानतामौर्यों का शौर्य,रोम का गौरवगए सब मिट, तू रहा शांतअब,इस तरह क्‍यों घबड़ाने लगा हैअमेरिका , रूस के नाम से पसीनाक्‍यों बार-बार आने लगा हैमुक्ति सुनी होगी तूने, व्‍यक्ति कीबुद्ध,ईसा,रामकृष्‍णसब हुए मुक्‍तदेखो तो आदमी पहुंचा कहांवो ढूंढ चुका है, युक्तिमानवता की मुक्ति काअरे, रे तुम तो घबड़ा गएएक बार, इस धराधाम की भीमुक्ति देख लोअच्‍छा तुम भी मुक्‍त हो जाओगेविराट शून्‍य की सत्‍ता सेएकाकार हो जाओगेलो,तुम भी बच्‍चों सा रोने लगेमैंने समझा था,केवल आदमी रोता हैतुम भी, अपना आपा इस तरह खोने !1987 में जब यह कविता लिखी थी और मेरे पहले संकलन समुद्र के आंसू में छपी तब वरिष्‍ठ कवि केदारनाथ सिंह का काफी प्रभाव था मुझ पर, इस कविता पर भी उसे देखा जा सकता है। उस समय इस पुस्‍तक को पढकर कवि आलोचक प्रभाकर माचवे ने एक पत्र लिखा था जिसमें एक जगह जहां उन्‍होंने प्रूफ की भूलें लिखीं वहीं अन्‍य कविताओं पर आलोचनात्‍मक राय भी दी। एक प्रकाशनार्थ सम्‍मति भी अलग से लिख दी थी जो उस समय छपने-छपाने की बहुत जानकारी और रूचि के अभाव के चलते कहीं छपी नहीं थी जब कि संग्रह की एक समीक्षा तब पटना से निकलने वाले दैनिक हिंदुस्‍तान में कवि मुकेश प्रत्‍यूष ने लिखी थी।प्रकाशनार्थ सम्‍मतिश्री अमरेन्‍द्र कुमार मुकुल का प्रथम कविता संग्रह समुद्र के आंसू श्री रंजन सूरिदेव तथा डॉ कुमार विमल की अनुशंसासहित प्रकाशित हुआ है। इसमें कवि के इक्‍यावन भावोद्गार हैं। इस संग्रह के अंतिम कवर पर छपी पंक्तियां सर्वोत्‍तम हैं – तुझे लगे/दुनिया में सत्‍य/सर्वत्र/हार रहा है/समझो/तेरे अंदर का/झूठ/तुझको ही/कहीं मार रहा है। सच-झूठयुवा बेरोजगार,खबर,चुनाव,मेरा शहर,रोल,बेचारा ग्रेजुएट,अपना गांव,सवालात में यथार्थ और व्‍यंग का अच्‍छा सम्मिश्रण है।ये रचनाएं चुभती हैं।कवि के अगले संग्रहों में और अच्‍छी कविताओं की आशा रहेगी।कविता न केवल वक्‍तव्‍य हेाती है,न राजनैतिक टिप्‍पणी।तत् त्‍वम् असि जैसी रचना से आशा बंधती है – प्रभाकर माचवे / नई दिल्‍ली / 3-1-88

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